हिन्दी के संपादकों में महावीरप्रसाद द्विवेदी का नाम अग्रगण्य है। वास्तव में द्विवेदी जी ने हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में एक नये युग की नींव डाली। उन्होंने हिन्दी में संपादन-कला का प्रवर्तन और परिष्कार किया। इस बात को समझना हो तो 1901 ईस्वी के पहले की 'सरस्वती' समेत पत्रिकाएं देख सकते हैं (किशोरीदास वाजपेयी, साहित्यिकों के पत्र, हिमालय एजेंसी, कनखल, 1958, पृष्ठ 2)। पत्रकारिता की इस यात्रा में ‘सरस्वती’ की भी बराबर की भूमिका रही। कहा जाता है कि द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' को और 'सरस्वती' ने द्विवेदी जी को चमका दिया। (डॉ. उदयभानु सिंह, महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 191)
जनवरी 1900 से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के संरक्षण में इंडियन प्रेस, प्रयाग से 'सरस्वती' मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। आरम्भ में इसका संपादन एक संपादक मण्डल के जिम्मे था। दूसरे वर्ष से इसका संपादन श्यामसुंदर दास करने लगे। संपादक की अन्य व्यस्तताओं के कारण पत्रिका और मालिक दोनों की सेहत प्रभावित हो रही थी। अतः दिसंबर, 1902 के अंक में संपादन भार से अवकाश ग्रहण करते हुए टाइटिल पेज दूसरे में लिखा, 'इस संख्या के साथ सरस्वती के तीसरे भाग का अंत हो गया। जनवरी सन 1903 से इस पत्रिका का चौथा भाग आरम्भ होगा। आगे इसके संपादन के पद को हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी सुशोभित करेंगे।' (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, कानपुर इतिहास समिति, नवंबर 1957, पृष्ठ 185) वैसे द्विवेदी जी का 'सरस्वती' से पुराना संबंध था। बाबू जी के संपादन काल में आचार्य द्विवेदी जी साहित्यिक विषयों पर व्यंग कविताएं लिखते थे, जो सरस्वती में व्यंग चित्रों के साथ छपा करती थीं। (वही)
संपादन भार ग्रहण करने पर द्विवेदी जी ने अपने लिए मुख्य चार आदर्श निश्चित किए-समय की पाबंदी करना, मालिकों का विश्वास-भाजन बनना, अपने हानि-लाभ की परवाह न करके पाठकों के हानि-लाभ का ध्यान रखना और न्याय-पथ से कभी भी विचलित न होना। ('साहित्य-संदेश', अप्रैल 1939 में प्रकाशित आत्म निवेदन; उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 162) बाबू चिंतामणि घोष ने द्विवेदी जी की प्रशंसा करते हुए एक बार कहा था-'हिंदुस्तानी संपादकों में मैंने वक्त के पाबंद और कर्तव्यपालन के विषय में दृढ़प्रतिज्ञ दो ही आदमी देखे हैं, एक तो रामानंद बाबू और दूसरे आप।' (द्विवेदी-लिखित 'बाबू चिंतामणि घोष की स्मृति', सरस्वती, 1928 ईस्वी, खण्ड 2, पृष्ठ 282; डॉ. उदयभानु सिंह, महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 49 में उद्धृत)
‘सरस्वती’ पत्रिका का उद्देश्य बहुत व्यापक था। इसमें लगभग सभी विधाओं जैसे-कविता, कहानी, एकांकी, समालोचना और पुस्तक परिचय, कला-सभ्यता, इतिहास, लोकगीत आदि सांस्कृतिक विषयों पर लेख तथा अन्य भाषाओं के साहित्य के अनुवाद को लाने का भरसक प्रयास किया था। ‘सरस्वती’ बहुर्मुखी एवं व्यापक विषयों पर लेख प्रकाशित करती थी। कुमारी चारलोट एम यंग द्वारा रचित पुस्तक 'बुक ऑफ गोल्डेन डीड्स' से प्रभावित गणेश शंकर का 'आत्मोत्सर्ग' शीर्षक लेख 1909 में 'सरस्वती' में ही प्रकाशित हुआ था। (मोती लाल भार्गव, आधुनिक भारत के निर्माता : गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रकाशन विभाग, मई 1992, पृष्ठ 15) 'सरस्वती' ही में कार्यरत रहते हुए सहायक संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने अंग्रेजी की अनेक कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया था जो 'शेखचिल्ली की कहानियां' शीर्षक से प्रकाशित हुईं। यह विद्यार्थी जी की हिन्दी में पहली प्रकाशित पुस्तक थी। (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 17)
