Friday, July 23, 2010

नेहरु से बेहतर कोई नहीं जानता


किसी को यह बताने की जरूरत नहीं कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु जितने बड़े राजनेता थे, उतने ही बड़े रचनाकार भी। एक ओर उन्होंने जहां अपने राजनीतिक चिंतन से समाज को सुंदर बनाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर मेरी कहानी, हिन्दुस्तान की कहानी तथा विश्व इतिहास की झलक जैसी महत्त्वपूर्ण कृतियों से अपनी रचनात्मक प्रतिभा की भी धाक जमायी।
हिन्दुस्तान की कहानी विश्व साहित्य की अत्यंत ही प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुस्तकों में से एक है। यह किताब नेहरु जी ने अहमदनगर किले के जेलखानों में अप्रैल से सितंबर 1944 के पांच महीनों में लिखी थी। जेल की तंग दीवारों के बीच कैद होने पर भी पंडित जी इस पुस्तक में ‘भारत की खोज’ की अनंत और दुर्धर्ष यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इतिहास के विविध दौरों से परिचय कराते हुए वह इसे आधुनिक काल और उसकी बहुमुखी समस्याओं तक ले जाते हैं और फिर भविष्य की झांकी दिखाकर हमें खुद सोचने-समझने को प्रेरित करते हैं। नेहरु जी की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक मेरी कहानी (सस्ता साहित्य मंडल ने हिंदी में आत्मकथा इसी नाम से प्रकाशित की है।) भी जून 1934 से फरवरी 1934 के बीच जेल ही में लिखी गई और विश्व इतिहास की झलक जेल से लिखे पत्रों का एक शानदार संकलन है। जेल ही से लिखे पत्रों का एक छोटा किंतु अतुलनीय महत्त्व का संकलन पिता के पत्र पुत्री के नाम भी है। इस संकलन के पत्र नेहरु, इंदिरा को तब लिखे थे जब वह मात्र नौ-दस वर्ष की बालिका थी। तब वह इंदिरा नहीं इंदु थी। इन पत्रों के माध्यम से नेहरु जो विषय/प्रश्न उठाते हैं वे बड़े ही गंभीर हैं। अपनी इतिहास-दृष्टि विकसित करने व नेहरु की इतिहास-दृष्टि को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। इस किताब को मैंने कई दफा पढ़ा बल्कि कहिए कि बार-बार पढ़ा। मेरी कोशिश होती है कि चार-छह माह के भीतर एक बार अवश्य ही पढ़ लूं। मेरा मानना है कि इस छोटी काया वाली पुस्तक को बी.ए. स्तर तक के विद्यार्थियों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया जाये, अगर कुछ भी हम अनिवार्यतया पढ़ाते हों। यूरोपीय इतिहास-दर्शन के क्षेत्र में जिस तरह एच. जी. वेल्स, कालिंगवुड और क्रोसे हैं, भारत में नेहरु का भी वही स्थान रहेगा।

Sunday, July 18, 2010

लिया बहुत कम कम दिया बहुत ज्यादा ज्यादा


लेखन एक गंभीर कर्म है और निरंतर मनुष्य के मस्तिष्क में संपादित होते रहता है। मस्तिष्क में ही कांट-छांट चलती रहती है। दिमाग में चलनेवाले लेखन को जब आप कागज पर उतार रहे होते हैं तो वह संपादित रूप में ही पाता है। लिखे जाने के बाद भी कई बार आप उसमें जोड़-घटाव करते हैं, यानी एक दूसरे स्तर का संपादन शुरू होता है। संपादन की यह प्रक्रिया निर्मम होनी चाहिए। इसके बाद जो हिस्सा बचेगा, शायद मूल्यवान और अर्थवान हो। इतना ही नहीं, आपका पाठ भी आलोचनात्मक होना चाहिए। यानी कुछ भी अगर आप पढ़ते हैं तो उसकी आलोचनात्मक समझ विकसित होती रहनी चाहिए। मेरे मित्र श्री ओमप्रकाश पांडेय जी, लगता है, इन चीजों से वंचित रह गये हैं। नतीजतन, पांच-छह किताबों के प्रकाशन के बाद भी वे अपनी रचनाओं को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हो सके हैं। कहिए कि लेखक का विश्वासअर्जितकर पा सकने में असमर्थ रहे हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकों मेंप्रेमांजलि’, ‘आत्महत्या से पहले’, ‘ रिबर्थ ऑफ महात्मा’, ‘इस्टर ईयर मेलॉडिजएवंगवर्नेंस एंड किंगशिप’ (सद्यःप्रकाशित) आदि शुमार हैं। लगता है, उन्होंने तो पढ़ाई तरीके से (आलोचनात्मक) की और अपनी चीजों को संपादित करना ही जाना। समवयस्क कहे जा सकनेवाले मित्र की इतनी सारी किताबें देखकर मन ही मन व्यथा से भरने लगता हूं। कारण कि मेरी अब तक एक भी किताब प्रकाशित नहीं है। ऐसे ही विरल पुरुषों को देखकर मुक्तिबोध को भी अपराध-बोध हुआ होगा-लिया बहुत ज्यादा-ज्यादा/दिया बहुत कम-कम/जीवन क्या जिया। और मेरे मित्र हैं कि एक पृष्ठ पढ़कर चार सौ पृष्ठ लिख डालते हैं। उनको कौन कहे कि मित्र, ‘महाभाष्यका समय नहीं है यह। समय का मूल-मंत्र हैकम लिखना, ज्यादा समझना
कहना होगा कि यह पुस्तक राजसत्ता के बारे में है। पांडेय जी कहते हैं किअगर शासन/राज्य/राजा हो तो लोग निरंकुश और स्वेच्छाचारी हो जाएंगे। चारों ओर असुरक्षा और अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।पांडेय जी के इस कथन से दो तथ्य सामने आते हैं-पहला कि राज्य एक शाश्वत संस्था है, और दूसरा कि इसका जन्म लोगों को सुरक्षा प्रदान करने एवं अराजकता से बचाने के लिए हुआ। पहले के जवाब में मार्क्स और एंगेल्स दोनों ही विद्वान काफी कुछ कह गए हैं। इन दोनों से पहले मॉर्गन साहब काफी-कुछ कह गये थे, जिसे, संभव हो तो पांडेय जी पढ़ लें। वैसेमौलिक लेखनकरनेवाले लोग दूसरों का लिखा कम ही पढ़ते हैं। के बराबर। पढ़ने के बाद लिखना मुश्किल हो जाता है शायद। आप जितना पढ़ेंगे, मुश्किल उसी हिसाब से बढ़ती जाएगी। इसलिएज्ञानीलोग पढ़ने का झंझट ही नहीं रखते।

इतिहासकार . एच. कार से संबंधित एक कहानी याद रही है। उन्हें शायद ग्रीक के इतिहास पर काम करना था। इसलिए जितनी भी उपलब्ध सामग्री थी उसे अपने पास ले आये और आश्वस्त हो लिये कि अब तो सारे तथ्य उनकी मुट्ठी में है। बेचारे अति प्रसन्न मुद्रा में थे कि बस अब किसी दिन उठेंगे और लिख डालेंगे। लेकिन ऐसा कोई दिन नहीं रहा था। बाद में मालूम हुआ कि जिन किताबों को अपनी मुट्ठी में कर प्रसन्न हो रहे थे उसी ने उनकी मुश्किल बढ़ा रखी है। तो यह है पढ़ने का संकट।

पांडेय जी ने अपने अध्ययन के लिए दो भिन्न काल के कवियों को लिया है। कालिदास भारतीय संस्कृति के उस काल के प्रतिनिधि कवि हैं जब सामंती समाज की विशेषताएं अपनी जड़ें जमा रही होती हैं जबकि शेक्सपीयर सामंती समाज के विध्वंस पर निर्मित हो रहे व्यावसायिक पूंजीवाद के प्रवक्ता हैं। इसलिए दोनों के मूल्यबोध में जो अंतर आता है उसकी व्याख्या प्रस्तुत करने में वे अक्षम साबित होते हैं। अलबत्ता साम्य सिद्ध करने में कोई परेशानी नहीं होती। कालिदासराजाकी बात करते हैं तो शेक्सपीयरकिंगकी। बल्कि पांडेय जी नेसिंह’, ‘किंग’ ‘राजा’, ‘ड्यूक’, ‘राजन’, ‘राजर्षि’, ‘युवराज’ ‘प्रिंसआदि को समानार्थी घोषित कर दिया। (गवर्नेंस एंड किंगशिप, पृष्ठ 9-10) इस प्रसंग में रामशरण शर्मा की यह बात ध्यान देने योग्य है-‘प्राचीन काल में राज्य का अध्ययन करनेवाले विद्वान हमेशा राजा का अंग्रेजी अनुवादकिंगकरके भ्रम फैलाते रहे हैं। राजा शब्द का मूलभूत अर्थ है दीप्तिमान (चमकनेवाला) व्यक्ति-स्पष्टतः ही अपने शारीरिक और मानसिक गुणों और उपलब्धियों के कारण निर्वाचित सरदार या मुखिया, जिसका व्यक्तित्व ओजस्वी या दीप्तिमान होता था।’ (भारत में राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 5) साथ यह भी ध्यातव्य है किऋग्वेद में आयेराजाशब्द का अर्थ शतपथ ब्राह्मण में प्रयुक्तराजाशब्द के अर्थ से भिन्न हो सकता है।’ (वही)

वैदिक ग्रंथों मेंराजन्शब्द का प्रयोग अनेक बार होने के कारण यह भ्रांति पैदा होती है कि वैदिक काल में राजा का पद ठीक उसी तरह से सुस्थापित था जिस तरह से बाद के दिनों में राजतंत्र सुप्रतिष्ठित हुआ। वास्तव में राजन् शब्द की उत्पत्ति जनजातीय है। संस्कृत में राजन् शब्द की व्युत्पत्ति सामान्यतः राज् (चमकना) अथवा रत्र्ज/रज् (लाल होना, रंगना, सज्जित करना, अनुरक्त करना) धातुओं से होती है। निघंटु 2: 14 के अनुसार इस धातु का अर्थ जाना भी होता है। (एम. मोनियर विलियम्स, संस्कृत-इंगलिश डिक्शनरी, शब्द देखिए, रत्र्ज अथवा रज्) यदि हम राजन् शब्द की व्युत्पत्ति राज् (चमकना) धातु से मानें तो भी इसका तात्पर्य होगा अनेक व्यक्तियों में चमकनेवाला व्यक्ति जिससे राजा होने का उसका औचित्य सिद्ध हो। स्पष्ट है कि ऐसा व्यक्ति केवल अपने शारीरिक बल और सौष्ठव तथा सामरिक उपलब्धियों के कारण ही नहीं चमकता वरन् अपने बौद्धिक और भावात्मक गुणों के आधार पर भी चमकता है। इन गुणों के संयोग से ही लोग उसे जनजाति का नेता होना स्वीकार करते हैं।

चाहे हम राजन् शब्द की व्युत्पत्ति रज्/रत्र्ज से मानें अथवा राज् से, हमारी धारणा के अनुसार आरंभ में इस शब्द से जनजाति के नेता अथवा सरदार का बोध होता था कि राजा अथवा शक्तिशाली राजतंत्र का, जैसाकि सामान्यतः कहा जाता है। राजन् शब्द का अर्थ जनजातीय नेता होने की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि उसके लिएजनस्य गोपअथवागोपतिबतलाया गया है। (रामशरण शर्मा, प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएं, पृष्ठ-393) दोनों ही शब्दों का अर्थ गोपालक से है। इस शब्द का राजन् के लिए प्रयोग संभवतः इस कारण होने लगा क्योंकि जाति अथवा जन की जान-माल की रक्षा करना उसका दायित्व था।

