(श्रीकांत जी के जन्मदिन के बहाने समय-समय पर उनकी किताबों पर की गई टिप्पणियों का कोलाज प्रस्तुत करते हुए)
दलित आंदोलन की पहली किताब
‘बिहार में दलित आंदोलन’ (1912-2000) पुस्तक के लेखक हैं प्रसन्न कुमार चौधरी एवं श्रीकांत। इससे पहले उनकी पुस्तक ‘बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’ अपने ‘जर्नलिस्टिक एप्रोच’ (प्रकाश लुइस) के बावजूद खासी चर्चा में रही।
‘बिहार में दलित आंदोलन’ पुस्तक बीसवीं सदी में बिहार के दलितों की स्थिति और उनके आंदोलन का एक दस्तावेज है। देश के अन्य हिस्सों, खासकर दक्षिण और पश्चिमी प्रदेशों में चले दलित आंदोलन और उनकी स्थिति पर तो काफी सामग्री उपलब्ध है, लेकिन बिहार के दलितों के बारे में सामग्रिक अध्ययन अब तक नहीं किया गया। यह किताब इसी अभाव को पूरा करने का एक प्रयास है। इस अध्ययन में लेखक को प्राथमिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ा है किंतु ये स्रोत भी ज्यादातर ‘नकारात्मक’ ही हैं-पुलिस तथा प्रशासन की रिपोर्टों के रूप में। यह अध्ययन एक ‘दस्तावेज’ इसलिए बन पड़ा है कि इसमें लगभग सभी उपलब्ध सामग्रियों को क्रमवार संकलित करने का प्रयास किया गया है।
इस अध्ययन को दस अध्यायों में सफलतापूर्वक समेटने का प्रयास किया गया है। प्रथम अध्याय ‘कमिया’, ‘क्रिमिनल’ और ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ है। इसमें बीसवीं सदी के आरंभ में बिहार के अछूतों की स्थिति प्रस्तुत की गई है। लेखक की राय है कि ‘भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के साथ जहां एक ओर औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज की कमजोरियों का आकलन-विश्लेषण तथा उनके निवारण की कोशिशें भी तेज हुईं। और आगे, ‘इसी आत्म-मंथन के बीच कई धर्म-सुधार तथा समाज-सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ।’ उपनिवेशवाद के खिलाफ यह संघर्ष न सिर्फ अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संघर्ष भर था, वरन वह भारतीय समाज की पुनर्रचना का भी आंदोलन बन गया। हमारा राजनीतिक संघर्ष भारतीय समाज की पुनर्रचना का आंदोलन किस हद तक था इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक द्वारा ही उद्धृत पंक्तियों का सहारा लें तो बेहतर होगा। ‘राजनीतिक आंदोलन के कई उग्र योद्धा सामाजिक प्रश्नों पर काफी पुरातनपंथी रुख रखते थे, और सामाजिक आंदोलन के कई गणमान्य नेता राजनीतिक आंदोलन के प्रति अधिक आग्रही नहीं थे। 1885 में कांग्रेस के पूना अधिवेशन में सामाजिक सुधार-विरोधी गुट विद्रोह कर बैठा और उसने धमकी दी कि यदि कांग्रेस ने सोशल कांफ्रेंस को अपने पंडाल का उपयोग करने की अनुमति दी तो पंडाल फूंक दिया जाएगा।’ यह भी सच है कि भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास के साथ ही जातीय संगठनों एवं साप्रदायिक दंगों का इतिहास जुड़ा है। 1885 में कांग्रेस की स्थापना होती है और दलित वर्गों का सबसे पुराना सामाजिक राजनीतिक संगठन 1892 में ‘द्रविड़ जनसभा’ नाम से अस्तित्व में आता है। पहला हिन्दू-मुस्लिम दंगा भी इसी के आसपास हुआ माना जाता है। इसकी तार्किक संगति बैठाने का पुस्तक में अभाव झलकता है।
दलित आंदोलन के उद्भव से संबंधित एक विचार साहित्य चिंतक डा. नामवर सिंह का भी है। वे लिखते हैं, ‘गनीमत है कि बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य में लेखकों का एक ऐसा समुदाय या वर्ग (संगठन नहीं) है जो अंग्रेजी शिक्षा से बहुत कुछ वंचित रह जाने के कारण इस नव-उपनिवेशवादी विचारधारा की गिरफ्त से बचा रह गया है। …भारतीय भाषाओं में ‘दलित साहित्य’…उसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जो प्राणवान और सार्थक है…साहित्य सृजन का अच्छा-खासा हिस्सा भारतीय समाज के उन लोगों की ओर से आया है जो हाशिए पर रहे हैं।’