डॉ. रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि ‘द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया।’ डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में ‘सरस्वती’ के संदर्भ में कई महत्त्वपूर्ण संकेत किए हैं। सही अर्थों में देखा जाय तो 'सरस्वती' सांस्कृतिक निर्माण की पत्रिका थी। ‘सरस्वती’ पत्रिका ने न केवल हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में, अपितु समग्र हिंदी साहित्य के विकास की दृष्टि से कई मानदंड स्थापित किये। इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी के मानक रूप गढ़े गए और हिंदी साहित्य को परिष्कृत रूप में समृद्ध किया गया। द्विवेदी जी के संपादकत्व में पत्रिका का न सिर्फ साहित्यिक दृष्टिकोण बदला बल्कि 'सरस्वती' अपनी निजी भाषा और सामग्री के माध्यम से पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने में भी सफल रही। ‘सरस्वती’ ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए जितना कार्य किया, वह बाद की पत्रिकाओं द्वारा न हो सका।
महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा को न सिर्फ सरल, सुगम एवं सुबोध बनाने का प्रयास किया, बल्कि उसके परिमार्जन के साथ-साथ शब्द-चयन, पद-रचना, वाक्य-विन्यास की दृष्टि से भी भाषा को व्याकरण अनुशासित करने का भी पुरजोर प्रयत्न किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा है- “यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रूकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।” उन्होंने ‘सरस्वती’ को भाषा संस्कार, साहित्य संस्कार और हिंदी भाषी जाति के मानस संस्कार का प्रतीक बनाया। हिंदी की अनस्थिरता को स्थिरता प्रदान करने एवं गद्य-पद्य की भाषा में एकरूपता लाने में द्विवेदी जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस संदर्भ में उन्होंने अपने एक लेख में लिखा है-"गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।"
प्रारम्भ ही से द्विवेदी जी ने भाषा परिमार्जन और शब्दों की एकरूपता पर जोर देना शुरू कर दिया था, किंतु उनसे पूर्व 'सरस्वती' में व्याकरण आदि की समस्याओं पर कुछ नहीं कहा गया था। बाबू श्यामसुंदर दास भी अपने संपादन काल में 'लौं', 'बेर' आदि शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 185)
द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ में हिंदी भाषा विषयक एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में उन्होंने हिंदी में प्रयुक्त होनेवाले अंगरेजी के शब्दों की उत्पत्ति पर विचार किया था। उन्होंने लिखा था : ‘जान पड़ता है कि हिंदी ही से अंगरेजी के शब्द की उत्पत्ति हुई है। यूरोप से पहले-पहल पोर्तगीज भारत आए। उन्होंने भी हिंदी में कुछ शब्द प्रविष्ट करा दिए। उनके द्वारा प्रयुक्त कैमरा हिंदी में कमरा हो गया और आक्सन से नीलाम बना।’ (सरस्वती, सितंबर 1901, पृष्ठ 12; डा. कृष्णानन्द द्विवेदी, बिहार की हिंदी पत्रकारिता, पृष्ठ 34) ‘बिहार बंधु’ उनकी शब्दोत्पत्ति विषयक इस स्थापना से सहमत नहीं हुआ। उसने अपने पत्र में प्रकाशित ठाकुर अयोध्या प्रसाद सिंह के लेख का हवाला देते हुए लिखा ‘द्विवेदी जी का शब्दोत्पत्ति पर अनुमान और नियंत्रण के संग-संग प्रमाण भी विचित्र ढंग का निकला था। पर ठाकुर अयोध्या प्रसाद ने सारा पोल खोल दिया। एक समय द्विवेदी साहब ने बाबू साहब से प्रार्थना की थी कि आप ऐसी बातों पर नुक्ताचीनी करना छोड़ दीजिए। मगर बाबू साहब ने इस गुड्डी को और आकाश में उड़ा दिया। आश्चर्य हमें तो वहीं होता है कि ऐसी निपुणता रखकर भी लोग हिंदी में मर्मज्ञ होने का अभिमान करते हैं। छिः।’ (बिहार बंधु, 1 मार्च 1903, पृष्ठ 4; डॉ. कृष्णानंद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 34) इसी लेख में उसने लिखा ‘द्विवेदी जी उर्दू को भी हिंदी का एक स्टाइल मानते हैं और बाबू श्यामसुंदर दास हिंदी और उर्दू को दो भिन्न और पृथक भाषा मानते थे। पर क्या एडीटर के बदलने से पेपर की पालिसी भी बदल गई? धन्य है।’ (वही)
