Saturday, October 3, 2026

कवि पत्रिका

विष्णु चंद्र शर्मा ने मासिक पत्र 'कवि' सन 1957 में प्रकाशित करना शुरू किया था। (विष्णु चंद्र शर्मा, 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन', आजकल : अप्रैल 2018) 'कवि' सच्ची लघु पत्रिका थी। लघु पत्रिका का आदर्श, एक देशभक्त, जीवन प्रेमी कवि द्वारा सम्पादित-निहायत सीमित साधनों से। विष्णुचंद्र शर्मा की नौकरी नहीं थी। वे तो पढ़ रहे थे। (विश्वनाथ त्रिपाठी, 'बना रहे बनारस', आलोचना, जनवरी-मार्च 2008, पृष्ठ 27) 'कवि' की शुरुआत की कहानी विष्णुचंद्र शर्मा ने खुद लिखी है : "मां तब जीवित थीं। मैंने कुछ रुपये 'कवि' के लिए उनसे मांगे थे। पिता की मौत के बाद वह खुद अपने को असहाय मानने लगी थीं। मुझे याद है उनके पास सोने की एकमात्र करधनी थी जो पिता की जेल यात्रा के समय नानी की प्रति-उत्पन्न मति के कारण बच गई थी। मां ने दूसरे दिन वह करधनी बेच दी थी। उस धन का मां ने चार हिस्सा किया था। एक हिस्से से कवि के कुछ अंक छपे थे।" (विष्णुचंद्र शर्मा, पूर्वोद्धृत)

विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है : "विष्णुचन्द्र शर्मा एक दिन रात को दस बजे गुर्टू हॉस्टेल में मेरे कमरे में आए। तेजी में थे। मेरा उनसे तब तक परिचय तो था लेकिन बस परिचय ही था। तपाक से बोले-तुमने कोई कविता लिखी है ‘परिवार’। नामवर तारीफ कर रहे थे। लाओ कवि निकालने जा रहे हैं, छापेंगे। इतने अधिकार से उन्होंने यह सब कहा कि मैं भाव-विभोर हो गया। कविता छपी। कविता की कुंडली अच्छी थी। अयाचित यश मिला।" (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

‘कवि’ दो आने में मिलता था। इतने कम दाम की कोई पत्रिका न उसके पहले कोई थी न बाद में हुई। पत्रिका की इतनी कम कीमत पर राहुल जी ने भी प्रसन्नता जाहिर की थी। पत्रिका एक फर्मे की थी। सारा काम-पैसा, सामग्री जुटाना, कागज, छपाई, वितरण, प्रूफ-विष्णुचन्द्र शर्मा ही करते थे। नामवर जी उसके हर अंक में लिखते थे। मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र, नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, कीर्ति चौधरी, रघुवीर सहाय विशेष कवि के रूप में प्रस्तुत किए गए। इन पर त्रिलोचन शास्त्री, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, डा. रामअवध द्विवेदी ने लिखा। भवानी प्रसाद मिश्र पर पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना लिखी-देखने में गद्य, पढ़ने में कविता बिल्कुल भवानी प्रसाद मिश्र की शैली में-जैसा बोलता है लिख और उससे भी बड़ा तू दिख।

‘कवि’ में कोई विज्ञापन नहीं छपता था। आज जिनको लघु पत्रिकाएं कहा जाता है उनमें से अधिकांश विज्ञापन बटोरू हैं। ‘कवि’ उन लघु पत्रिकाओं की आदि पत्रिका है जिन्होंने इस देश में ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को निभाया है। विश्वनाथ त्रिपाठी की जानकारी में मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं पर ‘कवि’ में पहली बार विचार किया गया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत) विचारक नामवर सिंह थे। रघुवीर सहाय उन दिनों तक नामवर जी के प्रिय कवि हो गए थे। केदारनाथ अग्रवाल की जनवादिता में सौंदर्य के तत्व ढूंढ़ने का उपक्रम केदारनाथ सिंह ने किया।

उन दिनों प्रगतिशील साहित्यकारों के पास शायद ही कोई पत्रिका रही हो। 'कल्पना', 'धर्मयुग', 'ज्ञानोदय' सबको-प्रगतिशीलों को भी छापती थीं। किन्तु उनमें प्रगतिशील एवं वामपंथी विचारधारा का प्रच्छन्न विरोध भी चलता था। शिवदान सिंह चौहान के हाथ से 'आलोचना' निकल गई थी। इस वातावरण में दुअन्नी की काव्य पत्रिका ‘कवि’ ने अपनी गम्भीरता और ताजगी से साहित्यकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि प्रगतिशील आंदोलन में नई जान फूंक दी और आज की लघु पत्रिका की लहर का प्रवर्तन किया। कम पैसे से भी अच्छी साहित्यिक पत्रिका निकाली जा सकती है-इसका रास्ता सुझाया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

हिंदी के कवियों की नई पीढ़ी ने इसमें विशिष्ट सहयोग दिया। सुखद आश्चर्य यह है कि पुरानी पीढ़ी और विश्वविद्यालय के आचार्यों ने भी इसकी सराहना ही नहीं की, इसमें सकर्मक योगदान किया। 'कवि' पत्र पर विष्णुचंद्र शर्मा को राहुल जी का भी एक उत्साहवर्धक पत्र (20/8/57) प्राप्त हुआ था। तब राहुल हार्न क्लिप, हैपी वैली, मसूरी में थे। पत्र निम्नवत है : 

"प्रिय शर्मा जी, 

'कवि' के पांच अंक मिले। कविताओं को देखकर खुशी हुई ही, साथ ही यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई, कि पत्र का मूल्य इतना रखा गया है जिसका भार पाठक आसानी से वहन कर सकता है। हमारी कविताओं के लिए ऐसे एक पत्र की बड़ी आवश्यकता थी। 

मेरी हार्दिक कामना है, कि पत्र दीर्घायु हो। 

आपका

राहुल (आजकल : अप्रैल 2018 में उद्धृत)

‘कवि’ में अनेक नए लोगों को रचनात्मकता की शिक्षा-दीक्षा भी दी। कवि जैसी एक फर्मे की पत्रिका में नेरूदा, जिम हिक्यट, वाल्ट ह्विटमैन, ऑस्कर वाइल्ड आदि कवियों के उत्कृष्ट काव्यानुवाद प्रकाशित हुए। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

'कवि' के केवल 11 अंक निकले। अन्तिम अंक संयुक्तांक था। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 28)

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