Tuesday, October 6, 2026

महावीरप्रसाद द्विवेदी, सरस्वती और हिंदी पत्रकारिता

हिन्दी के संपादकों में महावीरप्रसाद द्विवेदी का नाम अग्रगण्य है। वास्तव में द्विवेदी जी ने हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में एक नये युग की नींव डाली। उन्होंने हिन्दी में संपादन-कला का प्रवर्तन और परिष्कार किया। इस बात को समझना हो तो 1901 ईस्वी के पहले की 'सरस्वती' समेत पत्रिकाएं देख सकते हैं (किशोरीदास वाजपेयी, साहित्यिकों के पत्र, हिमालय एजेंसी, कनखल, 1958, पृष्ठ 2)। पत्रकारिता की इस यात्रा में ‘सरस्वती’ की भी बराबर की भूमिका रही। कहा जाता है कि द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' को और 'सरस्वती' ने द्विवेदी जी को चमका दिया। (डॉ. उदयभानु सिंह, महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 191)

जनवरी 1900 से नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के संरक्षण में इंडियन प्रेस, प्रयाग से 'सरस्वती' मासिक का प्रकाशन शुरू हुआ। आरम्भ में इसका संपादन एक संपादक मण्डल के जिम्मे था। दूसरे वर्ष से इसका संपादन श्यामसुंदर दास करने लगे। संपादक की अन्य व्यस्तताओं के कारण पत्रिका और मालिक दोनों की सेहत प्रभावित हो रही थी। अतः दिसंबर, 1902 के अंक में संपादन भार से अवकाश ग्रहण करते हुए टाइटिल पेज दूसरे में लिखा, 'इस संख्या के साथ सरस्वती के तीसरे भाग का अंत हो गया। जनवरी सन 1903 से इस पत्रिका का चौथा भाग आरम्भ होगा। आगे इसके संपादन के पद को हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी सुशोभित करेंगे।' (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, कानपुर इतिहास समिति, नवंबर 1957, पृष्ठ 185) वैसे द्विवेदी जी का 'सरस्वती' से पुराना संबंध था। बाबू जी के संपादन काल में आचार्य द्विवेदी जी साहित्यिक विषयों पर व्यंग कविताएं लिखते थे, जो सरस्वती में व्यंग चित्रों के साथ छपा करती थीं। (वही)

संपादन भार ग्रहण करने पर द्विवेदी जी ने अपने लिए मुख्य चार आदर्श निश्चित किए-समय की पाबंदी करना, मालिकों का विश्वास-भाजन बनना, अपने हानि-लाभ की परवाह न करके पाठकों के हानि-लाभ का ध्यान रखना और न्याय-पथ से कभी भी विचलित न होना। ('साहित्य-संदेश', अप्रैल 1939 में प्रकाशित आत्म निवेदन; उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 162) बाबू चिंतामणि घोष ने द्विवेदी जी की प्रशंसा करते हुए एक बार कहा था-'हिंदुस्तानी संपादकों में मैंने वक्त के पाबंद और कर्तव्यपालन के विषय में दृढ़प्रतिज्ञ दो ही आदमी देखे हैं, एक तो रामानंद बाबू और दूसरे आप।' (द्विवेदी-लिखित 'बाबू चिंतामणि घोष की स्मृति', सरस्वती, 1928 ईस्वी, खण्ड 2, पृष्ठ 282; डॉ. उदयभानु सिंह, महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका युग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पृष्ठ 49 में उद्धृत)

‘सरस्वती’ पत्रिका का उद्देश्य बहुत व्यापक था। इसमें लगभग सभी विधाओं जैसे-कविता, कहानी, एकांकी, समालोचना और पुस्तक परिचय, कला-सभ्यता, इतिहास, लोकगीत आदि सांस्कृतिक विषयों पर लेख तथा अन्य भाषाओं के साहित्य के अनुवाद को लाने का भरसक प्रयास किया था। ‘सरस्वती’ बहुर्मुखी एवं व्यापक विषयों पर लेख प्रकाशित करती थी। कुमारी चारलोट एम यंग द्वारा रचित पुस्तक 'बुक ऑफ गोल्डेन डीड्स' से प्रभावित गणेश शंकर का 'आत्मोत्सर्ग' शीर्षक लेख 1909 में 'सरस्वती' में ही प्रकाशित हुआ था। (मोती लाल भार्गव, आधुनिक भारत के निर्माता : गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रकाशन विभाग, मई 1992, पृष्ठ 15) 'सरस्वती' ही में कार्यरत रहते हुए सहायक संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने अंग्रेजी की अनेक कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया था जो 'शेखचिल्ली की कहानियां' शीर्षक से प्रकाशित हुईं। यह विद्यार्थी जी की हिन्दी में पहली प्रकाशित पुस्तक थी। (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 17)

डॉ. रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि ‘द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया।’ डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में ‘सरस्वती’ के संदर्भ में कई महत्त्वपूर्ण संकेत किए हैं। सही अर्थों में देखा जाय तो 'सरस्वती' सांस्कृतिक निर्माण की पत्रिका थी। ‘सरस्वती’ पत्रिका ने न केवल हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में, अपितु समग्र हिंदी साहित्य के विकास की दृष्टि से कई मानदंड स्थापित किये। इस पत्रिका के माध्यम से हिंदी के मानक रूप गढ़े गए और हिंदी साहित्य को परिष्कृत रूप में समृद्ध किया गया। द्विवेदी जी के संपादकत्व में पत्रिका का न सिर्फ साहित्यिक दृष्टिकोण बदला बल्कि 'सरस्वती' अपनी निजी भाषा और सामग्री के माध्यम से पाठक को अपनी ओर आकर्षित करने में भी सफल रही। ‘सरस्वती’ ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए जितना कार्य किया, वह बाद की पत्रिकाओं द्वारा न हो सका।

महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा को न सिर्फ सरल, सुगम एवं सुबोध बनाने का प्रयास किया, बल्कि उसके परिमार्जन के साथ-साथ शब्द-चयन, पद-रचना, वाक्य-विन्यास की दृष्टि से भी भाषा को व्याकरण अनुशासित करने का भी पुरजोर प्रयत्न किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने द्विवेदी जी के महत्त्व को रेखांकित करते हुए लिखा है- “यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रूकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया।” उन्होंने ‘सरस्वती’ को भाषा संस्कार, साहित्य संस्कार और हिंदी भाषी जाति के मानस संस्कार का प्रतीक बनाया। हिंदी की अनस्थिरता को स्थिरता प्रदान करने एवं गद्य-पद्य की भाषा में एकरूपता लाने में द्विवेदी जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस संदर्भ में उन्होंने अपने एक लेख में लिखा है-"गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।"

प्रारम्भ ही से द्विवेदी जी ने भाषा परिमार्जन और शब्दों की एकरूपता पर जोर देना शुरू कर दिया था, किंतु उनसे पूर्व 'सरस्वती' में व्याकरण आदि की समस्याओं पर कुछ नहीं कहा गया था। बाबू श्यामसुंदर दास भी अपने संपादन काल में 'लौं', 'बेर' आदि शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। (नरेशचंद्र चतुर्वेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ  185)

द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ में हिंदी भाषा विषयक एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में उन्होंने हिंदी में प्रयुक्त होनेवाले अंगरेजी के शब्दों की उत्पत्ति पर विचार किया था। उन्होंने लिखा था : ‘जान पड़ता है कि हिंदी ही से अंगरेजी के शब्द की उत्पत्ति हुई है। यूरोप से पहले-पहल पोर्तगीज भारत आए। उन्होंने भी हिंदी में कुछ शब्द प्रविष्ट करा दिए। उनके द्वारा प्रयुक्त कैमरा हिंदी में कमरा हो गया और आक्सन से नीलाम बना।’ (सरस्वती, सितंबर 1901, पृष्ठ 12; डा. कृष्णानन्द द्विवेदी, बिहार की हिंदी पत्रकारिता, पृष्ठ 34) ‘बिहार बंधु’ उनकी शब्दोत्पत्ति विषयक इस स्थापना से सहमत नहीं हुआ। उसने अपने पत्र में प्रकाशित ठाकुर अयोध्या प्रसाद सिंह के लेख का हवाला देते हुए लिखा ‘द्विवेदी जी का शब्दोत्पत्ति पर अनुमान और नियंत्रण के संग-संग प्रमाण भी विचित्र ढंग का निकला था। पर ठाकुर अयोध्या प्रसाद ने सारा पोल खोल दिया। एक समय द्विवेदी साहब ने बाबू साहब से प्रार्थना की थी कि आप ऐसी बातों पर नुक्ताचीनी करना छोड़ दीजिए। मगर बाबू साहब ने इस गुड्डी को और आकाश में उड़ा दिया। आश्चर्य हमें तो वहीं होता है कि ऐसी निपुणता रखकर भी लोग हिंदी में मर्मज्ञ होने का अभिमान करते हैं। छिः।’ (बिहार बंधु, 1 मार्च 1903, पृष्ठ 4; डॉ. कृष्णानंद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 34) इसी लेख में उसने लिखा ‘द्विवेदी जी उर्दू को भी हिंदी का एक स्टाइल मानते हैं और बाबू श्यामसुंदर दास हिंदी और उर्दू को दो भिन्न और पृथक भाषा मानते थे। पर क्या एडीटर के बदलने से पेपर की पालिसी भी बदल गई?  धन्य है।’ (वही)

‘बिहार बंधु’ और ‘भारत मित्र’ अपने समय के प्रसिद्ध पत्र थे। दोनों अपने पाठकों को नए विचार, नए संदेश एवं नई प्रेरणाओं से संबलित करने में तल्लीन थे। परंतु दोनों में किसी विषय पर सैद्धांतिक मतभेद हो जाना असंभव नहीं था। हिंदी भाषा के मानकीकरण संबंधी नीति को लेकर प्रचलित भाषिक अस्थिरता पर दोनों ही पत्रों का ऐतिहासिक विवाद 1902 से 1908 ई. तक चला जो काफी प्रसिद्ध हुआ। इस वाद-विवाद में खुलकर भाग लेनेवालों में ‘सरस्वती’, ‘भारत मित्र’, ‘हिंदी बंगवासी’, ‘समालोचक’, ‘वैश्योपकारक’ और ‘बिहार बंधु’ के ख्यातिलब्ध पत्रकार थे, जिनके दो दल हो गए थे। एक दल का नेतृत्व आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी कर रहे थे तो दूसरे दल का बालमुकुंद गुप्त। उक्त विवाद लंबे समय तक चला क्योंकि हिंदी के दो महारथियों का वह झगड़ा था, जिससे हिंदी के अनेक विद्वानों के धौरंधरिक संबंध हो गए थे। (डा. कृष्णबिहारी मिश्र, हिंदी पत्रकारिता, पृष्ठ 136) 