उत्तरवैदिक ग्रंथों में जो जनमानस दिखायी देता है उसमें एक ओर सरदार (राजा, राजन्य, क्षत्र, क्षत्रिय) और दूसरी ओर विश् या किसान बंधुजन के बीच भेद-बोध उभरकर आता है। (रामशरण शर्मा, भारत में राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 14) इन दोनों के बीच के भेद को रेखांकित करने के लिए तरह-तरह की उपमाओं का प्रयोग किया गया है। प्रथम हरिण है, तो द्वितीय यव, प्रथम अश्व है तो द्वितीय अन्य जंतु; प्रथम सोम है तो द्वितीय अन्य वनस्पति; प्रथम दूध है, तो द्वितीय सूरा; प्रथम अभिमंत्रित इष्टक (ईंट) है, तो द्वितीय खाली जगह को भरने की ईंटें, प्रथम कलश है तो द्वितीय चम्मच या छोटी कलछी; प्रथम इन्द्र है तो द्वितीय मरुत; प्रथम महतृण है, तो द्वितीय लघुतृण, आदि-आदि। इन उपमाओं को पुरोहितों ने चलाया ताकि करदाता किसान राजन्यों/क्षत्रियों और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता सहज भाव से स्वीकार करते रहें। (वही, पृष्ठ 15) राजा सोम के संदर्भ में कहा गया है कि जब क्षत्रिय उच्च स्थान में रहता है, तब विश् निम्न स्थान में रहते हुए उनकी सेवा करता है।(शतपथ ब्राह्मण, 19.3.6; देखें सेक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट, पृष्ठ 228, पाद टिप्पणी-2) हवन की वेदी बनने के अनुष्ठान से भी प्रकट होता है कि क्षत्र और विश् के बीच कैसा संबंध था। वेदी ईंटों से उसी प्रकार बनायी जाती है जिस प्रकार क्षत्र (सरदार) विश् से प्रबल बनाया जाता है और विश् नीचे से उसका अनुयायी बनाया जाता है। (वही, 4. 3. 3-4) बार-बार कहा गया है कि स्तुत (अभिमंत्रित) ईंटें क्षत्र की द्योतक हैं और खाली जगह भरने की ईंटें विश् की द्योतक हैं। प्रथम भोक्ता है और द्वितीय भोग्य। वाजपेय (बालपन का यज्ञ) में वैश्य को ब्राह्मण और राजन्य दोनों का भोग्य कहा गया है। और यह भी कि भोक्ता को अगर पर्याप्त भोजन मिले तो राज्य समृद्ध रहता है। (वही, 1. 2-25)

ईंटें बिछाने की व्याख्या बार-बार की गई है। अभीष्ट सदा यह रहा है कि क्षत्र को अधिक शक्तिशाली बनायें और विश् को उसका अनुयायी। यह भी कहा गया है कि विश् (प्रजा) को पृथग्वादिनी (अलग-अलग बोलनेवाली) और नानाचेतस (अलग-अलग सोचनेवाली) बनाये रखा जाये, अर्थात् प्रजा में फूट डाले रहें ताकि वह नियमानुसार कर चुकाने और सदा आदेश-पालन में आनाकानी कर सके। सौत्रामणी नामक सोमयज्ञ में दूध से भरी प्यालियों को क्षत्र (शासक) कहा गया है और सुरा से भरी प्यालियों को विश् (शासित) यह भी बताया गया है कि उन प्यालियों को एक-दूसरे से जोड़े बिना अलग-अलग उठायें, क्योंकि ऐसा करने से क्षत्र से विश् और विश् से क्षत्र अलग हो जाएंगे और ऊंच-नीच का क्रम गड्डमड्ड हो जाएगा। (रामशरण शर्मा, भारत में राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 16) लेकिन यदि उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर उठाये तो ऐसा नहीं होगा और विश् को क्षत्र का अनुयायी बना रखा जा सकेगा। (शतपथ ब्राह्मण, 7. 3. 12 और 15) विश् को क्षत्र का अनुयायी/आज्ञाकारी बनाये रखने की आवश्यकता के और भी साक्ष्य अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठानों से हमें प्राप्त होते हैं। (रामशरण शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 16) यज्ञ पशुओं में घोड़े को क्षत्र कहा गया है और अन्य पशुओं को विश्। (वही) देवताओं को अश्व आदि पशु-बलि देते समय आह्वान और मंत्र वही पढ़ना चाहिए जो उपयुक्त हों; अन्यथा प्रजा-तुल्य होकर प्रत्युद्गमनी, अर्थात् विरोध में खड़ी होनेवाली हो जाएगी और इससे यजमान की आयु कम हो जाएगी किंतु यदि पुरोहित लोग सब कुछ ठीक से करेंगे तो विश्, क्षत्र के प्रति विनीत और वशवर्ती रहेगा। (शतपथ ब्राह्मण, 2.2.15) इस सबसे प्रकट होता है कि स्वतंत्रता और समताप्रिय किसानों को काबू में रखना अत्यावश्यक समझा जाता था। घृत की आहुति-सम्बंधी एक अनुष्ठान में कहा गया है कि क्षत्रिय यह आहुति जुहू, अर्थात् छोटी कलछी से देगा तो भोजक और भोज्य के बीच अंतर मिट जाएगा; दूसरे शब्दों में, आरंभिक समतावादी बंधुत्व पलट आएगा। दूसरी ओर, यदि वह यह काम बड़ी कलछी से करे तो वैश्य को वश में करेगा और उसे कहेगा-‘वैश्य तुमने जो जमाकर रखा है, वह मेरे पास ला दो।’ (वही, 3, 2, 15) तथा, जिस राजा ने असंख्य लोगों के बीच अपने को प्रतिष्ठापित कर लिया है, वह एक घर (वेष्मन्) में रहते हुए भी उन्हें वश में करता है। (वही, 3. 2. 14)

कर्मकांडों से प्रकट होता है कि राजन्य और विश् के बीच संघर्ष छिड़ता था और उसमें ब्राह्मण या अन्य प्रकार के पुरोहित राजन्य की ओर से बीच-बचाव करते थे। (रामशरण शर्मा, भारत में राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 18) कई अनुष्ठानों में राजन्य और ब्राह्मण मिलकर विश् और शूद्र का सामना करते थे। (वही) यू. एन. घोषाल ने बहुत से ऐसे उएाहरण देकर बताया है कि किस तरह उत्तर वैदिक समाज में ब्रह्म और क्षत्र का बोलबाला रहा, किस तरह आपस मे ंउनकी प्रतिद्वन्दिता रही और किस तरह उनमें राजनीतिक गंठबंधन हुआ। (हिंदू पब्लिक लाइफ, भाग-1, कलकत्ता, 1944, पृष्ठ 73-80) यजुर्संहिताओं में (कण्व संहिता, गगण् 2) तथा ब्राह्मण ग्रंथों में (शतपथ ब्राह्मण, ग्प्प्प्ण् 5. 2. 11; 6. 1. 17-18, प्ग्ण् 4. 1. 7-8) दोनों उच्च वर्णों की रक्षा (अभय) की कामनावाली स्तुतियां मिलती हैं। कहा गया है कि वैश्य और शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रिय से घिरे हैं (वही,) तथा, जो क्षत्रिय हैं, पुरोहित, वे अपूर्ण हैं। (वही, 6.3.12-13) राजसूय यज्ञ के परवर्ती रूप में वैश्य और शूद्र को द्यूत-क्रीड़ा में शामिल नहीं किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि राजा केवल वैश्यों और शूद्रों को, बल्कि ब्राह्मणों को भी वश में रखने का प्रयास करता है। (रामशरण शर्मा, राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 19) इस संदर्भ में राजन्य और क्षत्रिय और राजन्यों के बीच, संभवतः राजा और पुराने बान्धव अभिजात वर्ग के बीच, विश् से वसूले गये अन्न एवं पशु आदि को लेकर संघर्ष होते थे।

यद्यपि ब्राह्मणों और क्षत्रियों की भलाई इसी में थी कि वे वैश्यों और शूद्रों के विरुद्ध आपस में मिलकर रहें; फिर भी दोनों आपस में लंबे युद्धों में संलग्न रहते थे। (वही) ऐसा प्रतीत होता है कि पनपते वर्ग/वर्णमूलक समाज में संघर्ष मुख्यतः सामाजिक श्रेष्ठता प्राप्त करने हेतु होते थे; (वही) और वैश्यों से प्राप्त भेंट और कर तथा शूद्र समुदाय से प्राप्त दास-दासी आदि श्रमिकों के बंटवारे के प्रश्न भी उनसे जुड़े रहते थे। क्षत्रियों में ज्ञानोत्कर्ष का दावा और यज्ञ-विरोधी भावना निश्चय ही इसलिए उदित हुई कि पुरोहितों को अपनी दान-दक्षिणा निरंतर मिलते रहना उन्हें खलता था। (वही) अंततोगत्वा यह संघर्ष एक सामंजस्यपूर्ण समझौते में खत्म हुआ जब क्षत्रियों ने ब्राह्मणों का धार्मिक नेतृत्त्व स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणों ने क्षत्रियों का राजनैतिक नेतृत्त्व। यह समझौता टूटता-सा लगता था जब दोनों ही प्रभु वर्ग अपने अधिकार क्षेत्रों का अतिक्रमण कर अपनी श्रेष्ठता का दावा पेश करते थे।

इस प्रकार के संघर्षों की चरम परिणति हुई वर्ण-व्यवस्था के उदय में, जिसके अनुसार वैश्यों और शूद्रों को ब्राह्मणांे और क्षत्रियों की श्रेष्ठता शिरोधार्य हो गई। इसी वर्ण-व्यवस्था की मदद से राजा ने अपना अलग अस्तित्त्व कायम किया और धर्म (अर्थात् वर्ण धर्म) की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया। उत्तर वैदिक काल में वर्ण और राजसत्ता के समर्थन में बहुत सी आनुष्ठानिक और वैचारिक युक्तियां निकाली गईं और वैदिकोत्तर काल में इस व्यवस्था की नींव पर खड़े किये गये धर्मशास्त्र ने वर्ण और राजसत्ता दोनों को समृद्ध किया। इस तरह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था का उदय संपत्ति संबंधों में आये क्रमिक विकास का ही नतीजा था। इसलिए ठीक ही कहा गया है कि वर्णों का विभाजन श्रम विभाजन के साथ ही साथ संपत्ति का भी विभाजन था। (एस. जी. सरदेसाई, प्राचीन भारत में प्रगति एवं रूढ़ि, पी. पी. एच., जयपुर, 1988, पृष्ठ 33) लगभग संपूर्ण प्राचीन भारत में वर्ग, मोटे तौर पर, वर्ण से अभिन्न रहा है। (डी. डी. कोसांबी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 39 रामशरण शर्मा ने भी अपनी पुस्तक सम इकेनॉमिक आस्पेक्ट्स ऑफ दि कास्ट सिस्टम इन एंशिएंट इंडिया, पटना, 1951 में ऐसा ही विचार व्यक्त किया है। और देखें, भारत में राज्य की उत्पत्ति, पृष्ठ 11, पाद टिप्पणी-5)

यह भारत में राजसत्ता के उदय की कहानी है। कमोबेश पूरी दुनिया की यह कहानी है। पाठक को पांडेय जी की उक्त किताब को पढ़ते हुए उपरोक्त बातों को ध्यान में रखना चाहिए। ध्यान तो ओमप्रकाश पांडेय को भी रखना था लेकिन किताबकिंगशिप एंड गवर्नेंसके लिखे जाने से पहले।

