Sunday, September 20, 2026

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की 'श्रेष्ठ कहानियां'

अबतक मैंने पांडेय बेचन शर्मा उग्र को नहीं पढ़ा था। एकाध कहानी कहीं से पढ़ लेना पढ़ना नहीं हो सकता। 'आत्माराम एंड संस' ने दो खंडों में इनकी कहानियां छापी हैं। ये उग्र की नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। इनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। समाज और व्यक्ति समान रूप से हमला झेलते हैं। अभी कुछ ही कहानियां पढ़ सका हूँ। पढ़ते लगा कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र आर्य समाज आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित कथाकार लगते हैं। उनका अतिरिक्त भारतीयता-बोध भी गाहे-बगाहे सिर उचका देता है। उनकी एक कहानी है 'कम्यूनिस्ट दरवाज़े पर'। यह व्यंग्यप्रधान आत्म-संस्मरणात्मक कहानी है। अफसोस कि व्यंग्य की अपनी सारी ताकत उन्होंने कम्यूनिस्ट पात्र का मजाक उड़ाने में खर्च कर दी है। एक स्थल पर लिखा है, 'रुपये-पैसे की झंकार के सामने काले चश्मेवाले कम्यूनिस्ट की क्रूर माया फट गई।' (पांडेय बेचन शर्मा उग्र, श्रेष्ठ रचनाएं, भाग 1, पृष्ठ 248) कहानीकार का यह कहना कि 'कम्यूनिस्ट रूस से नहीं आता, काले बुखार की तरह देश-देश में वह स्वयं पैदा हो जाता है', (पृष्ठ 246) स्वतंत्र कथन के रूप में तो सही है, लेकिन गलत है जब इस आधारवाक्य के पीछे भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को 'आयातित' कहने की 'कूटनीति' हो। कहानी के अंत में लेखक ने कम्यूनिस्ट को कहा, 'आप गधे हैं, रूसी खूंटे से बंधे।' (वही, पृष्ठ 249) दूसरी ओर कम्यूनिस्ट की एक नई प्रजाति अर्थात 'सनातनी कम्यूनिस्ट' की खोज लेखक करता है जिसका वह स्वयं प्रतिनिधि है। इस 'सनातनी कम्यूनिस्ट' का कर्तव्य है, 'गरीब और अमीर दोनों की रक्षा, सबका भला।' (वही, पृष्ठ 248)

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)

Saturday, September 19, 2026

किसी वरिष्ठ से नहीं लिखवाया किताब का 'आमुख'

मैं दसवीं जमात का विद्यार्थी था। हिन्दी की किताब में जगदीशचंद्र माथुर का एक रेखाचित्र पढ़ना था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। और यह 'जन्मजात चक्रवर्ती' कोई और नहीं श्री सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके बारे में लिखा था कि उन्हें नित नयी-नयी किताब पढ़ने और लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का शौक था। उनकी किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां  हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। 

इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। 1893 का वर्ष सच्चिदानंद सिन्हा का पढ़ाई समाप्त कर विलायत से लौटने का है। लौटते-लौटते उनके पास बंगाल से बिहार को अलग करने अथवा बिहार को स्वतंत्र प्रान्त का दर्जा दिलाने की बात एक ठोस शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। इसके लिए अखबार की जरूरत थी। इसलिए 1893 में एक अंग्रेजी अखबार शुरू करने हेतु बिहार के कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों की मीटिंग आयोजित की गई। उक्त सभा में अखबार का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित हुआ किन्तु अंततः 'बिहार टाइम्स' के नाम से 1894 में  महेश नारायण के संपादन में शुरू हो गया। (रामजी मिश्र 'मनोहर' की किताब 'बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास' के 27वें पृष्ठ पर इसका प्रकाशन वर्ष भूलवश 1884 छप गया है।) और बात है कि 1906 में इसका नाम बदलकर बिहारी हो गया। सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेश नारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेश नारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि का चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता है कि 'बिहार टाइम्स' के महेश नारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेश नारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी यह शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचन शरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक-भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) के पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

एक सामान्य पाठक यही जानता है कि पटने की खुदा बख्श लाइब्रेरी खुदा बख्श के द्वारा अर्जित-उपार्जित किताबों-पांडुलिपियों की लाइब्रेरी है किन्तु हकीकत है कि इस संग्रह की अधिकतर किताबें और पांडुलिपियां उनके पिता द्वारा उपार्जित थीं। खुदा बख्श साहब ने मृत्युशैया पर पड़े पिता से वादा किया था कि उनकी किताबों और पांडुलिपियों की हिफाजत के लिए वह लाइब्रेरी खड़ा करेगा। तभी 80,000 रुपये की लागत से लाइब्रेरी का भवन निर्मित कराया गया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि किताब दिलचस्प और ऐतिहासिक महत्त्व की है।

आज किताब का ब्लर्ब या आमुख किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का आमुख अमरनाथ झा से लिखवाया था। अमरनाथ झा के पिता सर गंगनाथ झा और सिन्हा साहब दोनों गहरे मित्र थे।