1902 से 1907 ई. तक ‘बिहार बंधु’ के प्रायः प्रत्येक अंक इन्हीं विवादों से भरे हैं। उन्हें देखने से ऐसा लगता है कि इन दोनों पत्रों के भाषागत सैद्धांतिक विवादों से पाठक वर्ग भी ऊब चुका था। मई 1907 के अंक में कलकत्ते के किसी पाठक ‘श. हि.’ का ‘भाइयो, अब क्षमा करो’ शीर्षक से एक पत्र प्रकाशित हुआ। पत्रप्रेषक ने दुर्भावनारहित होकर लिखा था ‘‘बिहार बंधु और भारतमित्र के संपादक में आपस में जब तक काम-काज की छेड़-छाड़ चलती थी तो उतना हरज नहीं था, पर आपस की जलन बुझाने के लिए अब फिजूल बकवाद हो रहा है। 'भारतमित्र' तो साग में हल्दी न डालने पर किस तरह वृथा बात बढ़ाए जाता है, वह स्पष्ट है। आपलोग सर्वसाधारण के उपकार के लिए पत्र छापते हैं इसलिए केवल अपनी हवस के लिए पत्र का कीमती कालम खराब करने का अधिकार हमारे जानते किसी संपादक को नहीं है। दोनों ओर के हिमायतियों को भी इस वृथा काम से हाथ खींचने का हम अनुरोध करते हैं।’’ (डॉ. कृष्णानंद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 37) उल्लेखनीय है कि इन दोनों पत्रों के विवादों ने हिंदी के संवर्धन का स्वस्थ प्रयास किया। भाषिक विशिष्टता की स्थापना हेतु उन दोनों ने जिस कटु किंतु रचनात्मक परिवेश को अपनाया, वह निश्चय ही सराहनीय था।

इन्हीं दिनों 'सरस्वती' का नागरी प्रचारिणी सभा के साथ भी विवाद हुआ। साहित्यिक कारणों से, सम्भवतः हिंदी पुस्तकों की खोज संबंधी विवाद के कारण नागरी प्रचारिणी सभा एवं श्यामसुंदर दास से द्विवेदी जी का मतभेद हो गया था। अक्तूबर 1904 ईस्वी की सरस्वती में सन 1901 ईस्वी की खोज की रिपोर्ट की कड़ी समालोचना हुई थी। सभा ने उक्त समालोचना का प्रतिवाद करते हुए इंडियन प्रेस के स्वामी को एक पत्र लिख भेजा। दिसंबर 1904 की सरस्वती में द्विवेदी जी का 'सभा और सरस्वती' शीर्षक से एक तीखा आलोचनात्मक लेख निकला। इस झगड़े ने ऐसा उग्र रूप धारण किया कि नागरी प्रचारिणी सभा ने तुरंत अपनी प्रबंधकारिणी समिति की बैठक करके इंडियन प्रेस को सूचना दे दी कि सभा आगामी 1905 से 'सरस्वती' पर से अपना अनुमोदन हटाती है। फलतः इंडियन प्रेस के संचालक बाबू चिंतामणि घोष ने जनवरी 1905 की 'सरस्वती' के छपे हुए कवर को रद्द करा दिया और 'नागरी-प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से संस्थित' को हटवाकर नया कवर छपवा दिया। इस प्रक्रिया में 'सरस्वती' एक सप्ताह के विलंब से पाठकों को प्राप्त हो सकी। (द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 529)

1903 से 1906 तक निरंतर महावीरप्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' के पाठकों की रुचि का परिष्कार करते रहे ताकि वे गंभीर विषयों का बोझ उठा सकें। 1906 के अंतिम अंक में द्विवेदी जी ने पाठकों को सूचित करते हुए लिखा-'सरस्वती के रसज्ञ वाचक अब कुछ गंभीर विषयों पर भी लेख पढ़ने को तैयार रहें। सामान्य विषयों पर ही सरल लेख लिखते रहने से हिन्दी की अवस्था उन्नति नहीं हो सकती।' (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 187) 'सरस्वती' के जीवन में सन 1907 का ऐतिहासिक महत्त्व है। इस वर्ष से विषय की गंभीरता और भी बढ़ चली। कुछ नये विषय यथा महापुरुषों की जीवनियाँ, कहानियां आदि शामिल हुए। अप्रैल 1907 में ही द्विवेदी जी का प्रसिद्ध लेख 'सभा की सभ्यता' 'सरस्वती' में प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष के मई अंक में 'दुलाई वाली' कहानी छपी। (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 188) प्रसिद्ध पुस्तक 'संपत्तिशास्त्र' संबंधी कई लेख 10907 की सरस्वती में प्रकाशित हुए। पहला लेख फरवरी अंक में प्रकाशित हुआ। (संपत्तिशास्त्र, भूमिका, पृष्ठ 4)

1908 की 'सरस्वती' में आचार्य द्विवेदी हिन्दी व्याकरण ही नहीं लिख रहे थे अपितु हिंदी विद्वानों को तुलनात्मक भाषाशास्त्र के अध्ययन हेतु भी प्रोत्साहित कर रहे थे।वैदिक साहित्य के गहन अध्ययन के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्य शब्द का मूल अर्थ है 'कृषक' (किसान) या 'कृषक-संतान'। यह शब्द 'ऋ' धातु से निकला है। यह धातु गत्यर्थक है किंतु अन्यान्य आर्य जातियों की भाषाओं में भी इसकी अनुरूप एक धातु है जिसका अर्थ खेती करना है। ग्रीक भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-व' धातु, लैटिन भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-ओ', गॉथिक भाषा में 'अर (र हलयुक्त)-गन' (न हलयुक्त), लिथूनियन भाषा में 'अर-ति' और जेंद भाषा में 'रर' धातु है। इन धातुओं का अर्थ खेती करना या हल से खेत जोतना है। (सरस्वती, सितंबर 1908; महावीरप्रसाद द्विवेदी, 'अतीत-स्मृति', लीडर प्रेस, प्रयाग, 1930, पृष्ठ 2) परंतु संस्कृत भाषा में 'अर' (र हलयुक्त) धातु नहीं है। सम्भव है कि पुराने जमाने में 'अर' (र हलयुक्त) धातु रही हो; पीछे लुप्त हो गई हो। अथवा यह भी हो सकता है कि 'ऋ' धातु ही के रूपांतर 'अर' (र हलयुक्त) हो गया हो, जैसा संस्कृत व्याकरण में होता भी है, और उसका मूल अर्थ 'हल चलाना' हो। (महावीरप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 3) यह भी सम्भव है कि हल की गति के कारण ही 'ऋ' धातु का अर्थ गतिसूचक हो गया हो। (वही) विभिन्न भाषाओं के कृषि वाचक धातुओं का विचार करने से जान पड़ता है कि 'अर्य्य' और 'आर्य्य' दोनों शब्दों का धात्वर्थ कृषक है। (वही) पाणिनि के 'इन्द्र वरुण-भव-शर्व' (4/1/49) आदि सूत्र पर सिद्धांतकौमुदी में 'आर्य्या'  और 'आर्य्याणी' शब्दों का अर्थ वैश्य-जातीय स्त्री और 'आर्य्य' शब्द का अर्थ वैश्य-पत्नी लिखा है। वाजसनेयी (14-28) और तैत्तिरीय संहिता (4-3-10-1) में चारों वर्णों के नाम-ब्रह्मन (न हलयुक्त), क्षत्र, अर्य्य और शूद्र लिखे हैं। (महावीरप्रसाद द्विवेदी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 3)

1910 में कुछ दिनों के लिए आचार्य द्विवेदी ने 'सरस्वती' के संपादन से विश्राम लिया। इस विश्राम-काल में उसका संपादन कानपुर के देवी प्रसाद शुक्ल ने किया। (हिन्दी साहित्य का विकास और कानपुर, पृष्ठ 188)

डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए लिखा है : “यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। ‘सरस्वती’ सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुख पत्र थी और हिंदी भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था।"

आचार्य द्विवेदी ने साहित्य कम, साहित्यिक अधिक पैदा किए। इस युग के बड़े-से-बड़े लेखक, महाकवि, संपादक और आचार्य उन्हीं के बनाए हैं। नागरी प्रचारिणी सभा (काशी) में सुरक्षित 'सरस्वती' की पांडुलिपियों को देखने से पता चलता है कि हिन्दी के इस महान ऋषि ने क्या कुछ किया है। (किशोरीदास वाजपेयी, साहित्यिकों के पत्र, हिमालय एजेंसी, कनखल, 1958, पृष्ठ 2) बाबू श्यामसुंदर दास के नाम पत्र (19/10/1923) में आचार्य द्विवेदी ने लिखा, 'मेरे समय की सरस्वती की 17 वर्ष की हस्तलिखित कापियाँ मेरे पास हैं। ...उनको देखने से पता लगेगा कि आज कल के हिन्दी के अनेक धुरंधर लेखक किस तरह राह पर लाये गये थे। (बैजनाथ सिंह विनोद, द्विवेदी युग के साहित्यकारों के कुछ पत्र, हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद, 1958, पृष्ठ 48) बाबूराव विष्णु पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकार तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था। (शर्मा, रामविलास, 1977, पृ. 377) ‘सरस्वती’ को सहायक संपादक की जरूरत थी। अतएव 2 नवंबर 1911 से आचार्य ने श्री गणेश शंकर विद्यार्थी को पच्चीस रुपये प्रति माह के वेतन पर सहायक संपादक के पद पर नियुक्त कर लिया। शीघ्र ही युवा एवं उत्साही सहायक संपादक ने आचार्य को अपने कार्य व परिश्रम से मुग्ध कर लिया। ‘सरस्वती’ पत्रिका में काम करने के कारण गणेश शंकर विख्यात हो गये। ‘सरस्वती’ पत्रिका साहित्यिक थी और गणेश शंकर विद्यार्थी का रुझान राजनीतिक पत्रकारिता की ओर था। अतः 'अभ्युदय' के संचालकों ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। 29 दिसंबर, 1912 को इलाहाबाद पहुंचकर ‘अभ्युदय’ में कार्यभार ग्रहण कर लिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता के क्षेत्र में पृथक अवश्य हो गए थे, परन्तु उनके पारस्परिक संबंध पहले ही जैसे बने रहे। विद्यार्थी जी आचार्य को 'सदैव गुरु की भाँति सम्मान देते थे और आचार्य कई मामलों में उन्हें अपना दिशा निर्देशक मानते थे।' (डॉक्टर मोती लाल भार्गव, आधुनिक भारत के निर्माता : गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रकाशन विभाग, मई 1992, पृष्ठ 13) 'प्रताप' के प्रकाशन के अवसर पर महावीर प्रसाद  द्विवेदी ने गणेश शंकर विद्यार्थी को न केवल आशीर्वाद दिया वरन उन्हें एक सिद्धान्त-सूचक पद (Moto) भी दिया जो निम्नवत था : "जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।" (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)

