Saturday, October 3, 2026

कवि पत्रिका

विष्णु चंद्र शर्मा ने मासिक पत्र 'कवि' सन 1957 में प्रकाशित करना शुरू किया था। (विष्णु चंद्र शर्मा, 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन', आजकल : अप्रैल 2018) 'कवि' सच्ची लघु पत्रिका थी। लघु पत्रिका का आदर्श, एक देशभक्त, जीवन प्रेमी कवि द्वारा सम्पादित-निहायत सीमित साधनों से। विष्णुचंद्र शर्मा की नौकरी नहीं थी। वे तो पढ़ रहे थे। (विश्वनाथ त्रिपाठी, 'बना रहे बनारस', आलोचना, जनवरी-मार्च 2008, पृष्ठ 27) 'कवि' की शुरुआत की कहानी विष्णुचंद्र शर्मा ने खुद लिखी है : "मां तब जीवित थीं। मैंने कुछ रुपये 'कवि' के लिए उनसे मांगे थे। पिता की मौत के बाद वह खुद अपने को असहाय मानने लगी थीं। मुझे याद है उनके पास सोने की एकमात्र करधनी थी जो पिता की जेल यात्रा के समय नानी की प्रति-उत्पन्न मति के कारण बच गई थी। मां ने दूसरे दिन वह करधनी बेच दी थी। उस धन का मां ने चार हिस्सा किया था। एक हिस्से से कवि के कुछ अंक छपे थे।" (विष्णुचंद्र शर्मा, पूर्वोद्धृत)

विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है : "विष्णुचन्द्र शर्मा एक दिन रात को दस बजे गुर्टू हॉस्टेल में मेरे कमरे में आए। तेजी में थे। मेरा उनसे तब तक परिचय तो था लेकिन बस परिचय ही था। तपाक से बोले-तुमने कोई कविता लिखी है ‘परिवार’। नामवर तारीफ कर रहे थे। लाओ कवि निकालने जा रहे हैं, छापेंगे। इतने अधिकार से उन्होंने यह सब कहा कि मैं भाव-विभोर हो गया। कविता छपी। कविता की कुंडली अच्छी थी। अयाचित यश मिला।" (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

‘कवि’ दो आने में मिलता था। इतने कम दाम की कोई पत्रिका न उसके पहले कोई थी न बाद में हुई। पत्रिका की इतनी कम कीमत पर राहुल जी ने भी प्रसन्नता जाहिर की थी। पत्रिका एक फर्मे की थी। सारा काम-पैसा, सामग्री जुटाना, कागज, छपाई, वितरण, प्रूफ-विष्णुचन्द्र शर्मा ही करते थे। नामवर जी उसके हर अंक में लिखते थे। मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र, नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, कीर्ति चौधरी, रघुवीर सहाय विशेष कवि के रूप में प्रस्तुत किए गए। इन पर त्रिलोचन शास्त्री, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, डा. रामअवध द्विवेदी ने लिखा। भवानी प्रसाद मिश्र पर पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना लिखी-देखने में गद्य, पढ़ने में कविता बिल्कुल भवानी प्रसाद मिश्र की शैली में-जैसा बोलता है लिख और उससे भी बड़ा तू दिख।

‘कवि’ में कोई विज्ञापन नहीं छपता था। आज जिनको लघु पत्रिकाएं कहा जाता है उनमें से अधिकांश विज्ञापन बटोरू हैं। ‘कवि’ उन लघु पत्रिकाओं की आदि पत्रिका है जिन्होंने इस देश में ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को निभाया है। विश्वनाथ त्रिपाठी की जानकारी में मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं पर ‘कवि’ में पहली बार विचार किया गया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत) विचारक नामवर सिंह थे। रघुवीर सहाय उन दिनों तक नामवर जी के प्रिय कवि हो गए थे। केदारनाथ अग्रवाल की जनवादिता में सौंदर्य के तत्व ढूंढ़ने का उपक्रम केदारनाथ सिंह ने किया।

उन दिनों प्रगतिशील साहित्यकारों के पास शायद ही कोई पत्रिका रही हो। 'कल्पना', 'धर्मयुग', 'ज्ञानोदय' सबको-प्रगतिशीलों को भी छापती थीं। किन्तु उनमें प्रगतिशील एवं वामपंथी विचारधारा का प्रच्छन्न विरोध भी चलता था। शिवदान सिंह चौहान के हाथ से 'आलोचना' निकल गई थी। इस वातावरण में दुअन्नी की काव्य पत्रिका ‘कवि’ ने अपनी गम्भीरता और ताजगी से साहित्यकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि प्रगतिशील आंदोलन में नई जान फूंक दी और आज की लघु पत्रिका की लहर का प्रवर्तन किया। कम पैसे से भी अच्छी साहित्यिक पत्रिका निकाली जा सकती है-इसका रास्ता सुझाया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