कमलाप्रसाद वर्मा की 'भूलती भागती यादें'

बिहार के पहले हिंदी अखबार 'बिहार बंधु' के संपादक रहे कमला प्रसाद वर्मा जी की आज पुण्यतिथि है। 1912 ईस्वी में 'बिहार बंधु' का संपादन कमला प्रसाद वर्मा (मुख्तार, पटना सिटी) करने लगे। आप दिन में पटना सिटी कोर्ट में मुख्तारी करते, रात में बांकीपुर जाकर पत्र का संपादन। इस कार्य हेतु आपको 50 रुपये मासिक वेतन तथा 10 रुपये मासिक भत्ता मिला करता। जलपान का खर्च और मार्गव्यय अलग से। मुख्तार साहब के बाद कुछ दिनों तक बल्लभ सम्प्रदाय के गोस्वामी जी को पत्र का संपादक बनाया गया। आशा थी कि उनके चेले और अनुयायी अखबार की मांग बढ़ाने में मदद करेंगे किन्तु ग्राहक संख्या बढ़ने की अपेक्षा बहुत घट गयी। इसी बीच अंग्रेज महिलाओं के संबंध में कुछ अपमानजनक समाचार छप गया। कमिश्नर ओल्ढम आगबबूला हो गये। संपादक की बुलाहट हुई। गोस्वामी जी चंपत हो गये। अतएव अनुरोधवश मुख्तार साहब को पुनः संपादन का भार स्वीकार करना पड़ा। आचार्य शिवपूजन सहाय ने 19 जनवरी, 1961 ई. की अपनी एक टिप्पणी में ठीक ही लिखा है कि मुख्तार साहब ने 'बिहार बन्धु' का दो बार संपादन किया था । 

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी 'हिन्दी साहित्य और बिहार' (तृतीय खंड) में  'भूलती भागती यादें' (1951 में प्रकाशित) से एक उद्धरण है जिसमें कहा गया है कि "सन 1872 ईस्वी में बिहार बन्धु का जन्म कलकत्ते में, स्वर्गीय पं. बालकृष्ण भट्ट के निरीक्षण में हुआ था। इसमें पं. केशवराम भट्ट का बड़ा हाथ था। ये दोनों महाराष्ट्री ब्राह्मण थे और इनके पूर्वज 'बिहारशरीफ' में आ बसे थे।" (पृष्ठ 169) अब यह निर्विवाद है कि 'बिहार बन्धु' 1872 में नहीं बल्कि 1873 में शुरू हुआ। दूसरी बात कि बालकृष्ण भट्ट की जगह मदनमोहन भट्ट लिखा जाना चाहिए था। ये दोनों सगे भाई थे और महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे जो व्यापार के सिलसिले में 'बिहारशरीफ' आकर बस गये थे। 'बिहार बन्धु' की स्थापना इन्हीं मदनमोहन भट्ट की देखरेख में हुई थी। जहांतक बालकृष्ण भट्ट की बात है, उनके पूर्वज मालवा के ब्राह्मण थे और झाँसी के निकट आकर बसे थे। बालकृष्ण भट्ट, मालवीय जी के रिश्तेदार थे और जो 'हिन्दी प्रदीप' के संपादक हुए।

हिन्दुस्तानी कहावत-कोश और फैलन का भाषा बोध

बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था : ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251) 

भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)                                                                                                                                                                    पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है-It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in  Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212) 

इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला : ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह  पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।

एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!

कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)

कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।

वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है, तब जन ही धन था।

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)

मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)

दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)

'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)

'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)

कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)

पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय

कर्मेंदु शिशिर की एक किताब है-'पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय'। इस किताब में उन्होंने पुस्तक-भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी को 'खुर्राट व्यवसायी' तथा बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय को 'दुधारू गाय' कहा है। आगे यह भी लिखा कि पाठ्यपुस्तकों के 'व्यवसाय की सफलता से उनकी आंखों पर मोटी परत चढ़ गई'। (पृष्ठ 53) शिशिर जी एक 'लेखक' को 'व्यवसायी' किस कुण्ठा में लिख रहे हैं वे ही जानें!

'जयन्ती स्मारक ग्रन्थ' में उस समय के लगभग तमाम लेखकों के संस्मरण प्रकाशित हैं। कथित दुधारू गायों के संस्मरण भी हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि वे बेरोजगार थे और बहन की शादी की चिंता सिर पर थी। उन्होंने जिन दो लोगों को पत्र लिखे उनमें एक पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचन शरण बिहारी भी थे। रामलोचन जी ने बेनीपुरी को पुस्तक भंडार आने का न्योता लिख भेजा। काम भी मिल गया। कुछ माह बाद उन्होंने बेनीपुरी को बहन की शादी की याद दिलायी तो उन्होंने अपर्याप्त बचत की बात कही। रामलोचन जी ने उन्हें एक नई साइकिल दी और कहा कि जाइए और अपने गांव के आसपास किसी लड़के को देखिए। शादी हो गई। लड़का बेनीपुरी जी खोजा और खर्च का भार बिहारी जी ने उठाया। बेनीपुरी जी के अतिरिक्त कलक्टर सिंह केसरी, दिनकर आदि ने भी आर्थिक मदद की बात स्वीकारी है।