'सरस्वती' में स्तरीय रचनाएँ ही जगह पा सकती थीं। विषय-वस्तु, भाषा आदि के स्तर से समझौता करना महावीर प्रसाद द्विवेदी ने न सीखा था। कहीं कमजोरी होती भी तो उसे दुरुस्त करते। एकदम ही चलने लायक न होता तो उसे कालेपानी की सजा दे डालते। अगर उस रचना को लेखक अन्यत्र कहीं छपा लेता तो उसे द्विवेदी जी की डांट और घुड़की मिलती। किन्तु 'कान्यकुब्ज' के प्रति थोड़ा मोह बसता था। उसके प्रति थोड़ा और नरम हो जाया करते। कई पत्रों में इसका संदर्भ मिलता है जैसे 'अमुक व्यक्ति संकट में है, कान्यकुब्ज भी है' आदि का उल्लेख स्पष्ट करता है कि वास्तविक मोह कहाँ था। (लक्ष्मीकान्त वर्मा, 'भूमिका', सम्मेलन पत्रिका (पत्र विशेषांक), भाग 68, संख्या 1-2, पृष्ठ 6)

'सरस्वती' की समसामयिक या अनुवर्ती हिंदी पत्रिकाओं के अवलोकन-समालोचन से यह प्रमाणित होता है कि उनके आकार-प्रकार, विषयों की विविधता, संपादकीय टिप्पणियां आदि लगभग सभी बातें 'सरस्वती' की नकल हैं। 'मर्यादा', 'प्रभा', 'चाँद', 'माधुरी' आदि पत्रिकाओं ने 'सरस्वती' के ही आकार को अपनाया। 'प्रभा' की संपादकीय टिप्पणियां 'संसारप्रगति', और 'विचारप्रवाह' 'सरस्वती' के 'विविध विषय' के ही विविध रूप हैं। 'माधुरी' के 'सुमन संचय' और 'विविध विषय' 'सरस्वती' की 'विविध वार्ता' के ही दो विभाग हैं। उसका 'महिला मनोरंजक' 'सरस्वती' के 'कामिनी कौतूहल' के ही ढंग की वस्तु है। 'चाँद' के 'ग्रहविज्ञान', 'चिट्ठीपत्री' और 'रंगभूमि' खंड 'सरस्वती' के फुटकर और साहित्यिक विषयों से लिए गए हैं। 'विनोदवाटिका' 'सरस्वती' के 'विनोद और आख्यायिका' खंड के ही रूपांतर है तो उसकी 'चित्रसूची' 'सरस्वती' की ही 'चित्रसूची' का विकसित रूप है। उसके 'कुछ कौतूहलपूर्ण बातें' और 'साहित्य संसार' खंड 'सरस्वती' के क्रमशः 'विचित्र विषय' और 'पुस्तक-परिचय' के ही प्रतिरूप हैं। (डॉ. उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 185-186) अज्ञेय ने 'सरस्वती' के संपादक को अपने बाल-मन का हीरो स्वीकार किया है। इसी प्रभाव में, "एक दिन सहसा पाया कि मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका निकाल दी है-'आनंद बंधु'। और इस पत्रिका में पहले पृष्ठ पर कविता से लेकर अंत में संपादकीय के बाद चित्र-परिचय तक सबकुछ था, जैसा कि उससे पहले के वर्षों की सरस्वती में हुआ करता था-स्वर्गीय महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकत्व में।" (अज्ञेय, आत्मनेपद, भारतीय विद्यापीठ, काशी, 1960, पृष्ठ 22; रमेशचंद्र शाह, पत्रकारिता के युग निर्माता : स. ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय', प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृष्ठ 26)

द्विवेदी जी रचनाओं के ऊपर काफी श्रम करते, आमूल परिवर्तन करते और कभी-कभी शीर्षक भी बदल देते। मैथिलीशरण गुप्त की पहली कविता 'शरद' अस्वीकृत हुई, परंतु दूसरी कविता 'हेमन्त' को उचित संशोधन और परिवर्द्धन के साथ 'सरस्वती' में जगह मिली। दिसंबर 1913 ईस्वी में केशवप्रसाद मिश्र की 'सुदामा' शीर्षक लंबी तुकबंदी में उसके दोषों का निर्देश और उन्हें दूर कर कहीं अन्यत्र छपा लेने का आदेश दिया। लक्ष्मीधर वाजपेयी के 'नाना फड़नवीस' नामक विस्तृत लेख को अत्यंत परिश्रमपूर्वक काट-छाँट के बाद न सिर्फ आठ पृष्ठों में छापा बल्कि सोलह रुपये का पुरस्कार भी भेजा। (डॉ. उदयभानु सिंह, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 170) किन्तु जिस रचना को खारिज कर देते उसके 'उद्धार' के सारे रास्ते बंद हो जाते। इसके प्रमाण में मैथिलीशरण गुप्त को लिखे गए एक पत्र को उद्धृत किया जा सकता है। वे लिखते हैं–“आगे से आप सरस्वती में लिखना चाहें तो इधर-उधर अपनी कविताएं छपाने का विचार छोड़ दीजिए। जिस कविता को हम चाहें, उसे छापेंगे। जिसे न चाहें उसे न कहीं दूसरी जगह छपाइए, न किसी को दिखाइए, ताले में बंद करके रखिए।” 

द्विवेदी जी सिद्धांततः व्यक्ति स्वातंत्र्य के समर्थक थे पर व्यवहार के स्तर पर इसके विरोधी थे। इस सन्दर्भ में गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रसंग भी ध्यान देने लायक है. विद्यार्थी जी जब 'सरस्वती' को छोड़कर 'अभ्युदय' चले गए थे तो आचार्य ने उन्हें भी हलकी डांट पिलायी थी. उन्होंने लिखा है : ‘गणेश ने उनसे (अभ्युदय) सेवा शर्तें तय करने के पश्चात् मुझे सूचना दी. क्योंकि मैं जाने की अनुमति देने के लिए विवश था, इसलिए मैंने आज्ञा दे दी. परन्तु मैंने भी उन्हें ऐसा करने के लिए हल्की सी डांट पिलाई. उनसे मैंने स्पष्ट रूप से पूछा कि मुझ से बिना परामर्श लिए उन्होंने कैसे यह सब मामला तय कर लिया?...मेरी हल्की डांट से गणेश बहुत प्रभावित हुए और अपने किये पर पश्चाताप करने लगे.’ (मोती लाल भार्गव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 20)   

द्विवेदी जी का मानना था कि हमें अपने लिखे हुए पर परिशोधन अथवा संशोधन को स्वीकार करना चाहिए। इस संदर्भ में उनका स्पष्ट मत था कि- “अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परंतु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है।” (गगनाञ्चल, नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11) प्रचलित है कि एक शाम के पी जायसवाल और दिनकर 'गप्प-शप्प' के मूड में बैठे थे। जायसवाल जी ने शुरुआत की, 'हिंदी में केवल दोय कवि भये।' दिनकर ने पूछा, 'वे कौन हैं भला?' उन्होंने कहा, 'एक तो वही चंद, और दूसरा यही हरिचंद।' दिनकर ने अकचकाकर पूछा, 'और तुलसीदास?' वे बोले, 'अरे, तुलसिया भी कौनो कवि रहा? उसकी तो बंदरवा न सुधार देता रहा जैसे गुप्तवा की महविरवा।' कहावत है कि तुलसीदास की अधूरी कविताओं को हनुमान जी पूर्ण कर देते थे। और इधर तो सर्वविदित ही है कि मैथिलीशरण जी की कविताओं का संशोधन पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी किया करते थे। (रामधारी सिंह दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ आठ)

द्विवेदी जी की यह खासियत थी कि वह साहित्यिक कृतियों के संदर्भ में किसी भी लाग-लपेट के बगैर रचना केन्द्रित उसका मूल्यांकन करते थे। यही कारण है कि 'सरस्वती' पत्रिका में जितनी भी रचनाएँ प्रकाशित हुई वह हमेशा स्तरीय रहीं। 'सरस्वती' पत्रिका के अंक की संपादकीय में पत्रिका के उद्देश्य एवं महत्ता के संबंध में संपादक ने लिखा है- "सरस्वती में केवल उत्कृष्ट कोटि की रचनाओं को ही महत्त्व दिया जाएगा और उनकी उत्कृष्टता का निर्णय लेखकों की प्रसिद्धि के आधार पर नहीं बल्कि रचना के अपने वैशिष्ट्य के आधार पर किया जाएगा।" (सरस्वती पत्रिका का संपादकीय से) जब 'भारत-भारती' पहले-पहल प्रकाशित हुई, द्विवेदी जी ने सरस्वती में उस पर एक लेख लिखा था जो प्रशंसात्मक और अत्यंत प्रभावपूर्ण था। लेख के अंत में द्विवेदी जी ने मैथिलीशरण जी के साथ अपनी मैत्री का भी जिक्र किया था और लिखा था, "लेकिन मैंने इसका कोई खयाल नहीं रखा है। सत्य, इसके साक्षी तुम हो।" जायसवाल जी जब 'पाटलिपुत्र' में इसकी समीक्षा करने लगे, उन्होंने पुस्तक और लेखक तथा प्रकाशक के नाम एवं मूल्यादि लिखकर केवल एक वाक्य लिखा, "स्वर्ग से फतवा आया है।" और उसके बाद द्विवेदी जी का पूरा-का-पूरा लेख उद्धृत कर दिया। (दिनकर, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 10) प्रारंभिक काल में ‘सरस्वती’ से निराला की रचनाएं भले ही वापस लौट आयी हों, परंतु यह सर्वथा सत्य है कि निराला की वास्तविक परख आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ही की थी। कलकत्ता की विवेकानंद सोसायटी से जब हिन्दी मासिक 'समन्वय' निकालने का निश्चय हुआ, तो सोसायटी के एक विद्वान संन्यासी स्वामी माधवानंद एम. ए. ने, आचार्य द्विवेदी से ही राय मांगी। बिना किसी हिचकिचाहट के आचार्य द्विवेदी ने निराला का नाम बता दिया। (इन्द्रनाथ मदान (संपादक), निराला, लोकभारती, द्वितीय संस्करण : 1998, पृष्ठ 20)

'सरस्वती' ने ही हिंदी पत्रकारिता को ऐसा व्यवस्थित आधारभूत ढांचा दिया जिससे वह वैचारिकता को प्राप्त कर सकी। उस दौर में (तत्कालीन) शायद ही कोई ऐसा विषय रहा होगा जिस पर 'सरस्वती' में लेख न प्रकाशित हुए हो। उस दरमियान किसी भी रचनाकार के लिए 'सरस्वती' में प्रकाशित होना एक उपलब्धि थी। अपने समय में ‘सरस्वती’ ने हर तरह के लेखकों को जोड़ने का काम किया। एक प्रकार से देखें तो ‘सरस्वती’ ने उस दौर की तत्कालीन समस्याओं को उजागर करने में हिंदी भाषी समाज के लिए एक मंच का काम किया। काबिलेगौर है  द्विवेदी जी के संपादन-काल में भाव और भाषा के साथ-साथ विधागत स्तर पर भी काफी प्रगति हुई। सरस्वती पत्रिका की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता रही है कि इसने हिंदी भाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा-विषयक सामग्री (साहित्य की समस्त विधाओं) को अनुवाद के जरिए सामने लाने का अनूठा कार्य किया।