बिहार में दलित आंदोलन का इतिहास लिखते हुए श्रीकांत ने दलित आंदोलन की वैचारिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश नहीं की है। यह आंदोलन बिहार में वर्षों से चल रहे ‘एग्रेरियन मुवमेंट’ से दार्शनिक स्तर पर कैसे भिन्न है, इसकी जांच अपेक्षित थी। लेकिन पाठकों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना होगा कि बिहार में दलित आंदोलन पर यह पहली पुस्तक है, पहला पाठ है।
बिहार में 'सुशासन' के नाम पर जो 'खेल' चल रहा है उसमें केवल अख़बारों के संपादक ही नहीं, अलख. एन. शर्मा जैसे 'एनजीओ बुद्धिजीवी' भी लिप्त हैं और मालामाल हो रहे हैं। अलख एन शर्मा की ताजा 'लीला' है-#डेवलपमेंटरिसर्चऑनबिहार (2000-2010) ए कम्पेनडियम'। इसे अलख एन शर्मा, अमृता दत्ता एवं जोयिता घोष ने सम्पादित किया है। यह 2000-2010 के बीच बिहार पर केंद्रित प्रकाशित पुस्तकों/शोध लेखों की सूची है। इस 'महत्वाकांक्षी' परियोजना की कई जानकारी अपर्याप्त/अपूर्ण और भ्रमपूर्ण है। उदाहरण के लिए 'दलित मूवमेंट इन बिहार (1912-2000) के लेखक प्रसन्न कुमार चौधरी के साथ श्रीकांत भी हैं। इस किताब का कई जगह उल्लेख तो है लेकिन कहीं भी लेखक के रूप में श्रीकांत का नाम नहीं है। इस शोध परियोजना की क्या जरूरत थी। सुशासन में लूट जारी है और यह सब वैश्विक स्तर पर है।
हिन्दी-सेवक मूनिस
पीर मुहम्मद मूनिस की रचनाओं एवं उनसे संबंधित दस्तावेजों का श्रीकांत ने 'अपनी बात' के साथ संकलन एवं संपादन किया है। पहली बार यह किताब सन 2000 में प्रकाशित हुई थी। इस संस्करण में कुछ अशुद्धियां शेष रह गई थीं जिनको आशुतोष पार्थेश्वर के सदुद्योग से दुरुस्त करते हुए चम्पारण सत्याग्रह के 100वें साल में प्रभात प्रकाशन के सौजन्य से पुनर्प्रकाशित किया गया है। हालांकि कुछ अशुद्धि रह ही गई है। उदाहरणार्थ, पृष्ठ संख्या 6 तथा कवर फ्लैप पर लिखा है कि 'मूनिस का जन्म 1892 में हुआ था' जबकि पृष्ठ संख्या 16 पर लिखा है, 'मूनिस का जन्म 1882 में हुआ था'। कहने की आवश्यकता नहीं कि 1882 वाली बात ही सही प्रतीत होती है।
भाषा में फिसलन से कभी-कभी प्रसंशा में कही गई बात भी घातक साबित हो जाती है। जैसे, मूनिस का हिन्दी प्रेम बताते हुए लेखक लिख जाता है कि 'मूनिस मुसलमान होते हुए भी हिन्दी के अनन्य सेवक थे'। (पृष्ठ 5) इस तरह के वाक्य से सामान्य मुसलमान की छवि हिन्दी विरोधी की बनती है। इससे कोई यह भी प्रमाणित करेगा कि हिन्दू हिन्दी सेवक हैं और फिर यह भी कि मुसलमानों की भाषा उर्दू है और हिंदुओं की हिन्दी।
कहने की आवश्यकता नहीं कि एन. एम. पी. श्रीवास्तव के बाद श्रीकांत अकेले ऐसे पत्रकार हैं जिनकी आधुनिक बिहार के इतिहास में गहरी अभिरुचि है। आधुनिक बिहार के विविध विषयों/पहलुओं पर आपके कई मूल्यवान शोधग्रंथ प्रकाशित हैं। आधुनिक बिहार के इतिहास में चंपारण, मूनिस और किसान आंदोलन में रुचि रखने वाले लोगों को यह किताब अवश्य देखनी चाहिए। वे तो और भी खास तवज्जो के साथ पढ़ें जो बिहार की हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास जानना/लिखना चाहते हों।
बिहार के बलिदानी
कहा जाता है कि कविता तीसरे पाठ के बाद भ्रष्ट हो जाती है और हम रिसर्चर किताब से किताब बनाये जा रहे हैं। 'स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के बलिदानी' (बिहार विधान परिषद सचिवालय, मार्च 2011) श्रीकांत जी की किताब है। इसमें पृष्ठ 31 पर मेरे गांव का नाम 'टेपारी' छपा है। मेरे गांव का नाम #तिनेरी है। गलत नाम पढ़कर दुख हुआ। लगा कि छापे की भूल है। लेकिन कल मैंने अपने विद्यालय की लाइब्रेरी से एक किताब निकाली। किताब का नाम है 'भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के शहीद'। लेखक वीरेंद्र कुमार 'वीरू' हैं। अनुराग प्रकाशन ने 2008 में इसे प्रकाशित किया है। इस किताब के पृष्ठ 35 पर भी अपने गांव का नाम 'टेपारी' छपा देख मन छोटा हो गया। क्या यह मूल दस्तावेज की गलती है अथवा मान लें कि किताब से किताब ही नहीं निकलती गलतियां भी निकलती हैं!