Tuesday, July 6, 2010

इतिहास को हिन्दुत्ववादी औजार बनाने का अभियान

हीगेल ने कभी लिखा था, ‘इतिहास हमें कोई सीख नहीं देता’; सचमुच अगर ऐसा होता तो हमारे समय की कई मुश्किलें आसान हो जातीं। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों की हेरा-फेरी में लोग इतनी तत्परता न दिखाते और इतिहास-लेखन में इतने विवाद की गुंजाइश भी न होती। मजेदार बात तो यह है कि भाववादी चेले ही आज हीगेल की स्थापना को मुंह चिढ़ाने लगे हैं।
इतिहास-लेखन शुरू से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है क्योंकि जनमानस को प्रभावित करनेवाला यह सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए इतिहास की चिंता सबको होती है; इसकी जरूरत सबको पड़ती है। शायद यह कहने की जरूरत अब शेष न रही हो कि विदेशी आक्रमणकारी भी जब-जब भारत आये हैं; इतिहासकारों की एक टोली हमेशा ही उनके साथ रही है और इतिहास-लेखन के काम को बड़ी शिद्दत से अंजाम दिया जाता रहा है। अंग्रेजों के आगमन से तो भारतीय इतिहास-लेखन की बाकायदा एक परंपरा ही शुरू होती है और अभी हम शायद यह भी नहीं भूल पाये हों कि भारत के आजाद होने में, इतिहास-लेखन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र भारत में इसकी भूमिका समाप्त हो गई हो। पहली बार 1977 में व्यापक उलट-फेर की कोशिश हुई और दूसरी बार एक नई सदी में, जब पूंजीवाद का संकट अपने चरम पर है।
बहस की शुरूआत राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद् के विशेषज्ञ पैनल से प्रो. रोमिला थापर, प्रो. रामशरण शर्मा, प्रो. बिपन चन्द्रा तथा प्रो. सतीश चन्द्रा को निकाले जाने की खबर से हुई थी। इस संदर्भ में मुरली मनोहर जोशी ने सफाई देते हुए कहा था कि ‘इन लोगों का टर्म पूरा हो चुका था, इसलिए हटाया जाना कोई अस्वाभाविक नहीं है।’ बात अगर इतनी ही सहज और स्वाभाविक होती, तो शायद इतनी चिल्ल-पों न मची होती। कहना न होगा कि यू. जी. सी. के द्वारा ज्योतिषशास्त्र को मान्यता प्रदान करना और उसके सिलेबस को उच्च शिक्षा में शामिल करना, एक स्पष्ट राजनीतिक मंशा को ही उजागर करता है।
क्या यह बात मतलब से खाली है कि जहां ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान बताकर पढ़ाये जाने की वकालत की जा रही हो, वहीं जमा दस तक समाज विज्ञान के सिलेबस को बिल्कुल छोटा किया जा रहा है। नये सिलेबस के तहत बच्चों पर से पढ़ाई का बोझ कम करने का नाटक करती हुई सरकार समाज विज्ञान की पढ़ाई को धूल चटा रही है। समाज विज्ञान की अलग-अलग किताबों की जगह अब सिर्फ एक किताब होगी जिसमें सिर्फ औपचारिकता का निर्वाह होगा और वह भी सरकार की मनगढ़ंत कहानियों के साथ। दुनिया में आज तक जितने भी बदलाव हुए हैं, सबके पीछे विचार रहा है। लेकिन हमारी सरकार स्कूली बच्चों को अवधारणात्मक शिक्षा से वंचित रखेगी। आर्थिक उदारीकरण को क्या विचारशून्यता इतनी ज्यादा पसंद है ?
कम दिलचस्प बात नहीं है कि जिन इतिहासकारों को पैनल से निकाला गया उन्हीं की किताबों को लेकर हंगामा खड़ा किया गया है। इन इतिहासकारों की पुस्तकों को 1977 में भी प्रतिबंधित किया गया था। रोमिला थापर की पुस्तक ‘मध्यकालीन भारत’, बिपन चंद्रा की पुस्तक ‘आधुनिक भारत’ तथा ‘सांप्रदायिकता और इतिहास लेखन’ जिनके लेखक रोमिला थापर, बिपन चंद्रा और हरबंस मुखिया थे, प्रतिबंधित हुई थी। रामशरण शर्मा की पुस्तक प्राचीन भारत को भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इनमें पहली और दूसरी पुस्तक सातवें-आठवें वर्ग के पाठ्यक्रम में स्वीकृत भी थी। इनको प्रतिबंधित करने की वजह यह थी कि इनमें सांप्रदायिकता, अंधराष्ट्रवाद और घृणित राष्ट्रवाद जैसे जन-विरोधी इतिहास-लेखन की परिपाटी का विरोध किया गया था और सही एवं वस्तुनिष्ठ इतिहास इतिहास लिखने की ईमानदार कोशिश की गई थी। ठीक इसी तरह कभी मध्य प्रदेश में मिली-जुली सरकार के शासन के दौरान मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति‘ खुलेआम जलाई गई थी। यह पुस्तक भी पहले पाठ्यक्रम में शामिल थी।
28 दिसंबर 1977 को भारतीय इतिहास कांग्रेस ने भुवनेश्वर में हो रहे अपने 38वें अधिवेशन के अवसर पर इतिहास के अध्ययन के प्रति भारतीय इतिहासकारों के वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण को दुहराते हुए तत्कालीन हमले के विरुद्ध घोषणा की, ‘स्कूलों में पढ़ाई के लिए इतिहास की कुछ स्वीकृत पुस्तकों पर हो रहे वर्तमान हमलों के जरिये इतिहास के मूल सिद्धांतों पर ही प्रश्नसूचक चिह्न लगाया जा रहा है। सरकार की ओर से उन पाठ्य पुस्तकों को सूची से हटा देने का प्रयत्न चल रहा है और ऐसी आशंका पैदा हो रही है कि इतिहास को सांप्रदायिक और अंधोन्मादी आधार पर फिर से लिखने के लिए सरकार सहायता देने को तैयार है। इस वास्तविकता को भी नजरों से ओझल नहीं किया जा सकता कि पिछले शासन के जमाने की तरह ही ऐसे इतिहासकारों पर व्यक्तिगत बंदिशें और पाबंदियां लगाने की नीति चलाई जा रही है, जो भूत के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने के लिए विख्यात रहे हैं।’
याद रहे कि हिटलर ने जर्मनी के नाजीकरण के दौरान सभी विज्ञानों को जर्मन बना दिया था। नाजी जर्मनी में विज्ञान को ‘जर्मन फिजिक्स’, जर्मन केमेस्ट्री’ और ‘जर्मन मैथेमेटिक्स’ कहा जाता था। नाजियों का कहना था कि विज्ञान का संबंध ‘नस्ल’ से है और इसका निर्धारण रक्त की शुद्धता के आधार पर ही किया जा सकता है। इसी अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद की वजह से उन्होंने सभी विज्ञानों के पहले ‘जर्मन’ शब्द लगा दिया था। भारत में भी इसी तर्क पर विज्ञान के ‘भारतीयकरण’ की घोषणा की जा रही है। ज्यातिषशास्त्र को यू.जी.सी. से मान्यता तथा ‘वैदिक मैथेमेटिक्स’ की स्कूलों में पढ़ाई, इसी अभियान की कड़ी के रूप में हैं।
प्रो. आर.एस.शर्मा की पुस्तक ‘प्राचीन भारत’ पर हमला करते हुए कहा गया था कि ‘वे अपनी पुस्तक में जैन और बौद्ध धर्म के उत्थान के कार्य-कारण संबंधों को, तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक स्थिति में-कृषि के विस्तार, वाणिज्य के विकास और असमानता पर आधारित वर्ण-व्यवस्था में ढूंढ़ते हैं।’ लोगों ने यह भी आरोप लगाया था कि उक्त पुस्तक में वैदिक आर्यों को गोमांसाहारी बताया गया है तथा भारत के इतिहास में कांस्य संस्कृति के अस्तित्व से इनकार किया है। दरअसल, डा. शर्मा जैसे ख्यातिप्राप्त इतिहासकार को न तो अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिया गया और न ही उसपर गंभीरता के साथ विचार ही किया गया। इसी का नतीजा था कि रामशरण शर्मा को अपनी पुस्तक के पक्ष में अलग से एक पुस्तिका लिखनी पड़ी, जिसका नाम ‘इन डिफेंस ऑफ एंशिएंट इंडिया’ था।
इस पूरी स्थिति के मद्देनजर आर.एस.शर्मा ने मूल बात पर जोर देते हुए कहा था कि ‘यह हमला केवल मार्क्सवादियों के ही विरुद्ध नहीं है, बल्कि अब यह लड़ाई तर्क और धर्म के बीच हो गई है।’ इन प्रतिक्रियावादी ताकतों ने तभी से तर्क की जगह धर्म को आधार बनाकर पाठ्य पुस्तकों के लेखन को अंजाम देना शुरू कर दिया था। सन् 77 की जनता पार्टी की सरकार के इस ‘नेक’ कार्य में सबसे ज्यादा योगदान आकाशवाणी और विद्या भारती द्वारा संचालित स्कूलों एवं डी.ए.वी. आदि शिक्षण संस्थाओं ने किया है। आकाशवाणी के प्रसारणों में इतिहास को तोड़-मरोड़कर एक नई व्याख्या में ढाला गया था। एक प्रसारण के अनुसार, ‘हिन्दी भाषा का विकास तुर्क आक्रमण के विरोध में हुआ था।’ (वी.सी.पी.चौधरी,कम्युनलिज्म वर्सस सेक्युलरिज्म,पृष्ठ 125)। भारतीय इतिहास का सामान्य पाठक भी जानता है कि किसी भाषा का विकास धार्मिक या जातीय विरोध में नहीं होता। रेडियो नाटकों द्वारा भी इस प्रकार के घृणित नस्लवाद का प्रचार किया जा रहा था। उदाहरण के लिए आकाशवाणी के कलकत्ता केन्द्र द्वारा प्रसारित बंगला नाटक ‘सिराजुद्दौला’ को लिया जा सकता है। इस तरह के अनेक तथ्य आपको तत्कालीन प्रसारणों में मिलेंगे जिनमें हिंदुत्व, आर्यत्व तथा भारतीय संस्कृति की विश्वव्यापी श्रेष्ठता का गुणगान है।
जनवरी 1987 को ‘जनशक्ति’ में ‘इतिहास में लिखी काल्पनिक कथाएं’ शीर्षक से बी. एन. पांडेय,इतिहास की एक पुस्तक का हवाला देते कहते हैं कि ‘मैंने उस किताब का टीपू सुल्तान संबंधी अध्याय खोला जिसमें लिखा था कि तीन हजार ब्राह्मणों ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली कि सुल्तान उन्हें जबरन मुसलमान बनाना चाहता था।’ उक्त पुस्तक के लेखक एक सुप्रसिद्ध इतिहासकार डा. हरप्रसाद शास्त्री हैं। श्री पांडेय ने शास्त्री जी से इस संबंध में जांच-पड़ताल की तो उत्तर मिला कि यह बात उन्होंने मैसूर गजट से ली है। किंतु मैसूर गजट में ऐसी कोई बात नहीं है। जाहिर है, डा. शास्त्री की किताब पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के दसवें वर्ग के पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती रही है। 1972 में तीन हजार ब्राह्मणों की झूठी कहानी उत्तर प्रदेश में जूनियर हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में भी मौजूद थी। ऐसी परिस्थिति में अगर साम्प्रदायिक दुराग्रह बढ़ते हों तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
विद्या भारती, सरस्वती शिशु मन्दिरऔर दयानंद आर्य वैदिक शिक्षण संस्थाएं आरंभ से ही बच्चों को नस्लवादी इतिहास का जहर पिलाना शुरू कर देती हैं। प्रमाण के रूप् में विद्या भारती स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली पुस्तकों को देख सकते हैं, जिनमें बताया गया है कि आर्य जाति ही दुनिया की सबसे उच्च जाति है और हिन्दू संस्कृति ही सारी संस्कृतियों का आधार। शिक्षा का यह सांप्रदायिक स्वरूप ठीक वैसा ही है जैसा हिटलर के समय में जर्मनी की नाजी शिक्षण संस्थानों में था। तत्कालीन जर्मनी की सही स्थितियों की जानकारी के लिए आप ब्रेख्त के नाटकों को प्रमाण के रूप् में ले सकते हैं। आज इस समय में भी जब विज्ञान की प्रगति पर हम ‘गर्व करना सीख गये हैं’, डी. ए. वी. विद्यालयों में पढ़ाई की घंटी गायत्री मंत्र के ‘जाप’ से शुरू होती है।
सन् 77 की जनता पार्टी की सरकार में पुस्तकों को प्रतिबंधित करने के साथ-साथ कई अन्य क्षेत्रों में भी प्रशासनिक हस्तक्षेप जारी थे। आर.एस.शर्मा की सोवियत विद्वानों की दावत पर एक विचार-गोष्ठी में भाग लेने के लिए जाने की अनुमति नहीं प्रदान की गई। अलीगढ़ विश्वविद्यालय के डा. अहतर अली को विदेशी निमंत्रण स्वीकार नहीं करने दिया गया था।
वर्तमान संदर्भ में दामोदरन नैयर की कहानी भी दिलचस्प हो जाती है। दामोदरन नैयर दिल्ली के गांधी स्मृति स्मारक में गाईड का कार्य कर रहे थे और साथ ही वे गांधी पर अपना शोध-प्रबंध भी तैयार कर रहे थे। अपने व्यावसायिक कर्तव्य के रूप में वे पर्यटकों को उस स्थल पर ले जाते थे जहां पर गांधीजी नाथूराम गोडसे की गोली के शिकार हुए थे। प्रसंगवश वे इसका भी जिक्र कर देते थे कि गोडसे आर.एस.एस. से संबंधित था। अपने कथन के साक्ष्य के रूप में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की पुस्तक ‘स्टोरी ऑफ माई लाईफ’(खंड-1,पृष्ठ 248)से उद्धरण पेश करते थे। इतिहास के तथ्य और अपने पेशे के प्रति दामोदरन की इस प्रतिबद्धता ने तत्कालीन शासक वर्ग के सांप्रदायिक और रूढ़िवादी तत्वों के रक्तचाप को बढ़ा दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि 9 और 31 अक्तूबर 1977 को आर.एस.एस.के सदस्यों ने उनकी पिटाई की। दामोदरन ने अपने बचाव के लिए जब यह कहा कि ‘जो वह कह रहे हैं, वही बात मोरारजी देसाई ने भी कही है’, तो आर.एस.एस.वालों ने उत्तर दिया, ‘अगर उन्होंने ऐसा कहा है,तो हम उन्हें भी मार डालेंगे।’(वी.सी.पी.चौधरी, भारतीय इतिहास लेखनः एक अंतर्राष्ट्रीय विवाद,पृष्ठ111)। बाद में वे लोग ‘गोडसे जिंदाबाद’ और ‘गोडसे अमर रहें’ का नारा लगाते हुए चले गये। यही नहीं, जब उस पवित्र स्थान पर जूता खोलकर जाने का निवेदन किया जाता था तो उनका जवाब होता था,‘हमलोग यहां पेशाब भी करेंगे।’(सेक्युलरिज्म वर्सस कम्युनलिज्म,पृष्ठ 106-7)।
तत्कालीन प्रधानमंत्री देसाई के साथ, गृहमंत्री चरण सिंह भी अक्सर कहा करते थे कि दामोदरन को ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिनसे आर.एस.एस. की भावना को ठेस पहुंचती हो। इस नाटक का अंत यह हुआ कि दामोदरन का स्थानांतरण दंडस्वरूप पुस्तकालय में कर दिया गया। इस प्रकार सन् 77 ई. में सत्ता की बागडोर थामनेवाली सांप्रदायिक शक्तियां, सच्ची बात कहने पर भी रोक लगा रही थीं। आर.एस.एस. के इन सांप्रदायिक क्रियाकलापों की भर्त्सना करते हुए एक जनता सांसद ने ही कहा था कि ‘हिटलर को जर्मनी के इतिहास पुनर्लेखन में ढाई वर्ष लगे थे, जिसे जनसंघ भारत के संदर्भ में एक सप्ताह में पूरा कर लेना चाहता है। जनसंघ के फासिस्ट चरित्र का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?’(सेक्युलर डिमोक्रेसी,1-15 सितंबर 1977)।
अंत में डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डा. एस.एल. बरुआ और उसी विभाग में रीडर डा. एम.एल.बोस की चर्चा कर देना भी प्रासंगिक होगा। उक्त विश्वविद्यालय से प्रकाशित इतिहास की एक पत्रिका ‘जर्नल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च’ में डा. एम.एल. बोस का लेख ‘असम का सामाजिक इतिहास’ प्रकाशित हुआ। उक्त पत्रिका का संपादन डा. बरुआ ने किया था,और उन्होंने इस लेख को ‘शोध का नमूना एवं वर्षों के अध्ययन का फल’ बताया था। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के कुलपति ने डा. बरुआ को इस पत्रिका का सिर्फ प्रकाश नही बंद करने का आदेश नहीं दिया बल्कि उन्हें विश्वविद्यालय में अपनी सेवा पर जाने से भी रोक दिया। ऐतिहासिक सच्चाई को कहने का यही ‘पुरस्कार’ था। (टाइम्स ऑफ इंडिया,21.10.1973)। इस प्रसंग में उक्त संपादकीय लेख को ध्यान में रखना होगा जिसमें कहा गया कि ‘एक वर्ष भी नहीं बीता है कि इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने जनता सरकार से इस आश्वासन के लिए अनुरोध किया था कि सांप्रदायिकता और संकीर्णता से प्रभावित इतिहास लेखन बंद किया जाए।’
जिस तरह से परिवार तथा समाज में पल-बढ़कर एक बच्चा ‘हिन्दू’, ‘मुसलमान’, ‘सिख’ या ‘ईसाई’ बन जाता है, ठीक उसी तरह पाठ्य पुस्तकों में वर्णित भ्रामक सामग्रियों से भी। लाला लाजपत राय अपने बचपन के दिनों की याद करके ‘आत्मकथा’ में लिखते हैं, ‘इतिहास की एक पुस्तक ‘‘वक्त-ए-हिन्दू’’ जो उस वक्त सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जाती थी, ने मुझमें यह भाव भर दिया कि मुसलमान शासकों ने हिन्दुओं पर काफी सितम ढाये। परिणामतः बचपन के पालन-पोषण से इस्लाम के प्रति जो सद्भाव मैंने हासिल किये थे, वे अब घृणा में परिणत हो रहे थे।’
इसलिए इन वस्तुनिष्ठ इतिहासकारों की पुस्तकों को निकाले जाने या फिर बदल डालने की घोषणा, महज संयोग नही है बल्कि इतिहास को नस्ल,जाति और धर्म की अविवेकी परंपरा में शामिल करने का जो फासिस्ट अभियान है, उसी की एक कड़ी है। अपनी बौद्धिक क्षुद्रता और दरिद्रता का अहसास करते हुए, वे इतिहास के किसी भी गंभीर विमर्श से बचना चाहते हैं। इसलिए उनकी रणनीति है, पाठ्य पुस्तकों में मनगढ़ंत बातें लिखवाकर स्कूल जाते बच्चों की घुट्टी में ही ऐसा जहर मिला दो ताकि बड़े होकर गर्व से कहें, ‘हम हिन्दू हैं।’