‘बिहार बंधु’ और ‘भारत मित्र’ अपने समय के प्रसिद्ध पत्र थे। दोनों अपने पाठकों को नए विचार, नए संदेश एवं नई प्रेरणाओं से संबलित करने में तल्लीन थे। परंतु दोनों में किसी विषय पर सैद्धांतिक मतभेद हो जाना असंभव नहीं था। हिंदी भाषा के मानकीकरण संबंधी नीति को लेकर प्रचलित भाषिक अस्थिरता पर दोनों ही पत्रों का ऐतिहासिक विवाद 1902 से 1908 ई. तक चला जो काफी प्रसिद्ध हुआ। इस वाद-विवाद में खुलकर भाग लेनेवालों में ‘सरस्वती’, ‘भारत मित्र’, ‘हिंदी बंगवासी’, ‘समालोचक’, ‘वैश्योपकारक’ और ‘बिहार बंधु’ के ख्यातिलब्ध पत्रकार थे, जिनके दो दल हो गए थे। एक दल का नेतृत्व आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी कर रहे थे तो दूसरे दल का बालमुकुंद गुप्त। उक्त विवाद लंबे समय तक चला क्योंकि हिंदी के दो महारथियों का वह झगड़ा था, जिससे हिंदी के अनेक विद्वानों के धौरंधरिक संबंध हो गए थे। (डा. कृष्णबिहारी मिश्र, हिंदी पत्रकारिता, पृष्ठ 136)
1902 से 1907 ई. तक ‘बिहार बंधु’ के प्रायः प्रत्येक अंक इन्हीं विवादों से भरे हैं। उन्हें देखने से ऐसा लगता है कि इन दोनों पत्रों के भाषागत सैद्धांतिक विवादों से पाठक वर्ग भी ऊब चुका था। मई 1907 के अंक में कलकत्ते के किसी पाठक ‘श. हि.’ का ‘भाइयो, अब क्षमा करो’ शीर्षक से एक पत्र प्रकाशित हुआ। पत्रप्रेषक ने दुर्भावनारहित होकर लिखा था ‘‘बिहार बंधु और भारतमित्र के संपादक में आपस में जब तक काम-काज की छेड़-छाड़ चलती थी तो उतना हरज नहीं था, पर आपस की जलन बुझाने के लिए अब फिजूल बकवाद हो रहा है। 'भारतमित्र' तो साग में हल्दी न डालने पर किस तरह वृथा बात बढ़ाए जाता है, वह स्पष्ट है। आपलोग सर्वसाधारण के उपकार के लिए पत्र छापते हैं इसलिए केवल अपनी हवस के लिए पत्र का कीमती कालम खराब करने का अधिकार हमारे जानते किसी संपादक को नहीं है। दोनों ओर के हिमायतियों को भी इस वृथा काम से हाथ खींचने का हम अनुरोध करते हैं।’’ (डॉ. कृष्णानंद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 37) उल्लेखनीय है कि इन दोनों पत्रों के विवादों ने हिंदी के संवर्धन का स्वस्थ प्रयास किया। भाषिक विशिष्टता की स्थापना हेतु उन दोनों ने जिस कटु किंतु रचनात्मक परिवेश को अपनाया, वह निश्चय ही सराहनीय था।
इन्हीं दिनों 'सरस्वती' का नागरी प्रचारिणी सभा के साथ भी विवाद हुआ। साहित्यिक कारणों से, सम्भवतः हिंदी पुस्तकों की खोज संबंधी विवाद के कारण नागरी प्रचारिणी सभा एवं श्यामसुंदर दास से द्विवेदी जी का मतभेद हो गया था। अक्तूबर 1904 ईस्वी की सरस्वती में सन 1901 ईस्वी की खोज की रिपोर्ट की कड़ी समालोचना हुई थी। सभा ने उक्त समालोचना का प्रतिवाद करते हुए इंडियन प्रेस के स्वामी को एक पत्र लिख भेजा। दिसंबर 1904 की सरस्वती में द्विवेदी जी का 'सभा और सरस्वती' शीर्षक से एक तीखा आलोचनात्मक लेख निकला। इस झगड़े ने ऐसा उग्र रूप धारण किया कि नागरी प्रचारिणी सभा ने तुरंत अपनी प्रबंधकारिणी समिति की बैठक करके इंडियन प्रेस को सूचना दे दी कि सभा आगामी 1905 से 'सरस्वती' पर से अपना अनुमोदन हटाती है। फलतः इंडियन प्रेस के संचालक बाबू चिंतामणि घोष ने जनवरी 1905 की 'सरस्वती' के छपे हुए कवर को रद्द करा दिया और 'नागरी-प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से संस्थित' को हटवाकर नया कवर छपवा दिया। इस प्रक्रिया में 'सरस्वती' एक सप्ताह के विलंब से पाठकों को प्राप्त हो सकी। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 529)