हिंदी के कवियों की नई पीढ़ी ने इसमें विशिष्ट सहयोग दिया। सुखद आश्चर्य यह है कि पुरानी पीढ़ी और विश्वविद्यालय के आचार्यों ने भी इसकी सराहना ही नहीं की, इसमें सकर्मक योगदान किया। 'कवि' पत्र पर विष्णुचंद्र शर्मा को राहुल जी का भी एक उत्साहवर्धक पत्र (20/8/57) प्राप्त हुआ था। तब राहुल हार्न क्लिप, हैपी वैली, मसूरी में थे। पत्र निम्नवत है : 

"प्रिय शर्मा जी, 

'कवि' के पांच अंक मिले। कविताओं को देखकर खुशी हुई ही, साथ ही यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई, कि पत्र का मूल्य इतना रखा गया है जिसका भार पाठक आसानी से वहन कर सकता है। हमारी कविताओं के लिए ऐसे एक पत्र की बड़ी आवश्यकता थी। 

मेरी हार्दिक कामना है, कि पत्र दीर्घायु हो। 

आपका

राहुल (आजकल : अप्रैल 2018 में उद्धृत)

‘कवि’ में अनेक नए लोगों को रचनात्मकता की शिक्षा-दीक्षा भी दी। कवि जैसी एक फर्मे की पत्रिका में नेरूदा, जिम हिक्यट, वाल्ट ह्विटमैन, ऑस्कर वाइल्ड आदि कवियों के उत्कृष्ट काव्यानुवाद प्रकाशित हुए। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

'कवि' के केवल 11 अंक निकले। अन्तिम अंक संयुक्तांक था। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 28)

Thursday, October 1, 2026

मास-मास 'बालक' प्रसव

1926 ई. में बच्चों की सचित्र मासिक पत्रिका ‘बालक’, ‘पुस्तक भंडार’ के रामलोचनशरण द्वारा लहेरियासराय से शुरू की गई। बाद में इसका प्रकाशन पटना से होने लगा। इसके संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे। 1927 के ‘गया साहित्य सम्मेलन’ में ‘वियोगी’ ने बेनीपुरी पर व्यंग्य करते हुए एक कविता सुनाई थी : ‘मास-मास बालक प्रसव’। पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी ही का नाम छपता रहा। ‘बालक’ की परिकल्पना में भी  इनकी भागीदारी थी, इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’ बाद में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। प्रवेशांक के समय बाबू शिवपूजन सहाय कलकत्ता के ‘समन्वय’ में कार्यरत थे, इसलिए इसके आरंभिक दो अंक उन्हीं के संपादन व देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में नाम रामलोचनशरण बिहारी का जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में  ‘विद्यापति प्रेस’ स्थापित किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण इसी प्रेस में होने लगा। 

रामलोचनशरण द्वारा संपादित ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ जिसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापतिं तथा पांच स्वागताध्य के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में ‘बालक’ का विज्ञापन छपा था जिसमें कहा गया कि ‘‘सोलह स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चैथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चैदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। इस तरक ‘बालक’ ने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इससे बच्चों की न केवल भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ बल्कि उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की भी वृद्धि हुई। 

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक-साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था। दिनकर, प्रभात, आरसी, हंसकुमार तिवारी, नेपाली आदि की काव्य-प्रतिभा ‘बालक’ के पृष्ठों में ही पल्लवित हुई। नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ बेनीपुरी ने ‘बालक’ में छापी थी। संभवतः 1926-27 की बात थी, जब नेपाली 15-16 की उम्र में तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे। उक्त कविता बेतिया मिडिल स्कूल के एक शिक्षक ने अपने पत्र के साथ रामलोचनशरण के पास प्रकाशनार्थ भेजी थी। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की पत्रिका के अनुसार नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी कही जाती है जो सही नहीं है। 1927 ई. में आरसीप्रसाद सिंह की कहानी ‘आम का पेड़’ ‘बालक’ में प्रकाशित हुई थी। 1928 के दिनों में नलिनजी की बहन कुमुद्वती ‘बालक’ के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। स्वयं नलिनजी की कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। बेनीपुरी ने प्रवेशांक में मुजफ्फरपुर के बाबू लंगटसिंह की सचित्र जीवनी प्रकाशित की थी। ‘बालक’ की समालोचना करते हुए काशी के दैनिक ‘आज’ ने उस जीवनी के विषय में लिखा था-‘‘वह कौन हैं ?’-शीर्षक के अंदर अपने ही पुरुषार्थ के बल पर अतिसाधारण उन्नति करनेवाले बिहार के स्व. श्री लंगटसिंह का चरित्र दिया गया है। संभवतः आगे भी इस स्तंभ में ऐसे ही स्वदेशीय पुरुषों के जीवन प्रकाशित किए जाएंगे। बालकों के चरित्र गठन पर ऐसे चरित्रों का निश्चय ही कल्याणकारी प्रभाव पड़ेगा।’’

