Saturday, September 12, 2026

किताबों में श्रीकांत

 (श्रीकांत जी के जन्मदिन के बहाने समय-समय पर उनकी किताबों पर की गई टिप्पणियों का कोलाज प्रस्तुत करते हुए)

दलित आंदोलन की पहली किताब

‘बिहार में दलित आंदोलन’ (1912-2000) पुस्तक के लेखक हैं प्रसन्न कुमार चौधरी एवं श्रीकांत। इससे पहले उनकी पुस्तक ‘बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’ अपने ‘जर्नलिस्टिक एप्रोच’ (प्रकाश लुइस) के बावजूद खासी चर्चा में रही।

‘बिहार में दलित आंदोलन’ पुस्तक बीसवीं सदी में बिहार के दलितों की स्थिति और उनके आंदोलन का एक दस्तावेज है। देश के अन्य हिस्सों, खासकर दक्षिण और पश्चिमी प्रदेशों में चले दलित आंदोलन और उनकी स्थिति पर तो काफी सामग्री उपलब्ध है, लेकिन बिहार के दलितों के बारे में सामग्रिक अध्ययन अब तक नहीं किया गया। यह किताब इसी अभाव को पूरा करने का एक प्रयास है। इस अध्ययन में लेखक को प्राथमिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ा है किंतु ये स्रोत भी ज्यादातर ‘नकारात्मक’ ही हैं-पुलिस तथा प्रशासन की रिपोर्टों के रूप में। यह अध्ययन एक ‘दस्तावेज’ इसलिए बन पड़ा है कि इसमें लगभग सभी उपलब्ध सामग्रियों को क्रमवार संकलित करने का प्रयास किया गया है।

इस अध्ययन को दस अध्यायों में सफलतापूर्वक समेटने का प्रयास किया गया है। प्रथम अध्याय ‘कमिया’, ‘क्रिमिनल’ और ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ है। इसमें बीसवीं सदी के आरंभ में बिहार के अछूतों की स्थिति प्रस्तुत की गई है। लेखक की राय है कि ‘भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के साथ जहां एक ओर औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज की कमजोरियों का आकलन-विश्लेषण तथा उनके निवारण की कोशिशें भी तेज हुईं। और आगे, ‘इसी आत्म-मंथन के बीच कई धर्म-सुधार तथा समाज-सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ।’ उपनिवेशवाद के खिलाफ यह संघर्ष न सिर्फ अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संघर्ष भर था, वरन वह भारतीय समाज की पुनर्रचना का भी आंदोलन बन गया। हमारा राजनीतिक संघर्ष भारतीय समाज की पुनर्रचना का आंदोलन किस हद तक था इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक द्वारा ही उद्धृत पंक्तियों का सहारा लें तो बेहतर होगा। ‘राजनीतिक आंदोलन के कई उग्र योद्धा सामाजिक प्रश्नों पर काफी पुरातनपंथी रुख रखते थे, और सामाजिक आंदोलन के कई गणमान्य नेता राजनीतिक आंदोलन के प्रति अधिक आग्रही नहीं थे। 1885 में कांग्रेस के पूना अधिवेशन में सामाजिक सुधार-विरोधी गुट विद्रोह कर बैठा और उसने धमकी दी कि यदि कांग्रेस ने सोशल कांफ्रेंस को अपने पंडाल का उपयोग करने की अनुमति दी तो पंडाल फूंक दिया जाएगा।’ यह भी सच है कि भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास के साथ ही जातीय संगठनों एवं साप्रदायिक दंगों का इतिहास जुड़ा है। 1885 में कांग्रेस की स्थापना होती है और दलित वर्गों का सबसे पुराना सामाजिक राजनीतिक संगठन 1892 में ‘द्रविड़ जनसभा’ नाम से अस्तित्व में आता है। पहला हिन्दू-मुस्लिम दंगा भी इसी के आसपास हुआ माना जाता है। इसकी तार्किक संगति बैठाने का पुस्तक में अभाव झलकता है।

दलित आंदोलन के उद्भव से संबंधित एक विचार साहित्य चिंतक डा. नामवर सिंह का भी है। वे लिखते हैं, ‘गनीमत है कि बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य में लेखकों का एक ऐसा समुदाय या वर्ग (संगठन नहीं) है जो अंग्रेजी शिक्षा से बहुत कुछ वंचित रह जाने के कारण इस नव-उपनिवेशवादी विचारधारा की गिरफ्त से बचा रह गया है। …भारतीय भाषाओं में ‘दलित साहित्य’…उसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जो प्राणवान और सार्थक है…साहित्य सृजन का अच्छा-खासा हिस्सा भारतीय समाज के उन लोगों की ओर से आया है जो हाशिए पर रहे हैं।’

बिहार में दलित आंदोलन का इतिहास लिखते हुए श्रीकांत ने दलित आंदोलन की वैचारिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश नहीं की है। यह आंदोलन बिहार में वर्षों से चल रहे ‘एग्रेरियन मुवमेंट’ से दार्शनिक स्तर पर कैसे भिन्न है, इसकी जांच अपेक्षित थी। लेकिन पाठकों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना होगा कि बिहार में दलित आंदोलन पर यह पहली पुस्तक है, पहला पाठ है।

बिहार में 'सुशासन' के नाम पर जो 'खेल' चल रहा है उसमें केवल अख़बारों के संपादक ही नहीं, अलख. एन. शर्मा जैसे 'एनजीओ बुद्धिजीवी' भी लिप्त हैं और मालामाल हो रहे हैं। अलख एन शर्मा की ताजा 'लीला' है-#डेवलपमेंटरिसर्चऑनबिहार (2000-2010) ए कम्पेनडियम'। इसे अलख एन शर्मा, अमृता दत्ता एवं जोयिता घोष ने सम्पादित किया है। यह 2000-2010 के बीच बिहार पर केंद्रित प्रकाशित पुस्तकों/शोध लेखों की सूची है। इस 'महत्वाकांक्षी' परियोजना की कई जानकारी अपर्याप्त/अपूर्ण और भ्रमपूर्ण है। उदाहरण के लिए 'दलित मूवमेंट इन बिहार (1912-2000) के लेखक प्रसन्न कुमार चौधरी के साथ श्रीकांत भी हैं। इस किताब का कई जगह उल्लेख तो है लेकिन कहीं भी लेखक के रूप में श्रीकांत का नाम नहीं है। इस शोध परियोजना की क्या जरूरत थी। सुशासन में लूट जारी है और यह सब वैश्विक स्तर पर है।