1903 से 1906 तक निरंतर महावीरप्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' के पाठकों की रुचि का परिष्कार करते रहे ताकि वे गंभीर विषयों का बोझ उठा सकें। 1906 के अंतिम अंक में द्विवेदी जी ने पाठकों को सूचित करते हुए लिखा-'सरस्वती के रसज्ञ वाचक अब कुछ गंभीर विषयों पर भी लेख पढ़ने को तैयार रहें। सामान्य विषयों पर ही सरल लेख लिखते रहने से हिन्दी की अवस्था उन्नति नहीं हो सकती।' (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 187) 'सरस्वती' के जीवन में सन 1907 का ऐतिहासिक महत्त्व है। इस वर्ष से विषय की गंभीरता और भी बढ़ चली। कुछ नये विषय यथा महापुरुषों की जीवनियाँ, कहानियां आदि शामिल हुए। अप्रैल 1907 में ही द्विवेदी जी का प्रसिद्ध लेख 'सभा की सभ्यता' 'सरस्वती' में प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष के मई अंक में 'दुलाई वाली' कहानी छपी। (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 188) प्रसिद्ध पुस्तक 'संपत्तिशास्त्र' संबंधी कई लेख 10907 की सरस्वती में प्रकाशित हुए। पहला लेख फरवरी अंक में प्रकाशित हुआ। (संपत्तिशास्त्र, भूमिका, पृष्ठ 4)
1908 की 'सरस्वती' में आचार्य द्विवेदी हिन्दी व्याकरण ही नहीं लिख रहे थे अपितु हिंदी विद्वानों को तुलनात्मक भाषाशास्त्र के अध्ययन हेतु भी प्रोत्साहित कर रहे थे।वैदिक साहित्य के गहन अध्ययन के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्य शब्द का मूल अर्थ है 'कृषक' (किसान) या 'कृषक-संतान'। यह शब्द 'ऋ' धातु से निकला है। यह धातु गत्यर्थक है किंतु अन्यान्य आर्य जातियों की भाषाओं में भी इसकी अनुरूप एक धातु है जिसका अर्थ खेती करना है। ग्रीक भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-व' धातु, लैटिन भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-ओ', गॉथिक भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-गन' (न हलयुक्त), लिथूनियन भाषा में 'अर-ति' और जेंद भाषा में 'रर' धातु है। इन धातुओं का अर्थ खेती करना या हल से खेत जोतना है। (सरस्वती, सितंबर 1908; महावीरप्रसाद द्विवेदी, 'अतीत-स्मृति', लीडर प्रेस, प्रयाग, 1930, पृष्ठ 2) परंतु संस्कृत भाषा में 'अर' (र हलयुक्त) धातु नहीं है। सम्भव है कि पुराने जमाने में 'अर' (र हलयुक्त) धातु रही हो; पीछे लुप्त हो गई हो। अथवा यह भी हो सकता है कि 'ऋ' धातु ही के रूपांतर 'अर' (र हलयुक्त) हो गया हो, जैसा संस्कृत व्याकरण में होता भी है, और उसका मूल अर्थ 'हल चलाना' हो। (महावीरप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 3) यह भी सम्भव है कि हल की गति के कारण ही 'ऋ' धातु का अर्थ गतिसूचक हो गया हो। (वही) विभिन्न भाषाओं के कृषि वाचक धातुओं का विचार करने से जान पड़ता है कि 'अर्य्य' और 'आर्य्य' दोनों शब्दों का धात्वर्थ कृषक है। (वही) पाणिनि के 'इन्द्र वरुण-भव-शर्व' (4/1/49) आदि सूत्र पर सिद्धांतकौमुदी में 'आर्य्या' और 'आर्य्याणी' शब्दों का अर्थ वैश्य-जातीय स्त्री और 'आर्य्य' शब्द का अर्थ वैश्य-पत्नी लिखा है। वाजसनेयी (14-28) और तैत्तिरीय संहिता (4-3-10-1) में चारों वर्णों के नाम-ब्रह्मन (न हलयुक्त), क्षत्र, अर्य्य और शूद्र लिखे हैं। (महावीरप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 3)
1910 में कुछ दिनों के लिए आचार्य द्विवेदी ने 'सरस्वती' के संपादन से विश्राम लिया। इस विश्राम-काल में उसका संपादन कानपुर के देवी प्रसाद शुक्ल ने किया। (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 188)
डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए लिखा है : “यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। ‘सरस्वती’ सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुख पत्र थी और हिंदी भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था।"