‘बालक’ के विशेषांक संग्रहणीय होते थे। ‘एण्ड्रूज अंक’ तथा भारतेन्दु की अर्द्ध-शताब्दी पर निकला अंक विशेष आकर्षक था। मई, 1935 में सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर ‘बालक’ का ‘रजत जयन्ती अंक’ निकला था। अपनी साज-सज्जा में यह ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव के अवसर पर भी ‘बालक’ के द्वारा राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण प्रकाशित किया गया था। पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी ‘बालक’ के विशेषांक के रूप में ‘शोक-प्रकाश’ प्रकाशित हुआ था। 

48 पृष्ठ के बालक का वार्षिक मूल्य 3 रुपयेे था। सन् 1969 ई. में इसकी प्रसार संख्या 22,000 थी जो किसी भी साप्ताहिक या मासिक से ज्यादा थी। तत्कालीन सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने ‘बालक’ की तुलना सर्वश्रेष्ठ बंगला बाल मासिक ‘संदेश’ से की तो अन्यों ने उसे मराठी बाल पत्रिका ‘सुमन’ से बेहतर कहा।

Friday, September 25, 2026

रामलोचन शरण बिहारी एवं बालक की पत्रकारिता

पुस्तक भंडार, लहेरियासराय के मालिक रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) का बाल साहित्य की रचना और प्रकाशन में वही स्थान है जो गुजराती भाषा में आचार्य गिजूभाई को प्राप्त है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ-502) यूनेस्को से जो शिक्षा-सम्बंधी सूचना प्रकाशित हुई थी, उसमें चौदह पुस्तकों के बीच आपकी भी एक पुस्तक की चर्चा है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502, पाद टिप्पणी संख्या-2) बाल शिक्षा साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘मनोहर पोथी’ आप ही की रचना है। आपने बिहार में पढ़ाई जानेवाली प्रायः सभी कक्षाओं की पुस्तकों का मुद्रण एवं प्रकाशन किया। 

‘बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार है’, इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर रामलोचन शरण बिहारी ने सन् 1926 ई. से ‘बालक’ सचित्र मासिक का प्रकाशन शुरू किया। कहना न होगा कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने निराला को पत्र (16. 2. 28) लिखने के लिए अपने जिस पैड का इस्तेमाल किया है, उस पर ‘बालक’ सचित्र मासिक छपा है। (रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 12)

'बालक' के आरंभिक संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे, बाद के दिनों में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। (एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ-76) ‘बालक’ के प्रवेशांक को वणिक प्रेस, कलकत्ता में मुद्रित कराया गया। तब वहीं ‘समन्वय’ में बाबू शिवपूजन सहाय कार्यरत थे। इसके आरंभिक दो अंक शिवपूजन सहाय द्वारा ही संपादित होकर उन्हीं की देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। शिवजी को लिखे बेनीपुरी के पत्रों से ज्ञात होता है कि संपादन का सारा भार बेनीपुरी जी ने शिवजी पर छोड़ दिया था। यद्यपि पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी का नाम ही छपता रहा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 96) 1926 से 28 तक बेनीपुरी जी, 'बालक' के प्रधान संपादक रहे। बालक की परिकल्पना में रामवृक्ष बेनीपुरी का बराबर की भागीदारी थी इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’

तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा, क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में रामलोचनशरण बिहारी का नाम जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। शांतिप्रिय द्विवेदी ने निराला को पत्र (11. 6. 1928) में वर्णित किया कि बेनीपुरी ने ‘बालक’ और लहेरियासराय को छोड़ दिया। अब शिवपूजन जी एकच्छत्र सम्राट हैं। (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 137-38 में उद्धृत) इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। विनोदशंकर व्यास ने निराला को पत्र (15. 7. 27) लिखा, ‘‘शिवजी को अपने कार्य से छुट्टी नहीं मिलती, वह ‘बालक’ में ही व्यस्त रहते हैं।’’ (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ में उद्धृत।) संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में एक प्रेस खोला, जिसका नामकरण ‘विद्यापति प्रेस’ किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण विद्यापति प्रेस, लहेरियासराय में ही होने लगा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96)