प्रकाशन: सहमत मुक्तनाद, जनवरी-मार्च 2002।

Sunday, May 23, 2010

मध्यवर्गीय है दलित की अवधारणा

मैंने पाया है कि गांव में भिन्न जाति के लोगों के लिए बोली-बाजी के मुहावरे और शब्दावलियां अलग-अलग हैं। अगर हलवाहे मुसहर जाति से होते और उनको बैल दिक (परेशान) करते तो सहज ही कहते ‘चमरे हीं दे अएबउ’ अर्थात् चमार को दे आएंगे। यहां यह भाव होता कि सामाजिक स्तरीकरण में मुसहर अपने को चमार जाति से श्रेष्ठ समझ रहा है। हलवाहा अगर चमार होता तो कहता ‘कसइबे हीं दे अएबउ।’ कसाई यानी इस्लाम। यहां यह गौरतलब है कि हिन्दू धर्म में चमार को अपने से हीन कोई न दीखता। जाहिर है, इसमें इस्लाम के प्रति घृणा भी समाविष्ट होती। और बात है कि अलग-अलग जातियों के लोगों को संबोधित करने के लिए अलग-अलग तरह की शब्दावली व्यवहृत होती है। गांव की पाठशाला जहां पर ब्राह्मण शिक्षक-‘पंडितजी’, ठाकुर शिक्षक ‘बाबू साहब’ और अन्य जातियों के शिक्षक ‘मुंशीजी’ कहकर संबोधित होते हैं तथा उनके लिए अभिवादन भी अलग-अलग हैं। जैसे पंडित जी के लिए-‘‘पंडत जी पांय लागी’’, बाबू साहब के लिए-‘‘बाबू साहब जयशंकर’’ तथा मुंशी जी के लिए-‘‘मुंशी जी नमस्ते’’। (मनोज कमार मार्तंड, ‘अस्तित्व’ , हंस, अगस्त, 2004, पृष्ठ, 23)।

‘श्राद्ध का भोज’ कविता में पंकज कुमार चौधरी ने गांव के श्राद्ध-भोज की एक सच्ची तस्वीर खींची है। गांवों में जैसाकि ऐसे मौकों पर हमेशा ही होता है, सवर्णों एवं अवर्णों की अलग-अलग पांत बैठती है। गांव के सवर्ण अरबिन्द के लिए ‘अरबिन्द बाबू’ और ‘राजा भाई जी’ जैसे संबोधनों का प्रयोग है। अवर्ण पात्रों के नाम अकलूआ, चट्टूआ, बिसेसरा आदि हैं। जाति एवं सामाजिक व्यवस्था से हमारी भाषा कैसे प्रभावित होती है, कवि ने इसका खास ध्यान रखा है। कैसे एक ही व्यक्ति, जो खाद्य-सामग्री परोसनेवाला है, अरबिन्द बाबू से पूछते हुए ‘सब्जी’ शब्द का प्रयोग करता है जबकि अकलूआ, चट्टूआ, बिसेसरा से पूछते हुए ‘तरकारी’ शब्द से ही काम चलाता है। जो व्यक्ति भाषा की गहरी समझ और संवेदना रखता है, वह इन चीजों पर गौर करेगा। प्रसंगवश, मुझे निराला की कृति ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ की याद आ रही है। बिल्लेसुर, जैसाकि आप सब जानते हैं, विल्लेश्वर है, लेकिन बकरी चरानेवाला (बकरिहा) होने की वजह से लोगों की जुबान पर चढ़ नहीं पाता। उपर्युक्त बातों के सहारे मैं अपनी इस बात को प्रस्थापित करने की कोशिश कर रहा हूं कि गांवों में ‘दलित समुदाय’ जैसी किसी चीज की अवधारणा का सर्वथा अभाव देखा जाता रहा है। वहां जातियां ही प्रधान हैं। और बड़ा विभाजन अगर करना चाहें तो वह सवर्ण और अवर्ण (बैकवर्ड एवं फॉरवर्ड) का है।

कई साल हुए सावित्री बाई के स्कूल की 13 साल की लड़की मुक्ताबाई ने जो निबंध लिखा था उसकी भी मुख्य अंतर्वस्तु जाति-व्यवस्था का अंतर्विरोध है। वह लड़की स्वयं मांग जाति से थी। उसका मानना है कि मुख्य अंतर्विरोध जाति व्यवस्थ का है। दलितों के अंदर भी महार और मांग में फर्क है। मांग जाति को महार की तुलना में निम्न सामाजिक हैसियत प्राप्त है। उस निबंध में दलितों के भीतर ब्राह्मणवादी सोच के अस्तित्व को दिखाते हुए लिखा कि महार भी अपने से नीचेवाले को दबाते हैं और निष्कर्षतः कहा कि इस व्यवस्था (जाति की) में सभी एक दूसरे को दबा रहे हैं। इसलिए इस बात को मान लेने का कोई आधार नहीं बनता कि दलित अपने आप में सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से शोषितों की एक मुकम्मल इकाई है।

ग्रामीण समाज के उलट शहरों-महानगरों में जातियों का एक तरह से लोप हुआ है। यहां समुदाय की अवधारणा जोर पकड़ी है। पिछड़ी जातियां, दलित आदि। कहना होगा कि ये जातियों के नहीं समुदाय के नाम हैं। ‘दलित टर्म’ तो एक ‘अम्ब्रेला टर्म’ है। (सुधीश पचौरी, ‘अमरीका में ब्लैक्स को आरक्षण है’, हंस, अगस्त, 2004)। समुदाय इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में जाति के मुकाबले एक बड़ी राजनीतिक ताकत है। दलित समुदाय का जो मध्यवर्ग है वह शहरों-महानगरों में केन्द्रित है। मध्यवर्ग को अपने दैनिक जीवन में रोज ही अपनी संगठित शक्ति का परिचय देकर अपना प्रभुत्व साबित करना होता है। इस प्रभुत्व के जरिए वे एक तरह का शक्ति-संतुलन स्थापित करते हैं। इस आधार पर वे अपनी सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं। आप कह ले सकते हैं पिछड़ी जाति एवं दलित का जो मध्यवर्ग है वह अपने समुदाय की एकता को दिखाने की ‘राजनीति’ करते हैं। ‘दलित लेखन की राजनीति के इस चरण की सोची-समझी राजनीति जान पड़ती है। यह राजनीति एक नवोदित मध्यवर्ग द्वारा सामाजिक प्रतिष्ठा में अपने हिस्से की मांग और आभिजात्य के अर्जन से जुड़ी है...।’ (डा. अर्चना वर्मा, दलित लेखन सिर्फ एक वर्गीकरण है, हंस, अगस्त, 2004)। यह वर्ग अपने समुदाय के लोगों के बीच यह ‘मिथ्या चेतना’ पैदा करने अथवा गढ़ने की कोशिश करता है कि उस जातीय समुदाय के सारे लोगों के सामाजिक-सांस्कृतिक स्वार्थ एक-से हैं। आर्थिक हितों की शायद ही यह दलित मध्यवर्ग चर्चा करता है क्योंकि ऐसा करने पर उनकी आपसी ‘नैसर्गिक एकता’ की कलई खुल सकती है!