आचार्य द्विवेदी ने साहित्य कम, साहित्यिक अधिक पैदा किए। इस युग के बड़े-से-बड़े लेखक, महाकवि, संपादक और आचार्य उन्हीं के बनाए हैं। नागरी प्रचारिणी सभा (काशी) में सुरक्षित 'सरस्वती' की पांडुलिपियों को देखने से पता चलता है कि हिन्दी के इस महान ऋषि ने क्या कुछ किया है। (किशोरीदास वाजपेयी, साहित्यिकों के पत्र, हिमालय एजेंसी, कनखल, 1958, पृष्ठ 2) बाबू श्यामसुंदर दास के नाम पत्र (19/10/1923) में आचार्य द्विवेदी ने लिखा, 'मेरे समय की सरस्वती की 17 वर्ष की हस्तलिखित कापियाँ मेरे पास हैं। ...उनको देखने से पता लगेगा कि आज कल के हिन्दी के अनेक धुरंधर लेखक किस तरह राह पर लाये गये थे। (बैजनाथ सिंह विनोद, द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1958, पृष्ठ 48) बाबूराव विष्णु पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था। (शर्मा, रामविलास, 1977, पृ. 377) ‘सरस्वती’ को सहायक संपादक की जरूरत थी। अतएव 2 नवंबर 1911 से आचार्य ने श्री गणेश शंकर विद्यार्थी को पच्चीस रुपये प्रति माह के वेतन पर सहायक संपादक के पद पर नियुक्त कर लिया। शीघ्र ही युवा एवं उत्साही सहायक संपादक ने आचार्य को अपने कार्य व परिश्रम से मुग्ध कर लिया। ‘सरस्वती’ पत्रिका में काम करने के कारण गणेश शंकर विख्यात हो गये। ‘सरस्वती’ पत्रिका साहित्यिक थी और गणेश शंकर विद्यार्थी का रुझान राजनीतिक पत्रकारिता की ओर था। अतः 'अभ्युदय' के संचालकों ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। 29 दिसंबर, 1912 को इलाहाबाद पहुंचकर ‘अभ्युदय’ में कार्यभार ग्रहण कर लिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के क्षेत्र में पृथक अवश्य हो गए थे, परन्तु उनके पारस्परिक संबंध पहले ही जैसे बने रहे। विद्यार्थी जी आचार्य को 'सदैव गुरु की भाँति सम्मान देते थे और आचार्य कई मामलों में उन्हें अपना दिशा निर्देशक मानते थे।' (डॉक्टर मोती लाल भार्गव, आधुनिक भारत के निर्माता : गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रकाशन विभाग, मई 1992, पृष्ठ 13) 'प्रताप' के प्रकाशन के अवसर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गणेश शंकर विद्यार्थी को न केवल आशीर्वाद दिया वरन उन्हें एक सिद्धान्त-सूचक पद (Moto) भी दिया जो निम्नवत था : "जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।" (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)
'सरस्वती' में स्तरीय रचनाएँ ही जगह पा सकती थीं। विषय-वस्तु, भाषा आदि के स्तर से समझौता करना महावीर प्रसाद द्विवेदी ने न सीखा था। कहीं कमजोरी होती भी तो उसे दुरुस्त करते। एकदम ही चलने लायक न होता तो उसे कालेपानी की सजा दे डालते। अगर उस रचना को लेखक अन्यत्र कहीं छपा लेता तो उसे द्विवेदी जी की डांट और घुड़की मिलती। किन्तु 'कान्यकुब्ज' के प्रति थोड़ा मोह बसता था। उसके प्रति थोड़ा और नरम हो जाया करते। कई पत्रों में इसका संदर्भ मिलता है जैसे 'अमुक व्यक्ति संकट में है, कान्यकुब्ज भी है' आदि का उल्लेख स्पष्ट करता है कि वास्तविक मोह कहाँ था। (लक्ष्मीकान्त वर्मा, 'भूमिका', सम्मेलन पत्रिका (पत्र विशेषांक), भाग 68, संख्या 1-2, पृष्ठ 6)