'व्यवसाय' की 'सफलता' के पीछे रामलोचनशरण बिहारी का श्रम और साधन था। तब 'बालक' पत्रिका निकालने की बात थी। उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका से अंग्रेजी के कई बालोपयोगी मासिक पत्र और वार्षिक पुस्तकें (इयर-बुक) मंगाई थी। बंगला, गुजराती, मराठी और उर्दू के प्रमुख बालोपयोगी पत्र भी मंगाये। बच्चों के लिए अंग्रेजी की प्रसिद्ध 'बुक-ऑफ नॉलेज' जैसी ग्रंथ-मालाएँ भी मंगाई। रामवृक्ष बेनीपुरी को कलकत्ता भेजकर वहां से मैकमिलन, न्यूमैन, बैंकर आदि अंग्रेजी कंपनियों की दूकानों से हजार रुपये की बालोपयोगी पुस्तकें भी मंगवाई। उन सबके अध्ययन और परीक्षण के बाद ही 'बालक' के लिए उपयुक्त विषयों एवं शीर्षकों का चुनाव तथा निर्धारण किया। 'बालक' का कवर आदि का डिजाइन बाबू शिवपूजन सहाय के परामर्श पर तत्कालीन प्रख्यात चित्रकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा से तैयार कराया गया था। 

इन सबके पीछे रामलोचनशरण जी ने पानी की तरह पैसा बहाया था। वर्मा जी से मास्टर साहब की भेंट 1929 में कलकत्ते में हुई थी। इसी साल वर्मा जी इंग्लैंड जाने के सिलसिले में पुस्तक भंडार आये थे। मास्टर साहब ने उन्हें एक हजार रुपये दिये थे। जबतक वर्माजी इंग्लैंड में रहे, तबतक उनके घर 50 रुपये माहवार 'भंडार' से निर्बाध जाता रहा। इंग्लैंड से भी वर्मा जी की मांग पर 600 रुपये अतिरिक्त भेजे गये थे। दुर्भाग्य कि स्वदेश लौटने के बाद वर्मा जी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके।

जानकीदेवी : मेरी जीवन-यात्रा

गाँधीजी के पांचवें पुत्र जमनालाल बजाज की पत्नी जानकीदेवी बजाज हैं। उनकी आत्मकथा है 'मेरी जीवन-यात्रा'। इस किताब की प्रस्तावना लिखी है आचार्य विनोबा ने। पहली बार यह 1956 में सस्ता साहित्य मंडल की पहल पर सत्साहित्य प्रकाशन से छ्पी। इस किताब को पढ़ते हुए अपना पुराना विश्वास दृढ़तर हुआ कि स्त्रियों को पढ़े बगैर किसी भी समाज का सच्चा और प्रामाणिक इतिहास लिखा जाना असम्भव है। कल्पना के घोड़े दौड़ाना और बात है।

जानकीदेवी का परिवार धार्मिक शिक्षा और संस्कारों का परिवार था जैसे गांधी का परिवार था। इसे आप औसत भारतीय परिवार का संस्कार भी कह सकते हैं। अल्पवय में शादी हुई। पति को लगभग परमेश्वर माननेवाली पत्नी साबित होने की साध थी। तब की औरतें शादी के बाद 'पतिसेवा' नामक किताब पढ़ती थीं। जानकीदेवी को भी दी गई। एक-एक अक्षर को अपने जीवन में उतारने की चाह लिए किताब पढ़ती रही। पति की थाली का उच्छिष्ट भोजन खाने लगी। पातिव्रत्य में कुछ कमी रह गई तो पादोदक/चरणोदक भी लेने लगी। जमनालाल बजाज अगर कभी जेल जाते तो अतिरिक्त मात्रा में चरणोदक की पहले ही से व्यवस्था करके रख लेती। बीच में अगर मिलने जेल भी जाती तो झट चरणोदक का प्रबंध कर लेती। लेकिन जैसे-जैसे जमनालाल जी की राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता बढ़ती गई जानकीदेवी के लिए परंपरा का निर्वाह मुश्किल होता गया। सात परदों के भीतर रहनेवाली महिला ने जब खादी की मोटी साड़ी धारण की तो पर्दा करना असंभव हो गया। आगे कुछ भी दिखना बंद हो गया। बापू के सामने समस्या रखी तो विनोदी महात्मा ने मजाक में कहा कि आंखों के आगे जाली लगा लो। फैसला हुआ कि पर्दा न किया जाये। 

