Friday, September 25, 2026

रामलोचन शरण बिहारी एवं बालक की पत्रकारिता

पुस्तक भंडार, लहेरियासराय के मालिक रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) का बाल साहित्य की रचना और प्रकाशन में वही स्थान है जो गुजराती भाषा में आचार्य गिजूभाई को प्राप्त है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ-502) यूनेस्को से जो शिक्षा-सम्बंधी सूचना प्रकाशित हुई थी, उसमें चौदह पुस्तकों के बीच आपकी भी एक पुस्तक की चर्चा है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502, पाद टिप्पणी संख्या-2) बाल शिक्षा साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘मनोहर पोथी’ आप ही की रचना है। आपने बिहार में पढ़ाई जानेवाली प्रायः सभी कक्षाओं की पुस्तकों का मुद्रण एवं प्रकाशन किया। 

‘बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार है’, इस सिद्धांत को ध्यान में रखकर रामलोचन शरण बिहारी ने सन् 1926 ई. से ‘बालक’ सचित्र मासिक का प्रकाशन शुरू किया। कहना न होगा कि आचार्य शिवपूजन सहाय ने निराला को पत्र (16. 2. 28) लिखने के लिए अपने जिस पैड का इस्तेमाल किया है, उस पर ‘बालक’ सचित्र मासिक छपा है। (रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 12)

'बालक' के आरंभिक संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे, बाद के दिनों में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। (एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ-76) ‘बालक’ के प्रवेशांक को वणिक प्रेस, कलकत्ता में मुद्रित कराया गया। तब वहीं ‘समन्वय’ में बाबू शिवपूजन सहाय कार्यरत थे। इसके आरंभिक दो अंक शिवपूजन सहाय द्वारा ही संपादित होकर उन्हीं की देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। शिवजी को लिखे बेनीपुरी के पत्रों से ज्ञात होता है कि संपादन का सारा भार बेनीपुरी जी ने शिवजी पर छोड़ दिया था। यद्यपि पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी का नाम ही छपता रहा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 96) 1926 से 28 तक बेनीपुरी जी, 'बालक' के प्रधान संपादक रहे। बालक की परिकल्पना में रामवृक्ष बेनीपुरी का बराबर की भागीदारी थी इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’

तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा, क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में रामलोचनशरण बिहारी का नाम जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। शांतिप्रिय द्विवेदी ने निराला को पत्र (11. 6. 1928) में वर्णित किया कि बेनीपुरी ने ‘बालक’ और लहेरियासराय को छोड़ दिया। अब शिवपूजन जी एकच्छत्र सम्राट हैं। (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 137-38 में उद्धृत) इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। विनोदशंकर व्यास ने निराला को पत्र (15. 7. 27) लिखा, ‘‘शिवजी को अपने कार्य से छुट्टी नहीं मिलती, वह ‘बालक’ में ही व्यस्त रहते हैं।’’ (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ में उद्धृत।) संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में एक प्रेस खोला, जिसका नामकरण ‘विद्यापति प्रेस’ किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण विद्यापति प्रेस, लहेरियासराय में ही होने लगा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96)

रामलोचनशरण बिहारी के संपादन में ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत हिन्दी-पुस्तक-भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) से 1926 ई. (संवत् 1983 वि.) में ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ था। इसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापति (पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, बाबू शिवनन्दन सहाय, पंडित सकलनारायण पाण्डेय एवं पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र) तथा पांच स्वागताध्यक्षों के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में बालक पत्रिका (वार्षिक मूल्य 3 रुपये, प्रति मास 48 पृष्ठ और 30-32 चित्र) का विज्ञापन (नमूना) छपा था-‘‘आजतक हिन्दी में जितने बालोपयोगी पत्र निकल चुके हैं या निकलते हैं, उनसे इसमें अनेक विशेषताएं हैं। बंगला, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी आदि उन्नत भाषाओं के बालोपयोगी पत्रों के सामने रखने योग्य अभी तक इसके सिवा कोई पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी में नहीं निकला। इसके अन्दर बालकों की ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन के सभी प्रकार के साधन उपस्थित हैं। इसमें 16 स्थायी सचित्र शीर्षक हैं, जिनमें विविध शिक्षाप्रद सामयिक विषयों के समावेश किया गया है, जिनसे प्रति मास बालकों को भिन्न-भिन्न भांति की लाभदायक बातें मालूम हो जाती हैं। छपाई, सफाई, शुद्धता और सुन्दरता तथा भाषा की सरलता और विषयों के चुनाव पर इतना काफी ध्यान दिया जाता है कि इसका नियमित रूप से पढ़नेवाला बालक थोड़े ही दिनों में विविध उपयोगी ज्ञानों का भण्डार बन जायगा। ‘विज्ञान’, ‘बहादुरी की बातें’, ‘केसर की क्यारी’, ‘जीवजन्तु’, ‘इतिहास’, ‘अनोखी दुनिया’, ‘वह कौन है?’, ‘बुढ़िया की कहानी’, ‘पँचमेल मिठाई’, ‘पूछताछ’, ‘भला-चंगा’, ‘हँसी-खुसी’, ‘कहाँ और क्या’, ‘बालक की बैठक’, ‘बालचर’ और ‘संपादक की झोली’-इन 16 स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चौथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चौदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। उक्त सभी विषयों के समावेश के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि ऐसी एक बात भी न हो जिससे बालकों का वास्तविक हित न हो। यही कारण है कि सभी पत्रों और विद्वानों ने मुक्त कंठ से इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यदि आप अपने बालकों का सच्चा कल्याण चाहते हैं, उनके जीवन को मंगल और आनन्द से भरपूर बनाना चाहते हैं, तो इस ‘बालक’ द्वारा उनके ज्ञान का खजाना भरिये।’’ 

आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96) जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा, उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं: ‘आयरलैंड के प्रसिद्ध नेता डी. वेलरा का स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रखी जाय और दूसरी ओर मातृभाषा, तो मैं मातृभाषा को लूँगा क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूँगा।’ (मंगलमूर्ति, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 97 में उद्धृत)

हिन्दी का कोई भी छोटा-बड़ा ऐसा लेखक नहीं था जिसकी रचनाएँ बालक में न छपती थीं। रामधारी सिंह दिनकर, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', आरसीप्रसाद सिंह, हंसकुमार तिवारी, गोपाल सिंह 'नेपाली' आदि की काव्य-प्रतिभा 'बालक' ही के पृष्ठों में पल्लवित हुई। राष्ट्रीय स्तर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी हिन्दी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोपाल सिंह नेपाली की पहली कविता रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में ही ‘बालक’ पत्रिका में छपी थी। शीर्षक की पंक्ति थी ‘भारत गगन के जगमग सितारे’। यह संभवतः 1926-27 की बात थी, और उस समय नेपाली तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे-उम्र कोई 15-16 वर्ष रही होगी। (सुरेश सलिल, कुछ गूंज हुई, कुछ गीत गए, आजकल: नवंबर 2011) राष्ट्रभाषा परिषद् की ‘परिषद पत्रिका’ (वर्ष 38, अंक 1-4, मार्च 2000, पृष्ठ 31) के अनुसार गोपाल सिंह नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी बतायी जाती है जो सही नहीं है। आरसी प्रसाद सिंह का 'आम का पेड़' 'बालक' में 1927 में प्रकाशित हुआ था। (हिन्दी सेवी संसार, पृष्ठ 13) 1928 के दिनों में नलिनविलोचन शर्मा की बहन कुमुद्वती 'बालक' के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। नलिन जी की भी समय-समय पर कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। (नलिन स्मृति अंक, नई धारा, पृष्ठ 28)

‘बालक’ ने स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बाल सामग्री की प्रस्तुति में एक प्रतिमान उपस्थित किया। सन् 1969 ई. में ‘बालक’ की प्रसार संख्या 22,000 थी। (यह आंकड़ा प्रेस इन इंडिया (1968-69), मिनिस्ट्री ऑफ इनफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली से लिया गया है।) किसी भी साप्ताहिक या मासिक में सबसे ज्यादा इसी की बिक्री थी। (रामजी मिश्र ‘मनोहर’, बिहार में हिन्दी-पत्रकारिता का विकास, काशी प्रसाद जायसवाल शोध-संस्थान, पटना, 1998, पृष्ठ 135) इससे बिहार में सुरुचिपूर्ण बाल पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। इन्होंने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले लुभावने एवं आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इनका महत्तम योगदान यह है कि इनसे बच्चों में साहित्यिक रुचि का विकास हुआ, उनकी भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ तथा उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की आशातीत वृद्धि हुई।

स्वतंत्रता से पहले रामलोचन शरण बिहारी की भूमिका अंग्रेजपरस्त की रही। मई, 1935 में जब सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती मनाई गई थी,  उन्होंने न केवल बहुत उत्साह के साथ उसमें योग दिया था बल्कि ‘बालक’ का रजत जयन्ती अंक बहुत सुन्दर निकाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी साज-सज्जा में यह जनवरी, 1935 के अपने ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव में भी आपने उसी उत्साह से सेवा की थी। उस अवसर पर भी बालक के द्वारा आपने राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया था। सम्राट पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी आपका शोक-प्रकाश 'बालक' के विशेषांक में प्रकट हुआ था। (जयन्ती-स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 712) सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘कॉरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502)

Monday, September 21, 2026

अपने अपने कुरुक्षेत्र

प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन बहुत ही सावधानी और होशियारी के साथ करने की जरुरत है। कारण कि हमारे अधिकतर ग्रंथ एक समय में और एक व्यक्ति के द्वारा नहीं लिखे गये हैं। महाभारत को 'जय', 'भारत' और 'महाभारत'-तीन चरणों में लिखे जाने की बात पर अधिकतर इतिहासकार एकमत हैं। कई चरणों में लिखे जाने का मतलब होता है कई युगों की कहानियों और घटनाओं को समेटते चलना। प्राचीन ग्रंथों की यह परिस्थितिजन्य विशेषता है। 'महाभारत' के बारे में तो लेखक का स्पष्ट दावा भी है कि 'अबतक का सारा ज्ञान इसमें निबद्ध है, और जो कुछ इसमें नहीं है, वह ज्ञान ही नहीं है।' लेखक की इस 'वीर-घोषणा' से न सिर्फ 'महाभारत' की ऐतिहासिक महत्ता का बोध होता है बल्कि इस बात का भी सहज अनुमान हो जाता है कि लेखक अपने समय में उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान को एक ही जगह ठूंस-ठांसकर संकलित कर देना चाहता है। इस तरह के उद्देश्य/दावा वाले ग्रन्थों के संपादन के लिए असीम धैर्य और अवकाश की आवश्यकता थी जिसका इन ग्रंथकारों के पास सख्त अभाव दिखता है। उनकी इस 'हड़बड़ी' का कारण वाचिक परंपरा से जन्मा होगा। इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि 'महाभारत' में वे तमाम तरह के किस्से आ गये हैं जिनका मूलकथा से कोई संबंध नहीं है। कई बार ये किस्से परस्परविरोधी भी हैं। उनमें आंतरिक संगति का भी अभाव परिलक्षित है।