दलितों के बीच मध्यवर्ग के निर्माण की प्रक्रिया अम्बेदकर के जमाने में ही शुरू हो चुकी थी लेकिन कहना होगा कि एक राजनीतिक ताकत के रूप में उसका बहुत ही सीमित उपयोग संभव था। इसी बात को दलित चिंतक चन्द्रभान प्रसाद दूसरे शब्दों में कुछ इस तरह कहते हैं-‘दलितों में आज मध्यवर्ग का उदय हो रहा है, अपने शैशव अवस्था में है। आज का यही दलित शिशु यदि डॉ. अम्बेडकर के समय में उदित हो चुका होता, तो तस्वीर निर्णायक रूप से भिन्न हो चुकी होती, अपने जीवन काल में ही वे वह लड़ाई जीत चुके होते, जिसे हम उनका सपना मानते हैं।’ (बौद्धिकता के अंकुर अभिजात वर्ग से, हंस, अगस्त, 2004)। उस जमाने में मध्यवर्ग हिदुओं एवं मुसलमानों के बीच ही उभर सका था। हिन्दू-मुस्लिम मध्यवर्ग का अंतर्विरोध ही प्रमुख था। शायद इसीलिए अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने इन्हीं दोनों के बीच के अंतर्विरोध एवं आपसी तनाव को गहरा करने की कोशिश की। हालांकि वे इस बात से नावाकिफ नहीं थे कि भारतीय समाज की एकता को तोड़ने के लिए दलित मध्यवर्ग का इस्तेमाल संभव है। यहां यह जोड़ देना मुनासिब लगता है कि साम्राज्यवादी ताकतें इस दिशा में पहल ले चुकी थीं। ‘पहली आम जनगणना 1881 में जातियों और प्रजातियों की सूची बनी। 1891 में उच्च और निम्न जाति के रूप में वर्गीकरण हुए। 1901 में उच्च जाति हिन्दुओं ने जाति उल्लेख का तीव्र विरोध किया। 1911 की जनगणना में उन जातियों और उन कबीलों की अलग-अलग गणना की, जो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता और, वेदों की सत्ता को नहीं मानते, बड़े-बड़े हिंदू देवी-देवताओं और गाय की पूजा नहीं करते, जो गोमांस खाते हैं।’(श्यौराजसिंह बेचैन, सत्ता-विमर्श और दलित, हंस, अगस्त, 2004)। इसके साथ ही वे सामाजिक व्यवस्था में छोटी-बड़ी जातियों का अपने हिसाब से श्रेणीक्रम निर्धारित करने की ‘राजनीति’ भी करते। कहते चलें कि इस साजिश में उनकी न्याय-व्यवस्था भी शामिल थी। और तो और वे ठीक मुसलमानों की तरह दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की भी व्यवस्था कर चुकनेवाले थे। ये सब करने के पीछे उनकी एक सोची-समझी राजनीति थी-‘फूट डालो और शासन करो।’ क्या यह तथ्य भी मतलब से खाली है कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद के दिनों में सबसे अधिक संख्या में किताबें भारत की जाति व्यवस्था पर ही लिखी गईं ?

आज दलित चिंतक यह कहते हुए कि ‘अंग्रेज देर से आए और जल्दी चले गए’, कोई नई बात नहीं कर रहे होते। यह कोई चौंकानेवाली बात भी नहीं है। दरअसल भारत का जो उच्च मध्यवर्ग रहा है, चाहे वह हिदू, मुस्लिम या दलित ही क्यों न रहा हो, अंग्रेजी राज के बने रहने में ही अपना उद्धार देखा है। हिन्दू मध्यवर्ग 1857 की क्रांति से अपने को अगर विलग रखता है तो शायद इसीलिए कि अंग्रेजी राज में ही अपना भविष्य तलाश रहे थे। यह और कोई नहीं अंग्रेजी पढ़ा उच्च मध्यवर्ग था। (पवन के वर्मा, बिकमिंग इंडियन,) उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का आधुनिकीकरण अंग्रेजों के बगैर संभव नहीं हो सकता। इतना ही नहीं वे आधुनिकता के इस जोश में पश्चिम की हर अच्छी-बुरी चीज को अपना रहे थे और उसी प्रक्रिया में भारत की हर अच्छी-बुरी चीज का विरोध भी कर रहे थे। कुछ लोग तिलक के यहां जो स्वदेशी और भारतीयता पर कभी-कभी ‘अनावश्यक’ जोर देखते हैं, उसकी वजह शायद यही है कि वे भारतीय राजनीति में निम्न मध्यवर्ग के प्रतिनिधि नेता थे जो कहीं न कहीं उच्च मध्यवर्ग की जो पश्चिमपरस्ती (या कि राजभक्ति ?) थी, उसकी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी थी। मुस्लिम मध्यवर्ग इस भूमिका में बाद में आए क्योंकि उनके बीच मध्यवर्ग का निर्माण हिन्दुओं की तुलना में अपेक्षाकृत विलंब से हुआ। वहां भी जिन्ना और अबुल कलाम आजाद की धारा है। जिन्ना शायद इतने आधुनिक या कि पश्चिमपरस्त हैं कि लगभग ‘अभारतीय’ हैं। गांधी ने नेहरु और जिन्ना में फर्क बताते हुए कहा था कि दोनों ही बड़े राजनेता हैं लेकिन नेहरु साथ ही एक बड़े देशभक्त भी हैं। दलित मध्यवर्ग और भी देर से पैदा हुआ। बल्कि कहना चाहिए कि दलितों के बीच मध्यवर्ग का व्यापक उभार केवल अभी ही देखने में आया है।

मुस्लिम मध्यवर्ग की ताकत का उपयोग भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एकता को कमजोर करने हेतु अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने किया तो दलित मध्यवर्ग के वर्तमान उभार को अमरीकी नव उपनिवेशवाद ने वर्ग संघर्ष की अवधारणा को कमजोर करने के लिए किया। आज विमर्श की जो आंधी चली है-यथा दलित विमर्श, नारी विमर्श, पर्यावरण विमर्श या फिर उत्तर आधुनिकता का विमर्श ही क्यों न हो-सभी वर्गीय चेतना को कमजोर बनाने के वैश्विक हथकंडों को अमरीकी फंडिंग जारी है। अकारण नहीं है कि दलित बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर फोर्ड फाउंडेशन के फेलोशिप प्रदान किये जा रहे हैं। इन सबमें कहीं न कहीं एक अंतःसूत्रता है जिसकी गहरे में जाकर खोज की जानी चाहिए।

Monday, April 19, 2010

उद्धरण का समाजशास्त्र

कहीं पढ़ा नहीं है, सुना है किसी से कि किसी पुस्तक पर चर्चा चल रही थी। एक वक्ता ने उद्धरण की अधिकता को उसकी खामी बता दी। सभा में नामवर सिंह जी भी थे। महाजनो येन गतः स पन्थाः-यह तो शास्त्रोक्त है। ‘सिंह’ हैं तो लीक छोड़कर ही चलेंगे। वे तो अपना शास्त्र खुद गढ़ने में विश्वास रखते हैं, इसलिए ‘एकला चलो’ का राग अलापे। कहा, उद्धरण कोई दोष नहीं बल्कि मेरी तो ईच्छा है कि सिर्फ उद्धरणों की एक किताब लिखूं। सिर्फ दूसरों की बातें हों जिसमें। अपनी कुछ भी नहीं। जितनी और जैसी जानकारी है, नामवर जी की वह ईच्छा अब तक पूरी न हो सकी। हां, कई साल पहले गुणाकर मुले को उस दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ते पाया था। कोई दस-बारह साल पहले पटने की ए.एन. सिन्हा इन्स्टीच्यूट में राहुल सांकृत्यायन पर कोई कार्यक्रम था। गुणाकर जी को उसमें अपना पर्चा पढ़ना था। मैं श्रोता था वहां। मुझे लगा, गुणाकर मुले के आलेख में अंग्रेजी भाषा के केवल दो शब्द हैं-‘कोट’ एवं ‘अनकोट’। कहने की जरूरत नहीं कि बाकी के लगभग सारे शब्द राहुल जी के रहे होंगे। पर्चा वितरित न हो पाने की वजह से दुविधा आज तक कायम है। हालांकि केवल इन दो शब्दों का ही उच्चारण गुणाकर मुले ने इतनी नाटकीयता के साथ किया था कि उनकी पाठ-शैली आज तक मुझे अद्वितीय लगती है।
जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखे हुए निराला के पत्रों को राजकमल प्रकाशन ने ‘निराला के पत्र’ नाम से प्रकाशित किया है। इसमें भी एक तरह से उद्धरणों की भरमार है। रामविलास जी का मानना है कि ‘रटनेवाला विद्वान उद्धरण ज्यादा देता है, उन्हें समझता कम है।’ (निराला की साहित्य साधना-3, पृष्ठ 39)। जानकीवल्लभ शास्त्री को रटने की घातक/मारक बीमारी थी। ‘‘ ‘चयनिका’ (रवीन्द्रनाथ ठाकुर की चुनी हुई कविताओं का संग्रह) की भांति ‘गोल्डेन ट्रेजरी’ भी घोंट डाली थी’’। (निराला के पत्र, पृष्ठ 28) शास्त्री जी में अंग्रजी भाषा को लेकर एक हीन भावना घर कर गई थी। दरअसल वे अंग्रेजी पढ़ना चाहते थे, दो साल तक इसके लिए उन्होंने प्रयत्न भी किया, ‘‘नान मेट्रिक बाबुओं के दरवाजे-दरवाजे मारा फिरा’’ (उपर्युक्त, पृष्ठ 140), किन्तु सफलता न मिली। ‘‘गांव के दो-एक रईसों ने पिताजी की गरीबी पर तरस खाकर मुझे अंग्रेजी न पढ़ाने की सलाह दी।’’ (उप.) रईसों की इसी ‘‘दुष्ट सम्मति’’ की वजह से शास्त्री जी अंग्रेजी-ज्ञान से वंचित रह गये। ‘अंग्रेजी की पढ़ाई न कर पाने पर अंग्रेजी कविता के उद्धरणों द्वारा अपना ज्ञान प्रदर्शित करने का लोभ ऐसे विद्वान संवरण नहीं कर पाते।’ (निराला की साहित्य साधना-3, पृष्ठ 39)। ‘निराला के पत्र’ में संस्कृत उद्धरणों की अपेक्षा अंग्रेजी के उद्धरण अधिक हैं, इसका यही कारण है।’ (उप.)
उद्धरण की-खासकर अंग्रेजी उद्धरण की बीमारी कुछ नये हिंदी विद्वानों को अपनी चपेट में ले चुकी है। मेरे पास नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित पत्रिका ‘कसौटी’ के कुछ अंक (4, 5, 7, 8 एवं 10) हैं। केवल अंक-10 को छोड़कर प्रायः सर्वत्र ही अपूर्वानन्द जी के लेख फैले हुए हैं। अंक-4 में उनका लेख ‘समकालीन कहानी: यथार्थ से स्वप्न तक’ शीर्षक से मुद्रित है। इसमें उनके अंग्रेजी ज्ञान का जलवा नहीं है। अंक-5 में ‘सामाजिक मूल्यांकन और डा. रामविलास शर्मा की आलोचना’ शीर्षक लेख की शुरुआत ही रेमंड विलियम्स की ‘पौलिटिक्स एंड लैटर्स’ से होती है। बीच में भी यत्र-तत्र अंग्रेजी की छौंक लगाने की भरपूर कोशिश है। अंक-7 में ‘आलोचना का दायित्व: कुछ पुराने विचार’ नाम से लेख प्रकाशित है। लेख की शुरुआत अशोक वाजपेयी एवं नामवर सिंह के ‘सटीक’ उद्धरणों से होती है। गनीमत कि ये मूल हिन्दी में हैं। अपूर्वा जी का वश चलता तो उसका भी अंग्रेजी उल्था ही प्रस्तुत करते। हालांकि इसकी क्षतिपूर्ति उन्होंने आगे जाकर कर ली है। देर आए, दुरुस्त आए! पृष्ठ 50 में जॉन मकगावन के हवाले से जेमसन को उद्धृत किया है। ठीक अगली ही पंक्ति में सीधा जेमसन को दे मारा। दूसरे का बोझ भला जॉन मकगावन आखिर कितना और कबतक ढोते?फिर विशुद्ध हिंदी के विद्वानों को ज्यादा-से-ज्यादा अंग्रेजी नामों से परिचय भी तो अभीष्ट था। कहना होगा कि पृष्ठ 50-51 जेमसनमय है। अंक-8 में बाबा नागार्जुन पर लेख है-‘दबी दूब का रूपक’। संस्कृत और पालि के विद्वान बाबा को अंग्रेजी से मुठभेड़ कराई गई है, वह भी गैरों के बहाने-‘इस संदर्भ में किपलिंग के ऊपर इलियट की यह टिप्पणी देखने योग्य है।’ देखने योग्य तो नन्ददुलारे वाजपेयी की टिप्पणी भी है-‘ हिन्दी वाले अधिकतर अंगरेजी साहित्य की चर्चा अपनी धाक जमाने के लिए ही करते हैं...।’ और बात है कि यह टिप्पणी पंत के संदर्भ में की गई थी।