'सरस्वती' उस दौर की अकेली ऐसी पत्रिका है जिसने बहुत ही का समय में न सिर्फ साहित्य जगत में बल्कि हिंदी पत्रिकारिता के इतिहास में अपनी गहरी पैठ बनाई है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने भी इस संदर्भ में लिखा है कि- "द्विवेदी जी के सरस्वती-सम्पादन का इतिहास अनेक आंदोलनों का इतिहास है। वह उनके व्यक्तित्व और तत्कालीन समाज के विकास का इतिहास भी कहा जा सकता है।" ‘सरस्वती’ के माध्यम से द्विवेदी जी ने रीतिवाद का जमकर विरोध किया। वे रीतिकालीन श्रृंगारिकता एवं नायिका-भेद के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि रस, भाव, अलंकार, छंद-शास्त्र और निरा नायिका-भेद का वर्णन करने से मानव-सभ्यता (जाति) का विकास संभव नहीं है। इसीलिए वे हमेशा कविता को रीतिवादी कूप से निकालकर काव्य-विषय के विस्तार के पक्षधर थे। एक प्रकार से देखें तो सरस्वती पत्रिका समकालीन रीतिवादी धारा के विरोध में और ब्रज भाषा के स्थान पर खड़ी बोली हिंदी के समर्थन में एक संघर्षरत पत्रिका थी। द्विवेदी जी के संपादन-काल में समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा, एवं बाल-साहित्य जैसे विषयों को भी ‘सरस्वती’ में विशेष स्थान दिया गया। नवजागरण की चेतना का प्रसार एवं उसे जनसाधारण तक पहुंचाने में 'सरस्वती' एवं महावीरप्रसाद द्विवेदी, दोनों ने संबल का काम किया। हिंदी साहित्य की सामयिक अवस्था का चित्रण करने एवं उसका गहरा प्रभाव डालने के लिए ‘सरस्वती’ में व्यंग्य-चित्रों को भी यथोचित स्थान मिला है। यहाँ तक कि आधुनिक हिंदी कहानी का उदय एवं आधुनिक खड़ी-बोली कविता को प्रचार-प्रसार एवं प्रतिष्ठा भी ‘सरस्वती’ से ही मिली। खड़ी बोली हिंदी को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना इस पत्रिका की नायाब उपलब्धि है। मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, राय देवी प्रसाद, गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', हरिऔध, नाथू राम 'शंकर' शर्मा, रामनरेश त्रिपाठी आदि कवियों की रचनाएँ प्रकाशित करके द्विवेदी जी ने यह साबित कर दिया कि खड़ी बोली हिंदी में भी उच्च कोटि की कविताएं लिखी जा सकती है। कविता के साथ-साथ कहानी विधा के विकास में भी इस पत्रिका की महती भूमिका रही है। बंग महिला की 'दुलाई वाली', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', विश्वंभर नाथ शर्मा की 'रक्षाबंधन', प्रेमचंद की 'सौत', जैसी महत्त्वपूर्ण कहानियाँ द्विवेदी जी के ही सम्पादन में प्रकाशित हुई। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबंध 'कविता क्या है ?', कामता प्रसाद गुरु का 'हिंदी व्याकरण', मैथिलीशरण गुप्त का 'कविता किस ढंग की हो', एवं सरदार पूर्ण सिंह द्वारा लिखे गए लाक्षणिक निबंध इसी अवधी की देन है। गौर करें तो उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, जीवनी, यात्रा-साहित्य एवं डायरी जैसी विधाओं के अतिरिक्त पुस्तक-समीक्षा के विकास में भी 'सरस्वती' की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, कामता प्रसाद गुरु, प्रेमचंद, लोचन प्रसाद पाण्डेय आदि ऐसे कई लेखक हैं जो ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा ही हिंदी जगत में परिचित एवं अपनी पहचान बना सके। द्विवेदी जी के संपादन काल में ‘सरस्वती’ में एक भी ऐसा लेख प्रकाशित नहीं हुआ जिससे समाज पर बुरा प्रभाव पड़े। द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के द्वारा हिंदी साहित्य में सुरुचि का प्रसार किया और साहित्य के क्षेत्र को खूब विस्तृत किया। महावीरप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित पत्रिका 'सरस्वती' में 1917 में चंपारन आंदोलन की कोई खबर नहीं छपी थी, जबकि इस पत्रिका को नवजागरण की सबसे महत्त्वपूर्ण पत्रिका माना जाता रहा है।

महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपादन-कौशल को ध्यान में रखते हुए पद्मसिंह शर्मा ने एक पत्र में लिखा था, 'आजकल के संपादकों के संपादन से जब आपके संपादन की तुलना करता हूँ तो अंतरम महदन्तरम (दोनों म हलयुक्त) प्रतीत होता है। एक बार आपने स्वामी सत्यदेव के प्रसंग में कहा था कि कच्चा माल मांगकर उसे व्यवहारोपयुक्त बनाना पड़ता है। बात बिल्कुल ठीक थी। आजकल तो हिन्दी के अनेक संपादक कच्चे माल में भी कूड़ा-करकट मिलाकर उसे भद्दा बना देते हैं। शब्द-शुद्धि की ओर तो ध्यान नहीं देते, या ज्ञान ही नहीं रखते। (पद्मसिंह शर्मा के पत्र, आत्माराम एन्ड संस, 1956, पृष्ठ 221)

Sunday, October 4, 2026

सीताराम सेक्सरिया की 'एक कार्यकर्ता की डायरी' पढ़ते हुए

स्वर्गीय प्रेमचंद जी के संबंध में हंस का प्रेमचंद स्मृति अंक निकला है वही आजकल पढ़ रहे हैं। इस से मालूम होता है कि प्रेमचंद जी जितने बड़े समझे जाते हैं उस से वह बहुत बड़े थे और कोरे साहित्यिक ही न थे, महान विचारक तथा अन्तर्निरीक्षक भी थे और बड़े सादे, सरल, सीधे और आनंदी जीव थे। अपने ने उन के सब ग्रंथ प्रायः पढ़े हैं और जब भी कोई उन की लिखी चीज निकलती थी उस को पढ़े बिना अपने को चैन नहीं पड़ता था। प्रेमचंद जी की भाषा, उन के भाव तथा उन की वर्णन करने की शक्ति अपने को मोहित करती थी। प्रेमचंद से अपना प्रत्यक्ष नहीं हो सका, अब तो उन से न मिलने का बहुत अफसोस है पर उन के जीवन काल में कोई मौका ही नहीं आया। हिन्दी संसार ने उन का यथोचित आदर नहीं किया और आज अफसोस ही रह गया। उसी तरह अपनी बात है पर अब क्या किया जाये। अपने पास यदि काफी रुपया होता तो प्रेमचंद जी का कोई उज्ज्वल स्मारक जरूर खड़ा करते। देखें कौन माई का लाल इस काम को करता है वैसे तो प्रेमचंद जी अपने ग्रन्थों के कारण ही स्थायी हो सकते हैं। कोई भी मनुष्य क्या कर सकता है पर बुद्ध जैसे महापुरुष के धर्म के प्रचार के लिए भी अशोक जैसे सम्राट की जरूरत पड़ी ही।' (सीताराम सेक्सरिया, एक कार्यकर्ता की डायरी (28 अक्टूबर 1937), भाग 2, पृष्ठ 532-33)

जब भगवान देवी रजस्वला हुई

'भगवान देवी रजस्वला हो गयी। छोटी बच्ची को बुखार था इसलिए उस को लेकर जमीन पर सोना ठीक नहीं था। इसलिए वह गद्दे पर ही सोयी। अपने मन में कोई विशेष विचार नहीं हुआ। इसको लेकर पहले की बात याद आ गयी। आज के इक्कीस वर्ष पहले एक मौका था जब अपनी पहली पत्नी रजस्वला थी और वह मिट्टी के बरतनों में खाती थी। रात में दस बजे करीब उन बरतनों से अपना पैर छू गया था तो उसी समय अपने स्नान किया, सब कपड़े धोये। इन सब बातों के लिखने का मतलब यह है कि मनुष्य के विचारों में कितना परिवर्तन हो जाता है।' (सीताराम सेक्सरिया, एक कार्यकर्ता की डायरी, भाग 1, भारतीय ज्ञानपीठ, प्रथम संस्करण : 1972, पृष्ठ 217)

एक कार्यकर्ता की नजर में सुभाष 

'ऐसे बंगाली भावुक जाति हैं पर सुभाष बाबू तो बहुत ही भावुक हैं। व्याख्यान देने खड़े हुए तो उन की आँखों से आंसुओं की धारा निकलने लगी, कई बार रुकना पड़ा और रुँधे कंठ से बोलते रहे। ...वे वीर हैं, त्यागी हैं, अपूर्व देशभक्त हैं पर अनुभवी नहीं हैं, विचारक नहीं हैं। एक बात सब से खराब है वह यह कि निज में वे महत्वाकांक्षी हैं। बंगाल के लोगों में बहुत-से गुण होते हुए यह दोष प्रायः पाया जाता है। इसी कारण इतने त्यागी और कार्यकर्ताओं के रहते हुए स्वतंत्रता के यज्ञ में इतनी अधिक आहुतियां डालने पर भी आज बंगाल अपना स्थान नहीं बना सका।' (सीताराम सेक्सरिया, एक कार्यकर्ता की डायरी (6 अप्रैल 1937), भाग 2, पृष्ठ 516)

 'बंगाल की स्थिति बहुत बिगड़ी हुई है, यहां एक खूब जोरदार नेता की जरूरत है। सुभाष बाबू त्यागी, देशभक्त हैं पर जो नेता में होना चाहिए वह उन में नहीं है।' (सीताराम सेक्सरिया, एक कार्यकर्ता की डायरी (31 जनवरी, 1938), भाग 2, पृष्ठ 547)

'सुभाष बाबू टाइम पर काम नहीं कर सकते। ग्यारह बजे का समय था, एक बजे बात शुरू हुई।' (वही, पृष्ठ 561)

'इस बार कांग्रेस के सभापतित्व का सवाल जरा टेढ़ा हो गया है। सुभाष बाबू यदि खड़े रहे और पट्टाभि भी खड़े रहे तो काफी दिक्कत और कम्पीटीशन होगा। सुभाष बाबू सभापति बनने की इच्छा तो खूब रखते हैं।' (एक कार्यकर्ता की डायरी (20 जनवरी, 1939), भाग 2, पृष्ठ 583)

