Monday, September 21, 2026

अपने अपने कुरुक्षेत्र

प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन बहुत ही सावधानी और होशियारी के साथ करने की जरुरत है। कारण कि हमारे अधिकतर ग्रंथ एक समय में और एक व्यक्ति के द्वारा नहीं लिखे गये हैं। महाभारत को 'जय', 'भारत' और 'महाभारत'-तीन चरणों में लिखे जाने की बात पर अधिकतर इतिहासकार एकमत हैं। कई चरणों में लिखे जाने का मतलब होता है कई युगों की कहानियों और घटनाओं को समेटते चलना। प्राचीन ग्रंथों की यह परिस्थितिजन्य विशेषता है। 'महाभारत' के बारे में तो लेखक का स्पष्ट दावा भी है कि 'अबतक का सारा ज्ञान इसमें निबद्ध है, और जो कुछ इसमें नहीं है, वह ज्ञान ही नहीं है।' लेखक की इस 'वीर-घोषणा' से न सिर्फ 'महाभारत' की ऐतिहासिक महत्ता का बोध होता है बल्कि इस बात का भी सहज अनुमान हो जाता है कि लेखक अपने समय में उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान को एक ही जगह ठूंस-ठांसकर संकलित कर देना चाहता है। इस तरह के उद्देश्य/दावा वाले ग्रन्थों के संपादन के लिए असीम धैर्य और अवकाश की आवश्यकता थी जिसका इन ग्रंथकारों के पास सख्त अभाव दिखता है। उनकी इस 'हड़बड़ी' का कारण वाचिक परंपरा से जन्मा होगा। इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि 'महाभारत' में वे तमाम तरह के किस्से आ गये हैं जिनका मूलकथा से कोई संबंध नहीं है। कई बार ये किस्से परस्परविरोधी भी हैं। उनमें आंतरिक संगति का भी अभाव परिलक्षित है।

कहने की जरुरत नहीं कि महाभारत का लेखन और पुनर्लेखन आज इक्कीसवीं शती में भी जारी है। धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा और नरेन्द्र कोहली से लेकर मीनाक्षी नटराजन तक ने अपने-अपने समय में कुछ-कुछ जोड़ने-घटाने की कोशिश की है। और बात है कि कला माध्यमों का फर्क रहा है। किसी ने कहानी, उपन्यास और नाटकों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की तो किसी ने फिल्म/धारावाहिक के माध्यम से। किन्तु कहना होगा कि अधिकतर विद्वानों ने पितृसत्ता के बने-बनाये दृष्टिकोण से ही कथा का पुनर्लेखन किया है। मीनाक्षी नटराजन ने 'सामयिक प्रकाशन' से छपी अपनी पुस्तक 'अपने अपने कुरुक्षेत्र' में इतिहास लेखन के क्षेत्र में व्याप्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह चुनौती इतिहास को 'नयी आँख' से देखने की वजह से मिल रही है। यह 'नयी आँख' स्त्री विमर्श की अथवा स्त्री जाति की है जिसकी स्पष्ट मान्यता रही है कि अबतक का इतिहास 'पुरुषों का' और 'पुरुषों के द्वारा' लिखा गया इतिहास है। अर्थात अगर इतिहास को 'स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला' मानें तो कहना होगा कि ये फैसले उन न्यायाधीशों के हैं जो इतिहास के अपराधी भी रहे हैं। इसलिए यह इतिहास विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो सकता। अविश्वसनीयता का कारण है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मूल्य और मापदंड अलग-अलग हैं। बात अगर महाभारत से शुरू करें तो जैसाकि चित्रा मुद्गल ने लिखा है, महाभारत की कथा उनलोगों ने लिखी है जो यह मानते रहे थे कि 'कौमार्य भंग स्त्री उनकी स्त्री नहीं हो सकती, किन्तु वह स्वयं की यौनेच्छाओं को मर्यादित करने के लिए बाध्य नहीं' थे। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 10) इसलिए मीनाक्षी नटराजन ने महाभारत की कथा और खासकर स्त्री पात्रों-यथा गांधारी, कुंती, शिखंडी, द्रौपदी आदि को 'स्त्री की आँख' से देखने की कोशिश की है। बार-बार भीष्म को झिड़की देती हुई कि उन्होंने कभी स्त्री के मन को पढ़ने-समझने की कोशिश नहीं की।