कहने की जरुरत नहीं कि महाभारत का लेखन और पुनर्लेखन आज इक्कीसवीं शती में भी जारी है। धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा और नरेन्द्र कोहली से लेकर मीनाक्षी नटराजन तक ने अपने-अपने समय में कुछ-कुछ जोड़ने-घटाने की कोशिश की है। और बात है कि कला माध्यमों का फर्क रहा है। किसी ने कहानी, उपन्यास और नाटकों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की तो किसी ने फिल्म/धारावाहिक के माध्यम से। किन्तु कहना होगा कि अधिकतर विद्वानों ने पितृसत्ता के बने-बनाये दृष्टिकोण से ही कथा का पुनर्लेखन किया है। मीनाक्षी नटराजन ने 'सामयिक प्रकाशन' से छपी अपनी पुस्तक 'अपने अपने कुरुक्षेत्र' में इतिहास लेखन के क्षेत्र में व्याप्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह चुनौती इतिहास को 'नयी आँख' से देखने की वजह से मिल रही है। यह 'नयी आँख' स्त्री विमर्श की अथवा स्त्री जाति की है जिसकी स्पष्ट मान्यता रही है कि अबतक का इतिहास 'पुरुषों का' और 'पुरुषों के द्वारा' लिखा गया इतिहास है। अर्थात अगर इतिहास को 'स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला' मानें तो कहना होगा कि ये फैसले उन न्यायाधीशों के हैं जो इतिहास के अपराधी भी रहे हैं। इसलिए यह इतिहास विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो सकता। अविश्वसनीयता का कारण है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मूल्य और मापदंड अलग-अलग हैं। बात अगर महाभारत से शुरू करें तो जैसाकि चित्रा मुद्गल ने लिखा है, महाभारत की कथा उनलोगों ने लिखी है जो यह मानते रहे थे कि 'कौमार्य भंग स्त्री उनकी स्त्री नहीं हो सकती, किन्तु वह स्वयं की यौनेच्छाओं को मर्यादित करने के लिए बाध्य नहीं' थे। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 10) इसलिए मीनाक्षी नटराजन ने महाभारत की कथा और खासकर स्त्री पात्रों-यथा गांधारी, कुंती, शिखंडी, द्रौपदी आदि को 'स्त्री की आँख' से देखने की कोशिश की है। बार-बार भीष्म को झिड़की देती हुई कि उन्होंने कभी स्त्री के मन को पढ़ने-समझने की कोशिश नहीं की।

महाभारत युद्ध की कथा निजी परिवार, निजी संपत्ति और राज्य के उदय तथा उसके सुदृढ़ीकरण से उत्पन्न अंतर्विरोधों की कथा है। प्राचीन भारत में भूमि पर निजी मालिकाना हक स्थापित किये बगैर निजी संपत्ति की अवधारणा को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करना असंभव था। द्रौपदी का पांच पतियों के साथ ब्याहा जाना, जो एक प्रक्षिप्त कथा का हिस्सा है, बहुपति विवाह की याद भर है। यह प्रथा कभी सुदूर अतीत में जब निजी संपत्ति का इस हद तक विकास नहीं हुआ होगा, अस्तित्व में रही होगी।

मीनाक्षी नटराजन की किताब का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने महाभारत की समस्या को 'स्त्री आँख' से पढ़ने की कोशिश की है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने इतिहास बोध से कभी किनारा नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उचित ही इतिहास बोध को 'तीसरी आँख' कहते थे। इस 'तीसरी आँख' से देखे बगैर महाभारत की कथा का सम्यक पाठ असम्भव है क्योंकि यह अपनी काया में तो विशाल है ही, इतिहास की अनगिनत प्रवृत्तियों और परंपराओं को भी एक साथ लिये चलती है। अर्थात महाभारत में बहुपति विवाह के साथ-साथ बहुपत्नी विवाह की भी कथा है। अतः महाभारत की कथा की स्पष्ट समझ के लिए हमें वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का भी ध्यान रखना होगा। मीनाक्षी नटराजन ने हमें ठीक ही ध्यान दिलाया है कि महाभारतकालीन समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ परंपराओं और मान्यताओं की अजीब टक्कर है। यहीं इतिहास बोध रूपी तीसरी आँख की आवश्यकता पड़ती है यह देखने के लिए कि कौन-सी मान्यता जीवित रहनेवाली है और कौन-सी दम तोड़नेवाली।

महाभारत में जो कभी-कभी यौन स्वछंदता की प्रवृत्ति दिखती है उसकी भी एक परंपरा है। देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57) ब्रह्मा-सरस्वती का यौन सम्बंध किसी प्राचीन समाज में पिता-पुत्री का 'वैध' यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68) प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)

कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ व्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) किन्तु शादी के पहले की यौन क्रिया संबंधी अपनी 'भूल' को कुंती आजीवन अपने पति पाण्डु के समक्ष स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मीनाक्षी नटराजन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य और मापदंड निर्धारित है।

स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)

मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)

हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।

मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।

मीनाक्षी नटराजन की पुस्तक की नवीनता और अद्वितीयता इस बात में है कि वह ऐतिहासिक संदर्भ में इतिहास बोध के साथ कथा को समझती है। गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि के स्त्री मन की पीड़ा को समझती है। मीनाक्षी की द्रौपदी पर बहुपतित्व कुन्ती के द्वारा थोपा हुआ फैसला नहीं था बल्कि स्वयं द्रौपदी का लिया निर्णय था। इतना ही नहीं, सभी पतियों के लिए बहुविवाह की व्यवस्था देना भी द्रौपदी ही का निर्णय था। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 143) दरअसल, द्रौपदी का प्रस्ताव था कि वह बारी-बारी प्रत्येक पांडव की पत्नी के रूप में एक-वर्ष का समय व्यतीत करेगी। उस एक वर्ष में अन्य पांडव बंधुओं के प्रति उसका व्यवहार पत्नी का नहीं होगा। इस व्यवस्था में प्रत्येक पाण्डव बंधु को द्रौपदी के संग के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी ही पड़ती। अतः उनका बहुविवाह आवश्यक था। (वही, पृष्ठ 145) 

यह महाभारत की कथा का स्त्री पाठ है। पुस्तक में प्रवाह और अद्भुत रोचकता है। एक सांस में पढ़ी जा सकने वाली दृष्टिसम्पन्न किताब है। इसे पढ़ना समृद्ध होना है। जहाँ तक भाषा की बात है, एकाध स्थल को छोड़ दें तो पुस्तक में अशुध्दियों की कमी खलती है!

Sunday, September 20, 2026

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की 'श्रेष्ठ कहानियां'

अबतक मैंने पांडेय बेचन शर्मा उग्र को नहीं पढ़ा था। एकाध कहानी कहीं से पढ़ लेना पढ़ना नहीं हो सकता। 'आत्माराम एंड संस' ने दो खंडों में इनकी कहानियां छापी हैं। ये उग्र की नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। इनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। समाज और व्यक्ति समान रूप से हमला झेलते हैं। अभी कुछ ही कहानियां पढ़ सका हूँ। पढ़ते लगा कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र आर्य समाज आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित कथाकार लगते हैं। उनका अतिरिक्त भारतीयता-बोध भी गाहे-बगाहे सिर उचका देता है। उनकी एक कहानी है 'कम्यूनिस्ट दरवाज़े पर'। यह व्यंग्यप्रधान आत्म-संस्मरणात्मक कहानी है। अफसोस कि व्यंग्य की अपनी सारी ताकत उन्होंने कम्यूनिस्ट पात्र का मजाक उड़ाने में खर्च कर दी है। एक स्थल पर लिखा है, 'रुपये-पैसे की झंकार के सामने काले चश्मेवाले कम्यूनिस्ट की क्रूर माया फट गई।' (पांडेय बेचन शर्मा उग्र, श्रेष्ठ रचनाएं, भाग 1, पृष्ठ 248) कहानीकार का यह कहना कि 'कम्यूनिस्ट रूस से नहीं आता, काले बुखार की तरह देश-देश में वह स्वयं पैदा हो जाता है', (पृष्ठ 246) स्वतंत्र कथन के रूप में तो सही है, लेकिन गलत है जब इस आधारवाक्य के पीछे भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को 'आयातित' कहने की 'कूटनीति' हो। कहानी के अंत में लेखक ने कम्यूनिस्ट को कहा, 'आप गधे हैं, रूसी खूंटे से बंधे।' (वही, पृष्ठ 249) दूसरी ओर कम्यूनिस्ट की एक नई प्रजाति अर्थात 'सनातनी कम्यूनिस्ट' की खोज लेखक करता है जिसका वह स्वयं प्रतिनिधि है। इस 'सनातनी कम्यूनिस्ट' का कर्तव्य है, 'गरीब और अमीर दोनों की रक्षा, सबका भला।' (वही, पृष्ठ 248)

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)

Saturday, September 19, 2026

किसी वरिष्ठ से नहीं लिखवाया किताब का 'आमुख'

मैं दसवीं जमात का विद्यार्थी था। हिन्दी की किताब में जगदीशचंद्र माथुर का एक रेखाचित्र पढ़ना था। शीर्षक था-'एक जन्मजात चक्रवर्ती'। और यह 'जन्मजात चक्रवर्ती' कोई और नहीं श्री सच्चिदानंद सिन्हा थे। उनके बारे में लिखा था कि उन्हें नित नयी-नयी किताब पढ़ने और लाल-पीले रंगों में रंगने अर्थात स्केच से 'अंडरलाइन' करने का शौक था। उनकी किताबों के संग्रह से बाद में प्रसिद्ध सिन्हा लाइब्रेरी की स्थापना हुई। सिन्हा साहब पाठक के साथ-साथ पत्रकार और लेखक भी थे। उन्होंने बिहार और भारत के अपने समकालीनों के ऊपर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां की हैं। बिहार के समकालीनों के ऊपर लिखी गई जीवनीपरक टिप्पणियां  हिमालय प्रेस, पटना के मैनेजर जयनाथ मिश्र के आग्रह पर 1944 में छपी थीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमालय प्रेस बिहार में टेक्स्टबुक लेखन के प्रणेता रामलोचनशरण बिहारी के प्रसिद्ध पुस्तक भण्डार (लहेरियासराय, दरभंगा) का पटना ब्रांच था। 