परंपरा में पति का नाम लेना भी पाप माना जाता था किंतु सामाजिक जीवन जीनेवाली जानकीदेवी से यह अभ्यास भी धीरे-धीरे छूटता गया। कुछ दिनों तक तो 'सेठजी' का सहारा रहा किन्तु अंततः जमनालाल जी पर आकर टिकी। पति का नाम लेना तब 'पाप' था। जानकीदेवी ने इसे अब 'पुण्य' बना दिया था।

जानकीदेवी के मारवाड़ी समाज में गहनों का भी चाव था। पैर में चांदी की कड़ी जैसी कोई चीज पहनने का रिवाज था। धार्मिक मान्यता थी कि वह श्मशान तक साथ जाती है। राजस्थानी परिवार-समाज की गरीब से गरीब औरतें भी इसे पहनना अनिवार्य मानती थीं। और भी कई गहने थे जो पति के जीवन की गारंटी सदृश थे। बापू ने यह सब छुड़वा दिया। और यह सब लाखों-करोड़ों औरतों के साथ हुआ। 

मैं समझता था कि गाँधी के आगमन के बाद राजनीति और समाज में धर्म और अंधविश्वास का बोलबाला बढ़ा है, किन्तु जानकीदेवी की इस आत्मकथा ने मेरी आँखें खोल दी हैं। स्त्रियों की आत्मकथाओं के बगैर गांधी का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

ईश्वरीय रचना नहीं है वेद

आज के उत्तर-आधुनिक समय में किसी के दिमाग में यह सवाल कौंध सकता है कि वेद का अध्ययन हम क्यों करें। किन्तु, प्राचीन जमाने का मनुष्य इतना 'भौतिकवादी' नहीं था। इसलिए वहाँ तुलसी के 'स्वान्तः सुखाय' की तरह ज्ञान का अन्यतम और संभवतः सबसे प्रमुख उपयोग 'बौद्धिक जिज्ञासा की तृप्ति' है। पतंजलि ने यही बात ध्यान में रखकर महाभाष्य में कहा है कि 'ब्राह्मणेन निष्कारणः षडंगो वेदो$ध्येयो ज्ञेयश्च' अर्थात ब्राह्मण को बिना किसी कारण के, तात्पर्य कि बिना किसी लौकिक लाभ की इच्छा के, षडंगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद, ज्योतिष) से युक्त वेदों का अध्ययन करना चाहिए। 'ब्राह्मण' को आप इस उत्तर-आधुनिक काल का 'बुद्धिजीवी' मान सकते हैं। 

उसी 'स्वान्तः सुखाय' की परंपरा में कुमार मुकुल ने वेदों का अध्ययन करते हुए 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' किताब का सृजन किया है। किताब एक खास तैयारी के बाद लिखी गई है, इसलिए 'नोट्स' को 'भाष्य' का समतुल्य मान सकते हैं। जब आप किताब पढ़ेंगे तो इस बात को स्वीकारे बिना न रहेंगे कि उन्होंने वैदिक साहित्य से सम्बंधित किताबों की जो विस्तृत सूची दी है, उसका गंभीर अध्ययन भी किया है। उन किताबों को समेटता हुआ एक स्वतंत्र अध्याय भी आपको पढ़ने को मिलेगा। इस किताब का यह खास आकर्षण है।

वेद शब्द 'विद' धातु से बना है जिसका मतलब 'ज्ञान' और 'संग्रह' है। अतः कहा जा सकता है कि वेद अपने समय के 'ज्ञान का संग्रह' हैं। जो वेद में है वह ज्ञान है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान का हिस्सा नहीं है। आम बोलचाल में भी 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन है जिसका मतलब हुआ कि वह 'संदेह से परे' है अथवा 'स्वयंप्रमाणित' है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में तनिक 'भिन्न' और 'निम्न' कोटि का ज्ञान था। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। पंचम वेद हो जाने से 'महाभारत' के बारे में भी प्रचलित हो गया कि अपने समय का सारा ज्ञान इसमें संकलित है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान भी नहीं है। हालांकि लोकबुद्धि ने इसे स्वीकार करने से इनकार किया है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद'। 

वेद का यह 'ज्ञान' किसी एक व्यक्ति अथवा किसी एक पीढ़ी का नहीं, अपितु पीढ़ियों का संकलित-संरक्षित ज्ञान है। संकलन-संरक्षण तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित करते जाने का यह काम वाचिक परंपरा में होता रहा। हस्तांतरण की इस प्रक्रिया के लिए कविता सबसे मुफीद विधा साबित हुई। वेद हमारी सभ्यता-संस्कृति के सबसे आरंभिक, अथवा कहें कि आदिम कविता संकलन हैं। हालांकि इस बात से यह भ्रम न होना चाहिए कि वैदिक आर्य गद्य विधा से अपरिचित थे बल्कि अपनी बात कहने के लिए कविता के फॉर्म का उनका चुनाव भौतिक परिस्थितियों से अधिक अनुप्राणित था। गद्य की किसी भी विधा (फॉर्म) की तुलना में कविता को कम शब्दों की आवश्यकता होती है। एक वैसे समय और समाज में जहां लेखनकला का विकास न हो सका हो, शब्दों की मितव्ययिता खास मतलब रखती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऋग्वैदिक समाज में सैंकड़ों तरह की चीजों के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त हो रहा है। यहां 'गो' (बाद में गाय के लिए रूढ़) शब्द के उदाहरण से स्थिति को समझने में आसानी हो सकती है। 