Tuesday, April 13, 2010

अम्बेदकर की इतिहास दृष्टि

जो पीढ़ी इतिहास में हस्तक्षेप नहीं करती, इतिहास निश्चय ही उसका अनादर कर बैठता है। इसलिए इतिहास को प्रभावित करनेवाले गांधी, नेहरु और अम्बेदकर सभी इतिहास की नवीन व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इसकी धारा को मोड़ने की कोशिश करते हैं। वे इतिहास की उन धारणाओं, स्थापनाओं से भी टकराते हैं जो समाज को गति प्रदान करती हैं। ‘इतिहास में व्यक्ति की भूमिका’ सदैव विवाद के केन्द्र में रही है। खासकर मार्क्स द्वारा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या पेश किये जाने के बाद विवाद और भी गहराता नजर आया है। इस सवाल ने अम्बेदकर को भी खासा परेशान किया था। वे लिखते हैं, ‘क्या इतिहास महापुरुषों का जीवन-चरित्र होता है ? यह प्रश्न प्रासंगिक भी है और महत्त्वपूर्ण भी। क्योंकि यदि महापुरुष इतिहास के निर्माता नहीं तो कोई कारण नहीं कि हम सिनेमा के सितारों से अधिक ध्यान उनकी ओर दें।’ (अम्बेदकर वाङ्मय, खंड,1, पृष्ठ 225)। आगे अम्बेदकर इस संबंध में अब तक दिए गए विचारों का एक वर्गीकरण तैयार करते हैं-‘कुछ लोग ऐसे हैं जो इस बात पर जोर देते हैं कि एक व्यक्ति कितना भी महान हो, समय ही उसका सृजनहार है, समय ही उसको बनाता है समय ही सब कुछ करता है। वह कुछ नहीं करता है।’ (वही, पृष्ठ 255)। अम्बेदकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहते हैं, जिन लोगों का यह विचार व मत है, मेरे विचार से वे इतिहास की गलत व्याख्या करते हैं।’
अम्बेदकर ने इतिहास के सिद्धांतकारों का जो वर्गीकरण किया है उसके अनुसार अगर मानंे तो ‘ऐतिहासिक परिवर्तनों के संबंध में तीन अलग-अलग मत रहे हैं। हमारे पास इतिहास के ऑगेस्टेनियन सिद्धांत हैं जिसके अनुसार इतिहास केवल एक दैवी योजना की अभिव्यंजना है। इसके अंतर्गत मानव जाति को युद्ध तथा पीड़ा झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना है जब तक वह दैवी योजना कयामत के दिन पूरी न हो सके। बर्कले का मत है कि इतिहास की रचना भूगोल तथा भौतिकी ने की है। कार्ल मार्क्स ने तीसरा मत प्रतिपादित किया है। उसके अनुसार इतिहास आर्थिक शक्तियों का प्रतिफल है। इन तीनों में से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि इतिहास महापुरुषों की जीवनी होता है।’ (वही, पृष्ठ 255)। आगे वे और स्पष्ट करते हैं ‘जहां तक बर्कले और मार्क्स का संबंध है, यद्यपि उनके कथन में सत्यता है, परंतु उनके मत पूर्ण सत्य को निरूपित नहीं करते। उनका यह मत बिल्कुल गलत है कि इतिहास के निर्माण में व्यक्ति से इतर शक्तियां ही सब कुछ होती हैं और व्यक्ति का उसे बनाने में कोई हाथ नहीं होता है।’ वही। अम्बेदकर अपना फैसला सुनाते कहते हैं, ‘व्यक्ति से इतर शक्तियां एक निर्धारी कारक होती हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता। परंतु यह बात भी स्वीकारी जानी चाहिए कि व्यक्ति से इतर शक्तियों का प्रभाव व्यक्ति पर निर्भर करता है।’ (वही)।
इतिहास के निर्माण में व्यक्ति की भूमिका को रेखांकित करने के क्रम में अम्बेदकर, कार्लाइल की पंक्ति उद्धृत करना नहीं भूलते। ‘जरूरी नहीं कि कोई युग नष्ट-भ्रष्ट हो ही, यदि वह पर्याप्त महान एवं विद्धान व्यक्ति को प्राप्त कर ले। यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो किसी भी युग का उद्धार हो सकता है।’ (वही, पृष्ठ 255) अम्बेदकर के अनुसार यह उनलोगों के लिए एक बिल्कुल निर्णायक उत्तर प्रतीत होता है, जो इतिहास को बनाने में मनुष्य को कोई स्थान देने से इनकार करते हैं। मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है और पर्यावरण संबंधी शक्तियों के, चाहे दैवी हों या सामाजिक, भले ही सर्वप्रथम हों, पर वे अंतिम चीज नहीं हैं। (वही, पृष्ठ 256)। कोई अल्पज्ञात ही कहेगा कि मार्क्स परिवर्तनकारी शक्तियों में व्यक्ति की भूमिका स्वीकार नहीं करते। अलबत्ता ‘दैवी शक्तियों’ पर तो स्वयं इतिहास का भी कोई वश नहीं होता!
इतिहास की अपनी अवधारणा में नेहरु, अम्बेदकर के उलट मार्क्स के ज्यादा करीब हैं और कार्लाइल व हीगेल से कोसों दूर। सन् 1928 में नेहरु ने इतिहास को परिभाषित करते हुए लिखा, ‘इतिहास युद्धों एवं योद्धाओं की कहानी नहीं है। यह हमें कुछ चुनिंदा लोगों के ही बारे में नहीं बताता बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि किसी भी देश में आमजन की स्थिति क्या है। सच्चा इतिहास आमजन का इतिहास होता है जिनके श्रम से किसी देश की महान सभ्यता की नींव पड़ती है। (वी.सी.पी.चौधरी, सेक्यूलरिज्म वर्सस कम्युनलिज्म, पृष्ठ 112)। नेहरु के लिए महापुरुषों के जन्म की घटना भी कोई चमत्कार नहीं है। वे बहुत साफ समझते हैं कि असाधारण समय में अत्यंत साधारण मनुष्य भी कैसे असाधारण हो जाते हैं। नेहरु ने इंदिरा को पत्रों के माध्यम से यह बात तब समझाई थी जब वह महज दस साल की बच्ची थी।
अम्बेदकर ने जिस चीज को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया है, वह है भारत की जाति व्यवस्था। जाति व्यवस्था को समझने के लिए उन्हें वर्ण व्यवस्था से भी टकराना पड़ा। फलतः कुछ अत्यंत ‘मौलिक’ बातें ढूंढ़ निकाली। उनका मानना है कि ‘जाति का आधारभूत सिद्धांत वर्ण के आधारभूत सिद्धांत से मूल रूप में भिन्न है, बल्कि मूल रूप से परस्पर विरोधी है। पहला सिद्धांत गुण पर आधारित है। यह सारी गड़बड़ी जाति व्यवस्था की है वर्ण व्यवस्था की नहीं।’ शायद इसीलिए अम्बेदकर ‘आदर्श वर्ण व्यवस्था’ को स्थापित करने की बात करते हैं। ‘उसके उद्येश्य से वर्ण व्यवस्था की स्थापना के लिए पहले जाति व्यवस्था को समाप्त करना होगा।’( अम्बेदकर वाङ्मय, खंड,1, पृष्ठ 81)। अम्बेदकर के इस पेंच को थोड़ा ढीला करने के लिए हम यहां महज इतना भर जोड़ देना आवश्यक समझते हैं कि ‘चूंकि वर्ण व्यवस्था में, कल्पित श्रम विभाजन में आरंभ से ही उसके वंशानुगत रूप पर जोर दिया गया, इसलिए वर्ण से जाति का भी बोध हो सकता था और इन दोनों शब्दों का प्रयोग एक दूसरे के स्थान पर भी हो सकता था। बंगाल से प्राप्त दसवीं सदी के एक ताम्रपत्र लेख में उल्लिखित बृहच्छत्रिवण्ण (एक ऐसा गांव जिसमें छत्तीस वर्ण के लोग रहते हैं) नामक गांव से पता चलता है कि आम व्यवहार में इन दोनों शब्दों का प्रयोग बिना किसी भेदभाव के किया जाता था।’ (पुष्पा नियोगी, ब्राह्मणिक सेट्लमेंट्स इन डिफरेंट सब डिवीजन्स ऑफ बंगाल, पृष्ठ 55)। वर्ण और जाति व्यवस्था में सम्मिलित लोगों की दृष्टि में इन दोनों शब्दों के समानार्थी होने से संकेत मिलता है कि वर्ण और जाति दो भिन्न प्रणालियां नहीं बल्कि एक ही प्रणाली थे। और यह तो सर्वविदित ही है कि स्वयं हिन्दू आज भी, जाति प्रथा के वर्ण से लेकर, समाजशास्त्रियों की भाषा में बात करें तो ‘उपजाति’ तक के सभी स्तरों के लिए जाति शब्द का ही प्रयोग करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि वेदोत्तर काल के बौद्ध तथा ब्राह्मण साहित्य में बार-बार उल्लिखित जाति शब्द का मतलब आवश्यक रूप से यह नहीं निकालना चाहिए कि वर्ण व्यवस्था में समाये मूल्यों और व्यवहारों से भिन्न प्रकार के मूल्यों और व्यवहारों पर आधारित कोई जाति व्यवस्था ई. सन् के आरंभ से कुछ सदी पूर्व काम कर रही थी।
अम्बेदकर यह भी कहते हैं कि ‘गुण के आधार पर चातुर्वर्ण्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अनर्थकारी नामों से रखना -जिनसे जन्म के आधार पर सामाजिक विभाजन का संकेत मिलता है, समाज के लिए फंदे की तरह है।’( अम्बेदकर वाङ्मय, खंड,1, पृष्ठ 81)। लेकिन दुर्भाग्य है कि इसी फंदे को अपनाकर बौद्ध धर्म क्रांतिकारी हो जाता है अथवा यों कहें कि वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखते हुए भी बौद्ध धर्म की क्रांतिकारी भूमिका कायम रहती है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और अब किसी से छिपा भी नहीं है कि एक गंभीर बहस (आत्मचिन्तन) के बाद गौतम बुद्ध ने क्षत्रिय वर्ण में जन्म लिया। यह और बात है कि यह बहस कहीं बाहर समाज में नहीं बल्कि बुद्ध के अंतर्मन में चली। जातक कथाओं के अध्ययन से साफ पता चलता है कि बुद्ध ब्राह्मण एवं क्षत्रिय कुल में ही जन्म लेना श्रेयस्कर मानते थे। ब्राह्मण-क्षत्रिय कुल के अनुसार क्षत्रिय कुल लोकमान्य है, इसलिए श्रेष्ठ है। क्षत्रियत्त्व की श्रेष्ठता से अम्बेदकर भी खासे प्रभावित लगते हैं। कहना न होगा कि अपनी पुस्तक में अम्बेदकर शूद्र को क्षत्रिय साबित करने में काफी श्रम और समय लगाते हैं। इस तथ्य से कि बुद्ध ने वर्णक्रम को स्वीकार किया है, अम्बेदकर अनजान नहीं हो सकते।
लेकिन कहना पड़ेगा कि अम्बेदकर को इतिहास का अज्ञान (अ-ज्ञान) है। वे कहते हैं, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि चातुर्वर्ण्य के समर्थकों ने यह नहीं सोचा कि उनकी इस वर्ण व्यवस्था में स्त्रियों का क्या होगा? क्या उन्हें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-चार वर्णों में विभाजित किया जाएगा या उन्हें अपने पतियों का दर्जा प्राप्त कर लेने दिया जाएगा ? यदि स्त्री का दर्जा शादी के बाद बदल जाएगा तो चातुर्वर्ण्य का क्या होगा अर्थात क्या किसी व्यक्ति का दर्जा उसके गुण पर आधारित होना चाहिए। इस स्थिति में चातुर्वर्ण्य के समर्थकों को स्वीकार करना होगा कि उनकी वर्ण व्यवस्था स्त्रियों पर लागू नहीं होती।’ (वही, पृष्ठ 83)। अम्बेदकर को यह कैसे मालूम नहीं हो सकता कि संपूर्ण हिन्दू शास्त्र (मनुस्मृति विशेष रूप से) में स्त्रियों की गिनती शूद्रों के साथ होती रही है। क्या यह भी किसी को बताने की जरूरत है कि शूद्र की अयोग्ताएं स्त्री की भी अयोग्यताएं हैं। शूद्र और स्त्री भारतीय संस्कृति में वेदपाठ एवं अन्य धार्मिक अधिकारों के मामले में समान रूप से उपेक्षित और वंचित रहे हैं। क्या कोई बता सकता है कि जनेऊ पहनने का अधिकार शूद्र एवं स्त्री में किसे प्राप्त है। संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र क्या समान रूप से ‘हीन’ (अपभ्रंश) भाषा का प्रयोग करते नहीं पाये जाते ? इतिहास के ये तथ्य अम्बेदकर के लिए किसी ‘काम’ के साबित नहीं होते। उन्हें तो कबीर की फटकार भी सुनाई नहीं देती-‘‘मोटी जनेऊ ब्राह्मण पेठो, ब्राह्मणी को नहीं पहनाई। जनम जनम को भई वो सूदा, उने परस्यो तने खाई।।’’ कारण शायद यह रहा हो कि स्वयं बुद्ध ने ही स्त्रियों का घोर विरोध कर डाला था। अम्बेदकर में बुद्ध के खिलाफ जाने की हिम्मत न थी। विरासत का तिरस्कार! बौद्ध धर्म-दर्शन शायद अम्बेदकर के लिए ‘डूबते को तिनके का सहारा’ जैसा था।
अम्बेदकर का मानस पूर्वग्रह से ग्रस्त है, इसलिए कई चीजों से जान-बूझकर बचने की कोशिश करता है, पीछा छुड़ाने की शैली में। इसलिए अवैज्ञानिक नतीजे निकाल लेता है। वे कहते हैं, ‘भारतीय इतिहास में केवल एक ऐसा काल है, जिसे स्वतंत्रता, महानता और गौरवपूर्ण युग कहा जाता है। वह युग है मौर्य साम्राज्य। सभी युगों में देश में पराभव और अन्धकार छाया रहा है। लेकिन मौर्य काल में चातुर्वर्ण्य को जड़ मूल से समाप्त कर दिया गया था। मौर्य युग के शूद्र जिनकी संख्या काफी थी, अपने असली रूप में सामने आए और देश के शासक बन गए। इतिहास में पराभव और अंधकार का युग वह था जब चातुर्वर्ण्य देश के अधिकांश भाग में अभिशाप बनकर फैल गया।’ (वही, पृष्ठ 86)। कहना होगा कि मौर्य काल से संबंधित जितने भी देशी-विदेशी विद्वान हैं, चाणक्य से लेकर मेगास्थनीज तक-किसी ने भी चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के लोप की बात न कही है। मौर्य काल का वैभव और उसकी महानता, देशी शूद्रों और कलिंग-युद्ध में लाखों की संख्या में बंदी बनाये गये दासों से पैदा हुई, जिन्हें कृषि-दासों में परिणत कर बड़े-बड़े राजकीय फार्मों में लगाया गया। अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि मौर्यों के पास सबसे बड़ी सेना, सबसे बड़ी नौकरशाही और साथ ही सबसे बड़ी गुप्तचर व्यवस्था थी। शायद यही कारण है कि प्राचीन भारत के इसी ‘महान’ युग में किसानों से टैक्स की अधिकतम दर वसूल की जाती थी। किसान शोषण से तंग आकर गांव तक छोड़ देने को मजबूर थे। तक्षशिला के किसानों ने बिंदुसार एवं अशोक, दोनों ही महान मौर्य शासकों के काल में विद्रोह किया था। चाणक्य राजकोष भरने के लिए सही-गलत कई आश्चर्यजनक तरीके बताता है। वह ‘अर्थशास्त्र’ में लिखता है कि जरूरत पड़ने पर राजा देवताओं की मूर्त्तियां बनवाकर बाजार में बेचे, जनता की धार्मिक भावना का दोहन करे, अंधविश्वास पैदा करे। फिर भी अम्बेदकर के लिए मौर्य काल महान काल है क्योंकि उनकी दृष्टि व्यक्ति से बनती है, समय और समाज की भौतिक सामाजिक परिस्थितियों से नहीं। और फिर शायद इसलिए भी कि इस युग में चातुर्वर्ण्य समाप्त हो गया था, कि शूद्र अपने ‘असली’ (बतौर शासक) रूप में सामने आए थे।