महाभारत युद्ध की कथा निजी परिवार, निजी संपत्ति और राज्य के उदय तथा उसके सुदृढ़ीकरण से उत्पन्न अंतर्विरोधों की कथा है। प्राचीन भारत में भूमि पर निजी मालिकाना हक स्थापित किये बगैर निजी संपत्ति की अवधारणा को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करना असंभव था। द्रौपदी का पांच पतियों के साथ ब्याहा जाना, जो एक प्रक्षिप्त कथा का हिस्सा है, बहुपति विवाह की याद भर है। यह प्रथा कभी सुदूर अतीत में जब निजी संपत्ति का इस हद तक विकास नहीं हुआ होगा, अस्तित्व में रही होगी।

मीनाक्षी नटराजन की किताब का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने महाभारत की समस्या को 'स्त्री आँख' से पढ़ने की कोशिश की है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने इतिहास बोध से कभी किनारा नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उचित ही इतिहास बोध को 'तीसरी आँख' कहते थे। इस 'तीसरी आँख' से देखे बगैर महाभारत की कथा का सम्यक पाठ असम्भव है क्योंकि यह अपनी काया में तो विशाल है ही, इतिहास की अनगिनत प्रवृत्तियों और परंपराओं को भी एक साथ लिये चलती है। अर्थात महाभारत में बहुपति विवाह के साथ-साथ बहुपत्नी विवाह की भी कथा है। अतः महाभारत की कथा की स्पष्ट समझ के लिए हमें वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का भी ध्यान रखना होगा। मीनाक्षी नटराजन ने हमें ठीक ही ध्यान दिलाया है कि महाभारतकालीन समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ परंपराओं और मान्यताओं की अजीब टक्कर है। यहीं इतिहास बोध रूपी तीसरी आँख की आवश्यकता पड़ती है यह देखने के लिए कि कौन-सी मान्यता जीवित रहनेवाली है और कौन-सी दम तोड़नेवाली।

महाभारत में जो कभी-कभी यौन स्वछंदता की प्रवृत्ति दिखती है उसकी भी एक परंपरा है। देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57) ब्रह्मा-सरस्वती का यौन सम्बंध किसी प्राचीन समाज में पिता-पुत्री का 'वैध' यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68) प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ व्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) किन्तु शादी के पहले की यौन क्रिया संबंधी अपनी 'भूल' को कुंती आजीवन अपने पति पाण्डु के समक्ष स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मीनाक्षी नटराजन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य और मापदंड निर्धारित है।

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

मीनाक्षी नटराजन की पुस्तक की नवीनता और अद्वितीयता इस बात में है कि वह ऐतिहासिक संदर्भ में इतिहास बोध के साथ कथा को समझती है। गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि के स्त्री मन की पीड़ा को समझती है। मीनाक्षी की द्रौपदी पर बहुपतित्व कुन्ती के द्वारा थोपा हुआ फैसला नहीं था बल्कि स्वयं द्रौपदी का लिया निर्णय था। इतना ही नहीं, सभी पतियों के लिए बहुविवाह की व्यवस्था देना भी द्रौपदी ही का निर्णय था। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 143) दरअसल, द्रौपदी का प्रस्ताव था कि वह बारी-बारी प्रत्येक पांडव की पत्नी के रूप में एक-वर्ष का समय व्यतीत करेगी। उस एक वर्ष में अन्य पांडव बंधुओं के प्रति उसका व्यवहार पत्नी का नहीं होगा। इस व्यवस्था में प्रत्येक पाण्डव बंधु को द्रौपदी के संग के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी ही पड़ती। अतः उनका बहुविवाह आवश्यक था। (वही, पृष्ठ 145) 

यह महाभारत की कथा का स्त्री पाठ है। पुस्तक में प्रवाह और अद्भुत रोचकता है। एक सांस में पढ़ी जा सकने वाली दृष्टिसम्पन्न किताब है। इसे पढ़ना समृद्ध होना है। जहाँ तक भाषा की बात है, एकाध स्थल को छोड़ दें तो पुस्तक में अशुध्दियों की कमी खलती है!