'सरस्वती' की समसामयिक या अनुवर्ती हिंदी पत्रिकाओं के अवलोकन-समालोचन से यह प्रमाणित होता है कि उनके आकार-प्रकार, विषयों की विविधता, संपादकीय टिप्पणियां आदि लगभग सभी बातें 'सरस्वती' की नकल हैं। 'मर्यादा', 'प्रभा', 'चाँद', 'माधुरी' आदि पत्रिकाओं ने 'सरस्वती' के ही आकार को अपनाया। 'प्रभा' की संपादकीय टिप्पणियां 'संसारप्रगति', और 'विचारप्रवाह' 'सरस्वती' के 'विविध विषय' के ही विविध रूप हैं। 'माधुरी' के 'सुमन संचय' और 'विविध विषय' 'सरस्वती' की 'विविध वार्ता' के ही दो विभाग हैं। उसका 'महिला मनोरंजक' 'सरस्वती' के 'कामिनी कौतूहल' के ही ढंग की वस्तु है। 'चाँद' के 'ग्रहविज्ञान', 'चिट्ठीपत्री' और 'रंगभूमि' खंड 'सरस्वती' के फुटकर और साहित्यिक विषयों से लिए गए हैं। 'विनोदवाटिका' 'सरस्वती' के 'विनोद और आख्यायिका' खंड के ही रूपांतर है तो उसकी 'चित्रसूची' 'सरस्वती' की ही 'चित्रसूची' का विकसित रूप है। उसके 'कुछ कौतूहलपूर्ण बातें' और 'साहित्य संसार' खंड 'सरस्वती' के क्रमशः 'विचित्र विषय' और 'पुस्तक-परिचय' के ही प्रतिरूप हैं। (डॉ. उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 185-186) अज्ञेय ने 'सरस्वती' के संपादक को अपने बाल-मन का हीरो स्वीकार किया है। इसी प्रभाव में, "एक दिन सहसा पाया कि मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका निकाल दी है-'आनंद बंधु'। और इस पत्रिका में पहले पृष्ठ पर कविता से लेकर अंत में संपादकीय के बाद चित्र-परिचय तक सबकुछ था, जैसा कि उससे पहले के वर्षों की सरस्वती में हुआ करता था-स्वर्गीय महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकत्व में।" (अज्ञेय, आत्मनेपद, भारतीय विद्यापीठ, काशी, 1960, पृष्ठ 22; रमेशचंद्र शाह, पत्रकारिता के युग निर्माता : स. ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय', प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृष्ठ 26)
द्विवेदी जी रचनाओं के ऊपर काफी श्रम करते, आमूल परिवर्तन करते और कभी-कभी शीर्षक भी बदल देते। मैथिलीशरण गुप्त की पहली कविता 'शरद' अस्वीकृत हुई, परंतु दूसरी कविता 'हेमन्त' को उचित संशोधन और परिवर्द्धन के साथ 'सरस्वती' में जगह मिली। दिसंबर 1913 ईस्वी में केशवप्रसाद मिश्र की 'सुदामा' शीर्षक लंबी तुकबंदी में उसके दोषों का निर्देश और उन्हें दूर कर कहीं अन्यत्र छपा लेने का आदेश दिया। लक्ष्मीधर वाजपेयी के 'नाना फड़नवीस' नामक विस्तृत लेख को अत्यंत परिश्रमपूर्वक काट-छाँट के बाद न सिर्फ आठ पृष्ठों में छापा बल्कि सोलह रुपये का पुरस्कार भी भेजा। (डॉ. उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 170) किन्तु जिस रचना को खारिज कर देते उसके 'उद्धार' के सारे रास्ते बंद हो जाते। इसके प्रमाण में मैथिलीशरण गुप्त को लिखे गए एक पत्र को उद्धृत किया जा सकता है। वे लिखते हैं–“आगे से आप सरस्वती में लिखना चाहें तो इधर-उधर अपनी कविताएं छपाने का विचार छोड़ दीजिए। जिस कविता को हम चाहें, उसे छापेंगे। जिसे न चाहें उसे न कहीं दूसरी जगह छपाइए, न किसी को दिखाइए, ताले में बंद करके रखिए।”
द्विवेदी जी सिद्धांततः व्यक्ति स्वातंत्र्य के समर्थक थे पर व्यवहार के स्तर पर इसके विरोधी थे। इस सन्दर्भ में गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रसंग भी ध्यान देने लायक है. विद्यार्थी जी जब 'सरस्वती' को छोड़कर 'अभ्युदय' चले गए थे तो आचार्य ने उन्हें भी हलकी डांट पिलायी थी. उन्होंने लिखा है : ‘गणेश ने उनसे (अभ्युदय) सेवा शर्तें तय करने के पश्चात् मुझे सूचना दी. क्योंकि मैं जाने की अनुमति देने के लिए विवश था, इसलिए मैंने आज्ञा दे दी. परन्तु मैंने भी उन्हें ऐसा करने के लिए हल्की सी डांट पिलाई. उनसे मैंने स्पष्ट रूप से पूछा कि मुझ से बिना परामर्श लिए उन्होंने कैसे यह सब मामला तय कर लिया?...मेरी हल्की डांट से गणेश बहुत प्रभावित हुए और अपने किये पर पश्चाताप करने लगे.’ (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)