ऐसी स्थिति सिर्फ इसलिए नहीं है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा:'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

वर्तमान रूप में ऋग्वेद के जो सूक्त मिलते हैं वे एक सुदीर्घ काव्य-परंपरा के परिणाम है। इस काव्य-परंपरा की शुरुआत ऋग्वेद के रचे जाने या भारत में आर्यों के आगमन से बहुत पहले हो चुकी है। इसका प्रमाण स्वयं ऋग्वेद के कवि हैं। वे बार-बार अपने पूर्वज कवियों को याद करते हैं. इस बात पर जोर देते हैं कि पुराने सूक्तों की तुलना में उनके स्तोत्र नये हैं। ऋग्वेद के कवियों से पूर्व अथर्वा एवं पिता मनु हैं और इन्होंने पूर्वथा, पहले की तरह इन्द्र को लक्ष्य करके स्तोत्र रचे। उस इन्द्र को प्राचीन लोग (पूर्वथा) हमारे पूर्वज (इमथा विश्वथा) तथा आज के सभी जन स्तुति कर रहे हैं। स्तुति की परंपरा पूर्वजों से चली आ रही है। ऋग्वेद के कवि अपनी काव्य-परंपरा के प्रति काफी सचेत हैं-‘हे घोड़ों के स्वामिन इन्द्र! तेरी पहले की गई स्तुति को कोई भी दूसरा बल से, न योग्यता से ही आज तक प्राप्त कर सका.’ यम को मधुर हवि अर्पित करते हुए कवि प्रथम मार्गदर्शक पूर्वजों को याद करता है-‘पूर्वज और पूर्व मार्गदर्शक ऋषियों के लिए यह नमस्कार है’ (पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृदम्य: ऋषिभ्य: इदं नम:)। अनेक सूक्तों में सुदूर अतीत की झलक मिलती है. काण्वमेध्य ऋषि एक मंत्र में कहते हैं-‘बहुस्तुत सोम प्राचीनकल से देवों का पेय है। अग्नि पूर्वकालीन और अधुनातन ऋषियों का पूज्य है। शुन:शेप प्राचीन पितरों से स्तुत इन्द्र की स्तुति करता है। कक्षीवान ऋषि भयंकर इन्द्र से उसी नेतृत्व की कामना करता है जो प्राचीनकाल में था। कक्षीवान के पिता दीर्घतमा प्राचीन ऋषि दधीचि, अंगिरा, प्रियमेध, काण्व, अत्रि तथा मनु का उल्लेख करता है. ऋषियों एवं उनके पुत्रों के सूक्त वेद में एकत्र मिलते हैं। इन सूक्तों से सिद्ध होता है कि ऋषियों को सतत अपने अतीत का स्मरण है। मैक्स मूलर ने भी स्वीकार किया है कि ऋग्वेद में प्राचीन एवं अर्वाचीन सूक्त हैं। इसलिए वेद को एक किसी निश्चित काल की रचना मानकर अध्ययन करने की अपनी परेशानी है।

वेदाध्यन के संदर्भ में कहा जाता है कि ‘ऋषि’, ‘देवता’ एवं ‘छंद’ को जाने बिना मंत्रार्थ नहीं खुलते हैं। ‘सर्वानुक्रमणी’ तथा ‘वृहददेवता’ में स्पष्ट लिखा है कि ऋषि, देवता एवं छंद समझे बिना वेदार्थ का प्रयास करनेवाले का श्रम निरर्थक जाता है। कहना अनावश्यक है कि यहाँ ‘ऋषि’ का अर्थ है कहनेवाला (यस्य वाक्यं स ऋषि), ‘देवता’ का भाव है-प्रकृति की शक्तिधारा (या तेनोच्यते सा देवता) और छंद का अर्थ है कि इसमें काव्यात्मकता किस शैली की है (यद अक्षरपरिमाणं तच्छन्द:)। भावों की गहराई तक पहुँचने में छन्द भी सहायक होते हैं। भर्तृहरि ने लिखा है कि शब्द और अर्थ का संबंध वक्ता की इच्छा के अधीन रहता है। प्रयोक्ता जिस शब्द को जिस अर्थ में प्रयोग करता है वही अर्थ उसे मिल जाता है। कबीर इसी रूप में वाणी के डिक्टेटर हैं। ब्लूमफील्ड भी वक्ता की मनःस्थिति के संदर्भ में ही अर्थ की चर्चा और परिभाषा करते हैं।