Tuesday, April 6, 2010

श्रम की गांठ से उपजी कविताएं


अपनी पीढ़ी के एक कवि की चर्चा धूमिल की पंक्ति से शुरू करने के लिए विज्ञजन से क्षमा की आशा रखता हूं। ‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’ मैं इसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहता हूं कि ‘आदमी’ होना कविता लिखे जाने की पहली और अनिवार्य शर्त है। व्यक्तित्व के फ्रॉड से ‘बड़ी’ कविता नहीं लिखी जा सकती। बड़ी कविता से मेरा मतलब महान कविता से कतई नहीं है। बड़ी कविता अपनी संपूर्ण रचना-प्रक्रिया में ‘जेनुइन’ होती है। यहां रचना-प्रक्रिया का उल्लेख अकारण नहीं है। समीक्ष्य काव्य-संग्रह ‘परिदृश्य के भीतर’ के कवि को मैंने पूरे एक दशक तक (यह क्रम अब भी जारी है) जाना और ‘झेला’ है। एक ईमानदार और मुखर आदमी को ‘झेलना’ सहज और आसान नहीं होता। इस कवि को मैंने जब भी अपने पास पाया-उसे बोलता-बड़बड़ाता हुआ ही पाया। इतने दिनों तक चप्पलें साथ चटखाने (घसीटने) के बाद मैंने यही महसूस किया कि ‘चुप्पी उसके लिए मौत से भी ज्यादा त्रासद और भयावह है।’
‘परिदृश्य के भीतर’ में सन् 1988 से 99 तक की कुल इक्यानवे कविताएं शामिल हैं। इन तमाम कविताओं का प्रथम पाठक/श्रोता होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। इसलिए इन कविताओं की रचना-प्रक्रिया में आनेवाली एक-एक चीज से परिचित हूं। कइयों के तो मुझे दृश्य तक याद हैं कि किन परिस्थितियों में वह कविता जन्म ले रही थी। कहना होगा कि कुमार मुकुल की कविताओं का क्षितिज काफी विस्तृत है। घर-परिवार और आस-पास की चीज से लेकर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य तक इनकी कविताओं में सहज भाव से शामिल होते हैं। इनकी कविता सोमालिया की दैन्य स्थिति से शुरू होती है और पहाड़, पत्नी से होती हुई महानगरीय जीवन से पलायन करती संवेदना तक को अपना निशाना बनाती है। प्रकृति पर इनके पास सबसे अधिक कविताएं हैं मानो वह उनकी मुट्ठी में हो।
‘सोमालिया’ संग्रह की सबसे छोटी कविता है, लेकिन इस छोटी-सी कविता के माध्यम से कवि विश्वव्यापी ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का सबसे अधिक प्रत्याख्यान करती है। पूंजीवाद के भ्रष्टतम रूप ने पूरी मानवीय संवेदना को किस हद तक अमानवीय बना डाला है,उसके पूरे अर्थशास्त्र को इन दो पंक्तियों की कविता से जाना जा सकता है। कविता की पूरी विकास-यात्रा को समझने के लिए इसको उद्धृत करना अत्यंत अनिवार्य है;
‘मुट्ठी भर
अन्न के लिए
गोलियां
मुट्ठी भर
और सभ्यता के कगार पर
आ पहुंचे हम।’

इसे उद्धृत करने का एकमात्र कारण यह नहीं है कि यह छोटी है और ऐसा करना मितव्ययी होना अथवा सुविधाजनक है, बल्कि यह संग्रह की कविता एवं कुमार मुकुल की चेतना का प्रस्थान-बिंदु है। यहां से मुकुल की कविता के कैनवास खुलते हैं।
इस ‘कुलीन’ और बर्बर संस्कृति का रक्तबीज है महान औद्योगिक क्रांति के गर्भ से उपजी बाजार की फासीवादी संस्कृति। उपभोक्तावाद ने हमारी तमाम संवेदना को ग्रस रखा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शक्ल में नव-फासीवादी ताकतें हमारे बीच फिर से पसरने लगी हैं। एक ईमानदार और संवेदनशील कवि भला इस अमानवीय, त्रासद स्थिति को अपनी नियति मानकर चुप कैसे बैठा रह सकता है। उसके पास इतने तफसील हैं इसके कि वह पूरी विनाशलीला को बगैर किसी धुंध के साफ-साफ देख रहा है। संग्रह की दूसरी कविता ‘कउआ’ इसी सत्य को उद्घाटित करती है। कउए को शायद पता नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कितना खाद्य-अखाद्य बना डाला है। किसी को अलग से बताने की जरूरत शायद ही अब शेष हो कि प्रति-वर्ष लाखों की संख्या में गायों का निधन पॉलिथीन खाने से हो रहा है और हमारी अत्यंत ‘सहनशील’ हिंदू सभ्यता कुछ भी कर पाने में असमर्थ साबित हो रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन को आये दिन सरकारी वक्तव्यों में जिस तरह पेश किया जा रहा है,लगता है, यह कोई महान् उपलब्धि हो। पचास वर्षों से अधिक के आजाद भारत के इतिहास में गुलामी की याद अब भी ताजा है और कवि की सचेत आंखें उसके फैलते जाल को अपनी पराधीनता का तंबू मान रही हैं। कहना होगा कि भारत में अंग्रेजों का आगमन एक विशुद्ध व्यापारिक कंपनी के रूप् में हुआ था लेकिन धीरे-धीरे देशी निजामों की अदूरदर्शिता और सामान्य जन की ‘कोउ नृप होहिं हमें का हानि’ वाली मुद्रा की वजह से शासक बन बैठे थे। आज स्थिति उससे दो कदम आगे तक जा चुकी है जब हम खुद उसके आने का जश्न मना रहे हैं और सारी दुनिया के सामने दांतें निपोरकर अपना अहोभाग्य बता रहे हैं। सूत्र रूप में यह कहना होगा कि कवि अपने दैनिक जीवन में गांधीवादी शैली से काम चलाते हैं। अपने आस-पास अभावों की एक दुनिया सृजित कर।
कुमार मुकुल से असहमति की गुंजाइश तब होती है जब वे कहते हैं,
‘संस्कृतियों के
इतने रंग-बिरंगे टीलों को छोड़
गंगा की ओर मुंह किए
कहां भागा जा रहा है कउवा।’