Sunday, September 20, 2026

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की 'श्रेष्ठ कहानियां'

अबतक मैंने पांडेय बेचन शर्मा उग्र को नहीं पढ़ा था। एकाध कहानी कहीं से पढ़ लेना पढ़ना नहीं हो सकता। 'आत्माराम एंड संस' ने दो खंडों में इनकी कहानियां छापी हैं। ये उग्र की नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। इनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। समाज और व्यक्ति समान रूप से हमला झेलते हैं। अभी कुछ ही कहानियां पढ़ सका हूँ। पढ़ते लगा कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र आर्य समाज आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित कथाकार लगते हैं। उनका अतिरिक्त भारतीयता-बोध भी गाहे-बगाहे सिर उचका देता है। उनकी एक कहानी है 'कम्यूनिस्ट दरवाज़े पर'। यह व्यंग्यप्रधान आत्म-संस्मरणात्मक कहानी है। अफसोस कि व्यंग्य की अपनी सारी ताकत उन्होंने कम्यूनिस्ट पात्र का मजाक उड़ाने में खर्च कर दी है। एक स्थल पर लिखा है, 'रुपये-पैसे की झंकार के सामने काले चश्मेवाले कम्यूनिस्ट की क्रूर माया फट गई।' (पांडेय बेचन शर्मा उग्र, श्रेष्ठ रचनाएं, भाग 1, पृष्ठ 248) कहानीकार का यह कहना कि 'कम्यूनिस्ट रूस से नहीं आता, काले बुखार की तरह देश-देश में वह स्वयं पैदा हो जाता है', (पृष्ठ 246) स्वतंत्र कथन के रूप में तो सही है, लेकिन गलत है जब इस आधारवाक्य के पीछे भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को 'आयातित' कहने की 'कूटनीति' हो। कहानी के अंत में लेखक ने कम्यूनिस्ट को कहा, 'आप गधे हैं, रूसी खूंटे से बंधे।' (वही, पृष्ठ 249) दूसरी ओर कम्यूनिस्ट की एक नई प्रजाति अर्थात 'सनातनी कम्यूनिस्ट' की खोज लेखक करता है जिसका वह स्वयं प्रतिनिधि है। इस 'सनातनी कम्यूनिस्ट' का कर्तव्य है, 'गरीब और अमीर दोनों की रक्षा, सबका भला।' (वही, पृष्ठ 248)

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)

Saturday, September 19, 2026

किसी वरिष्ठ से नहीं लिखवाया किताब का 'आमुख'

मैं दसवीं जमात का विद्यार्थी था। हिन्दी की किताब में जगदीशचंद्र माथुर का एक रेखाचित्र पढ़ना था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। और यह 'जन्मजात चक्रवर्ती' कोई और नहीं श्री सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके बारे में लिखा था कि उन्हें नित नयी-नयी किताब पढ़ने और लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का शौक था। उनकी किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां  हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। 

इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। 1893 का वर्ष सच्चिदानंद सिन्हा का पढ़ाई समाप्त कर विलायत से लौटने का है। लौटते-लौटते उनके पास बंगाल से बिहार को अलग करने अथवा बिहार को स्वतंत्र प्रान्त का दर्जा दिलाने की बात एक ठोस शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। इसके लिए अखबार की जरूरत थी। इसलिए 1893 में एक अंग्रेजी अखबार शुरू करने हेतु बिहार के कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों की मीटिंग आयोजित की गई। उक्त सभा में अखबार का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित हुआ किन्तु अंततः 'बिहार टाइम्स' के नाम से 1894 में  महेश नारायण के संपादन में शुरू हो गया। (रामजी मिश्र 'मनोहर' की किताब 'बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास' के 27वें पृष्ठ पर इसका प्रकाशन वर्ष भूलवश 1884 छप गया है।) और बात है कि 1906 में इसका नाम बदलकर बिहारी हो गया। सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेश नारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेश नारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि का चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता है कि 'बिहार टाइम्स' के महेश नारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेश नारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी यह शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचन शरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक-भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) के पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