हिन्दी-सेवक मूनिस

पीर मुहम्मद मूनिस की रचनाओं एवं उनसे संबंधित दस्तावेजों का श्रीकांत ने 'अपनी बात' के साथ संकलन एवं संपादन किया है। पहली बार यह किताब सन 2000 में प्रकाशित हुई थी। इस संस्करण में कुछ अशुद्धियां शेष रह गई थीं जिनको आशुतोष पार्थेश्वर के सदुद्योग से दुरुस्त करते हुए चम्पारण सत्याग्रह के 100वें साल में प्रभात प्रकाशन के सौजन्य से पुनर्प्रकाशित किया गया है। हालांकि कुछ अशुद्धि रह ही गई है। उदाहरणार्थ, पृष्ठ संख्या 6 तथा कवर फ्लैप पर लिखा है कि 'मूनिस का जन्म 1892 में हुआ था' जबकि पृष्ठ संख्या 16 पर लिखा है, 'मूनिस का जन्म 1882 में हुआ था'। कहने की आवश्यकता नहीं कि 1882 वाली बात ही सही प्रतीत होती है।

भाषा में फिसलन से कभी-कभी प्रसंशा में कही गई बात भी घातक साबित हो जाती है। जैसे, मूनिस का हिन्दी प्रेम बताते हुए लेखक लिख जाता है कि 'मूनिस मुसलमान होते हुए भी हिन्दी के अनन्य सेवक थे'। (पृष्ठ 5) इस तरह के वाक्य से सामान्य मुसलमान की छवि हिन्दी विरोधी की बनती है। इससे कोई यह भी प्रमाणित करेगा कि हिन्दू हिन्दी सेवक हैं और फिर यह भी कि मुसलमानों की भाषा उर्दू है और हिंदुओं की हिन्दी।

कहने की आवश्यकता नहीं कि एन. एम. पी. श्रीवास्तव के बाद श्रीकांत अकेले ऐसे पत्रकार हैं जिनकी आधुनिक बिहार के इतिहास में गहरी अभिरुचि है। आधुनिक बिहार के विविध विषयों/पहलुओं पर आपके कई मूल्यवान शोधग्रंथ प्रकाशित हैं। आधुनिक बिहार के इतिहास में चंपारण, मूनिस और किसान आंदोलन में रुचि रखने वाले लोगों को यह किताब अवश्य देखनी चाहिए। वे तो और भी खास तवज्जो के साथ पढ़ें जो बिहार की हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास जानना/लिखना चाहते हों।

बिहार के बलिदानी

कहा जाता है कि कविता तीसरे पाठ के बाद भ्रष्ट हो जाती है और हम रिसर्चर किताब से किताब बनाये जा रहे हैं। 'स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के बलिदानी' (बिहार विधान परिषद सचिवालय, मार्च 2011) श्रीकांत जी की किताब है। इसमें पृष्ठ 31 पर मेरे गांव का नाम 'टेपारी' छपा है। मेरे गांव का नाम #तिनेरी है। गलत नाम पढ़कर दुख हुआ। लगा कि छापे की भूल है। लेकिन कल मैंने अपने विद्यालय की लाइब्रेरी से एक किताब निकाली। किताब का नाम है 'भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के शहीद'। लेखक वीरेंद्र कुमार 'वीरू' हैं। अनुराग प्रकाशन ने 2008 में इसे प्रकाशित किया है। इस किताब के पृष्ठ 35 पर भी अपने गांव का नाम 'टेपारी' छपा देख मन छोटा हो गया। क्या यह मूल दस्तावेज की गलती है अथवा मान लें कि किताब से किताब ही नहीं निकलती गलतियां भी निकलती हैं! 

पुनश्च, श्रीकांत जी की किताब में तिथिवार शहीदों की सूची प्रकाशित है। उक्त सूची में मेरे गांव के 'शहीद' अम्बिका सिंह का जिक्र नहीं है।

अम्बिका सिंह की मृत्यु 10 अगस्त 1942 को गाँव के निकट रेल पटरी पर पुलिस की गोली लगने से हुई थी। तथ्य है कि रेल-पटरी उखाड़ने की कार्रवाई रात के वक्त हुई थी। सुबह वे धान का खेत देखने व शौच के ख्याल से निकले थे। तभी उन्हें गोली लगी थी। इस तरह वे इतिहास में 'शहीद' के रूप में दर्ज हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की यह कोई पहली ऐसी घटना नहीं है। 1942 के जमाने में पाखाना करते-करते 'शहीद' हो जाने की अनेक घटनाएं हैं। 1942 की ही क्रांति के समय आरा के पास जमीरा में पाखाना फिर रहे कुछ लोगों को गोली मार दी गई थी। (मन्मथनाथ गुप्त, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास, आत्माराम एंड संस, 2009, पृष्ठ 374) उन सब का का नाम 42 के शहीद में दर्ज है.

पुस्तक में कुछ महत्त्वपूर्ण शहीदों के नाम नहीं आ सके हैं। नवंबर 1930 में 'जवाहर दिवस' मनाने का आदेश निकला था। बिहार ने सबसे अधिक उत्साह के साथ इस दिवस को मनाया। इस दिवस को मनाने की तैयारियां देखकर ही बिहार सरकार घबरा गई थी और उसको रोकने के लिए सरकार ने कोई चेष्टा बाकी न रखी। इसके चलते बिहार में दो जगहों पर गोलियां भी चलाई गईं।  #मुजफ्फरपुर का #भगवानदास इसी दिवस के मनाने में शहीद हुआ। (छविनाथ पांडेय, राजेंद्र अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 118) 19 जून, 1931 को हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर क्रांतिकारियों ने रेलवे कैश बैग को लूट लिया था। लूट में #रामदेनीसिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी और उन्हें फांसी की सजा भी इसी केस के मुतल्लिक हुई थी। (विनोद कुमार सिंह, मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 2011, पृष्ठ 43) #महेंद्रचौधरी भी ऐसे ही एक राजनीतिक कैदी का नाम है जिसे डाकाजनी और हत्या के अपराध में 7 अगस्त, 1945 को भागलपुर केन्द्रीय जेल में फांसी दी गई थी।

महात्मा गांधी और मैं

जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना से रामनन्दन मिश्र की पुस्तिका 'महात्मा गाँधी और मैं' का पुनर्प्रकाशन हुआ है। निस्संदेह यह ऐतिहासिक महत्त्व का काम है। नई पीढ़ी के लोगों के लिए, जिन्हें भारत और खासकर बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में रुचि है, विशेष महत्त्व की चीज है। नई पीढ़ी के लोगों को इसमें कई नई बातें मिलेंगी। एक नई बात मुझे भी मिली। मैं अब तक यही जानता था कि गाँधीजी को महात्मा की उपाधि टैगोर से मिली थी। इतिहास की प्रचलित किताबों में यही पढ़ा था। रामनन्दन मिश्र ने टैगोर की जगह लोकमान्य तिलक का नाम लिया है। (पृष्ठ 11)