रामलोचनशरण बिहारी के संपादन में ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत हिन्दी-पुस्तक-भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) से 1926 ई. (संवत् 1983 वि.) में ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ था। इसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापति (पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, बाबू शिवनन्दन सहाय, पंडित सकलनारायण पाण्डेय एवं पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र) तथा पांच स्वागताध्यक्षों के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में बालक पत्रिका (वार्षिक मूल्य 3 रुपये, प्रति मास 48 पृष्ठ और 30-32 चित्र) का विज्ञापन (नमूना) छपा था-‘‘आजतक हिन्दी में जितने बालोपयोगी पत्र निकल चुके हैं या निकलते हैं, उनसे इसमें अनेक विशेषताएं हैं। बंगला, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी आदि उन्नत भाषाओं के बालोपयोगी पत्रों के सामने रखने योग्य अभी तक इसके सिवा कोई पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी में नहीं निकला। इसके अन्दर बालकों की ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन के सभी प्रकार के साधन उपस्थित हैं। इसमें 16 स्थायी सचित्र शीर्षक हैं, जिनमें विविध शिक्षाप्रद सामयिक विषयों के समावेश किया गया है, जिनसे प्रति मास बालकों को भिन्न-भिन्न भांति की लाभदायक बातें मालूम हो जाती हैं। छपाई, सफाई, शुद्धता और सुन्दरता तथा भाषा की सरलता और विषयों के चुनाव पर इतना काफी ध्यान दिया जाता है कि इसका नियमित रूप से पढ़नेवाला बालक थोड़े ही दिनों में विविध उपयोगी ज्ञानों का भण्डार बन जायगा। ‘विज्ञान’, ‘बहादुरी की बातें’, ‘केसर की क्यारी’, ‘जीवजन्तु’, ‘इतिहास’, ‘अनोखी दुनिया’, ‘वह कौन है?’, ‘बुढ़िया की कहानी’, ‘पँचमेल मिठाई’, ‘पूछताछ’, ‘भला-चंगा’, ‘हँसी-खुसी’, ‘कहाँ और क्या’, ‘बालक की बैठक’, ‘बालचर’ और ‘संपादक की झोली’-इन 16 स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चौथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चौदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। उक्त सभी विषयों के समावेश के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि ऐसी एक बात भी न हो जिससे बालकों का वास्तविक हित न हो। यही कारण है कि सभी पत्रों और विद्वानों ने मुक्त कंठ से इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यदि आप अपने बालकों का सच्चा कल्याण चाहते हैं, उनके जीवन को मंगल और आनन्द से भरपूर बनाना चाहते हैं, तो इस ‘बालक’ द्वारा उनके ज्ञान का खजाना भरिये।’’ 

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96) जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा, उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं: ‘आयरलैंड के प्रसिद्ध नेता डी. वेलरा का स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रखी जाय और दूसरी ओर मातृभाषा, तो मैं मातृभाषा को लूँगा क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूँगा।’ (मंगलमूर्ति, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 97 में उद्धृत)

हिन्दी का कोई भी छोटा-बड़ा ऐसा लेखक नहीं था जिसकी रचनाएँ बालक में न छपती थीं। रामधारी सिंह दिनकर, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', आरसीप्रसाद सिंह, हंसकुमार तिवारी, गोपाल सिंह 'नेपाली' आदि की काव्य-प्रतिभा 'बालक' ही के पृष्ठों में पल्लवित हुई। राष्ट्रीय स्तर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी हिन्दी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोपाल सिंह नेपाली की पहली कविता रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में ही ‘बालक’ पत्रिका में छपी थी। शीर्षक की पंक्ति थी ‘भारत गगन के जगमग सितारे’। यह संभवतः 1926-27 की बात थी, और उस समय नेपाली तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे-उम्र कोई 15-16 वर्ष रही होगी। (सुरेश सलिल, कुछ गूंज हुई, कुछ गीत गए, आजकल: नवंबर 2011) राष्ट्रभाषा परिषद् की ‘परिषद पत्रिका’ (वर्ष 38, अंक 1-4, मार्च 2000, पृष्ठ 31) के अनुसार गोपाल सिंह नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी बतायी जाती है जो सही नहीं है। आरसी प्रसाद सिंह का 'आम का पेड़' 'बालक' में 1927 में प्रकाशित हुआ था। (हिन्दी सेवी संसार, पृष्ठ 13) 1928 के दिनों में नलिनविलोचन शर्मा की बहन कुमुद्वती 'बालक' के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। नलिन जी की भी समय-समय पर कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। (नलिन स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 28)