एक सामान्य पाठक यही जानता है कि पटने की खुदा बख्श लाइब्रेरी खुदा बख्श के द्वारा अर्जित-उपार्जित किताबों-पांडुलिपियों की लाइब्रेरी है किन्तु हकीकत है कि इस संग्रह की अधिकतर किताबें और पांडुलिपियां उनके पिता द्वारा उपार्जित थीं। खुदा बख्श साहब ने मृत्युशैया पर पड़े पिता से वादा किया था कि उनकी किताबों और पांडुलिपियों की हिफाजत के लिए वह लाइब्रेरी खड़ा करेगा। तभी 80,000 रुपये की लागत से लाइब्रेरी का भवन निर्मित कराया गया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि किताब दिलचस्प और ऐतिहासिक महत्त्व की है।

आज किताब का ब्लर्ब या आमुख किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का आमुख अमरनाथ झा से लिखवाया था। अमरनाथ झा के पिता सर गंगनाथ झा और सिन्हा साहब दोनों गहरे मित्र थे।

कमलाप्रसाद वर्मा की 'भूलती भागती यादें'

बिहार के पहले हिंदी अखबार 'बिहार बंधु' के संपादक रहे कमला प्रसाद वर्मा जी की आज पुण्यतिथि है। 1912 ईस्वी में 'बिहार बंधु' का संपादन कमला प्रसाद वर्मा (मुख्तार, पटना सिटी) करने लगे। आप दिन में पटना सिटी कोर्ट में मुख्तारी करते, रात में बांकीपुर जाकर पत्र का संपादन। इस कार्य हेतु आपको 50 रुपये मासिक वेतन तथा 10 रुपये मासिक भत्ता मिला करता। जलपान का खर्च और मार्गव्यय अलग से। मुख्तार साहब के बाद कुछ दिनों तक बल्लभ सम्प्रदाय के गोस्वामी जी को पत्र का संपादक बनाया गया। आशा थी कि उनके चेले और अनुयायी अखबार की मांग बढ़ाने में मदद करेंगे किन्तु ग्राहक संख्या बढ़ने की अपेक्षा बहुत घट गयी। इसी बीच अंग्रेज महिलाओं के संबंध में कुछ अपमानजनक समाचार छप गया। कमिश्नर ओल्ढम आगबबूला हो गये। संपादक की बुलाहट हुई। गोस्वामी जी चंपत हो गये। अतएव अनुरोधवश मुख्तार साहब को पुनः संपादन का भार स्वीकार करना पड़ा। आचार्य शिवपूजन सहाय ने 19 जनवरी, 1961 ई. की अपनी एक टिप्पणी में ठीक ही लिखा है कि मुख्तार साहब ने 'बिहार बन्धु' का दो बार संपादन किया था । 

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी 'हिन्दी साहित्य और बिहार' (तृतीय खंड) में  'भूलती भागती यादें' (1951 में प्रकाशित) से एक उद्धरण है जिसमें कहा गया है कि "सन 1872 ईस्वी में बिहार बन्धु का जन्म कलकत्ते में, स्वर्गीय पं. बालकृष्ण भट्ट के निरीक्षण में हुआ था। इसमें पं. केशवराम भट्ट का बड़ा हाथ था। ये दोनों महाराष्ट्री ब्राह्मण थे और इनके पूर्वज 'बिहारशरीफ' में आ बसे थे।" (पृष्ठ 169) अब यह निर्विवाद है कि 'बिहार बन्धु' 1872 में नहीं बल्कि 1873 में शुरू हुआ। दूसरी बात कि बालकृष्ण भट्ट की जगह मदनमोहन भट्ट लिखा जाना चाहिए था। ये दोनों सगे भाई थे और महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे जो व्यापार के सिलसिले में 'बिहारशरीफ' आकर बस गये थे। 'बिहार बन्धु' की स्थापना इन्हीं मदनमोहन भट्ट की देखरेख में हुई थी। जहांतक बालकृष्ण भट्ट की बात है, उनके पूर्वज मालवा के ब्राह्मण थे और झाँसी के निकट आकर बसे थे। बालकृष्ण भट्ट, मालवीय जी के रिश्तेदार थे और जो 'हिन्दी प्रदीप' के संपादक हुए।

हिन्दुस्तानी कहावत-कोश और फैलन का भाषा बोध

बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था : ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251) 

भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)                                                                                                                                                                    पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है-It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in  Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212) 

इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला : ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह  पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।

एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!

कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)

कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।

वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है, तब जन ही धन था।

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)

मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)

दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)

'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)

'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)

कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)

पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय

कर्मेंदु शिशिर की एक किताब है-'पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय'। इस किताब में उन्होंने पुस्तक-भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी को 'खुर्राट व्यवसायी' तथा बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय को 'दुधारू गाय' कहा है। आगे यह भी लिखा कि पाठ्यपुस्तकों के 'व्यवसाय की सफलता से उनकी आंखों पर मोटी परत चढ़ गई'। (पृष्ठ 53) शिशिर जी एक 'लेखक' को 'व्यवसायी' किस कुण्ठा में लिख रहे हैं वे ही जानें!

'जयन्ती स्मारक ग्रन्थ' में उस समय के लगभग तमाम लेखकों के संस्मरण प्रकाशित हैं। कथित दुधारू गायों के संस्मरण भी हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि वे बेरोजगार थे और बहन की शादी की चिंता सिर पर थी। उन्होंने जिन दो लोगों को पत्र लिखे उनमें एक पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचन शरण बिहारी भी थे। रामलोचन जी ने बेनीपुरी को पुस्तक भंडार आने का न्योता लिख भेजा। काम भी मिल गया। कुछ माह बाद उन्होंने बेनीपुरी को बहन की शादी की याद दिलायी तो उन्होंने अपर्याप्त बचत की बात कही। रामलोचन जी ने उन्हें एक नई साइकिल दी और कहा कि जाइए और अपने गांव के आसपास किसी लड़के को देखिए। शादी हो गई। लड़का बेनीपुरी जी खोजा और खर्च का भार बिहारी जी ने उठाया। बेनीपुरी जी के अतिरिक्त कलक्टर सिंह केसरी, दिनकर आदि ने भी आर्थिक मदद की बात स्वीकारी है।

'व्यवसाय' की 'सफलता' के पीछे रामलोचनशरण बिहारी का श्रम और साधन था। तब 'बालक' पत्रिका निकालने की बात थी। उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका से अंग्रेजी के कई बालोपयोगी मासिक पत्र और वार्षिक पुस्तकें (इयर-बुक) मंगाई थी। बंगला, गुजराती, मराठी और उर्दू के प्रमुख बालोपयोगी पत्र भी मंगाये। बच्चों के लिए अंग्रेजी की प्रसिद्ध 'बुक-ऑफ नॉलेज' जैसी ग्रंथ-मालाएँ भी मंगाई। रामवृक्ष बेनीपुरी को कलकत्ता भेजकर वहां से मैकमिलन, न्यूमैन, बैंकर आदि अंग्रेजी कंपनियों की दूकानों से हजार रुपये की बालोपयोगी पुस्तकें भी मंगवाई। उन सबके अध्ययन और परीक्षण के बाद ही 'बालक' के लिए उपयुक्त विषयों एवं शीर्षकों का चुनाव तथा निर्धारण किया। 'बालक' का कवर आदि का डिजाइन बाबू शिवपूजन सहाय के परामर्श पर तत्कालीन प्रख्यात चित्रकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा से तैयार कराया गया था। 

इन सबके पीछे रामलोचनशरण जी ने पानी की तरह पैसा बहाया था। वर्मा जी से मास्टर साहब की भेंट 1929 में कलकत्ते में हुई थी। इसी साल वर्मा जी इंग्लैंड जाने के सिलसिले में पुस्तक भंडार आये थे। मास्टर साहब ने उन्हें एक हजार रुपये दिये थे। जबतक वर्माजी इंग्लैंड में रहे, तबतक उनके घर 50 रुपये माहवार 'भंडार' से निर्बाध जाता रहा। इंग्लैंड से भी वर्मा जी की मांग पर 600 रुपये अतिरिक्त भेजे गये थे। दुर्भाग्य कि स्वदेश लौटने के बाद वर्मा जी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके।