दुखद है कि असाधारण महत्त्व की पुस्तिका में भी भाषा और प्रूफ की कई गड़बड़ियां हैं। पृष्ठ 14 पर लिखा है, 'स्वर्गीय सरोजिनी नायडू अक्सर गाँधीजी के पास आतीं और उनसे घंटों बातें करतीं।' हम यह तो जानते हैं कि गाँधीजी एक चमत्कारी व्यक्तित्व के आदमी थे किंतु अब तक यह पढ़ा-सुना न था कि वे मृतात्माओं के साथ भी घंटों बोल-बतिया सकते थे! नामों की समरूपता/एकरूपता का भी ध्यान नहीं रखा गया है, अर्थात कहीं 'राधाबाई' लिखा मिलता है तो कहीं 'राधावाई'। एक जगह 'राधाबहन' तो दूसरी जगह 'राधावहन'। पूरी किताब में 'ढ' और 'ढ़' के प्रयोग में असावधानी बरती गई है। अनुस्वार का कई जगहों पर अवांछित/अनावश्यक इस्तेमाल हुआ है। रुचि और रुपये भी कई जगह गलत (रूचि, रूपये) लिखे मिलते हैं। पृष्ठ (viii) पर 'घी' का स्त्रीलिंग-प्रयोग है : 'सबों को खाने में एक चम्मच घी मिलती थी'। यह प्रयोग व्याकरणसम्मत नहीं है। पुरुष (पुरूष) और पुरुषोत्तम (पुरूषोत्तम) लिखने में भी भूल हुई है। पृष्ठ 17 पर 'पूर्व-सर्गों' शब्द के लिए कोष्ठक में propositions लिखा गया है जबकि इसे कायदे से prepositions होना था।

बिहार में महात्मा गांधी

5 मार्च, 1947 को बापू कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही उन्होंने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, 'क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?' श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि 'बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।' इस भाषण के बाद बापू को एक 'तार' प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, 'बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।'

1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो। अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक 'रॉयल बेगर' ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।

ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, 'तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।'

श्रीकांत की किताब '1947-बिहार में महात्मा गांधी दंगों का दस्तावेज है। 5 मार्च 1947 से 23 मई 1947 तक बिहार के अलग-अलग दंगा-प्रभावित स्थानों की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी ने जो कुछ कहा था वह सब तभी 'दुःखे दिल की पुकार' पुस्तिका में प्रकाशित हुआ था। इस सामग्री के अलावे भी कई दस्तावेजों को खंगाल कर श्रीकांत ने अपनी किताब को पठनीय और प्रामाणिक बनाया है।

पुस्तक के आरंभ में गांधी संग्रहालय, पटना के रजी अहमद का 'अवलोकन' छपा है। प्रथम अनुच्छेद में 'राजनीतिक-गुलामी' में योजक चिह्न का बेजा प्रयोग हुआ है। दूसरे अनुच्छेद  के प्रथम वाक्य का हिस्सा है : 'दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़े अभियान में'। 'लड़े अभियान' की जगह 'चले अभियान' श्रेयस्कर था। आगे लिखा है : "1916 के लखनऊ कांग्रेस के बाद, एक के बाद एक घटनायें सामने आती गईं....।" कहना अनावश्यक है कि एक के बाद एक घटना आती है! एक के बाद बहुवचन सर्वथा त्याज्य है। आगे लिखा है : 'ऐसे मील के पत्थर हैं जिसने...।' जिसने की जगह जिनने संभवतः ज्यादा उपयुक्त होता। 'युग पुरूष', 'गुरू गोविंद सिंह' की जगह 'युग पुरुष' और 'गुरु गोविंद सिंह' उचित था। 'लिखे एक पत्र में लिखा था'-यहाँ लिखने की क्रिया की अनावश्यक आवृत्ति है। अंतिम अनुच्छेद में Man of the Millennium असावधानीवश Man of the Million हो गया है। परिणाम स्वरूप और विस्तार पूर्वक साथ लिखे जाने चाहिए अर्थात परिणामस्वरूप तथा विस्तारपूर्वक। कुछ प्रूफ की भूलें भी हैं। उदाहरणार्थ तजुर्बों और पीढ़ियां 'तर्जुबों' तथा 'पीढ़ीयां' प्रकाशित हैं।

बिहार में हिन्दी--प्रेमकुमार मणि

राजू रंजन जी इतिहास के प्राध्यापक हैं और हिन्दी में कविताएं लिखते हैं. सामयिक विषयों पर भी लिखते रहे हैं. कोई बीस साल या उससे भी पूर्व ' लोकदायरा ' पत्रिका के कोई आधा दर्जन अंक इन्होने  बड़े उत्साह से निकाला था. पिछले कुछ समय से इनकी चुप्पी से मैं चिंतित था. लेकिन कुछ समय पूर्व जब इनकी किताब ' बिहार में हिन्दी ' मिली तब अहसास हुआ उनकी चुप्पी क्यों थी. 

किताब (बिहार में हिन्दी : डा राजू रंजन प्रसाद) में कुल आठ लेख हैं जो एक साथ मिल कर सोच-विचार की एक दुनिया गढ़ते हैं. बिहार का सांस्कृतिक अध्ययन बहुत कम हुआ है. यह किताब इस दिशा में एक जरूरी कदम है. लेखों के शीर्षक बहुत कुछ कह जाते हैं, इसलिए इन्हें देखा जाना चाहिए -

हिन्दी का उद्भव एवं पूर्व मध्यकालीन बिहार 

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षा एवं हिन्दी में पाठ्यपुस्तक 

औपनिवेशिक बिहार में स्कूली शिक्षा एवं हिन्दी पत्रकारिता 

औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी कहानी का विकास 

बिहार में अंग्रेजी दमन एवं प्रतिरोध का साहित्य 

औपनिवेशिक बिहार में भागलपुर की हिन्दी पत्रकारिता 

औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी व्याकरण की परंपरा 

बिहार में नवजागरण और बिहार बंधु 

सभी लेख महत्वपूर्ण हैं. सन्दर्भ टिप्पणियों के साथ इन्हें अकादमिक अनुशासन के साथ लिखा गया है. इस दृष्टि से यह इतिहास के विद्यार्थियों केलिए भी उपयोगी है. लेकिन आम पाठक भी इससे बहुत कुछ ग्रहण कर सकते हैं. पिछली शताब्दियों के बिहार में हिन्दी, उसके साहित्य और  पत्रकारिता की क्या स्थिति थी और कुल मिला कर इस क्षेत्र के सामाजिक- राजनीतिक नवजागरण में हिन्दी वालों ने क्या भूमिका निभाई इस किताब से समझा जा सकता है. रामदीन सिंह की किताब  बिहार दर्पण की कडी में मैं इसे देखता हूँ. हाँ, औपनिवेशिकता से लेखक का क्या तात्पर्य है इसकी विवेचना होनी चाहिए थी. राजू जी जब लोकदायरा निकालते थे, तब भी उसे प्रति-औपनिवेशिक चेतना की पत्रिका घोषित किया था. इसकी सम्यक विवेचना अपेक्षित है. 

लगभग तीन सौ ( २९१) पृष्ठों की किताब के प्रकाशक हैं प्रलेक प्रकाशन, मुंबई. 