'सुभाष बाबू का त्याग, वीरता आदि गुण अपने को उन के प्रति श्रद्धा रखने को कहते हैं पर उन का विवेक, उन की बुद्धि अपने को आकृष्ट नहीं करती। वह जिस तरह देश की बागडोर अपने हाथ में रखने की अनुचित कोशिश करते हैं और छोटे-छोटे मामलों से लेकर बड़ी से बड़ी बातें अपनी इच्छानुसार ही हो, यह चाहते हैं या कोशिश करते हैं, यह उन के बड़प्पन के लायक नहीं है।' (एक कार्यकर्ता की डायरी (24 जनवरी, 1939), भाग 2, पृष्ठ 584)

'आज कांग्रेस सभापति का चुनाव है। बहुत वर्षों से चुनाव बिना प्रतिद्वंदिता के होता रहा। इस बार सुभाष बाबू ने वर्किंग कमेटी के खास मेम्बरों की बात नहीं मानी, खासकर महात्मा जी और जवाहरलाल जी की भी इच्छा के विरुद्ध खड़े हो गये। कई लोगों ने उन को समझाया भी पर वह अटल रहे। ...ऐसा कर के वह देश का या निज का भला नहीं करते हैं। उन के जो वक्तव्य निकलते हैं, उन की दलीलें बिल्कुल नहीं जँची और अपनी यह भी पक्की धारणा थी कि सुभाष बाबू हार जायेंगे और उन को बहुत कम वोट मिलेंगे पर उन को वोट ज्यादा मिले। खासकर बंगाल में उन को बहुत ही ज्यादा वोट मिलेंगे, यह नहीं सोचा गया था। बंगाल में सुभाष बाबू को चार सौ चार वोट मिले और पट्टाभि को केवल उन्नासी। इसका खास कारण यह हो सकता है कि बंगाल में जो लोग सुभाष बाबू को सभापति बनाने के विरोधी थे, वे भी उन के विरोध में जाने का साहस नहीं कर सके या उचित नहीं समझा। दूसरा कारण थोड़ी प्रांतीय प्रवृत्ति भी है ही, तीसरी बात यह कि जनता बहुत सोच कर थोड़े ही काम करती है, जो गरम बोलता है उस के पक्ष में हो जाती है। यह चुनाव सुभाष बाबू ने जीत लिया पर अपनी निगाह में इस का परिणाम अच्छा नहीं है।' (एक कार्यकर्ता की डायरी (29 जनवरी, 1939), भाग 2, पृष्ठ 584-85)

औपनिषदिक परंपरा की पुस्तक है शब्द चयनिका

जब मैं हाईस्कूल में था तो अपने कम्युनिस्ट शिक्षक रामविनय शर्मा से आनंदमार्ग और उसके संस्थापक प्रभात रंजन सरकार का नाम और खंडन-मंडन सुना करता था इसलिए एक लंबे समय तक इनसे बचाव की मुद्रा में रहा। सन 2000 के आसपास 'लोक दायरा' पत्रिका निकालने के क्रम में नेहरूनगर, पटना के एक व्यक्ति के यहां जाना हुआ जहां 'शब्द चयनिका' (भाग 2) पुस्तक देखने को मिली। उलट-पलटकर देखा तो किताब रोचक लगी और उपयोगी भी। घर ले आया। पढ़ा तो उसका कायल भी हुआ। अब मैं आपको भी पढ़ने की सलाह देता हूँ।

8 सितंबर, 1985 को प्रभात रंजन सरकार ने प्रत्येक रविवार को बंगला भाषा के चुनिंदा शब्दों पर व्याख्यान की एक श्रृंखला शुरू की थी। यह पुस्तक उन्हीं व्याख्यानों का लिखित-संकलित रूप है। इस लिहाज से यह औपनिषदिक परंपरा की चीज लगती है जहाँ शिष्य सीधा गुरुमुख से ज्ञान प्राप्त करता है। प्रभात रंजन सरकार की पुस्तक 'शब्द-चयनिका' मूल बंगला भाषा में 26 खण्डों में प्रकाशित हो चुकी है। जैसा कि नाम ही से स्पष्ट है, यह पुस्तक चुने हुए शब्दों की व्याख्या है। इसमें लेखक शब्दों की व्युत्पत्ति की व्याख्या करते हैं और इस क्रम में वे इतिहास, भूगोल, दर्शन, विज्ञान और भाषाविज्ञान जैसी ज्ञानजगत की अनेक गलियों से गुजरते हैं। इस यात्रा के फलस्वरूप यह किताब शब्दों की व्युत्पत्ति भर न रहकर 'ज्ञानकोष' हो जाती है। वे अपनी बात कहने के लिए कई कहानियों का भी सहारा लेते हैं। कुछ अविश्वसनीय कथाओं को छाँट दें तो कहना होगा कि ये जरूरी किताबें हैं।

बचपन में हमलोग कबीर के इस ज्ञान को अक्सर रटा करते थे : ''सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ/ धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिखा न जाइ।'' प्रभात रंजन सरकार हमें बताते हैं कि मूल संस्कृत में यह मूलतः शिव के लिए लिखा गया था : ''असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे/सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमूर्बी। लिखति यदि गृहीत्वा सारदा सर्वकालं/तथापि तव गुणानामीश पारं न याति।।'' अर्थात ''हे शिव, यदि हिमालय की तरह एक कज्जल-वटिका (स्याही की गोली), समुद्र जैसा एक मत्स्याधार (दवात), स्वर्ग के पारिजात वृक्ष की शाखा जैसी कलम और इस सुविस्तीर्ण धरापृष्ठ को कागज के रूप में व्यवहार कर स्वयं विद्यादेवी अनंत काल तक लिखती जाएं फिर भी तुम्हारी गुणावली लिखकर समाप्त नहीं की जा सकती।'' (प्रभात रंजन सरकार, शब्द-चयनिका, तृतीय खंड, पृष्ठ 30)

संस्कृत में पत्नी के लिए 'कलत्र' शब्द भी व्यवहृत है। 'कल' शब्द का अर्थ है ध्वनि और 'कलत्र' शब्द का अर्थ हुआ 'ध्वनि के द्वारा जो त्राण करे'। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द-चयनिका, भाग 3, पृष्ठ 166) पत्नी शारीरिक शक्ति में संभव न हो, वाक युद्ध में शत्रु को पराभूत कर स्वामी को विपन्मुक्त कर सकती है। इसलिए पत्नी को कलत्र कहा गया है। (वही) मजेदार है कि कलत्र शब्द जहां पत्नी के अर्थ में व्यवहृत होता है वहां यह पुल्लिंगवाचक (कलत्र:, नर शब्द की तरह रूप) अथवा स्त्रीलिंगवाचक रूप (कलत्रा, लता की तरह) न होकर क्लीवलिंगवाचक होता है अर्थात शब्द हो जाता है कलत्रम् (फल शब्द की तरह रूप)। 'यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।' भर्तृहरिशतकत्रयम् 2/68; आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 300 में उद्धृत)

 शहरों/नगरों के नामों का भी वे उत्खनन करते हैं किंतु उनके औजार यही शब्द होते हैं। भाषा में शब्दों को पढ़ना आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के लिए भी पुरातत्त्व उत्खनन ही था। सरकार कहते हैं कि उत्तर भारत में बकुल, मौलश्री नाम से सभी परिचित हैं। राढ़ में बकुल फूल को 'बउल' या 'बोल' कहा जाता है। बकुलपुर शब्द से बोलपुर आया है। (तृतीय भाग, पृष्ठ 75) तिरहुत की भी कुछ यही कहानी है। बताते हैं कि राजा मिथि ने विदेह को दखल करके भूमि को पवित्र करने के लिए त्रिहोत्रीय यज्ञ (तीन होताओं द्वारा यज्ञ) किया था और भूमि के पवित्र होने की घोषणा की। त्रिहोत्रीय यज्ञ के द्वारा भूमि के पवित्र होने से त्रिहुत नाम पड़ा। (तृतीय भाग, पृष्ठ 106) पूर्णिया स्थानीय बोलचाल का प्रचलित शब्द पुरैनियाँ का भ्रष्ट अंग्रेजी रूप है। (डी आर पाटिल, द एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार, पृष्ठ 425) इस इलाके में कभी कमल ही कमल हुआ करते थे। अकारण नहीं है कि फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल की नायिका भी कमली है। कमल की समष्टि को कमलिनी कहा जाता है। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, भाग 3, पृष्ठ) कमल को उस क्षेत्र में पुरइन भी कहा जाता है। इसलिए शहर का नाम हुआ पुरैनियाँ। आसपास के गांव के बच्चों के बुझौवल में शहर पुरैनियाँ की याद शेष है-"एक रत्ती चिनगी चिनगल जाए, सहर पुरैनियाँ लूटल जाए?" (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल पेपरबैक्स, 1992, पृष्ठ 86) कुछ लोग बताते हैं कि पूर्णिया शब्द पूर्ण/पूरा और अरण्य से मिलकर बना है। जो हो, शब्द निर्माण की बड़ी ही दिलचस्प यात्रा है।

अर्जुन की पताका में वानरचिह्न रहने से उसका एक नाम 'कपिध्वज' है; उसी प्रकार वानर जिसका रथ चलाता है, इस अर्थ में राम का एक नाम 'कपिरथ' है। (तृतीय भाग, पृष्ठ 115)

'ओड' (ड हल युक्त है) धातु का अर्थ है नजदीक लाना, आदर करना, जकड़कर पकड़ना, सेवा-शुश्रुषा करना आदि। 'उड' (ड हलयुक्त) + रक (क हलयुक्त) ओड्र हुआ। जिस देश में अतिथि का खूब आदर-सत्कार होता है, दूर के लोगों को खींचकर लाया जाता है, उसका नाम है 'ओड्र' देश। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, तृतीय खण्ड, पृष्ठ आठ) इस ओड्र देश संबंधी विषय को औड्र कहा जाता है और वहाँ की भाषा को ओड्री/औड्री कहा जाता है। इस ओड्री/औड्री शब्द से ओड़िया शब्द आया है। ओड्री/औड्री से विवर्तित होकर 'उड़िया' शब्द नहीं आता, ओड़िया आता है। (प्रभात रंजन सरकार, पूर्वोद्धृत)

इंद्र को संस्कृत में उलूक कहते है। (वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, कमल प्रकाशन, पृष्ठ 254; प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, भाग 2, पृष्ठ 73)। इंद्र को यह नाम उनके बड़बोलेपन की वजह से दिया गया है। (प्रभात रंजन, पृष्ठ 74) कुछ लोगों का ख्याल है कि दिन के उजाले में उल्लू बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए अपने अँधेरे कोटर में छिपा रहता है। साथ ही यह सोचकर आत्ममुग्ध भी होता है कि उसके भय से रात में कोई भी वन्य पशु शिकार के लिए निकलने न पाया था। उन बेचारों को अब जाकर मौका मिला है तो उन्हें अवसर का लाभ उठा लेने दो! रात में वे कायर मेरी वीरता के आगे कहाँ ठहर पाते है! यह स्वघोषित वीरता उल्लू को तोष देती है। पुराणों में वीरता के बखान के किस्से इंद्र के भी हैं। (प्रभात रंजन, पृष्ठ 74) पति अगर सम्मानित न हो तो पत्नी भला कैसे सम्मानित बनी रह सकती है। संस्कृत में इंद्र की पत्नी इन्द्राणी के लिए उलूकी शब्द है। उलूकी का अर्थ हुआ उल्लू की तरह बदसूरत! घूम-फिरकर भाषा स्त्री की सूरत पर आ टिकती है। क्या यहाँ भी कोई पितृसत्ता काम कर रही है? नारीवादी चिंतकों को सोचना चाहिए!