इस किताब में बीसियों लोगों की जीवनियों के साथ-साथ लगभग चालीस पृष्ठों की एक लंबी भूमिका भी है जिसमें 1893 से 1912 तक के बंगाल से बिहार के पृथक्करण का जो संघर्ष चला उसका संक्षिप्त किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व का विवरण लिखा है। 1893 का वर्ष सच्चिदानंद सिन्हा का पढ़ाई समाप्त कर विलायत से लौटने का है। लौटते-लौटते उनके पास बंगाल से बिहार को अलग करने अथवा बिहार को स्वतंत्र प्रान्त का दर्जा दिलाने की बात एक ठोस शक्ल अख्तियार कर चुकी थी। इसके लिए अखबार की जरूरत थी। इसलिए 1893 में एक अंग्रेजी अखबार शुरू करने हेतु बिहार के कुछ प्रमुख बुद्धिजीवियों की मीटिंग आयोजित की गई। उक्त सभा में अखबार का नाम 'बिहारी' प्रस्तावित हुआ किन्तु अंततः 'बिहार टाइम्स' के नाम से 1894 में  महेश नारायण के संपादन में शुरू हो गया। (रामजी मिश्र 'मनोहर' की किताब 'बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास' के 27वें पृष्ठ पर इसका प्रकाशन वर्ष भूलवश 1884 छप गया है।) और बात है कि 1906 में इसका नाम बदलकर बिहारी हो गया। सच्चिदानंद सिन्हा का मानना है कि चूंकि 1894 में 'बिहार टाइम्स' के प्रकाशन से बिहार की पत्रकारिता और पृथक बिहार की मांग शुरू हुई इसलिए इस वर्ष को बिहार में रेनेसां की शुरुआत का वर्ष माना जा सकता है। अगर अखबार के प्रकाशन से बिहार के रिनेसाँ को जोड़ा जा सकता है तो हिन्दी अखबार 'बिहार बन्धु' को यह श्रेय क्यों नहीं दिया जा सकता जो बंगाल से बिहार को अलग करने के मुद्दे को उठाता रहा था। फिर 'अनीश' और 'कासिद' जैसे उर्दू रिसाले तो बहुत पहले से ये मांग रखते आ रहे थे।

आश्चर्यजनक है कि किताब में महेश नारायण पर एक स्वतंत्र अध्याय है किंतु हिन्दी पत्र 'बिहार बन्धु' से उनके जुड़ाव की कोई चर्चा नहीं है। 'बिहार बन्धु' से जुड़े महेश नारायण नाम के एक कवि भी थे जिनकी बिहार बन्धु प्रेस से 'स्वप्न' नाम की मुक्तछंद की लंबी कविता छपी थी। वे खड़ी बोली के बिहार के आरंभिक कवि हैं। सिन्हा साहब द्वारा उनकी इस उपलब्धि का चर्चा न किया जाना मेरे इस संदेह को और गहरा करता है कि 'बिहार टाइम्स' के महेश नारायण और 'बिहार बन्धु' में खड़ी बोली की कविताएं लिखने वाला महेश नारायण अलग-अलग व्यक्तित्व तो नहीं? श्री जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जी को भी यह शक हुआ था। किन्तु, श्री रामलोचन शरण बिहारी द्वारा संपादित एवं संवत 1883 वि. में हिन्दी-पुस्तक-भंडार, लहेरियासराय से प्रकाशित किताब 'बिहार का साहित्य' (पहला भाग) के पृष्ठ संख्या 6 पर जो संपादकीय टिप्पणी है, उससे स्पष्ट है कि दोनों एक ही आदमी थे।

एक सामान्य पाठक यही जानता है कि पटने की खुदा बख्श लाइब्रेरी खुदा बख्श के द्वारा अर्जित-उपार्जित किताबों-पांडुलिपियों की लाइब्रेरी है किन्तु हकीकत है कि इस संग्रह की अधिकतर किताबें और पांडुलिपियां उनके पिता द्वारा उपार्जित थीं। खुदा बख्श साहब ने मृत्युशैया पर पड़े पिता से वादा किया था कि उनकी किताबों और पांडुलिपियों की हिफाजत के लिए वह लाइब्रेरी खड़ा करेगा। तभी 80,000 रुपये की लागत से लाइब्रेरी का भवन निर्मित कराया गया था। कहने की आवश्यकता नहीं कि किताब दिलचस्प और ऐतिहासिक महत्त्व की है।

आज किताब का ब्लर्ब या आमुख किसी वरिष्ठ लेखक से लिखाने का चलन है, किन्तु सच्चिदानंद सिन्हा ने अपनी किताब 'सम एमिनेंट बिहार कंटेम्प्रेरीज' का आमुख अमरनाथ झा से लिखवाया था। अमरनाथ झा के पिता सर गंगनाथ झा और सिन्हा साहब दोनों गहरे मित्र थे।

कमलाप्रसाद वर्मा की 'भूलती भागती यादें'

बिहार के पहले हिंदी अखबार 'बिहार बंधु' के संपादक रहे कमला प्रसाद वर्मा जी की आज पुण्यतिथि है। 1912 ईस्वी में 'बिहार बंधु' का संपादन कमला प्रसाद वर्मा (मुख्तार, पटना सिटी) करने लगे। आप दिन में पटना सिटी कोर्ट में मुख्तारी करते, रात में बांकीपुर जाकर पत्र का संपादन। इस कार्य हेतु आपको 50 रुपये मासिक वेतन तथा 10 रुपये मासिक भत्ता मिला करता। जलपान का खर्च और मार्गव्यय अलग से। मुख्तार साहब के बाद कुछ दिनों तक बल्लभ सम्प्रदाय के गोस्वामी जी को पत्र का संपादक बनाया गया। आशा थी कि उनके चेले और अनुयायी अखबार की मांग बढ़ाने में मदद करेंगे किन्तु ग्राहक संख्या बढ़ने की अपेक्षा बहुत घट गयी। इसी बीच अंग्रेज महिलाओं के संबंध में कुछ अपमानजनक समाचार छप गया। कमिश्नर ओल्ढम आगबबूला हो गये। संपादक की बुलाहट हुई। गोस्वामी जी चंपत हो गये। अतएव अनुरोधवश मुख्तार साहब को पुनः संपादन का भार स्वीकार करना पड़ा। आचार्य शिवपूजन सहाय ने 19 जनवरी, 1961 ई. की अपनी एक टिप्पणी में ठीक ही लिखा है कि मुख्तार साहब ने 'बिहार बन्धु' का दो बार संपादन किया था । 