प्रेमकुमार मणि

किताबों के बारे में

विश्व पुस्तक दिवस (2022) की शाम भंवरलाल कसाणिया जी का फोन आया कि मैं अगर व्यस्त न होऊं तो उनसे ऑनलाइन पुस्तकों के बारे में बात करूँ। उन्होंने बातचीत का एक सिरा भी पकड़ा दिया कि आजकल शिक्षक कहलाने वाला समुदाय भी पढ़ाई-लिखाई और अंततः किताबों से दूर जा चुका है। उनकी बात से मुझे कृशन चंदर के 'एक गधे की आत्मकथा' की याद हो आई और 'गधों' के लिए थोड़ी करुणा भी पैदा कर सका। गधे की आत्मकथा का मजमून है कि गधों का मालिक वकील साहब के यहां काम पर लगा है। वकील साहब को अखबार पढ़ने की बुरी आदत थी लेकिन वे क्लासिफाइड विज्ञापन वाले कॉलम ही में रुचि लेते थे। वे जब विज्ञापन देख-पढ़ रहे होते तो संपादकीय पृष्ठ बाहर की तरफ खुलता। कहना अनावश्यक है कि गधे को भी अखबार पढ़ने की लत थी। इसलिए वह हमेशा इस ताक में रहता कि वकील साहब अखबार खोलें तो वह भी कुछ ताक-झाँक कर ले। इस तरह वकील साहब प्रतिदिन अखबार का विज्ञापन उलटते-पलटते और मौके का फायदा उठाकर गधा संपादकीय पृष्ठ पर अपनी नजरें टिका लेता। गधे को इस बुरी आदत के लिए मालिक की छड़ी भी खानी पड़ती लेकिन गधे ही क्या जो मार खा सुधर जाएं!

कृशन चंदर के गधे की तुलना मैं पटना-गया रेललाइन के यात्रियों से कर सकता हूँ। बचपन की स्मृति है कि जब कोई सज्जन अखबार लिए रेल डिब्बे में दाखिल होते तो एक साथ कई-कई लोग उसे झपट लेने को आतुर रहते। बेचारे का एक-एक पेज पूरी बोगी में फैल जाता। अखबार मालिक को छोड़ सबको पता होता कि कौन-सा पृष्ठ किसके पास है। वे आपस में पृष्ठों की अदला-बदली करते रहते और कभी-कभी तो अखबार मालिक को उसके बगैर ही अपने गंतव्य पर गाड़ी छोड़ देना होता। मैं कभी अखबार लेकर तो ट्रेन में नहीं चढ़ा लेकिन कंधे से लटकता कपड़े का एक झोला अवश्य होता जिसमें मार्क्सवादी साहित्य की दो-तीन किताबें होतीं और 'हंस-मेनस्ट्रीम' जैसी पत्रिकाएं। झोले से जैसे ही किताबें निकलतीं कि लोग अपने हाथ में लेने और उलट-पलट करने को बेचैन हो जाते। कभी-कभी ट्रेन में इतनी भीड़ होती कि बैठने भर की जगह न होती तो किताबें क्या निकलतीं। झोले में पड़ी-पड़ी ज्ञान का ताप फैलाती रहती। काफी बाद तक झोले की आदत बनी रही। पत्नी कभी टोकती भी कि जब पढ़ने का अवसर नहीं मिलता तो किताबें क्यों टांगे चलते हैं? मैं बेलज्ज सा जवाब देता-'इन कंधों को भार ढोने की आदत हो गई है। इससे संस्कार और संतुलन दोनों कायम रहता है!'

पुस्तकों में हमारे पुरखों के अनुभव कैद हैं। किसी राष्ट्र अथवा संस्कृति की स्मृति के दस्तावेज हैं। पारंपरिक भारतीय समाज में इसीलिए बड़े-बुजुर्गों का आदर/सम्मान होता था कि वे अनुभव के खजाने हैं। पूर्ववैदिक समाज में 'सभा', 'समिति' जैसी संस्थाओं का उल्लेख है जिनमें बुजुर्गो की खास भागीदारी पर ध्यान दिया जाता था लेकिन अफसोस कि आज हमारे परिवार की अवधारणा से बुजुर्ग गायब हैं। जो थोड़े बच भी गये हैं उनको हमने वृद्धाश्रम की राह दिखा दी है और एक नये बुजुर्ग 'गूगल बाबा' को ले आया है। गौर करें तो किताबों का संकट और बुजुर्गों का संकट साथ-साथ आया है। हमें मानवी बुद्धि नहीं कृत्रिम बुद्धि की दरकार हो चली है और सबसे बड़ी 'व्यावसायिक बुद्धि' है। मान लिया गया है कि पढ़े-लिखे लोगों में व्यावसायिक बुद्धि नहीं होती। उन्हें 'किताबी' कहकर उपेक्षित किया जाता रहा है। याद आता है कि अदम गोंडवी भी अपनी गजल में एक जगह 'किताबी' शब्द का प्रयोग करते हैं। कहते है-तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये दावा किताबी है। (स्मृति के आधार पर) कबीर तो पहले ही 'कागद लेखी' की जगह 'आँखिन देखी' को स्थापित कर चुके हैं। अब कबीर को भला कौन कहता कि कागद लेखी भी कभी आँखिन देखी रहा होगा। अकारण नहीं है कि वेद के ऋषियों को मंत्रों का 'रचयिता' नहीं 'द्रष्टा' कहा गया है!

एक तुलसी बाबा भी हैं जो स्कूल मास्टर की तरह डपटकर हिदायत दे गये हैं-शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। बड़े भाई बताते हैं कि पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के एक प्रोफेसर थे। दीनानाथ वर्मा नाम था। उनका सूत्रवाक्य था-पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना। किताब पढ़ना भी कला है। सब इस कला का निष्णात हो सम्भव नहीं। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों की बात कुछ और है! किताब को पढ़ना समय को पढ़ना है जिस समय में वह किताब लिखी गई। हर समय के अपने खास शब्द और मुहावरे होते हैं। एक समय के बाद शब्द और मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। इन बदले हुए अर्थ के साथ पुराने समय को पढ़ना जोखिम भरा और अनर्थकारी हो सकता है। संस्कृत की एक कहानी से इस बात को बेहतर समझा जा सकता है। कहानी है कि शास्त्र पढ़े हुए चार स्नातक ब्राह्मणकुमार थे। वे 'शास्त्रजीवी' थे मतलब शास्त्रोक्त काम ही करते थे। रोजगार के सिलसिले में वे गांव से बाहर निकले। शास्त्र साथ लेते गये। मेरे बाबा कहा करते थे कि 'तीर न कमान तो ...के पैठान'! खाली जगह में आप उपयुक्त शब्द रख छोड़ें, बाबा का कहा मैं नहीं लिख सकता। ब्राह्मणकुमार जैसे ही घर से निकले कि एक चौराहा मिला। जब शास्त्र उपस्थित हो तो भला किसी से क्यों पूछना कि किस राह जाना चाहिए? शास्त्र ने रास्ता दिखाया-महाजनो येन गताः स पन्थाः! दुर्योग कहिए कि उसी समय एक अर्थी ले जायी जा रही थी। स्नातकों ने समझा महाजन यानी ढेर सारे लोग। अनुगमन का मार्ग अपनाया। अब वे श्मशान में थे। साक्षात विपत्ति। अब क्या करें? पुनः शास्त्र खोला-विपत्ति में जो साथ खड़ा हो वही भाई है। तब सामूहिक रुदन का दौर था। गधे के गले लग रोने के क्रम में भाई ने दुलत्ती झाड़ दी। परिणाम की भयंकरता का आप खुद अनुमान कर लें। आगे बढ़े कि रात घिर आई। गाँव के मुखिया जी के घर ठहरे थे। खाने में मीठी सेवई मिली लेकिन शास्त्र में लिखा 'दीर्घसूत्री विनश्यन्ति' मिल गया। विनाश के भय से कुमारों ने कुछ न खाया। आगे की यात्रा शुरू। नदी गहरी मिली। एक को तैरना न आता था। डूबने-उतराने लगा। शास्त्र ने कहा, 'सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धत्यजति स: पंडित:'। पण्डितों ने डूबते शरीर का सिर बचा लिया। पूरे का मोह क्यों करता भला! गाँव लौटे तो तीन शरीर और एक सिर साथ था। उन कुमारों के साथ क्या सलूक हुआ होगा यह अब पूछना अनावश्यक है। इसलिए तुलसी बाबा का कहा मानिए और किताब को पढ़ने का सही तरीका अमल में लाइए! पाठ और पाठ....पुनर्पाठ!