माना जाता है कि कठोपनिषद की रचना वैशम्पायन के शिष्य कठ नामक वैदिक ऋषि ने की थी। कठ (ठ हलयुक्त) धातु का अर्थ है कष्ट में रहना, कठिनाई से रहना (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश), सूखकर कड़ा हो जाना, झमेला में रहना, आर्त्तनाद करना, आहत होकर या आहत होने के भय से दौड़ना, हरी घास या गाछ का सूखकर पीला या पुआल हो जाना (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, तृतीय खण्ड, पृष्ठ 46) आदि। कठ से सूखी लकड़ी या पत्थर का भी बोध होता है। कहने की जरूरत नहीं कि उस काल में बहुत से ब्राह्मण दरिद्र और अभावग्रस्त हुआ करते थे। इसलिए कठ से सामान्यतः ब्राह्मण भी समझा जाता है। 'कठी' या 'कठानी' का अर्थ ब्राह्मणी (ब्राह्मणकन्या नहीं) और 'कठा' शब्द का अर्थ ब्राह्मणकन्या है। (प्रभात रंजन सरकार, पूर्वोद्धृत)

वे खाली जगहों को अपनी कहानियों से भरने की कोशिश करते हैं। वैसे भी, भाषाविज्ञान को इन कहानियों/कल्पनाओं की आवश्यकता पड़ती रही है। इससे सरकार की शब्द-यात्रा रोचक भी बनती है। तो अब एक कहानी भी-"पद्म की डंठल या मृणाल में एक प्रकार के कीट होते हैं-विशेषकर वर्षाकाल में। उसी प्रकार के कीट कलम्बी (कलमी, करमी) साग में भी होते हैं। इसीलिए वर्षाकाल में लोग कलम्बी साग नहीं खाते। कुछ लोग तर्क द्वारा समझाने पर भी कई बार समझना-मानना नहीं चाहते। इसलिए डराने के लिए कहा जाता है कि सीधा रथ के दिन से उल्टा रथ के दिन तक जगन्नाथ को ज्वर रहता है। वे कलमी पत्ते पर सोये रहते हैं, इसलिए उस समय कलमी साग नहीं खाना चाहिए। खाने से पाप होता है।" (तृतीय भाग, पृष्ठ 131, पादटिप्पणी)

इस किताब को पढ़ने के बाद अपनी पुरानी धारणा को बल मिला कि धर्म और धर्म-प्रचारकों ने सिर्फ उन्माद ही नहीं फैलाया बल्कि तुलनात्मक भाषाशास्त्र विकसित करते हुए दुनिया की कई भाषाओं का 'पहला व्याकरण' लिखने का गौरव भी हासिल किया। (डैविड क्रिस्टल, 'लिंग्विस्टिक्स', पेंगुइन, रिप्रिंट : 1980, पृष्ठ 45) भारत की बात करें तो मलाबार क्षेत्र में सत्रहवीं सदी के अंतिम चरण से लेकर अठारहवीं सदी के चौथे दशक तक क्रियाशील रहनेवाले जेस्विट पादरी फादर हैंक्सलेडेन ने संस्कृत का एक व्याकरण लिखा जो किसी भी यूरोपीय भाषा में संस्कृत पर लिखा गया पहला व्याकरण है। (द्विजेन्द्र नारायण झा, प्राचीन भारत : सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की पड़ताल, ग्रंथ शिल्पी, प्रथम संस्करण : 2000, पृष्ठ 13) 1767 में सबसे पहले फादर कुर्डो ने संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं के बीच के घनिष्ठ संबंध को पहचाना। (वही) प्रभात रंजन सरकार की 'शब्द-चयनिका' उसी की एक आगे की कड़ी है।

Saturday, October 3, 2026

कवि पत्रिका

विष्णु चंद्र शर्मा ने मासिक पत्र 'कवि' सन 1957 में प्रकाशित करना शुरू किया था। (विष्णु चंद्र शर्मा, 'महापंडित राहुल सांकृत्यायन', आजकल : अप्रैल 2018) 'कवि' सच्ची लघु पत्रिका थी। लघु पत्रिका का आदर्श, एक देशभक्त, जीवन प्रेमी कवि द्वारा सम्पादित-निहायत सीमित साधनों से। विष्णुचंद्र शर्मा की नौकरी नहीं थी। वे तो पढ़ रहे थे। (विश्वनाथ त्रिपाठी, 'बना रहे बनारस', आलोचना, जनवरी-मार्च 2008, पृष्ठ 27) 'कवि' की शुरुआत की कहानी विष्णुचंद्र शर्मा ने खुद लिखी है : "मां तब जीवित थीं। मैंने कुछ रुपये 'कवि' के लिए उनसे मांगे थे। पिता की मौत के बाद वह खुद अपने को असहाय मानने लगी थीं। मुझे याद है उनके पास सोने की एकमात्र करधनी थी जो पिता की जेल यात्रा के समय नानी की प्रति-उत्पन्न मति के कारण बच गई थी। मां ने दूसरे दिन वह करधनी बेच दी थी। उस धन का मां ने चार हिस्सा किया था। एक हिस्से से कवि के कुछ अंक छपे थे।" (विष्णुचंद्र शर्मा, पूर्वोद्धृत)

विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है : "विष्णुचन्द्र शर्मा एक दिन रात को दस बजे गुर्टू हॉस्टेल में मेरे कमरे में आए। तेजी में थे। मेरा उनसे तब तक परिचय तो था लेकिन बस परिचय ही था। तपाक से बोले-तुमने कोई कविता लिखी है ‘परिवार’। नामवर तारीफ कर रहे थे। लाओ कवि निकालने जा रहे हैं, छापेंगे। इतने अधिकार से उन्होंने यह सब कहा कि मैं भाव-विभोर हो गया। कविता छपी। कविता की कुंडली अच्छी थी। अयाचित यश मिला।" (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

‘कवि’ दो आने में मिलता था। इतने कम दाम की कोई पत्रिका न उसके पहले कोई थी न बाद में हुई। पत्रिका की इतनी कम कीमत पर राहुल जी ने भी प्रसन्नता जाहिर की थी। पत्रिका एक फर्मे की थी। सारा काम-पैसा, सामग्री जुटाना, कागज, छपाई, वितरण, प्रूफ-विष्णुचन्द्र शर्मा ही करते थे। नामवर जी उसके हर अंक में लिखते थे। मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र, नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, कीर्ति चौधरी, रघुवीर सहाय विशेष कवि के रूप में प्रस्तुत किए गए। इन पर त्रिलोचन शास्त्री, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, डा. रामअवध द्विवेदी ने लिखा। भवानी प्रसाद मिश्र पर पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना लिखी-देखने में गद्य, पढ़ने में कविता बिल्कुल भवानी प्रसाद मिश्र की शैली में-जैसा बोलता है लिख और उससे भी बड़ा तू दिख।

‘कवि’ में कोई विज्ञापन नहीं छपता था। आज जिनको लघु पत्रिकाएं कहा जाता है उनमें से अधिकांश विज्ञापन बटोरू हैं। ‘कवि’ उन लघु पत्रिकाओं की आदि पत्रिका है जिन्होंने इस देश में ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को निभाया है। विश्वनाथ त्रिपाठी की जानकारी में मुक्तिबोध की लम्बी कविताओं पर ‘कवि’ में पहली बार विचार किया गया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत) विचारक नामवर सिंह थे। रघुवीर सहाय उन दिनों तक नामवर जी के प्रिय कवि हो गए थे। केदारनाथ अग्रवाल की जनवादिता में सौंदर्य के तत्व ढूंढ़ने का उपक्रम केदारनाथ सिंह ने किया।

उन दिनों प्रगतिशील साहित्यकारों के पास शायद ही कोई पत्रिका रही हो। 'कल्पना', 'धर्मयुग', 'ज्ञानोदय' सबको-प्रगतिशीलों को भी छापती थीं। किन्तु उनमें प्रगतिशील एवं वामपंथी विचारधारा का प्रच्छन्न विरोध भी चलता था। शिवदान सिंह चौहान के हाथ से 'आलोचना' निकल गई थी। इस वातावरण में दुअन्नी की काव्य पत्रिका ‘कवि’ ने अपनी गम्भीरता और ताजगी से साहित्यकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि प्रगतिशील आंदोलन में नई जान फूंक दी और आज की लघु पत्रिका की लहर का प्रवर्तन किया। कम पैसे से भी अच्छी साहित्यिक पत्रिका निकाली जा सकती है-इसका रास्ता सुझाया। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

हिंदी के कवियों की नई पीढ़ी ने इसमें विशिष्ट सहयोग दिया। सुखद आश्चर्य यह है कि पुरानी पीढ़ी और विश्वविद्यालय के आचार्यों ने भी इसकी सराहना ही नहीं की, इसमें सकर्मक योगदान किया। 'कवि' पत्र पर विष्णुचंद्र शर्मा को राहुल जी का भी एक उत्साहवर्धक पत्र (20/8/57) प्राप्त हुआ था। तब राहुल हार्न क्लिप, हैपी वैली, मसूरी में थे। पत्र निम्नवत है : 

"प्रिय शर्मा जी, 

'कवि' के पांच अंक मिले। कविताओं को देखकर खुशी हुई ही, साथ ही यह जानकर और भी प्रसन्नता हुई, कि पत्र का मूल्य इतना रखा गया है जिसका भार पाठक आसानी से वहन कर सकता है। हमारी कविताओं के लिए ऐसे एक पत्र की बड़ी आवश्यकता थी। 

मेरी हार्दिक कामना है, कि पत्र दीर्घायु हो। 

आपका

राहुल (आजकल : अप्रैल 2018 में उद्धृत)

‘कवि’ में अनेक नए लोगों को रचनात्मकता की शिक्षा-दीक्षा भी दी। कवि जैसी एक फर्मे की पत्रिका में नेरूदा, जिम हिक्यट, वाल्ट ह्विटमैन, ऑस्कर वाइल्ड आदि कवियों के उत्कृष्ट काव्यानुवाद प्रकाशित हुए। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत)

'कवि' के केवल 11 अंक निकले। अन्तिम अंक संयुक्तांक था। (विश्वनाथ त्रिपाठी, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 28)