कहना पड़ेगा कि अर्थ की महिमा से प्राचीनकाल के लोग बखूबी परिचित थे। यास्क ने निरुक्त में कहा है कि जिस प्रकार बगैर अग्नि के शुष्क ईंधन प्रज्वलित नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना अर्थ समझें जो शब्द दुहराया जाता है, वह कभी अभीप्सित विषय को प्रकाशित नहीं कर सकता-"यद (द हलयुक्त) गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्दयते (द हलयुक्त)। अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित" (त हलयुक्त)।। उसी प्रसंग में आगे कहा है कि जो बिना अर्थ जाने वेदों का अध्ययन करता है, वह केवल भार ढोता है। अर्थ को जानने वाला ही समस्त कल्याणों का भागी होता है और ज्ञान की ज्योति से समस्त दोषों को दूर कर ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। "स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति यो$र्थम (म हलयुक्त)। यो$र्थज्ञ इत (त हलयुक्त) सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।।" 

कुमार मुकुल बहुत सही कहते हैं कि 'शब्दों की जन्मकुंडली वेदों से खुलती है'। पुस्तक में 'वैदिक शब्दगाथा' शीर्षक से एक अध्याय है, जिसमें शब्द-निर्माण-प्रक्रिया का बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन है। व्युत्पत्ति के माध्यम से वे शब्दों की यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं जो काफी उपयोगी और दिलचस्प है। किन्तु, लेखक इस व्युत्पत्ति-विज्ञान की सीमा से परिचित भी है। यह विज्ञान कभी-कभी विनोद का साधन बन जाता है। कहना अनावश्यक है कि ब्राह्मण और उपनिषद पुराने अनुष्ठानमूलक शब्दों से अपने मतलब के नये अर्थ निकालने के लिए अनेक बचकानी व्युत्पत्तियां प्रस्तुत करते हैं। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में एक मजेदार कहानी है, जिसमें बताया गया है कि बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर विग्रहराज क्यों रखा ? बीसलदेव का एक सान्धिविग्रहिक ‘कुमारपाल’ की सभा में आया। उसने ‘बीसल’ को संस्कृत ‘विश्वल’ (विश्व को जीत लेनेवाला) से व्युत्पन्न बताया। कुमारपाल के मन्त्री कपर्दी ने ‘विश्वल’ (वि=पक्षी, श्वल=भागनेवाला) का अर्थ किया-'चिड़ियों की तरह भागनेवाला'। यह सुनकर बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर 'विग्रहराज' रखा पर कपर्दी ने इसका भी बेढंगा अर्थ सिद्ध कर दिया। उसने बताया कि इस शब्द का अर्थ हुआ 'शिव और ब्रह्मा की नाक काटनेवाला'! तब बीसलदेव ने अपना नाम ‘कविबान्धव’ रखा।

इतिहासकार जब तक यह मानते रहे कि ऋग्वैदिक समाज मूलतः पशुचारी और कबीलाई था, 'आर्य' शब्द को ‘ऋ’ धातु से व्युत्पन्न बताया जाता रहा और सदैव यह कहते रहे कि अलग-अलग गणों में जो ‘ऋ’ धातु पाई जाती है, वह प्रायः गत्यर्थक है। अतः आर्य शब्द का अर्थ हुआ 'घुमक्कड़' या 'मुसाफिर'। यह भी कहा गया कि संस्कृत में गमनार्थक धातुओं का बाहुल्य है जो संभवतः इस बात का प्रमाण है कि आर्य स्थिर रहने के बदले चलते रहना पसंद करते थे। बाद के दिनों में, जब आर्यों के कृषि-जीवन की जानकारी प्राप्त हुई, विद्वानों ने कहना शुरू किया कि आर्य शब्द ‘अर्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ 'कृषि करना' है। कहने की जरूरत नहीं कि आर्य शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों की बदलती मान्यताएं भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों से कम, इतिहास की हमारी व्याख्या से ज्यादा प्रभावित लगती हैं। 