पुनश्च, श्रीकांत जी की किताब में तिथिवार शहीदों की सूची प्रकाशित है। उक्त सूची में मेरे गांव के 'शहीद' अम्बिका सिंह का जिक्र नहीं है।
अम्बिका सिंह की मृत्यु 10 अगस्त 1942 को गाँव के निकट रेल पटरी पर पुलिस की गोली लगने से हुई थी। तथ्य है कि रेल-पटरी उखाड़ने की कार्रवाई रात के वक्त हुई थी। सुबह वे धान का खेत देखने व शौच के ख्याल से निकले थे। तभी उन्हें गोली लगी थी। इस तरह वे इतिहास में 'शहीद' के रूप में दर्ज हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की यह कोई पहली ऐसी घटना नहीं है। 1942 के जमाने में पाखाना करते-करते 'शहीद' हो जाने की अनेक घटनाएं हैं। 1942 की ही क्रांति के समय आरा के पास जमीरा में पाखाना फिर रहे कुछ लोगों को गोली मार दी गई थी। (मन्मथनाथ गुप्त, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास, आत्माराम एंड संस, 2009, पृष्ठ 374) उन सब का का नाम 42 के शहीद में दर्ज है.
पुस्तक में कुछ महत्त्वपूर्ण शहीदों के नाम नहीं आ सके हैं। नवंबर 1930 में 'जवाहर दिवस' मनाने का आदेश निकला था। बिहार ने सबसे अधिक उत्साह के साथ इस दिवस को मनाया। इस दिवस को मनाने की तैयारियां देखकर ही बिहार सरकार घबरा गई थी और उसको रोकने के लिए सरकार ने कोई चेष्टा बाकी न रखी। इसके चलते बिहार में दो जगहों पर गोलियां भी चलाई गईं। #मुजफ्फरपुर का #भगवानदास इसी दिवस के मनाने में शहीद हुआ। (छविनाथ पांडेय, राजेंद्र अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 118) 19 जून, 1931 को हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर क्रांतिकारियों ने रेलवे कैश बैग को लूट लिया था। लूट में #रामदेनीसिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी और उन्हें फांसी की सजा भी इसी केस के मुतल्लिक हुई थी। (विनोद कुमार सिंह, मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 2011, पृष्ठ 43) #महेंद्रचौधरी भी ऐसे ही एक राजनीतिक कैदी का नाम है जिसे डाकाजनी और हत्या के अपराध में 7 अगस्त, 1945 को भागलपुर केन्द्रीय जेल में फांसी दी गई थी।
महात्मा गांधी और मैं
जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना से रामनन्दन मिश्र की पुस्तिका 'महात्मा गाँधी और मैं' का पुनर्प्रकाशन हुआ है। निस्संदेह यह ऐतिहासिक महत्त्व का काम है। नई पीढ़ी के लोगों के लिए, जिन्हें भारत और खासकर बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में रुचि है, विशेष महत्त्व की चीज है। नई पीढ़ी के लोगों को इसमें कई नई बातें मिलेंगी। एक नई बात मुझे भी मिली। मैं अब तक यही जानता था कि गाँधीजी को महात्मा की उपाधि टैगोर से मिली थी। इतिहास की प्रचलित किताबों में यही पढ़ा था। रामनन्दन मिश्र ने टैगोर की जगह लोकमान्य तिलक का नाम लिया है। (पृष्ठ 11)