‘बालक’ ने स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बाल सामग्री की प्रस्तुति में एक प्रतिमान उपस्थित किया। सन् 1969 ई. में ‘बालक’ की प्रसार संख्या 22,000 थी। (यह आंकड़ा प्रेस इन इंडिया (1968-69), मिनिस्ट्री ऑफ इनफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली से लिया गया है।) किसी भी साप्ताहिक या मासिक में सबसे ज्यादा इसी की बिक्री थी। (रामजी मिश्र ‘मनोहर’, बिहार में हिन्दी-पत्रकारिता का विकास, काशी प्रसाद जायसवाल शोध-संस्थान, पटना, 1998, पृष्ठ 135) इससे बिहार में सुरुचिपूर्ण बाल पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। इन्होंने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले लुभावने एवं आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इनका महत्तम योगदान यह है कि इनसे बच्चों में साहित्यिक रुचि का विकास हुआ, उनकी भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ तथा उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की आशातीत वृद्धि हुई।

स्वतंत्रता से पहले रामलोचन शरण बिहारी की भूमिका अंग्रेजपरस्त की रही। मई, 1935 में जब सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती मनाई गई थी,  उन्होंने न केवल बहुत उत्साह के साथ उसमें योग दिया था बल्कि ‘बालक’ का रजत जयन्ती अंक बहुत सुन्दर निकाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी साज-सज्जा में यह जनवरी, 1935 के अपने ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव में भी आपने उसी उत्साह से सेवा की थी। उस अवसर पर भी बालक के द्वारा आपने राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया था। सम्राट पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी आपका शोक-प्रकाश 'बालक' के विशेषांक में प्रकट हुआ था। (जयन्ती-स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 712) सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘कॉरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502)

Monday, September 21, 2026

अपने अपने कुरुक्षेत्र

प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन बहुत ही सावधानी और होशियारी के साथ करने की जरुरत है। कारण कि हमारे अधिकतर ग्रंथ एक समय में और एक व्यक्ति के द्वारा नहीं लिखे गये हैं। महाभारत को 'जय', 'भारत' और 'महाभारत'-तीन चरणों में लिखे जाने की बात पर अधिकतर इतिहासकार एकमत हैं। कई चरणों में लिखे जाने का मतलब होता है कई युगों की कहानियों और घटनाओं को समेटते चलना। प्राचीन ग्रंथों की यह परिस्थितिजन्य विशेषता है। 'महाभारत' के बारे में तो लेखक का स्पष्ट दावा भी है कि 'अबतक का सारा ज्ञान इसमें निबद्ध है, और जो कुछ इसमें नहीं है, वह ज्ञान ही नहीं है।' लेखक की इस 'वीर-घोषणा' से न सिर्फ 'महाभारत' की ऐतिहासिक महत्ता का बोध होता है बल्कि इस बात का भी सहज अनुमान हो जाता है कि लेखक अपने समय में उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान को एक ही जगह ठूंस-ठांसकर संकलित कर देना चाहता है। इस तरह के उद्देश्य/दावा वाले ग्रन्थों के संपादन के लिए असीम धैर्य और अवकाश की आवश्यकता थी जिसका इन ग्रंथकारों के पास सख्त अभाव दिखता है। उनकी इस 'हड़बड़ी' का कारण वाचिक परंपरा से जन्मा होगा। इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि 'महाभारत' में वे तमाम तरह के किस्से आ गये हैं जिनका मूलकथा से कोई संबंध नहीं है। कई बार ये किस्से परस्परविरोधी भी हैं। उनमें आंतरिक संगति का भी अभाव परिलक्षित है।