द्विवेदी जी का मानना था कि हमें अपने लिखे हुए पर परिशोधन अथवा संशोधन को स्वीकार करना चाहिए। इस संदर्भ में उनका स्पष्ट मत था कि- “अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परंतु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है।” (गगनाञ्चल, नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11) प्रचलित है कि एक शाम के पी जायसवाल और दिनकर 'गप्प-शप्प' के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, 'हिंदी में केवल दोय कवि भये।' दिनकर ने पूछा, 'वे कौन हैं भला?' उन्होंने कहा, 'एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।' दिनकर ने अकचकाकर पूछा, 'और तुलसीदास?' वे बोले, 'अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।' कहावत है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ आठ)
द्विवेदी जी की यह खासियत थी कि वह साहित्यिक कृतियों के संदर्भ में किसी भी लाग-लपेट के बगैर रचना केन्द्रित उसका मूल्यांकन करते थे। यही कारण है कि 'सरस्वती' पत्रिका में जितनी भी रचनाएँ प्रकाशित हुई वह हमेशा स्तरीय रहीं। 'सरस्वती' पत्रिका के अंक की संपादकीय में पत्रिका के उद्देश्य एवं महत्ता के संबंध में संपादक ने लिखा है- "सरस्वती में केवल उत्कृष्ट कोटि की रचनाओं को ही महत्त्व दिया जाएगा और उनकी उत्कृष्टता का निर्णय लेखकों की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं बल्कि रचना के अपने वैशिष्ट्य के आधार पर किया जाएगा।" (सरस्वती पत्रिका का संपादकीय से) जब 'भारत-भारती' पहले-पहल प्रकाशित हुई, द्विवेदी जी ने सरस्वती में उस पर एक लेख लिखा था जो प्रशंसात्मक और अत्यंत प्रभावपूर्ण था। लेख के अंत में द्विवेदी जी ने मैथिलीशरण जी के साथ अपनी मैत्री का भी जिक्र किया था और लिखा था, "लेकिन मैंने इसका कोई खयाल नहीं रखा है। सत्य, इसके साक्षी तुम हो।" जायसवाल जी जब 'पाटलिपुत्र' में इसकी समीक्षा करने लगे, उन्होंने पुस्तक और लेखक तथा प्रकाशक के नाम एवं मूल्यादि लिखकर केवल एक वाक्य लिखा, "स्वर्ग से फतवा आया है।" और उसके बाद द्विवेदी जी का पूरा-का-पूरा लेख उद्धृत कर दिया। (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 10) प्रारंभिक काल में ‘सरस्वती’ से निराला की रचनाएं भले ही वापस लौट आयी हों, परंतु यह सर्वथा सत्य है कि निराला की वास्तविक परख आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ही की थी। कलकत्ता की विवेकानंद सोसायटी से जब हिन्दी मासिक 'समन्वय' निकालने का निश्चय हुआ, तो सोसायटी के एक विद्वान संन्यासी स्वामी माधवानंद एम. ए. ने, आचार्य द्विवेदी से ही राय मांगी। बिना किसी हिचकिचाहट के आचार्य द्विवेदी ने निराला का नाम बता दिया। (इन्द्रनाथ मदान (संपादक), निराला, लोकभारती, द्वितीय संस्करण : 1998, पृष्ठ 20)
'सरस्वती' ने ही हिंदी पत्रकारिता को ऐसा व्यवस्थित आधारभूत ढांचा दिया जिससे वह वैचारिकता को प्राप्त कर सकी। उस दौर में (तत्कालीन) शायद ही कोई ऐसा विषय रहा होगा जिस पर 'सरस्वती' में लेख न प्रकाशित हुए हो। उस दरमियान किसी भी रचनाकार के लिए 'सरस्वती' में प्रकाशित होना एक उपलब्धि थी। अपने समय में ‘सरस्वती’ ने हर तरह के लेखकों को जोड़ने का काम किया। एक प्रकार से देखें तो ‘सरस्वती’ ने उस दौर की तत्कालीन समस्याओं को उजागर करने में हिंदी भाषी समाज के लिए एक मंच का काम किया। काबिलेगौर है द्विवेदी जी के संपादन-काल में भाव और भाषा के साथ-साथ विधागत स्तर पर भी काफी प्रगति हुई। सरस्वती पत्रिका की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है कि इसने हिंदी भाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा-विषयक सामग्री (साहित्य की समस्त विधाओं) को अनुवाद के जरिए सामने लाने का अनूठा कार्य किया।