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी 'हिन्दी साहित्य और बिहार' (तृतीय खंड) में  'भूलती भागती यादें' (1951 में प्रकाशित) से एक उद्धरण है जिसमें कहा गया है कि "सन 1872 ईस्वी में बिहार बन्धु का जन्म कलकत्ते में, स्वर्गीय पं. बालकृष्ण भट्ट के निरीक्षण में हुआ था। इसमें पं. केशवराम भट्ट का बड़ा हाथ था। ये दोनों महाराष्ट्री ब्राह्मण थे और इनके पूर्वज 'बिहारशरीफ' में आ बसे थे।" (पृष्ठ 169) अब यह निर्विवाद है कि 'बिहार बन्धु' 1872 में नहीं बल्कि 1873 में शुरू हुआ। दूसरी बात कि बालकृष्ण भट्ट की जगह मदनमोहन भट्ट लिखा जाना चाहिए था। ये दोनों सगे भाई थे और महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे जो व्यापार के सिलसिले में 'बिहारशरीफ' आकर बस गये थे। 'बिहार बन्धु' की स्थापना इन्हीं मदनमोहन भट्ट की देखरेख में हुई थी। जहांतक बालकृष्ण भट्ट की बात है, उनके पूर्वज मालवा के ब्राह्मण थे और झाँसी के निकट आकर बसे थे। बालकृष्ण भट्ट, मालवीय जी के रिश्तेदार थे और जो 'हिन्दी प्रदीप' के संपादक हुए।

हिन्दुस्तानी कहावत-कोश और फैलन का भाषा बोध

बिहार में सन् 1860 ई. में पहले-पहल जब राष्ट्रभाषा-आंदोलन प्रारंभ हुआ तो उस आंदोलन का नारा था : ‘स्कूलों में हिन्दी का स्थान हो, कचहरियों में हिन्दी का प्रवेश हो’। उस आंदोलन के फलस्वरूप बिहार के स्कूलों में सन् 1870 ई. में हिन्दी का प्रवेश हुआ। (धीरेन्द्रनाथ सिंह, आधुनिक हिन्दी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1986, पृष्ठ 250) बिहार प्रदेश के स्कूलों के तत्कालीन शिक्षाधिकारी एस. डब्ल्यू. फैलन हिंदी-प्रेमी थे। उन्होंने हिंदी प्रचलन को स्कूलों में सफल बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकें लिखने की ओर ध्यान दिया। उस समय हिंदी में पाठ्य-पुस्तकें नगण्य थीं इसलिए उन्होंने अजमेर से हिन्दी-अध्यापक लाला सूरजमल को बुलाया। उनकी नियुक्ति पटना नॉर्मल स्कूल में की गई। साथ ही उनके रिश्तेदार मुंशी राधालाल माथुर को बुलाया गया। उन्हें गया के नॉर्मल स्कूल में नियुक्त किया गया। इन लोगों के साथ हिन्दी के अन्य अनेक अध्यापकों की नियुक्ति की गई और उन्हें पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया गया, किंतु बिहार में उस समय प्रेस का अभाव था। प्रारंभ में पाठ्य-पुस्तक के लेखन में उत्साह का भी अभाव था। अतः फैलन साहब के सराहनीय प्रयास के बावजूद बिहार के स्कूलों में हिन्दी के प्रचलन में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। (वही, पृष्ठ 251) 

भगवान प्रसाद यानी रूपकला जी ने सन् 1863 ई. में ‘तन-मन की स्वच्छता’ पुस्तिका लिखकर तत्कालीन स्कूल-इन्सपेक्टर डा. फेलन को समर्पित की। (हिन्दी साहित्य और बिहार, द्वितीय खंड पृष्ठ 59) उन्हीं की आज्ञा से आपने ‘तहारते जाहिर वो बातिन’ नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी किया था। (वही, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-2) आगे उन्होंने बंगला पुस्तक का ‘शरीर-पालन’ नाम से हिंदी में अनुवाद किया। पुनः आपने ‘हिफजे सेहत की उमदः तदबीरें’ के नाम से इसका उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित किया। बिहार के मिडिल स्कूल के पाठ्यक्रम में भी यह रही। (हिंदी साहित्य और बिहार, पृष्ठ 61, पाद टिप्पणी-3।)                                                                                                                                                                    पटना नॉर्मल स्कूल के हेडमास्टर राय सोहनलाल ने फैलन की विशेष सहायता की थी। यह सहायता पारिभाषिक शब्दों की थी जिसके बगैर शिक्षा को लोकप्रिय बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फैलन ने उनका उल्लेख अपने कोश की भूमिका में किया है-It is Rae Sohan Lal, the very able Head Master of Patna Normal School, that the compiler is indebted for the large collection of popular Hindustani scientific terms which will appear in this dictionary-terms in  Pure Mathematics, Physics, Electricity, Astronomy, Physiology, Botany, Philosophy, etc. And it is to his Popular Science treatise, readers, and other literary pieces in popular Hindustani, or Hindi, that the compiler is able to point, among modern compositions, for evidence of force, copiousness, and expressiveness of spoken Hindi. (रामविलास शर्मा, भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास-परंपरा, पृष्ठ 212) 