कहने की जरुरत नहीं कि महाभारत का लेखन और पुनर्लेखन आज इक्कीसवीं शती में भी जारी है। धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा और नरेन्द्र कोहली से लेकर मीनाक्षी नटराजन तक ने अपने-अपने समय में कुछ-कुछ जोड़ने-घटाने की कोशिश की है। और बात है कि कला माध्यमों का फर्क रहा है। किसी ने कहानी, उपन्यास और नाटकों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की तो किसी ने फिल्म/धारावाहिक के माध्यम से। किन्तु कहना होगा कि अधिकतर विद्वानों ने पितृसत्ता के बने-बनाये दृष्टिकोण से ही कथा का पुनर्लेखन किया है। मीनाक्षी नटराजन ने 'सामयिक प्रकाशन' से छपी अपनी पुस्तक 'अपने अपने कुरुक्षेत्र' में इतिहास लेखन के क्षेत्र में व्याप्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह चुनौती इतिहास को 'नयी आँख' से देखने की वजह से मिल रही है। यह 'नयी आँख' स्त्री विमर्श की अथवा स्त्री जाति की है जिसकी स्पष्ट मान्यता रही है कि अबतक का इतिहास 'पुरुषों का' और 'पुरुषों के द्वारा' लिखा गया इतिहास है। अर्थात अगर इतिहास को 'स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला' मानें तो कहना होगा कि ये फैसले उन न्यायाधीशों के हैं जो इतिहास के अपराधी भी रहे हैं। इसलिए यह इतिहास विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो सकता। अविश्वसनीयता का कारण है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मूल्य और मापदंड अलग-अलग हैं। बात अगर महाभारत से शुरू करें तो जैसाकि चित्रा मुद्गल ने लिखा है, महाभारत की कथा उनलोगों ने लिखी है जो यह मानते रहे थे कि 'कौमार्य भंग स्त्री उनकी स्त्री नहीं हो सकती, किन्तु वह स्वयं की यौनेच्छाओं को मर्यादित करने के लिए बाध्य नहीं' थे। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 10) इसलिए मीनाक्षी नटराजन ने महाभारत की कथा और खासकर स्त्री पात्रों-यथा गांधारी, कुंती, शिखंडी, द्रौपदी आदि को 'स्त्री की आँख' से देखने की कोशिश की है। बार-बार भीष्म को झिड़की देती हुई कि उन्होंने कभी स्त्री के मन को पढ़ने-समझने की कोशिश नहीं की।

महाभारत युद्ध की कथा निजी परिवार, निजी संपत्ति और राज्य के उदय तथा उसके सुदृढ़ीकरण से उत्पन्न अंतर्विरोधों की कथा है। प्राचीन भारत में भूमि पर निजी मालिकाना हक स्थापित किये बगैर निजी संपत्ति की अवधारणा को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करना असंभव था। द्रौपदी का पांच पतियों के साथ ब्याहा जाना, जो एक प्रक्षिप्त कथा का हिस्सा है, बहुपति विवाह की याद भर है। यह प्रथा कभी सुदूर अतीत में जब निजी संपत्ति का इस हद तक विकास नहीं हुआ होगा, अस्तित्व में रही होगी।

मीनाक्षी नटराजन की किताब का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने महाभारत की समस्या को 'स्त्री आँख' से पढ़ने की कोशिश की है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने इतिहास बोध से कभी किनारा नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उचित ही इतिहास बोध को 'तीसरी आँख' कहते थे। इस 'तीसरी आँख' से देखे बगैर महाभारत की कथा का सम्यक पाठ असम्भव है क्योंकि यह अपनी काया में तो विशाल है ही, इतिहास की अनगिनत प्रवृत्तियों और परंपराओं को भी एक साथ लिये चलती है। अर्थात महाभारत में बहुपति विवाह के साथ-साथ बहुपत्नी विवाह की भी कथा है। अतः महाभारत की कथा की स्पष्ट समझ के लिए हमें वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का भी ध्यान रखना होगा। मीनाक्षी नटराजन ने हमें ठीक ही ध्यान दिलाया है कि महाभारतकालीन समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ परंपराओं और मान्यताओं की अजीब टक्कर है। यहीं इतिहास बोध रूपी तीसरी आँख की आवश्यकता पड़ती है यह देखने के लिए कि कौन-सी मान्यता जीवित रहनेवाली है और कौन-सी दम तोड़नेवाली।

महाभारत में जो कभी-कभी यौन स्वछंदता की प्रवृत्ति दिखती है उसकी भी एक परंपरा है। देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57) ब्रह्मा-सरस्वती का यौन सम्बंध किसी प्राचीन समाज में पिता-पुत्री का 'वैध' यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68) प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ व्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) किन्तु शादी के पहले की यौन क्रिया संबंधी अपनी 'भूल' को कुंती आजीवन अपने पति पाण्डु के समक्ष स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मीनाक्षी नटराजन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य और मापदंड निर्धारित है।

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

मीनाक्षी नटराजन की पुस्तक की नवीनता और अद्वितीयता इस बात में है कि वह ऐतिहासिक संदर्भ में इतिहास बोध के साथ कथा को समझती है। गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि के स्त्री मन की पीड़ा को समझती है। मीनाक्षी की द्रौपदी पर बहुपतित्व कुन्ती के द्वारा थोपा हुआ फैसला नहीं था बल्कि स्वयं द्रौपदी का लिया निर्णय था। इतना ही नहीं, सभी पतियों के लिए बहुविवाह की व्यवस्था देना भी द्रौपदी ही का निर्णय था। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 143) दरअसल, द्रौपदी का प्रस्ताव था कि वह बारी-बारी प्रत्येक पांडव की पत्नी के रूप में एक-वर्ष का समय व्यतीत करेगी। उस एक वर्ष में अन्य पांडव बंधुओं के प्रति उसका व्यवहार पत्नी का नहीं होगा। इस व्यवस्था में प्रत्येक पाण्डव बंधु को द्रौपदी के संग के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी ही पड़ती। अतः उनका बहुविवाह आवश्यक था। (वही, पृष्ठ 145) 