Thursday, September 10, 2026

एक दलित की आत्मकथा

 प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित किताब एक दलित कीआत्मकथा (2022) मिली। लगा कि लेखक का नाम 'राम रक्षादास' गलत छप गया है। मेरी सहज व्याकरण-बुद्धि ने इसे सुधारकर 'रामरक्षा दास' पढ़ना शुरू किया। हालांकि नाम में बुद्धि काम नहीं करती तो मैंने लेखक को फोन लगाया। पता चला कि उनका सही नाम 'राम रक्षा दास' है। पुस्तक में नाम की अशुद्धि के साथ और भी कई तरह की अशुद्धियां रह गई हैं जो गम्भीर संपादन की मांग करती हैं। मसलन, पृष्ठ 17 पर 'खपरैल का घर' की बजाय 'खपरैल घर' लिखना श्रेयस्कर होता। घर लिखना अगर आवश्यक हो तो 'खपड़े का घर' लिखा जाना उचित है। पृष्ठ 18 पर 'अहसान', 'छह', 'पुत्रेष्ठि' की जगह 'एहसान', 'छः' और 'पुत्रेष्टि' का प्रयोग सही होता। पृष्ठ 22 पर 'मर्माहत' भूलवश 'मर्माहित' छप गया है तो पृष्ठ 23 पर 'फीट'। हिंदी में 'फुट' ही चलता है। पृष्ठ 40 पर 'अधिकांश' शब्द की जगह 'अधिकतर' लिखा जाना था। 'प्रीफेक्ट' को सर्वत्र 'परफेक्ट' (पृष्ठ 72 एवं अन्य) लिखा गया है। पृष्ठ 80 पर लिखा है, 'फूलन देवी मालिन जाति की लड़की थी।' कहना अनावश्यक है कि जाति का नाम तो माली है, मालिन उसका स्त्रीलिंग रूप हुआ। पृष्ठ संख्या 86 पर '57वीं जयंती समारोह' की बजाय '57वाँ जयन्ती समारोह' लिखा जाना चाहिए था।

पृष्ठ 116 पर लिखते हैं, '...तब तैमूरलंग याद आते हैं, जिन्हें 17 बार चढ़ाई करने के बाद 18वीं बार में सफलता मिली थी।' दरअसल यह बात महमूद गजनी के बारे में प्रचलित है।

लेखक को लगता है कि "इस देश और समाज में 'मनुस्मृति' के प्रावधान के विरुद्ध जाना खतरे से खाली नहीं है।" (पृष्ठ 226) इस समझ से उनके निजी जीवन के निर्णय तो प्रभावित होते ही हैं, इतिहास का विश्लेषण भी कहाँ अप्रभावित रह पाता है! बंगाल के एक प्रसंग में वे कहते हैं- "'मनुस्मृति' में शूद्रों को जज बनाने पर रोक है। अंग्रेजों ने 1861 में आई.पी.सी. एवं अन्य अधिनियम बनाए। इसके पहले तो 'मनुस्मृति' के कोड के आधार पर न्यायिक कार्य होता था। 'मनुस्मृति' में ब्राह्मणों को दंडित करने पर रोक है। लेकिन इस प्रावधान के विपरीत वॉरेन हेस्टिंग्स ने 5 अगस्त, 1775 में राजा नंद कुमार नामक एक ब्राह्मण को फाँसी दे दी। जिस तरह भागलपुर में हंगामा हुआ, उसी तरह 1775 में कलकत्ता में हंगामा खड़ा हुआ। अंग्रेजों का शासन तो ब्राह्मणों की मदद से चल रहा था। सारे ब्राह्मण पदाधिकारियों और नेताओं ने अंग्रेजों को सहयोग करना बंद कर दिया। नतीजा हुआ कि अंग्रेजों को अपनी राजधानी कलकता से हटाकर दिल्ली ले जानी पड़ी।" (पृष्ठ 225) 'मनुस्मृति' के प्रति उनकी 'अतिरिक्त सजगता' बंगाल के इतने लंबे अंतराल को ब्राह्मण-विरोध से पाट देती है।

किताब में कुछ रोचक निजी अनुभव हैं। जैसे, "मैथिल की तीन पहचान है-पान, पेटिशन और पैरवी। या तो वे पान खाते और सरौता से कसैली काटते रहेंगे या किसी के खिलाफ पेटिशन लिखते रहेंगे। इससे समय बचा तो पैरवी करने लगेंगे। पैरवी करने में भी उनका एक हाथ पैर पर और दूसरा गरदन पर रहता है।'' (पृष्ठ 157)

यह भी लिखा है कि पटना शहर के गर्दनीबाग मुहल्ले के नामकरण की कहानी 1942 की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी कही जाती है। उस समय यह संपूर्ण इलाका बाग-बगीचे से भरा था। अंग्रेज, आंदोलनकारियों की गर्दनों को इन्हीं पेड़ों से लटका दिया करते थे ताकि लोगों में भय और आतंक पैदा हो सके। इस तरह इस मुहल्ले का नाम गर्दनीबाग हुआ। (पृष्ठ 79) हालांकि इसका कोई दस्तावेजी साक्ष्य उनके पास नहीं है। अपने एक सीनियर पदाधिकारी के साथ हुई मौखिक बातचीत को आधार बनाया है। यद्यपि अतार्किक नहीं है।

'एक दलित की आत्मकथा' मुझे काफी रोचक लग रही है। यह हर हाल में पठनीय है। आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी हुई कई दिलचस्प जानकारियां हैं। कुछ जादू-टोने भी। उसमें लेखक का विश्वास थोड़ा डराता है तो वर्णित तथ्यों को थोड़ा अविश्वसनीय भी बनाता है। लेखक को यह अंधविश्वास थोड़ा 'विरासत' में मिला है तो थोड़ा अर्जित करना पड़ा है!