इन पारिभाषिक शब्दों की ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकारते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जो पारिभाषिक शब्द उन्होंने दिये हैं, वे चालू हिन्दुस्तानी या हिन्दी के हैं। ये गणित, भौतिक, विद्युत्, ज्योतिष, वनस्पति शास्त्रों के हैं, दर्शन के हैं। ये शब्द पाठ्य-पुस्तकों में कोशों से नहीं आये; पाठ्य-पुस्तकों से कोशों में आये हैं। विज्ञान शिक्षा को लोकप्रिय बनाने के लिए पुस्तकें लिखी जा रही थीं और उन्हें देखकर ही फैलन को ज्ञात हुआ था कि बोलचाल की हिन्दी में कितनी शक्ति, कितनी बड़ी शब्द संपदा और कैसी अभिव्यंजना-शक्ति है। (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 212)

बाबू शिवनंदन सहाय ने लिखा है-’यह (भारतेंदु) विवाह आदि में बुरे गीत गाना पसंद नहीं करते थे वरन मई 1880 में जब इनकी कन्या का विवाह हुआ तो उस समय इन्होंने अपने घर गाली का गाना बन्द कर दिया।’ (बाबू शिवनंदन सहाय, हरिश्चंद्र, पृष्ठ 251-52; चंदन कुमार श्रीवास्तव, ’हिन्दी नवजागरण और नारी नर सम होंहिं’, परिषद पत्रिका (स्त्री विमर्श विशेषांक), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, अप्रैल 2003-मार्च 2004) ’कविवचनसुधा’ में यह बात प्रकाशित हुई और भारतेंदु के मित्र ठाकुर जाहर सिंह ने आगरे से इनको पत्र लिखकर धन्यवाद दिया कि “आपने यह अच्छा प्रबंध किया कि विवाह में जो स्त्री बुरा-बुरा गीत गाती थीं तिस की रीति उठा दी।“ (शिवनंदन सहाय, पूर्वोद्धृत) इस पत्र में भारतेंदु से कहा गया कि हमारी जाति की स्त्रियां अच्छा गीत नहीं जानतीं अतः “आपसे मेरी प्रार्थना है कि कोई पुस्तक ऐसी बने जिसमें हर समय के गीत अच्छे-अच्छे और सरल भाषा में होंय जो स्त्रियां उनको पढ़कर बुरी चाल के गीत आदि को छोड़ दें।“ (वही) ध्यान रहे, ’हिन्दी जाति’ के किसान चेतना के महाकवि तुलसीदास विवाह के बुरे गीतों से परेशान नहीं हैं। वहाँ जनकपुर में जब विवाह संपन्न होता है तो स्त्रियां गाती हैं-’जेंवत देहि मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी’। तुलसीदास ही क्यों केशव की ‘रामचंद्रिका’ की औरतें भी दशरथ के लिए ‘मंगल’ गारी/गाली गाती हैं। (रामचंद्रिका, जानकीप्रसाद कृत टीका सहित, पृष्ठ 51) सवाल है, आखिर अपनी परंपरा से प्रेरणा लेनेवाले भारतेंदु, जो उसी ’हिन्दी जाति’ के संस्थापक और ’राष्ट्रीय संस्कृति’ की नींव रखने वाले हैं, यहां विवाह के 'बुरे' गीत क्यों रोक रहे हैं? (चंदन कुमार श्रीवास्तव, पूर्वोद्धृत)

जिक्र है कि फैलन ने एक पढ़े-लिखे आदमी से लोकगीत इकट्ठा करने को कहा। उसने लोकगीत इकट्ठे किये पर लिखा-‘इसकी भाषा बहुत अशुद्ध है; उसे सुधारकर भेजने में कुछ समय लगेगा।’ (रामविलास शर्मा, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 266-67) एक अन्य अंग्रेजी तथा प्राच्य भाषाओं के विद्वान ने फैलन से कहा कि ‘नजीर के उद्धरणों से अपने कोश को भ्रष्ट न करें’। (वही, पृष्ठ 267) फैलन का विचार था कि ‘सबसे स्वाभाविक और जोरदार मुहावरे लिखित भाषा में नहीं, बोलचाल की भाषा में देखने को मिलते हैं। (वही, पृष्ठ 264) उन्होंने उत्सवों-त्योहारों में बिहार के अपढ़ जनों को अश्लील गीत गाते और अनुरूप मुद्राएं बनाते देखा था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘ये लोग ऊपर से देखने में अश्लील किंतु व्यवहार में उन लोगों से कहीं ज्यादा ईमानदार थे जो अपनी नैतिकता की चादर के नीचे हर तरह की बेईमानी छिपाये हुए थे। जीवन में यह सब भी है; उसे छिपाया क्यों जाय?’ (वही, पृष्ठ 260)