यह महाभारत की कथा का स्त्री पाठ है। पुस्तक में प्रवाह और अद्भुत रोचकता है। एक सांस में पढ़ी जा सकने वाली दृष्टिसम्पन्न किताब है। इसे पढ़ना समृद्ध होना है। जहाँ तक भाषा की बात है, एकाध स्थल को छोड़ दें तो पुस्तक में अशुध्दियों की कमी खलती है!

Sunday, September 20, 2026

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की 'श्रेष्ठ कहानियां'

अबतक मैंने पांडेय बेचन शर्मा उग्र को नहीं पढ़ा था। एकाध कहानी कहीं से पढ़ लेना पढ़ना नहीं हो सकता। 'आत्माराम एंड संस' ने दो खंडों में इनकी कहानियां छापी हैं। ये उग्र की नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। इनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। समाज और व्यक्ति समान रूप से हमला झेलते हैं। अभी कुछ ही कहानियां पढ़ सका हूँ। पढ़ते लगा कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र आर्य समाज आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित कथाकार लगते हैं। उनका अतिरिक्त भारतीयता-बोध भी गाहे-बगाहे सिर उचका देता है। उनकी एक कहानी है 'कम्यूनिस्ट दरवाज़े पर'। यह व्यंग्यप्रधान आत्म-संस्मरणात्मक कहानी है। अफसोस कि व्यंग्य की अपनी सारी ताकत उन्होंने कम्यूनिस्ट पात्र का मजाक उड़ाने में खर्च कर दी है। एक स्थल पर लिखा है, 'रुपये-पैसे की झंकार के सामने काले चश्मेवाले कम्यूनिस्ट की क्रूर माया फट गई।' (पांडेय बेचन शर्मा उग्र, श्रेष्ठ रचनाएं, भाग 1, पृष्ठ 248) कहानीकार का यह कहना कि 'कम्यूनिस्ट रूस से नहीं आता, काले बुखार की तरह देश-देश में वह स्वयं पैदा हो जाता है', (पृष्ठ 246) स्वतंत्र कथन के रूप में तो सही है, लेकिन गलत है जब इस आधारवाक्य के पीछे भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को 'आयातित' कहने की 'कूटनीति' हो। कहानी के अंत में लेखक ने कम्यूनिस्ट को कहा, 'आप गधे हैं, रूसी खूंटे से बंधे।' (वही, पृष्ठ 249) दूसरी ओर कम्यूनिस्ट की एक नई प्रजाति अर्थात 'सनातनी कम्यूनिस्ट' की खोज लेखक करता है जिसका वह स्वयं प्रतिनिधि है। इस 'सनातनी कम्यूनिस्ट' का कर्तव्य है, 'गरीब और अमीर दोनों की रक्षा, सबका भला।' (वही, पृष्ठ 248)

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)

Saturday, September 19, 2026

किसी वरिष्ठ से नहीं लिखवाया किताब का 'आमुख'

मैं दसवीं जमात का विद्यार्थी था। हिन्दी की किताब में जगदीशचंद्र माथुर का एक रेखाचित्र पढ़ना था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। और यह 'जन्मजात चक्रवर्ती' कोई और नहीं श्री सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके बारे में लिखा था कि उन्हें नित नयी-नयी किताब पढ़ने और लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का शौक था। उनकी किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां  हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। 

इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। 1893 का वर्ष सच्चिदानंद सिन्हा का पढ़ाई समाप्त कर विलायत से लौटने का है। लौटते-लौटते उनके पास बंगाल से बिहार को अलग करने अथवा बिहार को स्वतंत्र प्रान्त का दर्जा दिलाने की बात एक ठोस शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। इसके लिए अखबार की जरूरत थी। इसलिए 1893 में एक अंग्रेजी अखबार शुरू करने हेतु बिहार के कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों की मीटिंग आयोजित की गई। उक्त सभा में अखबार का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित हुआ किन्तु अंततः 'बिहार टाइम्स' के नाम से 1894 में  महेश नारायण के संपादन में शुरू हो गया। (रामजी मिश्र 'मनोहर' की किताब 'बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास' के 27वें पृष्ठ पर इसका प्रकाशन वर्ष भूलवश 1884 छप गया है।) और बात है कि 1906 में इसका नाम बदलकर बिहारी हो गया। सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेश नारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेश नारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि का चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता है कि 'बिहार टाइम्स' के महेश नारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेश नारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी यह शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचन शरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक-भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) के पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