जानकीदेवी : मेरी जीवन-यात्रा

गाँधीजी के पांचवें पुत्र जमनालाल बजाज की पत्नी जानकीदेवी बजाज हैं। उनकी आत्मकथा है 'मेरी जीवन-यात्रा'। इस किताब की प्रस्तावना लिखी है आचार्य विनोबा ने। पहली बार यह 1956 में सस्ता साहित्य मंडल की पहल पर सत्साहित्य प्रकाशन से छ्पी। इस किताब को पढ़ते हुए अपना पुराना विश्वास दृढ़तर हुआ कि स्त्रियों को पढ़े बगैर किसी भी समाज का सच्चा और प्रामाणिक इतिहास लिखा जाना असम्भव है। कल्पना के घोड़े दौड़ाना और बात है।

जानकीदेवी का परिवार धार्मिक शिक्षा और संस्कारों का परिवार था जैसे गांधी का परिवार था। इसे आप औसत भारतीय परिवार का संस्कार भी कह सकते हैं। अल्पवय में शादी हुई। पति को लगभग परमेश्वर माननेवाली पत्नी साबित होने की साध थी। तब की औरतें शादी के बाद 'पतिसेवा' नामक किताब पढ़ती थीं। जानकीदेवी को भी दी गई। एक-एक अक्षर को अपने जीवन में उतारने की चाह लिए किताब पढ़ती रही। पति की थाली का उच्छिष्ट भोजन खाने लगी। पातिव्रत्य में कुछ कमी रह गई तो पादोदक/चरणोदक भी लेने लगी। जमनालाल बजाज अगर कभी जेल जाते तो अतिरिक्त मात्रा में चरणोदक की पहले ही से व्यवस्था करके रख लेती। बीच में अगर मिलने जेल भी जाती तो झट चरणोदक का प्रबंध कर लेती। लेकिन जैसे-जैसे जमनालाल जी की राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता बढ़ती गई जानकीदेवी के लिए परंपरा का निर्वाह मुश्किल होता गया। सात परदों के भीतर रहनेवाली महिला ने जब खादी की मोटी साड़ी धारण की तो पर्दा करना असंभव हो गया। आगे कुछ भी दिखना बंद हो गया। बापू के सामने समस्या रखी तो विनोदी महात्मा ने मजाक में कहा कि आंखों के आगे जाली लगा लो। फैसला हुआ कि पर्दा न किया जाये। 

परंपरा में पति का नाम लेना भी पाप माना जाता था किंतु सामाजिक जीवन जीनेवाली जानकीदेवी से यह अभ्यास भी धीरे-धीरे छूटता गया। कुछ दिनों तक तो 'सेठजी' का सहारा रहा किन्तु अंततः जमनालाल जी पर आकर टिकी। पति का नाम लेना तब 'पाप' था। जानकीदेवी ने इसे अब 'पुण्य' बना दिया था।

जानकीदेवी के मारवाड़ी समाज में गहनों का भी चाव था। पैर में चांदी की कड़ी जैसी कोई चीज पहनने का रिवाज था। धार्मिक मान्यता थी कि वह श्मशान तक साथ जाती है। राजस्थानी परिवार-समाज की गरीब से गरीब औरतें भी इसे पहनना अनिवार्य मानती थीं। और भी कई गहने थे जो पति के जीवन की गारंटी सदृश थे। बापू ने यह सब छुड़वा दिया। और यह सब लाखों-करोड़ों औरतों के साथ हुआ। 

मैं समझता था कि गाँधी के आगमन के बाद राजनीति और समाज में धर्म और अंधविश्वास का बोलबाला बढ़ा है, किन्तु जानकीदेवी की इस आत्मकथा ने मेरी आँखें खोल दी हैं। स्त्रियों की आत्मकथाओं के बगैर गांधी का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।