Tuesday, September 8, 2026

चंद किताबों के बारे में : 'दो शब्द'

इतिहास और साहित्य में इतना ही भेद है कि पहले में तिथि और पात्र वास्तविक हैं और बाकी सब कल्पना है जबकि दूसरे में तिथि और पात्र तो काल्पनिक हैं किंतु बाकी सब यथार्थ हैं। इतिहास के तथ्य के मामले में आप चाहें तो हाउसमान की इस उक्ति से सहमत हो सकते हैं कि 'यथातथ्य होना एक दायित्व है, कोई गुण नहीं।' सही है कि किसी 'इतिहासकार की यथातथ्यता की प्रशंसा वैसी ही है जैसे किसी वास्तुकार की इसलिए तारीफ की जाए कि उसने अपने भवन में पुरानी लकड़ियों का प्रयोग किया है अथवा ककीट का सही घोल बनाया है। यह तो उसके काम के लिए आवश्यक शर्त है, कोई वास्तविक कार्य नहीं।' (ई. एच. कार, इतिहास क्या है, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, द्वितीय हिन्दी संस्करण 1987, पृष्ठ 4)

'कंक्रीट के सही घोल का प्रयोग' वास्तुकार का कोई गुण नहीं है, यह तो भवन बनाने की पूर्वशर्त है। ठीक उसी तरह यथातथ्यता इतिहासकार की विशेषता न होकर इतिहास लेखन की एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। लेकिन यह भी सच है कि कंक्रीट के सही घोल के बगैर न तो सुंदर और मजबूत भवन की कल्पना की जा सकती है न ही यथातथ्यता के बगैर इतिहास की। इस बात से भी शायद ही कोई इंकार करे कि 'तथ्य, इतिहास की रीढ़ हैं'।

दुखद है कि बिहार के इतिहास से संबंधित अधिकतर प्रामाणिक कही जानेवाली किताबों में इसकी भारी उपेक्षा है। यहां तक कि प्रतिष्ठित शोध संस्थानों से प्रकाशित इतिहास की किताबों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। तथ्य को लेकर न लेखक गम्भीर है न प्रकाशक । छापे की इन भूलों को सुधारने के लिए लेखक जीवित रहे नहीं और शोध संस्थाओं के निदेशक अब पढ़े-लिखे होते नहीं कि इस ओर ध्यान जाय। कुछ सालों बाद पाठक इसे ही सच मानकर बिहार का 'प्रामाणिक' इतिहास लिखेंगे। इतिहास चाहे जैसा हो, प्रामाणिक ही होता है!

इधर के वर्षों में मैंने अपना अध्ययन औपनिवेशिक बिहार के गिर्द केंद्रित करने की कोशिश की है। जाहिर है, तथ्य को पवित्र मानकर मैंने इतिहास नहीं पढ़ा है। इतिहास के एक सजग विद्यार्थी को चाहिए कि वह न केवल इतिहासकार के मतव्यों पर नजर रखे अपितु तथ्यों की भी जांच करता चले। इसी जांच के क्रम में कुछ किताबों पर अपनी टिप्पणी दे दी है। यह किताब और परिशिष्ट उसी का नतीजा है।

बिहार में हिंदी

कहना अनावश्यक है कि हिंदी भाषा एवं साहित्य के इतिहास लेखन में बिहार की भूमिका उपेक्षित रही है। डॉ. राजू रंजन प्रसाद की 'बिहार में हिंदी' बिहार एवं हिंदी को केंद्र में रखकर लिखी गई सम्भवतः पहली किताब है। डॉ. प्रसाद की 'अष्टाध्यायी' इस किताब के पहले अध्याय में पूर्व मध्यकालीन बिहार में हिंदी के उद्भव एवं विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को परखते हुए यह दिखलाने का प्रयास है कि नाथों-सिद्धों के रूप में बिहार हिंदी की आदिभूमि रहा है।

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में बिहार के शिक्षा जगत में भाषा और लिपि की समस्या के साथ ही विद्यार्थियों के सम्मुख टेक्स्टबुक की समस्या उपस्थित हुई। फैलन एवं भूदेव मुखोपाध्याय के नेतृत्व में देशी-विदेशी हिंदी लेखकों की एक फौज ने पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अपना हाथ बंटाया। राय सोहनलाल और मुंशी राधालाल जैसे विद्वानों ने हिंदी का आरंभिक कोश तैयार किया। फ्रेडरिक पिन्काट जैसे विदेशी विद्वानों ने बिहार के बच्चों की पाठ-सामग्री तैयार की। इन पाठ्यपुस्तकों को पटना के बिहार बन्धु एवं खड्गविलास प्रेस ने प्रकाशित कर सुलभ कराया और नवलकिशोर प्रेस के एकाधिकार को समाप्त किया। यही वह काल है जब बिहारी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए 'विद्यार्थी' और 'शिक्षा' जैसे पत्र निकले। पुस्तक के दूसरे और तीसरे अध्याय में इन तथ्यों की गहरी पड़ताल की गई है। कहना जरूरी है कि औपनिवेशिक बिहार में पाठ्यपुस्तक से सम्बंधित सामग्री और उसकी समीक्षा पहली बार 'बिहार में हिंदी' किताब में पढ़ने को मिलेगी।

आधुनिक हिंदी के विकास में बिहार अग्रणी भूमिका में रहा है। आरंभिक जीवनीकारों में जिस तरह शिवनंदन सहाय को नहीं भुलाया जा सकता ठीक उसी तरह हिंदी कहानी की बात सदल मिश्र को छोड़कर नहीं की जा सकती। पुस्तक के चौथे अध्याय में औपनिवेशिक बिहार की हिंदी कहानी का संक्षिप्त इतिहास संकलित है तो पांचवें अध्याय में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध रचे गये साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत है। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शती के पूर्वार्ध में हिंदी और इसकी बोलियों में रचित साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है जिसे विदेशी शासन के कोप का शिकार होना पड़ा और प्रतिबंधित हुआ।

निराला को जिस मुक्तछंद की कविता को स्थापित करने का श्रेय प्राप्त है, दरअसल, उसके प्रवर्तक होने का गौरव बिहार के कवि महेश नारायण को प्राप्त है। बिहार केवल खड़ी बोली आंदोलन और साहित्य का सृजन ही नहीं कर रहा था बल्कि उसकी भाषा को भी एक मानक और मर्यादित रूप दे रहा था। न केवल पहला हिंदी व्याकरण बिहार में लिखा गया बल्कि अयोध्या प्रसाद खत्री, केशवराम भट्ट, सकलनारायण शर्मा, रामावतार शर्मा, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने बिहार की भूमि से आधुनिक हिंदी को अपने व्याकरण ग्रंथों के माध्यम से अनुशासित एवं परिष्कृत करने का काम किया। इन बातों को जन-जन तक पहुंचाने में बिहार बन्धु छापाखाना और पत्र की महती भूमिका रही है। किंतु हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने कृतघ्नता ज्ञापित की है। इन सब बातों की विवेचना आप पुस्तक के सातवें-आठवें अध्याय में पढ़ सकेंगे।