एक सामान्य पाठक यही जानता है कि पटने की खुदा बख्श लाइब्रेरी खुदा बख्श के द्वारा अर्जित-उपार्जित किताबों-पांडुलिपियों की लाइब्रेरी है किन्तु हकीकत है कि इस संग्रह की अधिकतर किताबें और पांडुलिपियां उनके पिता द्वारा उपार्जित थीं। खुदा बख्श साहब ने मृत्युशैया पर पड़े पिता से वादा किया था कि उनकी किताबों और पांडुलिपियों की हिफाजत के लिए वह लाइब्रेरी खड़ा करेगा। तभी 80,000 रुपये की लागत से लाइब्रेरी का भवन निर्मित कराया गया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि किताब दिलचस्प और ऐतिहासिक महत्त्व की है।

आज किताब का ब्लर्ब या आमुख किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का आमुख अमरनाथ झा से लिखवाया था। अमरनाथ झा के पिता सर गंगनाथ झा और सिन्हा साहब दोनों गहरे मित्र थे।

कमलाप्रसाद वर्मा की 'भूलती भागती यादें'

बिहार के पहले हिंदी अखबार 'बिहार बंधु' के संपादक रहे कमला प्रसाद वर्मा जी की आज पुण्यतिथि है। 1912 ईस्वी में 'बिहार बंधु' का संपादन कमला प्रसाद वर्मा (मुख्तार, पटना सिटी) करने लगे। आप दिन में पटना सिटी कोर्ट में मुख्तारी करते, रात में बांकीपुर जाकर पत्र का संपादन। इस कार्य हेतु आपको 50 रुपये मासिक वेतन तथा 10 रुपये मासिक भत्ता मिला करता। जलपान का खर्च और मार्गव्यय अलग से। मुख्तार साहब के बाद कुछ दिनों तक बल्लभ सम्प्रदाय के गोस्वामी जी को पत्र का संपादक बनाया गया। आशा थी कि उनके चेले और अनुयायी अखबार की मांग बढ़ाने में मदद करेंगे किन्तु ग्राहक संख्या बढ़ने की अपेक्षा बहुत घट गयी। इसी बीच अंग्रेज महिलाओं के संबंध में कुछ अपमानजनक समाचार छप गया। कमिश्नर ओल्ढम आगबबूला हो गये। संपादक की बुलाहट हुई। गोस्वामी जी चंपत हो गये। अतएव अनुरोधवश मुख्तार साहब को पुनः संपादन का भार स्वीकार करना पड़ा। आचार्य शिवपूजन सहाय ने 19 जनवरी, 1961 ई. की अपनी एक टिप्पणी में ठीक ही लिखा है कि मुख्तार साहब ने 'बिहार बन्धु' का दो बार संपादन किया था । 

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी 'हिन्दी साहित्य और बिहार' (तृतीय खंड) में  'भूलती भागती यादें' (1951 में प्रकाशित) से एक उद्धरण है जिसमें कहा गया है कि "सन 1872 ईस्वी में बिहार बन्धु का जन्म कलकत्ते में, स्वर्गीय पं. बालकृष्ण भट्ट के निरीक्षण में हुआ था। इसमें पं. केशवराम भट्ट का बड़ा हाथ था। ये दोनों महाराष्ट्री ब्राह्मण थे और इनके पूर्वज 'बिहारशरीफ' में आ बसे थे।" (पृष्ठ 169) अब यह निर्विवाद है कि 'बिहार बन्धु' 1872 में नहीं बल्कि 1873 में शुरू हुआ। दूसरी बात कि बालकृष्ण भट्ट की जगह मदनमोहन भट्ट लिखा जाना चाहिए था। ये दोनों सगे भाई थे और महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे जो व्यापार के सिलसिले में 'बिहारशरीफ' आकर बस गये थे। 'बिहार बन्धु' की स्थापना इन्हीं मदनमोहन भट्ट की देखरेख में हुई थी। जहांतक बालकृष्ण भट्ट की बात है, उनके पूर्वज मालवा के ब्राह्मण थे और झाँसी के निकट आकर बसे थे। बालकृष्ण भट्ट, मालवीय जी के रिश्तेदार थे और जो 'हिन्दी प्रदीप' के संपादक हुए।