हमारे प्यारे कवि के लिए शहर संस्कृति के रंग-बिरंगे टीले से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ‘कउवा’ मुकुल की अकेली कविता नहीं है जिसमें शहर के प्रति उपेक्षा का भाव है बल्कि संगह की जिस किसी कविता में भी शहर आता है,वह हीनता-बोध और अपराध-बोध की भावना से ग्रस्त होता है और कवि की कुपित संवेदना का शिकार होता है। इस प्रसंग में कवि की भिन्न-भिन्न कविताओं से चुनी गई पंक्तियों को यहां रखने की अनुमति चाहूंगा। ‘मर्यादाएं हम तोड़ेंगे’ कविता की अंतिम पंक्तियां कुछ इस तरह की हैं,
‘बंदरों-भालुओं से अंटी अयोध्या को
पीटेंगे बांधकर

इसी कंकरीट के जंगल में।’
ऐसा कहते हुए कवि अयोध्या की संपूर्ण ऐतिहासिक गरिमा और उससे जुड़ी हमारी जातीय स्मृतियों को एक गैर-जरूरी चीज साबित कर डालता है। एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘प्यार में’। कविता यों शुरू होती हैः
‘प्यार में महानगरों को छोड़ा हमने
और कस्बों की राह ली
अमावस को मिले हम और
आंखों के तारों की रोशनी में
नाद के चबूतरे पर बैठे हमने
दूज के चांद का इंतजार किया
और भैंस की सींग के बीच से
पश्चिमी कोने पर डूबते चांद को देखा।’
इससे पहले कि मैं कुछ कहूं कवि अपनी ‘पुतैये’ कविता का स्मरण करे। क्या शहर इतना अमानवीय है कि प्यार करने के लिए अब किसी को कस्बों की राह थामनी होगी ? कवि स्वयं लिखता है;
‘महानगर में अब भी तीखा है महुआ
अब भी सुंदर हैं लड़कियां यहां।’
कवि को शायद इस बात का अंदाजा हो कि कस्बों में जो प्रेम-संबंध हैं, जीवन का जो माधुर्य है, उसकी रक्षा के लिए लाखों मजदूर और भिन्न-भिन्न पेशों की चाह लिए नौजवान प्रति-वर्ष किसी-न-किसी शहर को अपना गंतव्य बनाते हैं। यहां उनके हाथों को काम और गांवों में चल रहे/पल रहे प्रेम-संबंधों को खुराक की नमी मिलती है।
शहर के प्रति कवि का जो नजरिया है वह ऐतिहासिक विकास की गलत समझ से बना लगता है। बाजार-संस्कृति का विरोध करने का यह मतलब कतई नहीं होता कि आप प्रगति ही के महत्व को नकार दें। शहर सिर्फ विषैला सर्प नहीं है जो हमेशा फन काढ़े बैठा हो कि कब आदमी आये और उसे डंस लें। अज्ञेय के यहां शहरों के लिए तिरस्कार का भाव है और गांवों का चित्रण ऐसा करते हैं मानों वहां हमेशा ‘ढोल और मादल’ बजते हों। कवि केदारनाथ सिंह के लिए शहर वैसी जगह है जहां इच्छाएं पलती हैं। अब इस सवाल का जवाब तो कुमार मुकुल ही देंगे कि क्या शहरों में स्वयं इसका विरोध करनेवाले कवि और लेखक नहीं बसते ? आपके पास आंकड़ों की कमी नहीं, और आप बता सकते हैं कि शहरों से गांवों के लिए दया की भीख मांगनेवाले कितने गंवई कवि हैं जिन्हें हम भी जानते हों। क्या हम इस बात को कहने का साहस कर सकते हैं कि कविता के जन्म लेने से पाठकों तक लाने का सारा कारोबार इन्हीं नगरों-महानगरों में अंजाम पाता है। हमारे ज्ञान को दुरुस्त करनेवाली कौन-सी किताब और ‘कठिन वक्त की कविता’ की कौन-सी पत्रिका है जिसके कारखाने गांव में हैं ?
शहरों का इतिहास हमारी प्रगति की कहानी कहता है जिसमें लाखों-करोड़ों मजदूरों का श्रम लगा है। संस्कृति के इन टीलों को निर्मित करने में हमारे फौलादी हाथ काम आये हैं। इन्हीं टीलों में किताबों से अंटे तंग से तंग कमरे में अरुण कमल जैसे सुकवि की आत्मा बसती है। उसके एक कोने में सूर्य की तरह उद्भाषित होता पितरिया लोटा भी होता है।
इसी प्रसंग से संबंधित ‘चबूतरा’ शीर्षक की दो कविताएं भी चर्चा की खासतौर से अपेक्षा रखती हैं। इसमें भी कुएं के माध्यम से गांव और शहर (माफ कीजिए, कवि इसे महानगर कहता है) की आत्मा का हमें फर्क बताया गया है। एक कुआं कवि के गांव में है जिसके
‘चबूतरे के पास ही
मेंहदी लगी थी
जो आज तक हरी है
दिन में जिस पर लंगोट सूखते हैं
और रात में उगते हैं सफेद सपने।’

आगे
‘एक कुआं है
महानगर में भी
बिना चबूतरे के
उसके निकट जाने पर ही
पता चलता है कि कुआं है।’

और ऐसा शायद इसलिए है कि ‘महानगर’ के कुएं के लिए कवि की कोई स्मृति नहीं है। इस कुएं के पास कवि ने शाम भी न गुजारी होगी, रात की कौन पूछे। इसीलिए कवि और उनके वर्ग के लोगों के लिए इसका महातम साल में केवल एक बार छठ के अवसर पर जगता है। लेकिन चाय की गुमटीवाला ऐसा नहीं सोचता जिसकी चाय के लिए पानी इसी कुएं से जाता है। सुबह-सुबह कुछ दूधिए भी अपना गेरू वहीं धोते हैं। भिखमंगे भी भरी दोपहरी में वहीं नहाते हैं। कवि को शायद यह मालूम हो कि यह मुहल्ला शहर का वह हिस्सा है जिसका शहरीकरण होना अभी बाकी है। पड़ोस के कई भूखंड अब भी खाली पड़े हैं जिनमे बिल्लियां चूहों के साथ बेखौफ खेलती हैं। जैसे ही अगहन में धान पकते हैं कि उसकी एक लरछी अपनी चोंच में दबाए गौरैया कवि के घर में दाखिल हो जाती है। लेकिन कवि हैं कि
‘कंक्रीट के इस जंगल में
मौसम की निर्जनता
मुझे ही नहीं
इस घरेलू चिड़िया को भी खलेगी।’

कविता का पैरा अभी खत्म भी न होने पाया कि कवि की राय महानगर को लेकर बदल जाती है। वे लिखते हैं, ‘इस नये बसते शहर के पड़ोस में धान की फसल कटेगी।’ शहर के गिर्द फसल की हरियाली हो तो कवि को भला क्या उज्र!
कुमार मुकुल की कविता की विशेषता इस बात में है कि बड़ी-से-बड़ी बात को कम-से-कम शब्दों में कह डालती है। इस लिहाज से संग्रह में कई ऐसी कविताएं हैं जिनमें स्थितियों का ऐसा जबर्दस्त चित्रण है कि एक साथ भाव के कई स्तर खुलते हैं। सामंती व्यवस्था और मानसिकता के विरुद्ध चल रहे नक्सलबाड़ी आन्दोलन को कवि दृश्य-चित्रण प्रस्तुत कर शब्दों की कितनी मितव्ययिता प्रदर्शित करता है-इसका बेहतर नमूना पेश करती है ‘पुतैये’ कविता। कविता की पंक्तियां कुछ इस तरह हैं;
‘यूं चरमराया तो था बांस की चांचर का दरवाजा
प्रतिरोध किया था जस्ते के लोटे ने
ढनमनाया था जोर से
चूल्हे पर पड़ा काला तावा भी
खड़का था
नीचे गिरते हुए।’

कितने कम शब्द और कहने के लिए कितनी बड़ी बात। कविता की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे अनायास शमशेर की ‘उषा’ कविता की याद हो आई। अद्भुत चित्रात्मकता इन दोनों कविताओं की जान है। ऐसे ही विरल अवसर के लिए एंगेल्स ने कभी लिखा था कि विचार जितने ही छिपे हों लेखक के लिए उतना ही अच्छा है। क्या इन कविताओं में विचार छिप सके हैं ? एंगेल्स की इस उलटबांसी( ?) का कई जनवादी आलोचक तक ने अर्थ लगाया कि विचार कविता के लिए उपयुक्त नहीं है!
कवि जब अपनी दैनिक जिंदगी में बातचीत या बहसों में होता है तो सीधे हमला करता है लेकिन कविताओं में कई बार प्रकारांतर से चीजों को बे-पर्द करता है। एक कविता ‘बाई जी’ शीर्षक से है जो दरअसल पत्नी को संबोधित करके लिखी गई है। इस कविता के माध्यम से कवि ने घर के सामंती ढांचे की विद्रूपताओं को दिखाने की कोशिश की है। यह घर जिसे हमने सभ्यता-संस्कृति के विकास की एक खास अवस्था में गढ़ा था,आज इस बीसवीं शती के अंतिम दौर में भी एक स्त्री के अस्तित्व को लील जाना चाहता है। संस्कृति की सुरक्षा में खड़ी की गईं ये दीवारें एक स्त्री के गुनगुनाने मात्र से कैसे बेतरह कांपने लगती हैं। जिस भयावह स्थिति की ओर कुमार मुकुल ने ईशारा किया है, उसी भयावहता को दूर तक तानते हुए आलोक ने लिखा है घर की जंजीरें कितनी बड़ी दिखायी देती हैं जब कोई लड़की घर से भागती है। यहां नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है।
मुकुल जी का संग्रह इस कारण से भी महत्वपूर्ण है कि वह श्रम की महत्ता को सीधे-सीधे स्थापित करता है। पूरा संग्रह ऐसी पंक्तियों से भरा है जो श्रम की दुनिया से कवि के जुड़ाव को प्रदर्शित करती है। निम्न मध्यवर्ग का वह तबका जो महान श्रम से जुड़ा नहीं होता शीघ्र ही अवसाद के गहरे अंधेरे में चला जाता है। बारी-बारी से तमाम चीजों की अर्थवत्ता समाप्त होने लगती है। श्रम हमें ऐसे अवसाद से बचाता है और व्यक्तित्व को एक दृढ़ आधार प्रदान करता है। इसीलिए हमारे कवि के जीवन में अवसाद पल-दो-पल की चीज है। उदासी डरावनी नहीं है बल्कि एक ‘धारदार हीरा’ है। कवि गहरे आत्मविश्वास से कहता है, ‘उदासी आंखों में पैठ गयी तो
सोचता हूं दौड़ूं और उदासी को
पीछे छोड़ दूं।’

ऐसा वही कह सकता है जिसमें काम करने की अदम्य लालसा हो। मुझे नेहरु की याद आती है जब वे कहते हैं, ‘शायद मुझे एक उड़ाका होना चाहिए था-इसलिए कि जब जिन्दगी का धीमापन और उदासी मुझ पर छाये, तो मैं उड़कर बादलों के कोलाहल में समा जाता।’ विज्ञजन कहेंगे, यह तो एक तरह का रोमान है। सही है; किन्तु यह जीवन और श्रम के महान उद्येश्यों से पैदा हुआ है। मुकुल की कविताएं श्रम की गांठ से उपजी कविताएं हैं।