Monday, September 7, 2026

किताब के पीछे से एक आवाज आती है---मृणाल वल्लरी

क्या पढ़ना खाने-पीने, घूमने-फिरने जैसी सहज प्रक्रिया हो सकती है? वैसे, अब भोजन करना भी सहज प्रक्रिया कहां रही? रोटी में अब हमें कार्बोहाइड्रेट दिखता है तो दाल में प्रोटीन। और अब कहा जा रहा है कि दाल में भी प्रोटीन जरा सा ही है। आज के समय में ज्यादातर लोगों को अहसास करवाया जा रहा है कि वे अब तक जो भी खा रहे थे, गलत खा रहे थे। यहां पर एक अस्वीकरण...जाहिर सी बात है कि दुनिया में अभी पुरानी किताबों वाला वर्ग संघर्ष चल ही रहा है तो, यह एक बहुत छोटा तबका है, जो अभी खाना कैसे खाएं वाले शिक्षकों का विद्यार्थी बना बैठा है। दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए समस्या यही है कि क्या खाएं, कैसे भूख मिटाएं।

खाना कैसे खाएं की भेड़चाल के बीच नजर पड़ती है राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारें में’। क्या किताबों के बारे में भी कहा जा सकता है कि ‘हम किताब कैसे पढ़ें’। किताब के प्राक्कथन में यह वाक्य पढ़ते ही जेहन में याद आ गया पिछले दिनों गीतांजलि श्री की किताब रेत समाधि के बारे में। रेत समाधि को बुकर सम्मान मिलते ही हिंदी के पाठकों ने उसे पढ़ना शुरू कर दिया। बहुत से पाठकों ने किताब की भाषा, शैली पर सवाल उठाए। उसी समय कुछ ऐसे विद्वान भी सामने आए जिन्होंने रेत समाधि को पढ़ने के एक सौ एक तरीकेनुमा लेख भी लिखे। जब तक रेत समाधि को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिला था, तब तक किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि पाठकों को रेत समाधि पढ़ने के नुस्खे बता दिए जाएं।

किताब और पाठक और अब प्रकाशक के भी ऐसे संबंधों को समझने के लिए राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारे में’ पढ़ लेना बतौर पाठक खुद को समृद्ध कर लेना होगा। ‘चंद किताबों के बारे में’ राजू रंजन प्रसाद के विभिन्न मंचों पर लिखे गए लेखों का संग्रह है। ये लेख दो अलग-अलग माध्यमों के जरिए पाठकों तक पहुंचे। कुछ लेख अखबार व पत्रिकाओं में छपे हैं तो कई लेख को लेखक ने अपने फेसबुक खाते की दीवार पर प्रकाशित किया है। इन लेखों में हम पहला अंतर माध्यमों का देखेंगे। बतौर लेखक राजू रंजन प्रसाद जब पत्र-पत्रिकाओं के निर्धारित अनुशासन के इतर सोशल मीडिया पर आते हैं तो ज्यादा मुखर होते हैं। लेखक इतिहास के अकादमिक विद्वान हैं और साहित्य के अध्येता हैं। फेसबुक की दीवार की सबसे खास बात यह है कि लेखक, अपने संपादक खुद ही हैं। इसलिए इस माध्यम पर वे ज्यादा बेबाक नजर आते हैं। उनके लिखने की गति भी तेज होती है और वे कई विषयों पर सवाल उठाते हैं। लेकिन उनके लिए फेसबुक लेखन वैचारिक विरेचन जैसा नहीं होता है। फेसबुक पर भी वे अपनी अकादमिक जिम्मेदारियों को क्षण भर के लिए भी नहीं भूलते हैं। वहां भी जो लिखते हैं पुख्ता स्रोतों और अपनी पूरी समझ के साथ। शायद इसलिए घनघोर वैचारिक बहसों के बाद भी उन्हें कभी अपनी पोस्ट को डिलीट करने की नौबत नहीं आई है।

हम गणित के सवाल कैसे हल करते हैं, विज्ञान की गुत्थियों को कैसे समझते हैं, संस्कृत के श्लोकों को कैसे देखते हैं, कविता की व्याख्या कैसे करते हैं, हम कौन सी किताब पढ़ने के ख्वाहिशमंद होते हैं, किताबों को कैसे पढ़ते व समझते हैं, यह सब बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हमने इतिहास को कितना और कैसे पढ़ा है। इतिहास सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में नहीं पढ़ा जाता। इतिहास दादी-नानी, दादा-दादी की कहानियों में होता है, खेतों-खलिहानों, कारखानों में होता है। और अब इतिहास वाट्सएप और फेसबुक पर भी है।

इतिहास-लेखन को लेकर राजू रंजन प्रसाद कहते हैं-‘इतिहास लेखन शुरू से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है क्योंकि जनमानस को प्रभावित करनेवाला यह सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए इतिहास की चिंता सबको होती है, इसकी जरूरत सबको पड़ती है।’

किताब का पहला अध्याय चंद किताबों के बारे में उन किताबों पर रोचक टिप्पणियां हैं जो अपने लिखे जाने के समय से लेकर अब तक सवालों से मुठभेड़ करती हैं। इसमें लेखक सूत्र देते हुए कहते हैं, ‘बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। लेखक अपने बड़े भाई के हवाले से कहते हैं-‘अच्छा पाठक वह नहीं है जो बहुत कुछ या सब कुछ पढ़ता है, बल्कि वह है जो यह जानता है कि उसे क्या पढ़ना है और क्या नहीं, आज भी मुझे सूत्रवाक्य की तरह लगती है।’ यह सूत्र आगे जाकर कहता है, ‘पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। हम अपने किशोर समय में जो किताबें पढ़ते हैं वे हमें सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। अक्सर देखा गया है कि बड़ी उम्र में जाने के बाद कई लोग किशोरावस्था में पढ़ी गई किताबों को फिर से समझते हैं तो अपनी मानसिक बनावट पर अचरज करते हैं। पहले पढ़ी हुई किताब एकदम नई सी लगने लगती है। राम शरण शर्मा की पुस्तक प्राचीन भारत की चर्चा करते हुए लेखक की टिप्पणी है-‘लगता है, इस किताब को शर्मा जी ने बड़े ही धैर्य से लिखा है। कहीं से भी नहीं लगता कि इतिहास-दर्शन पढ़ाया जा रहा है जबकि छात्र उससे लैस होता चलता है। यह ऐसी किताब है जिसे पढ़ते हुए लेखक की बात सुनाई देती है। ई.एच. कार ने इतिहास क्या है में लिखा है कि किताब के पीछे से एक आवाज आती है। आवाज अगर सुनायी न दे तो लेखक गूंगा है या फिर पाठक बहरा है।’