Thursday, October 1, 2026

मास-मास 'बालक' प्रसव

1926 ई. में बच्चों की सचित्र मासिक पत्रिका ‘बालक’, ‘पुस्तक भंडार’ के रामलोचनशरण द्वारा लहेरियासराय से शुरू की गई। बाद में इसका प्रकाशन पटना से होने लगा। इसके संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे। 1927 के ‘गया साहित्य सम्मेलन’ में ‘वियोगी’ ने बेनीपुरी पर व्यंग्य करते हुए एक कविता सुनाई थी : ‘मास-मास बालक प्रसव’। पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी ही का नाम छपता रहा। ‘बालक’ की परिकल्पना में भी  इनकी भागीदारी थी, इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’ बाद में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। प्रवेशांक के समय बाबू शिवपूजन सहाय कलकत्ता के ‘समन्वय’ में कार्यरत थे, इसलिए इसके आरंभिक दो अंक उन्हीं के संपादन व देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में नाम रामलोचनशरण बिहारी का जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में  ‘विद्यापति प्रेस’ स्थापित किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण इसी प्रेस में होने लगा। 

रामलोचनशरण द्वारा संपादित ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ जिसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापतिं तथा पांच स्वागताध्य के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में ‘बालक’ का विज्ञापन छपा था जिसमें कहा गया कि ‘‘सोलह स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चैथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चैदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। इस तरक ‘बालक’ ने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इससे बच्चों की न केवल भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ बल्कि उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की भी वृद्धि हुई। 

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक-साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था। दिनकर, प्रभात, आरसी, हंसकुमार तिवारी, नेपाली आदि की काव्य-प्रतिभा ‘बालक’ के पृष्ठों में ही पल्लवित हुई। नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ बेनीपुरी ने ‘बालक’ में छापी थी। संभवतः 1926-27 की बात थी, जब नेपाली 15-16 की उम्र में तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे। उक्त कविता बेतिया मिडिल स्कूल के एक शिक्षक ने अपने पत्र के साथ रामलोचनशरण के पास प्रकाशनार्थ भेजी थी। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की पत्रिका के अनुसार नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी कही जाती है जो सही नहीं है। 1927 ई. में आरसीप्रसाद सिंह की कहानी ‘आम का पेड़’ ‘बालक’ में प्रकाशित हुई थी। 1928 के दिनों में नलिनजी की बहन कुमुद्वती ‘बालक’ के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। स्वयं नलिनजी की कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। बेनीपुरी ने प्रवेशांक में मुजफ्फरपुर के बाबू लंगटसिंह की सचित्र जीवनी प्रकाशित की थी। ‘बालक’ की समालोचना करते हुए काशी के दैनिक ‘आज’ ने उस जीवनी के विषय में लिखा था-‘‘वह कौन हैं ?’-शीर्षक के अंदर अपने ही पुरुषार्थ के बल पर अतिसाधारण उन्नति करनेवाले बिहार के स्व. श्री लंगटसिंह का चरित्र दिया गया है। संभवतः आगे भी इस स्तंभ में ऐसे ही स्वदेशीय पुरुषों के जीवन प्रकाशित किए जाएंगे। बालकों के चरित्र गठन पर ऐसे चरित्रों का निश्चय ही कल्याणकारी प्रभाव पड़ेगा।’’

‘बालक’ के विशेषांक संग्रहणीय होते थे। ‘एण्ड्रूज अंक’ तथा भारतेन्दु की अर्द्ध-शताब्दी पर निकला अंक विशेष आकर्षक था। मई, 1935 में सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर ‘बालक’ का ‘रजत जयन्ती अंक’ निकला था। अपनी साज-सज्जा में यह ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव के अवसर पर भी ‘बालक’ के द्वारा राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण प्रकाशित किया गया था। पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी ‘बालक’ के विशेषांक के रूप में ‘शोक-प्रकाश’ प्रकाशित हुआ था। 

48 पृष्ठ के बालक का वार्षिक मूल्य 3 रुपयेे था। सन् 1969 ई. में इसकी प्रसार संख्या 22,000 थी जो किसी भी साप्ताहिक या मासिक से ज्यादा थी। तत्कालीन सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने ‘बालक’ की तुलना सर्वश्रेष्ठ बंगला बाल मासिक ‘संदेश’ से की तो अन्यों ने उसे मराठी बाल पत्रिका ‘सुमन’ से बेहतर कहा।

Friday, September 25, 2026

रामलोचन शरण बिहारी एवं बालक की पत्रकारिता

पुस्तक भंडार, लहेरियासराय के मालिक रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) का बाल साहित्य की रचना और प्रकाशन में वही स्थान है जो गुजराती भाषा में आचार्य गिजूभाई को प्राप्त है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ-502) यूनेस्को से जो शिक्षा-सम्बंधी सूचना प्रकाशित हुई थी, उसमें चौदह पुस्तकों के बीच आपकी भी एक पुस्तक की चर्चा है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502, पाद टिप्पणी संख्या-2) बाल शिक्षा साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘मनोहर पोथी’ आप ही की रचना है। आपने बिहार में पढ़ाई जानेवाली प्रायः सभी कक्षाओं की पुस्तकों का मुद्रण एवं प्रकाशन किया। 

‘बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार है’, इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर रामलोचन शरण बिहारी ने सन् 1926 ई. से ‘बालक’ सचित्र मासिक का प्रकाशन शुरू किया। कहना न होगा कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने निराला को पत्र (16. 2. 28) लिखने के लिए अपने जिस पैड का इस्तेमाल किया है, उस पर ‘बालक’ सचित्र मासिक छपा है। (रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 12)

'बालक' के आरंभिक संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे, बाद के दिनों में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। (एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ-76) ‘बालक’ के प्रवेशांक को वणिक प्रेस, कलकत्ता में मुद्रित कराया गया। तब वहीं ‘समन्वय’ में बाबू शिवपूजन सहाय कार्यरत थे। इसके आरंभिक दो अंक शिवपूजन सहाय द्वारा ही संपादित होकर उन्हीं की देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। शिवजी को लिखे बेनीपुरी के पत्रों से ज्ञात होता है कि संपादन का सारा भार बेनीपुरी जी ने शिवजी पर छोड़ दिया था। यद्यपि पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी का नाम ही छपता रहा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 96) 1926 से 28 तक बेनीपुरी जी, 'बालक' के प्रधान संपादक रहे। बालक की परिकल्पना में रामवृक्ष बेनीपुरी का बराबर की भागीदारी थी इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’

तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा, क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में रामलोचनशरण बिहारी का नाम जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। शांतिप्रिय द्विवेदी ने निराला को पत्र (11. 6. 1928) में वर्णित किया कि बेनीपुरी ने ‘बालक’ और लहेरियासराय को छोड़ दिया। अब शिवपूजन जी एकच्छत्र सम्राट हैं। (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 137-38 में उद्धृत) इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। विनोदशंकर व्यास ने निराला को पत्र (15. 7. 27) लिखा, ‘‘शिवजी को अपने कार्य से छुट्टी नहीं मिलती, वह ‘बालक’ में ही व्यस्त रहते हैं।’’ (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ में उद्धृत।) संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में एक प्रेस खोला, जिसका नामकरण ‘विद्यापति प्रेस’ किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण विद्यापति प्रेस, लहेरियासराय में ही होने लगा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96)

रामलोचनशरण बिहारी के संपादन में ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत हिन्दी-पुस्तक-भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) से 1926 ई. (संवत् 1983 वि.) में ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ था। इसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापति (पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, बाबू शिवनन्दन सहाय, पंडित सकलनारायण पाण्डेय एवं पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र) तथा पांच स्वागताध्यक्षों के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में बालक पत्रिका (वार्षिक मूल्य 3 रुपये, प्रति मास 48 पृष्ठ और 30-32 चित्र) का विज्ञापन (नमूना) छपा था-‘‘आजतक हिन्दी में जितने बालोपयोगी पत्र निकल चुके हैं या निकलते हैं, उनसे इसमें अनेक विशेषताएं हैं। बंगला, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी आदि उन्नत भाषाओं के बालोपयोगी पत्रों के सामने रखने योग्य अभी तक इसके सिवा कोई पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी में नहीं निकला। इसके अन्दर बालकों की ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन के सभी प्रकार के साधन उपस्थित हैं। इसमें 16 स्थायी सचित्र शीर्षक हैं, जिनमें विविध शिक्षाप्रद सामयिक विषयों के समावेश किया गया है, जिनसे प्रति मास बालकों को भिन्न-भिन्न भांति की लाभदायक बातें मालूम हो जाती हैं। छपाई, सफाई, शुद्धता और सुन्दरता तथा भाषा की सरलता और विषयों के चुनाव पर इतना काफी ध्यान दिया जाता है कि इसका नियमित रूप से पढ़नेवाला बालक थोड़े ही दिनों में विविध उपयोगी ज्ञानों का भण्डार बन जायगा। ‘विज्ञान’, ‘बहादुरी की बातें’, ‘केसर की क्यारी’, ‘जीवजन्तु’, ‘इतिहास’, ‘अनोखी दुनिया’, ‘वह कौन है?’, ‘बुढ़िया की कहानी’, ‘पँचमेल मिठाई’, ‘पूछताछ’, ‘भला-चंगा’, ‘हँसी-खुसी’, ‘कहाँ और क्या’, ‘बालक की बैठक’, ‘बालचर’ और ‘संपादक की झोली’-इन 16 स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चौथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चौदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। उक्त सभी विषयों के समावेश के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि ऐसी एक बात भी न हो जिससे बालकों का वास्तविक हित न हो। यही कारण है कि सभी पत्रों और विद्वानों ने मुक्त कंठ से इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यदि आप अपने बालकों का सच्चा कल्याण चाहते हैं, उनके जीवन को मंगल और आनन्द से भरपूर बनाना चाहते हैं, तो इस ‘बालक’ द्वारा उनके ज्ञान का खजाना भरिये।’’ 

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96) जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा, उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं: ‘आयरलैंड के प्रसिद्ध नेता डी. वेलरा का स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रखी जाय और दूसरी ओर मातृभाषा, तो मैं मातृभाषा को लूँगा क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूँगा।’ (मंगलमूर्ति, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 97 में उद्धृत)