सामाजिक-ऐतिहासिक मान्यताएं भाषाविज्ञान के नियमों को प्रभावित करती हैं, इस तथ्य को 'शूद्र', 'कायस्थ', 'पत्नी' आदि शब्दों के व्युत्पत्यर्थ निकालने के बेतुके और अवैज्ञानिक प्रयासों से भी समझा जा सकता है। वेदांत सूत्र में शूद्र शब्द को दो भाग में विभक्त कर दिया गया है-‘शुक’ (शोक) और ‘द्र’ जो ‘द्रु’ धातु से बना है, और जिसका अर्थ 'दौड़ना' बताया गया है। पाणिनि के व्याकरण में उणादिसूत्र के लेखक ने भी इस शब्द की कुछ ऐसी ही व्युत्पत्ति दर्शायी है। पुराणों में भी शूद्र शब्द ‘शुच्’ धातु से संबद्ध जान पड़ता है, जिसका अर्थ 'संतप्त होना' है। कहा जाता है कि ‘जो खिन्न हुए और भागे, ,शारीरिक श्रम करने के अभ्यस्त थे, उन्हें शूद्र बना दिया गया।’ बौद्धों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या भी ब्राह्मणों की व्याख्या से भिन्न नहीं है। बुद्ध के अनुसार, जिन व्यक्तियों का आचरण आतंकपूर्ण और हीन कोटि का था (लुदआचारा खुद्दाचाराति), वे सुद्द (संस्कृत-शूद्र) कहलाने लगे और इस तरह सुद्द (संस्कृत-शूद्र) शब्द बना। दीघनिकाय के एक परिच्छेद में कहा गया है कि 'शूद्र वे हैं जो शिकार और अन्य हीन कर्म द्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं'। आदि मध्यकाल के बौद्ध शब्दकोश में शूद्र शब्द क्षुद्र का पर्याय बन गया, और इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि शूद्र शब्द क्षुद्र से बना है। दोनों ही व्युत्पत्तियां भाषाविज्ञान की दृष्टि से असंतोषजनक हैं। हाल में एक लेखक ने शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति इस रूप में की है-धातु ‘श्वी’ (मोटा होना) + धातु ‘द्रु’ (दौड़ना)। उनकी राय है कि इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा व्यक्ति जो स्थूल जीवन की ओर दौड़े।’ अतएव उनकी दृष्टि में शूद्र ‘ऐसा गँवार है जो शारीरिक श्रम करने के लिए ही बना है। इस शब्द को लेखक जो अर्थ देना चाहता है, वह शूद्रों के प्रति केवल परंपरावादी मनोवृत्ति को चित्रित कर पाता है। उससे शूद्रों की उत्पत्ति पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। उशना ने कायस्थ की एक विचित्र व्युत्पत्ति उपस्थित की है, यथा काक (कौआ) के ‘का’, यम के ‘य’ एवं स्थपति के ‘स्थ’ शब्दों से ‘कायस्थ’ बना है; ‘काक’, ‘यम’ एवं ‘स्थपति’ शब्द क्रम से लालच (लोभ), क्रूरता एवं लूट के परिचायक हैं। ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत इन व्युत्पत्तियों में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है। पाणिनि ने ‘पति’ से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति सिद्ध करने की व्याख्या दी है। ‘पत्युर्नो यज्ञ संयोगे’-पति के यज्ञ कार्य में सहयोग प्रदान करने से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति, स्त्री की निम्नतर सामाजिक स्थिति की आख्यात्री है।

वैदिक काल में शब्द-निर्माण की प्रक्रिया पर गौर करें तो अधिकतर शब्द 'गो' से बन रहे हैं। चमड़ा से लेकर सूर्य की किरण तक सभी गो हैं। आरम्भ में पृथ्वी की गमनशीलता के कारण उसे भी 'गो' कहा गया। वाणी भी गौ है। गाय को चूंकि हम पहले पालतू बना चुके हैं, इसलिए बाद में भैंस से परिचय होने पर उसे भी 'गौरी गवल' कहा जाता है। इसका कारण है कि हमारी भौतिक संस्कृति में बहुत कम चीज है, अतः जैसे-जैसे संस्कृति का हमारा दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे शब्द बढ़ते हैं। जैसे प्रारम्भ में 'सुर' और 'असुर' में भेद नहीं है, दोनों शब्द एक ही अर्थ ध्वनित करते हैं। पूर्ववैदिक काल में, आप आश्चर्य नहीं करें, आदमी भी 'पशु' कहलाता है। मनुष्य पशुओं में प्रथम है। सारे पशु, मृग भी हैं। उसी मृग में आदमी भी शामिल है। बाद के दिनों में उसी मृग से शाखा पर रहनेवाले अर्थात 'शाखामृग' अर्थात बंदर बनते हैं। उसी मृग से हाथवाला पशु अर्थात मृगहस्तिन अर्थात हाथी बनता है। 

मगही भाषा का बहुप्रचलित 'पोरसा' शब्द वैदिक 'पुरुष' से बना लगता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में लंबाई की एक माप के रूप में 'पुरुष' शब्द प्रयुक्त होता रहा है। 'तैत्तिरीय संहिता' एवं 'शतपथ ब्राह्मण' में इसे उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। वैदिक साहित्य में इसका सबसे प्राचीन प्रयोग यज्ञ की बेदी की ऊंचाई बताने हेतु हुआ है। कहा गया है कि ‘चतुरश्र स्येन’ (बाज पक्षी के आकार की तथा चौकोर ईंटों की बनी सबसे प्राचीन बेदी) का क्षेत्रफल साढ़े सात वर्गपुरुष होता था। पाणिनि काल में भी गहराई मापने के संबंध में ‘पुरुष’-संज्ञक माप का प्रयोग किया जाता था-'पुरुषात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम्'। जैसलमेर में आज भी यह शब्द प्रचलित और सुरक्षित है। वहां कुएं की गहराई 300-350 ‘पुरुष’ के नाम से ही जानी जाती है। एक हाथ में रस्सी को पकड़कर दूसरे हाथ को ऋजुकोण की तरह फैलाने तक की दूरी को ‘एक पुरुष’ मानकर मापने की रीति राजस्थान में आज भी प्रचलित है। 