लाला हरदयाल की किताब ‘हिंट्स फार सेल्फ कल्चर’ का जिक्र करते हुए लेखक लिखते हैं-इसमें इतिहास, गणित एवं भूगोल जैसे विषयों से लेकर संगीत तक पर जानकारी उपलब्ध है। उसी किताब में मैंने इतिहास के बारे में पढ़ा था कि यह...उस्तरे की तरह है जिससे सफलतापूर्वक दाढ़ी बनाकर आप सुंदर दिख सकते हैं लेकिन आपने थोड़ी भी लापरवाही या असावधानी बरती कि अपने को घायल कर लेंगे। लेखक लाला हरदयाल के दिए नुस्खे साझा करते हुए लेखक लिखते हैं-‘कोई भी पुस्तक आप पढ़ें तो उसके नोट्स अवश्य लें। बगैर नोट्स की पढ़ाई की तुलना उन्होंने ढालुआं छत की वर्षा से की थी। मूसलाधार बारिश के बाद भी पानी की बूंदें वहां ठहर नहीं पातीं। इस हिदायत को ताख पर रखकर पढ़नेवालों का बुरा हाल होते मैंने देखा है। आसपास ऐसे लोग बिखरे पड़े हैं जिन्होंने पढ़ा तो बहुत कुछ (एक सीमा में कहें तो शायद सब कुछ!) लेकिन लिखा कुछ नहीं। शायद कुछ अकाट्य लिखना चाहते हों।’ हालांकि यहां लेखक पाठकों के साथ कुछ ज्यादती करते दिख रहे हैं। पढ़ना अलग क्रिया है और लिखना अलग। हर पढ़नेवाला कुछ लिख भी ले यह जरूरी नहीं। दुनिया में बहुत सारा श्रेष्ठ उन लोगों ने भी रचा है, जिन्होंने बहुत सारा श्रेष्ठ नहीं पढ़ा है। लेखक जब लिखते हैं कि मैं अपनी किताबें ऐसे दिखाता था जैसे औरतें अपने गहने तो मन सवालिया होता है। क्या लेखक के समकालीन समाज में ऐसी औरतें नहीं थीं जो किताबें दिखाती थीं? फिर तो किताबों के पढ़ने की एक और श्रेणी विकसित करनी पड़ेगी स्त्रियों के संदर्भ में।

लेखक उस दौर का भी जिक्र करते हैं, जब किताब लिखना बहुत मुश्किल काम नहीं रहा और उससे जीवन के अनुभव गायब होते गए। इसी क्रम में कबीर किताब की बातों का उपहास उड़ा कर ‘आंखिन देखी’ को प्रमाणिक मानते हैं। लेखक साहित्यिक बहस में भी इतिहास की लेंस को लाना नहीं भूलते हैं। ‘मुसलमान’ एक पत्र प्रतिक्रिया शीर्षक वाले लेख में आलोचना के अंक 91 में कवि देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ नामक कविता पर हुई बहस के संदर्भ में राजू रंजन प्रसाद लिखते हैं-‘कविता में जो द्वंद्व उभरकर आया है वह व्यक्ति का-खुद कवि का अंतिर्विरोध है। कवि को न तो इतिहास की कोई स्पष्ट समझ है न तो समाज को देखने का सही नजरिया है। इसलिए इतिहास में वर्णित मिथकों का जिक्र करके प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाने की कोशिश में वह असफल हो जाता है। बजाए, इसकी, प्रगतिशीलता के आइने में उनका रोबीला सांप्रदायिक चेहरा बेपर्द हो जाता है। कवि इतिहास के मिथकों में फंसकर खुद नये मिथक गढ़ने शुरू कर देता है।’ इतिहास में एक खास तर्कशैली पर सवाल उठाते हुए लेखक पूछते हैं-‘मुसलमानों के आगमन से ही कबीर, गालिब पैदा हुए यह इतिहास की कौन-सी व्याख्या है। असलियत तो यह है कि ये सारे लोग सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की उपज थे। मार्क्सवादी अंदाज में कहा जाए तो ‘हिस्टॉरिकल डेवलपमेंट’ की नियति थे।’ ध्यान रहे कि लेखक ने यह हस्तक्षेप 16 नवंबर, 1990 को नवभारत टाइम्स के पत्रों के कालम में किया था। वहीं एक रेडियो कार्यक्रम में हरेकृष्ण झा के कविता संग्रह पर बात करते हुए लेखक कहते हैं-‘कहने को तो पूंजीवाद की भी एक क्रांतिकारी भूमिका है, लेकिन अक्सर होता ऐसा है कि सामंतवाद के साथ यह तीव्र संघर्ष न करके उसके साथ समझौता कर लेता है।’

भाषा और अस्मिता की खोज के संदर्भ में लेखक उद्धृत करते हैं-‘दरअसल भाषा का सवाल कभी सिर्फ भाषा का सवाल नहीं होता। यह अपनी बुनियाद में ही किसी राष्ट्र की और उसकी अस्मिता का सवाल होता है।’

राजू रंजन प्रसाद के लेखकीय अस्तित्व में एक शिक्षक की आवाज भी गूंजती है। शिक्षक की आंखें त्रुटियां, चालाकी, काहिलियत को जल्दी पकड़ लेती हैं। किताब का अध्याय ‘परिशिष्ट’ इसकी बानगी है। साहित्य से लेकर पत्रकारिता व राजनीति तक में गैरजिम्मेदारी की पहचान कर उसे सार्वजनिक करना आज के दौर में सबसे ऐतिहासिक काम है। राजनीति में पहले विपक्ष और प्रतिपक्ष जैसे शब्द होते थे। अब राजनीति में विपक्ष के लिए धड़ल्ले से ‘विरोधी पार्टी’ जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही आज साहित्य में भाषा, व्याकरण और तथ्यों की भूल बताने वाले को ‘विरोधी’ बताया जाता है। इंटरनेट पर के लेखन को वाट्सएप यूनिवर्सिटी की संज्ञा मिलने की वजह यही है कि लिखने और पढ़ने वाले के बीच कोई संपादक, कोई शिक्षक जैसी जिम्मेदार संस्था नहीं है। राजू रंजन प्रसाद इंटरनेट लेखन पर शिक्षक और अकादमिक की जिम्मेदारी बखूबी निभाते नजर आते हैं। किताब के इस खंड में उनकी जिम्मेदारी, निर्भीकता और लेखन को लेकर अभय मुद्रा दिखती है। प्रभाकर प्रकाशन से आई इस किताब को पढ़ने के बाद आपको अपनी पढ़ी हुई किताबों की याद जरूर आएगी कि आपने उसे क्यों और कैसे पढ़ा। यहीं पर राजू रंजन प्रसाद सफल होते दिखते हैं।