दुखद है कि असाधारण महत्त्व की पुस्तिका में भी भाषा और प्रूफ की कई गड़बड़ियां हैं। पृष्ठ 14 पर लिखा है, 'स्वर्गीय सरोजिनी नायडू अक्सर गाँधीजी के पास आतीं और उनसे घंटों बातें करतीं।' हम यह तो जानते हैं कि गाँधीजी एक चमत्कारी व्यक्तित्व के आदमी थे किंतु अब तक यह पढ़ा-सुना न था कि वे मृतात्माओं के साथ भी घंटों बोल-बतिया सकते थे! नामों की समरूपता/एकरूपता का भी ध्यान नहीं रखा गया है, अर्थात कहीं 'राधाबाई' लिखा मिलता है तो कहीं 'राधावाई'। एक जगह 'राधाबहन' तो दूसरी जगह 'राधावहन'। पूरी किताब में 'ढ' और 'ढ़' के प्रयोग में असावधानी बरती गई है। अनुस्वार का कई जगहों पर अवांछित/अनावश्यक इस्तेमाल हुआ है। रुचि और रुपये भी कई जगह गलत (रूचि, रूपये) लिखे मिलते हैं। पृष्ठ (viii) पर 'घी' का स्त्रीलिंग-प्रयोग है : 'सबों को खाने में एक चम्मच घी मिलती थी'। यह प्रयोग व्याकरणसम्मत नहीं है। पुरुष (पुरूष) और पुरुषोत्तम (पुरूषोत्तम) लिखने में भी भूल हुई है। पृष्ठ 17 पर 'पूर्व-सर्गों' शब्द के लिए कोष्ठक में propositions लिखा गया है जबकि इसे कायदे से prepositions होना था।
बिहार में महात्मा गांधी
5 मार्च, 1947 को बापू कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही उन्होंने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, 'क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?' श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि 'बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।' इस भाषण के बाद बापू को एक 'तार' प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, 'बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।'
1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो। अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक 'रॉयल बेगर' ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।
ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, 'तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।'
श्रीकांत की किताब '1947-बिहार में महात्मा गांधी दंगों का दस्तावेज है। 5 मार्च 1947 से 23 मई 1947 तक बिहार के अलग-अलग दंगा-प्रभावित स्थानों की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी ने जो कुछ कहा था वह सब तभी 'दुःखे दिल की पुकार' पुस्तिका में प्रकाशित हुआ था। इस सामग्री के अलावे भी कई दस्तावेजों को खंगाल कर श्रीकांत ने अपनी किताब को पठनीय और प्रामाणिक बनाया है।
पुस्तक के आरंभ में गांधी संग्रहालय, पटना के रजी अहमद का 'अवलोकन' छपा है। प्रथम अनुच्छेद में 'राजनीतिक-गुलामी' में योजक चिह्न का बेजा प्रयोग हुआ है। दूसरे अनुच्छेद के प्रथम वाक्य का हिस्सा है : 'दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़े अभियान में'। 'लड़े अभियान' की जगह 'चले अभियान' श्रेयस्कर था। आगे लिखा है : "1916 के लखनऊ कांग्रेस के बाद, एक के बाद एक घटनायें सामने आती गईं....।" कहना अनावश्यक है कि एक के बाद एक घटना आती है! एक के बाद बहुवचन सर्वथा त्याज्य है। आगे लिखा है : 'ऐसे मील के पत्थर हैं जिसने...।' जिसने की जगह जिनने संभवतः ज्यादा उपयुक्त होता। 'युग पुरूष', 'गुरू गोविंद सिंह' की जगह 'युग पुरुष' और 'गुरु गोविंद सिंह' उचित था। 'लिखे एक पत्र में लिखा था'-यहाँ लिखने की क्रिया की अनावश्यक आवृत्ति है। अंतिम अनुच्छेद में Man of the Millennium असावधानीवश Man of the Million हो गया है। परिणाम स्वरूप और विस्तार पूर्वक साथ लिखे जाने चाहिए अर्थात परिणामस्वरूप तथा विस्तारपूर्वक। कुछ प्रूफ की भूलें भी हैं। उदाहरणार्थ तजुर्बों और पीढ़ियां 'तर्जुबों' तथा 'पीढ़ीयां' प्रकाशित हैं।