'सरस्वती' उस दौर की अकेली ऐसी पत्रिका है जिसने बहुत ही का समय में न सिर्फ साहित्य जगत में बल्कि हिंदी पत्रिकारिता के इतिहास में अपनी गहरी पैठ बनाई है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने भी इस संदर्भ में लिखा है कि- "द्विवेदी जी के सरस्वती-सम्पादन का इतिहास अनेक आंदोलनों का इतिहास है। वह उनके व्यक्तित्व और तत्कालीन समाज के विकास का इतिहास भी कहा जा सकता है।" ‘सरस्वती’ के माध्यम से द्विवेदी जी ने रीतिवाद का जमकर विरोध किया। वे रीतिकालीन श्रृंगारिकता एवं नायिका-भेद के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि रस, भाव, अलंकार, छंद-शास्त्र और निरा नायिका-भेद का वर्णन करने से मानव-सभ्यता (जाति) का विकास संभव नहीं है। इसीलिए वे हमेशा कविता को रीतिवादी कूप से निकालकर काव्य-विषय के विस्तार के पक्षधर थे। एक प्रकार से देखें तो सरस्वती पत्रिका समकालीन रीतिवादी धारा के विरोध में और ब्रज भाषा के स्थान पर खड़ी बोली हिंदी के समर्थन में एक संघर्षरत पत्रिका थी। द्विवेदी जी के संपादन-काल में समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा, एवं बाल-साहित्य जैसे विषयों को भी ‘सरस्वती’ में विशेष स्थान दिया गया। नवजागरण की चेतना का प्रसार एवं उसे जनसाधारण तक पहुंचाने में 'सरस्वती' एवं महावीरप्रसाद द्विवेदी, दोनों ने संबल का काम किया। हिंदी साहित्य की सामयिक अवस्था का चित्रण करने एवं उसका गहरा प्रभाव डालने के लिए ‘सरस्वती’ में व्यंग्य-चित्रों को भी यथोचित स्थान मिला है। यहाँ तक कि आधुनिक हिंदी कहानी का उदय एवं आधुनिक खड़ी-बोली कविता को प्रचार-प्रसार एवं प्रतिष्ठा भी ‘सरस्वती’ से ही मिली। खड़ी बोली हिंदी को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना इस पत्रिका की नायाब उपलब्धि है। मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवी प्रसाद, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', हरिऔध, नाथू राम 'शंकर' शर्मा, रामनरेश त्रिपाठी आदि कवियों की रचनाएँ प्रकाशित करके द्विवेदी जी ने यह साबित कर दिया कि खड़ी बोली हिंदी में भी उच्च कोटि की कविताएं लिखी जा सकती है। कविता के साथ-साथ कहानी विधा के विकास में भी इस पत्रिका की महती भूमिका रही है। बंग महिला की 'दुलाई वाली', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', विश्वंभर नाथ शर्मा की 'रक्षाबंधन', प्रेमचंद की 'सौत', जैसी महत्त्वपूर्ण कहानियाँ द्विवेदी जी के ही सम्पादन में प्रकाशित हुई। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबंध 'कविता क्या है ?', कामता प्रसाद गुरु का 'हिंदी व्याकरण', मैथिलीशरण गुप्त का 'कविता किस ढंग की हो', एवं सरदार पूर्ण सिंह द्वारा लिखे गए लाक्षणिक निबंध इसी अवधी की देन है। गौर करें तो उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, जीवनी, यात्रा-साहित्य एवं डायरी जैसी विधाओं के अतिरिक्त पुस्तक-समीक्षा के विकास में भी 'सरस्वती' की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कामता प्रसाद गुरु, प्रेमचंद, लोचन प्रसाद पाण्डेय आदि ऐसे कई लेखक हैं जो ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा ही हिंदी जगत में परिचित एवं अपनी पहचान बना सके। द्विवेदी जी के संपादन काल में ‘सरस्वती’ में एक भी ऐसा लेख प्रकाशित नहीं हुआ जिससे समाज पर बुरा प्रभाव पड़े। द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा हिंदी साहित्य में सुरुचि का प्रसार किया और साहित्य के क्षेत्र को खूब विस्तृत किया। महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित पत्रिका 'सरस्वती' में 1917 में चंपारन आंदोलन की कोई खबर नहीं छपी थी, जबकि इस पत्रिका को नवजागरण की सबसे महत्त्वपूर्ण पत्रिका माना जाता रहा है।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपादन-कौशल को ध्यान में रखते हुए पद्मसिंह शर्मा ने एक पत्र में लिखा था, 'आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम महदन्तरम (दोनों म हलयुक्त) प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते। (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221)