हिन्दी का कोई भी छोटा-बड़ा ऐसा लेखक नहीं था जिसकी रचनाएँ बालक में न छपती थीं। रामधारी सिंह दिनकर, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', आरसीप्रसाद सिंह, हंसकुमार तिवारी, गोपाल सिंह 'नेपाली' आदि की काव्य-प्रतिभा 'बालक' ही के पृष्ठों में पल्लवित हुई। राष्ट्रीय स्तर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी हिन्दी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोपाल सिंह नेपाली की पहली कविता रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में ही ‘बालक’ पत्रिका में छपी थी। शीर्षक की पंक्ति थी ‘भारत गगन के जगमग सितारे’। यह संभवतः 1926-27 की बात थी, और उस समय नेपाली तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे-उम्र कोई 15-16 वर्ष रही होगी। (सुरेश सलिल, कुछ गूंज हुई, कुछ गीत गए, आजकल: नवंबर 2011) राष्ट्रभाषा परिषद् की ‘परिषद पत्रिका’ (वर्ष 38, अंक 1-4, मार्च 2000, पृष्ठ 31) के अनुसार गोपाल सिंह नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी बतायी जाती है जो सही नहीं है। आरसी प्रसाद सिंह का 'आम का पेड़' 'बालक' में 1927 में प्रकाशित हुआ था। (हिन्दी सेवी संसार, पृष्ठ 13) 1928 के दिनों में नलिनविलोचन शर्मा की बहन कुमुद्वती 'बालक' के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। नलिन जी की भी समय-समय पर कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। (नलिन स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 28)

‘बालक’ ने स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बाल सामग्री की प्रस्तुति में एक प्रतिमान उपस्थित किया। सन् 1969 ई. में ‘बालक’ की प्रसार संख्या 22,000 थी। (यह आंकड़ा प्रेस इन इंडिया (1968-69), मिनिस्ट्री ऑफ इनफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली से लिया गया है।) किसी भी साप्ताहिक या मासिक में सबसे ज्यादा इसी की बिक्री थी। (रामजी मिश्र ‘मनोहर’, बिहार में हिन्दी-पत्रकारिता का विकास, काशी प्रसाद जायसवाल शोध-संस्थान, पटना, 1998, पृष्ठ 135) इससे बिहार में सुरुचिपूर्ण बाल पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। इन्होंने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले लुभावने एवं आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इनका महत्तम योगदान यह है कि इनसे बच्चों में साहित्यिक रुचि का विकास हुआ, उनकी भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ तथा उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की आशातीत वृद्धि हुई।

स्वतंत्रता से पहले रामलोचन शरण बिहारी की भूमिका अंग्रेजपरस्त की रही। मई, 1935 में जब सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती मनाई गई थी,  उन्होंने न केवल बहुत उत्साह के साथ उसमें योग दिया था बल्कि ‘बालक’ का रजत जयन्ती अंक बहुत सुन्दर निकाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी साज-सज्जा में यह जनवरी, 1935 के अपने ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव में भी आपने उसी उत्साह से सेवा की थी। उस अवसर पर भी बालक के द्वारा आपने राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया था। सम्राट पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी आपका शोक-प्रकाश 'बालक' के विशेषांक में प्रकट हुआ था। (जयन्ती-स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 712) सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘कॉरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502)

Monday, September 21, 2026

अपने अपने कुरुक्षेत्र

प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन बहुत ही सावधानी और होशियारी के साथ करने की जरुरत है। कारण कि हमारे अधिकतर ग्रंथ एक समय में और एक व्यक्ति के द्वारा नहीं लिखे गये हैं। महाभारत को 'जय', 'भारत' और 'महाभारत'-तीन चरणों में लिखे जाने की बात पर अधिकतर इतिहासकार एकमत हैं। कई चरणों में लिखे जाने का मतलब होता है कई युगों की कहानियों और घटनाओं को समेटते चलना। प्राचीन ग्रंथों की यह परिस्थितिजन्य विशेषता है। 'महाभारत' के बारे में तो लेखक का स्पष्ट दावा भी है कि 'अबतक का सारा ज्ञान इसमें निबद्ध है, और जो कुछ इसमें नहीं है, वह ज्ञान ही नहीं है।' लेखक की इस 'वीर-घोषणा' से न सिर्फ 'महाभारत' की ऐतिहासिक महत्ता का बोध होता है बल्कि इस बात का भी सहज अनुमान हो जाता है कि लेखक अपने समय में उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान को एक ही जगह ठूंस-ठांसकर संकलित कर देना चाहता है। इस तरह के उद्देश्य/दावा वाले ग्रन्थों के संपादन के लिए असीम धैर्य और अवकाश की आवश्यकता थी जिसका इन ग्रंथकारों के पास सख्त अभाव दिखता है। उनकी इस 'हड़बड़ी' का कारण वाचिक परंपरा से जन्मा होगा। इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि 'महाभारत' में वे तमाम तरह के किस्से आ गये हैं जिनका मूलकथा से कोई संबंध नहीं है। कई बार ये किस्से परस्परविरोधी भी हैं। उनमें आंतरिक संगति का भी अभाव परिलक्षित है।

कहने की जरुरत नहीं कि महाभारत का लेखन और पुनर्लेखन आज इक्कीसवीं शती में भी जारी है। धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा और नरेन्द्र कोहली से लेकर मीनाक्षी नटराजन तक ने अपने-अपने समय में कुछ-कुछ जोड़ने-घटाने की कोशिश की है। और बात है कि कला माध्यमों का फर्क रहा है। किसी ने कहानी, उपन्यास और नाटकों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की तो किसी ने फिल्म/धारावाहिक के माध्यम से। किन्तु कहना होगा कि अधिकतर विद्वानों ने पितृसत्ता के बने-बनाये दृष्टिकोण से ही कथा का पुनर्लेखन किया है। मीनाक्षी नटराजन ने 'सामयिक प्रकाशन' से छपी अपनी पुस्तक 'अपने अपने कुरुक्षेत्र' में इतिहास लेखन के क्षेत्र में व्याप्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह चुनौती इतिहास को 'नयी आँख' से देखने की वजह से मिल रही है। यह 'नयी आँख' स्त्री विमर्श की अथवा स्त्री जाति की है जिसकी स्पष्ट मान्यता रही है कि अबतक का इतिहास 'पुरुषों का' और 'पुरुषों के द्वारा' लिखा गया इतिहास है। अर्थात अगर इतिहास को 'स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला' मानें तो कहना होगा कि ये फैसले उन न्यायाधीशों के हैं जो इतिहास के अपराधी भी रहे हैं। इसलिए यह इतिहास विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो सकता। अविश्वसनीयता का कारण है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मूल्य और मापदंड अलग-अलग हैं। बात अगर महाभारत से शुरू करें तो जैसाकि चित्रा मुद्गल ने लिखा है, महाभारत की कथा उनलोगों ने लिखी है जो यह मानते रहे थे कि 'कौमार्य भंग स्त्री उनकी स्त्री नहीं हो सकती, किन्तु वह स्वयं की यौनेच्छाओं को मर्यादित करने के लिए बाध्य नहीं' थे। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 10) इसलिए मीनाक्षी नटराजन ने महाभारत की कथा और खासकर स्त्री पात्रों-यथा गांधारी, कुंती, शिखंडी, द्रौपदी आदि को 'स्त्री की आँख' से देखने की कोशिश की है। बार-बार भीष्म को झिड़की देती हुई कि उन्होंने कभी स्त्री के मन को पढ़ने-समझने की कोशिश नहीं की।

महाभारत युद्ध की कथा निजी परिवार, निजी संपत्ति और राज्य के उदय तथा उसके सुदृढ़ीकरण से उत्पन्न अंतर्विरोधों की कथा है। प्राचीन भारत में भूमि पर निजी मालिकाना हक स्थापित किये बगैर निजी संपत्ति की अवधारणा को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करना असंभव था। द्रौपदी का पांच पतियों के साथ ब्याहा जाना, जो एक प्रक्षिप्त कथा का हिस्सा है, बहुपति विवाह की याद भर है। यह प्रथा कभी सुदूर अतीत में जब निजी संपत्ति का इस हद तक विकास नहीं हुआ होगा, अस्तित्व में रही होगी।

मीनाक्षी नटराजन की किताब का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने महाभारत की समस्या को 'स्त्री आँख' से पढ़ने की कोशिश की है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने इतिहास बोध से कभी किनारा नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उचित ही इतिहास बोध को 'तीसरी आँख' कहते थे। इस 'तीसरी आँख' से देखे बगैर महाभारत की कथा का सम्यक पाठ असम्भव है क्योंकि यह अपनी काया में तो विशाल है ही, इतिहास की अनगिनत प्रवृत्तियों और परंपराओं को भी एक साथ लिये चलती है। अर्थात महाभारत में बहुपति विवाह के साथ-साथ बहुपत्नी विवाह की भी कथा है। अतः महाभारत की कथा की स्पष्ट समझ के लिए हमें वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का भी ध्यान रखना होगा। मीनाक्षी नटराजन ने हमें ठीक ही ध्यान दिलाया है कि महाभारतकालीन समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ परंपराओं और मान्यताओं की अजीब टक्कर है। यहीं इतिहास बोध रूपी तीसरी आँख की आवश्यकता पड़ती है यह देखने के लिए कि कौन-सी मान्यता जीवित रहनेवाली है और कौन-सी दम तोड़नेवाली।

महाभारत में जो कभी-कभी यौन स्वछंदता की प्रवृत्ति दिखती है उसकी भी एक परंपरा है। देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57) ब्रह्मा-सरस्वती का यौन सम्बंध किसी प्राचीन समाज में पिता-पुत्री का 'वैध' यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68) प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ व्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) किन्तु शादी के पहले की यौन क्रिया संबंधी अपनी 'भूल' को कुंती आजीवन अपने पति पाण्डु के समक्ष स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मीनाक्षी नटराजन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य और मापदंड निर्धारित है।

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

मीनाक्षी नटराजन की पुस्तक की नवीनता और अद्वितीयता इस बात में है कि वह ऐतिहासिक संदर्भ में इतिहास बोध के साथ कथा को समझती है। गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि के स्त्री मन की पीड़ा को समझती है। मीनाक्षी की द्रौपदी पर बहुपतित्व कुन्ती के द्वारा थोपा हुआ फैसला नहीं था बल्कि स्वयं द्रौपदी का लिया निर्णय था। इतना ही नहीं, सभी पतियों के लिए बहुविवाह की व्यवस्था देना भी द्रौपदी ही का निर्णय था। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 143) दरअसल, द्रौपदी का प्रस्ताव था कि वह बारी-बारी प्रत्येक पांडव की पत्नी के रूप में एक-वर्ष का समय व्यतीत करेगी। उस एक वर्ष में अन्य पांडव बंधुओं के प्रति उसका व्यवहार पत्नी का नहीं होगा। इस व्यवस्था में प्रत्येक पाण्डव बंधु को द्रौपदी के संग के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी ही पड़ती। अतः उनका बहुविवाह आवश्यक था। (वही, पृष्ठ 145) 

यह महाभारत की कथा का स्त्री पाठ है। पुस्तक में प्रवाह और अद्भुत रोचकता है। एक सांस में पढ़ी जा सकने वाली दृष्टिसम्पन्न किताब है। इसे पढ़ना समृद्ध होना है। जहाँ तक भाषा की बात है, एकाध स्थल को छोड़ दें तो पुस्तक में अशुध्दियों की कमी खलती है!