इसके अलावे 'पुरुष' शब्द मनुष्य की जीवन-अवधि अथवा एक पीढ़ी के लिए, नेत्र की पुतलियों के लिए और व्याकरण साहित्य में क्रिया के 'पुरुष' के लिए भी व्यवहृत हुआ है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में विभिन्न वर्णों का जन्म भी एक विराट ‘पुरुष’ ही से बताया गया है। इसी ‘पुरुष’ से ‘अपौरुषेय’ शब्द बना है। वेद को ‘अपौरुषेय’ कहकर 'ईश्वरीय' और 'दैवी' घोषित करने की कोशिश की गई है जबकि सच्चाई यह है कि वेद में ईश्वर का तात्पर्य 'स्वामी' से है, भगवान वाला अर्थ उसने बहुत बाद में ग्रहण किया है। इसीलिए नास्तिक का आरंभिक अर्थ है, 'वह जो वेद में विश्वास नहीं करता'। मनुस्मृति में भी नास्तिक का यही अर्थ लिया गया है-'नास्तिको वेद निंदकः'। इसलिए वेद के अपौरुषेय होने का मतलब उसे दैवी अथवा ईश्वरीय समझना दरअसल वेद के गलत पाठ से जुड़ा मसला है। आधुनिक अर्थबोध के साथ जब तक हम वेद पढ़ेंगे, ऐसी भूल से अपने को बचाने में असमर्थ रहेंगे।

परिवर्तन न सिर्फ प्रकृति का नियम है, अपितु भाषा में भी काल-सापेक्ष परिवर्तन देखा गया है। इसलिए जब हम वेद जैसे गुजरे जमाने की रचनाओं को आज के संदर्भ में पढ़ते हैं तो उनके शब्द कई बार हमें भ्रमित और चकित करते हैं, क्योंकि आज उनके अर्थ वही नहीं होते जो रचना के लिखे जाने के समय थे। कभी-कभी शब्दार्थ इतनी तेजी से बदलते हैं कि महज दो पीढ़ी का अंतर भी इतिहास का विशाल काल-खंड प्रतीत होता है। निरुक्तकार यास्क ने वेद के लगभग चार सौ ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। इस अर्थ-परिवर्तन में जाति, धर्म, लिंग आदि अन्य अनेक चीजों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 

ऋग्वेद की आरंभिक ऋचाओं में ‘असुर’ शब्द देवतावाचक है किन्तु संभवतः पारसियों से संबंध अच्छे न रह जाने के कारण भारतीय आर्यों ने ‘असुर’ शब्द को, जो पारसियों के प्रधान देवता (अहुरमज्दा) का वाचक था, ‘राक्षस’ के अर्थ में प्रचलित कर लिया। जैन लेखक विमलसूरी की प्राकृत रामायण ‘पउमाचरियम’ की मानें तो ब्राह्मण ग्रंथों का यह ‘राक्षस’, दानव नहीं है। यहां राक्षस शब्द ‘रक्ष’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘रक्षा करना’ है। इस तरह आप कह सकते हैं कि संस्कृत का असुर शब्द ‘देवता’ से परिवर्तित होकर ‘राक्षस’ अर्थ प्रयोक्ताओं की विशेष मानसिक स्थिति का परिणाम है। संस्कृत 'उपेक्षितव्याः' का मूल अर्थ है ‘समीप जाकर देखना चाहिए’ किन्तु बाद में इसका अर्थ ‘तिरस्कार’ हो गया। ‘निरुक्त’ में यह पुराने ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आंखों के निकट रहने से अनादर होता ही है, संभवतः इस तरह यह अर्थ आया। 'भ्रातृव्य' शब्द का मूल अर्थ ‘भ्राता का पुत्र’ था किन्तु आगे चलकर वह ‘शत्रु’ के लिए प्रयुक्त होने लगा, ठीक जैसे कभी पड़ोसी राजा को ‘अरि’ कहा जाता था। ‘धान्य’ शब्द का मूल अर्थ ‘अनाज’ है लेकिन कालांतर में धान्य शब्द ‘चावल’ संबंधी अर्थ में सीमित हो गया। कीथ और मैकडानल के अनुसार ऋग्वेद में ‘यव’ शब्द केवल ‘जौ’ का वाचक नहीं बल्कि अन्न मात्र का वाचक है। ‘पुंगव’ शब्द का अर्थ बैल था किन्तु ‘नरपुंगव’ में श्रेष्ठतावाचक हो गया। ‘दया’ अथवा ‘अनुकम्पा’ के अर्थ में प्रयुक्त होनेवाला ‘घृणा’ शब्द ‘नफरत’ का वाचक बन गया।

कुमार मुकुल की पुस्तक 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' देखने-पढ़ने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ है। इसलिए कह सकता हूँ कि वेद के विविध आयामों और अध्यायों वाली यह पुस्तक रोचक बन पड़ी है और निश्चय ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी। आशा है, वेद के और कुमार मुकुल के कवि से आप एक साथ मिल सकेंगे।