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने एस. डब्ल्यू. फैलन के ‘हिन्दुस्तानी कहावत-कोश’ का हिन्दी अनुवाद और संशोधन कराया है। अनुवादक एवं संशोधक कृष्णानन्द गुप्त हैं। संशोधन के नाम पर पुस्तक में इन्होंने कुछ मौलिक गड़बड़ियां कर दी हैं। एक कहावत है-‘सगरे गाँव घुर अइली, कहीं न देखी लबदा। पटना सहर अइसन देखलिन, काँख तरे लबदा।’ (हिन्दी कहावत-कोश, पृष्ठ 316) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘सब नगर और गाँव मैंने घूमे, पर कहीं लाभ नहीं दिखाई दिया, पर पटना नगर ऐसा है जहाँ बगल में लाभ मौजूद है।’ (वही) संपादक ने निष्कर्ष निकाला : ‘इससे जान पड़ता है पटना कभी व्यवसाय का बड़ा केंद्र रहा होगा।’ इस अनर्थ का कारण ‘लबदा’ का शब्दार्थ बना। संपादक ने अर्थ किया ‘लब्धि’ और ‘प्राप्ति’। (वही) दरअसल, पटना जिले में ‘लबदा/लबेदा’ मोटे और छोटे डंडे को कहा जाता है जिससे हमलोग बचपन में आम-अमरूद तोड़ा करते थे। कहावत भी है-‘आवे आम चाहे जाय लबेदा’! इसी कोश में अन्यत्र इस कहावत को इस तरह  पेश किया गया है-'आए आम, जाए लबेड़ा'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 29) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'डंडा भले ही चला जाए पर आम तो आए'। (वही) इसकी दूसरी व्याख्या में कहा गया है कि कुछ पाने के लिए खोना भी पड़ता है। लबेड़ा या लभेड़ा एक फल भी होता है, जिसका अचार बनता है। तब यह अर्थ हो सकता है कि भले ही एक सामान्य वस्तु हाथ से चली जाए, पर अच्छी वस्तु तो मिले।' (वही) संशोधक ने यहाँ 'लबेदा' (डंडा) को 'लबेड़ा/लभेड़ा' अर्थात 'एक तरह का फल' बना दिया, फिर फल से फल तोड़ने लगे! फल से फल तोड़ने में जाने का कहाँ डर? उसे तो पुनः जमीन पर आना ही है। जाने का डर तो तब है जब लबेदा (कोश अनुसार लबेड़ा/लभेड़ा) फल न होकर डंडा हो। डंडा कई बार आम गिराए बिना प्रथम प्रयास ही में झुरमुट में फंस जाता है।

एक कहावत है-'अघाना बगुला पोठिया तीत'। (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 5) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बगुले का पेट भरा है, इसलिए अब उसे सभी मछलियाँ कड़वी लग रही हैं। भरा पेट होने पर कोई वस्तु अच्छी नहीं लगती।' (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि इस कहावत के अर्थ को समझने में संपादक से भूल हुई है। दरअसल पोठिया मछली के गले के पास कुछ ऐसा पदार्थ होता है जिसका स्वाद तीता होता है। इसलिए पोठिया मछली बनाते समय उस हिस्से को सावधानीपूर्वक निकाल लिया जाता है। इस तरद्दुद की वजह से पोठिया मछली संकटकालीन खाद्य सामग्री है। अघाये बगुले को अगर पोठिया तीत लगती है तो आश्चर्य कैसा? पोठिया खाना आपद्धर्म निबाहना है!

कहावत है, 'अहीर से जब गुन निकले जब बालू से घी'। (एस. डब्ल्यू. फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 16) इसकी व्याख्या में कहा गया है कि 'बालू से जिस तरह घी नहीं निकल सकता, उसी तरह अहीर से उसके व्यवसाय के भेद नहीं जाने जा सकते।' (वही) यहाँ 'व्यवसाय के भेद' अनावश्यक की ठूँस-ठाँस है। कहावत में स्पष्ट ही अहीर को गुणों से रहित अर्थात मूर्ख कहा गया है जबकि 'व्यवसाय के भेद' न बताना एक खास तरह का चातुर्य है। कहना अनावश्यक है कि हिन्दुस्तानी कहावतों में अन्यत्र भी अहीर जाति की मूर्खता के किस्से भरे पड़े हैं। 'मैला आँचल' में सख्त हिदायत है कि 'खेलावन को सठबरसा (साठ बरस तक समझदारी का न आना अर्थात यादव) न समझना।' (पृष्ठ 32) सैनिक जी की स्त्री बोलती है, 'अरे जानती नहीं हैं, ग्वाला साठ बरस तक ...।' (वही, पृष्ठ 157) इस बात की तस्दीक सतीनाथ भादुड़ी से कर लें-'ग्वालों की साठ सालों पर और ततमा लोगों की सत्तर पर बुद्धि खुलती है।' (ढोड़ायचरितमानस, पृष्ठ 67) 'चार जात गावें हरबोंग, अहीर, डफाली, धोबी, डोम।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 112)

कहावत है कि 'कायथों का छोटा, और भांड़ों का बड़ा, दोनों की खराबी।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 69) संशोधक ने इसकी व्याख्या में लिखा है कि 'केवल कायस्थों में ही नहीं, हिन्दू घरों में जो सबसे छोटा होता है, उसे ही सबसे अधिक काम करना पड़ता है।' (वही) यह व्याख्या सही नहीं है क्योंकि यह समस्त हिंदुओं पर लागू नहीं होती। इस के समानांतर लोक में एक दूसरी कहावत भी प्रचलित है-'बाभन में छोट, गोवार (अहीर) में मोट'। मतलब यह कि ऊंची जातियों में बड़े लोगों को सम्मानवश श्रम से दूर रखा जाता है। 'मोट' का अभिप्राय यहाँ अपढ़ अथवा बुद्धिहीन से है। भारतीय समाज-संस्कृति में आरंभकाल से ही श्रम को उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया है। यह कहावत इसी की अभिव्यक्ति है।

वेद शब्द विद (द हलयुक्त) धातु से बना है जिसका अर्थ ज्ञान तथा ज्ञान का संकलन है अर्थात वेद अपने समय के 'अंतिम ज्ञान' के संग्रह हैं। बहुत हाल तक 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन था जिसका मतलब हुआ कि वह संदेह से परे है अथवा स्वयं प्रमाणित है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में ज्ञान की भिन्न कोटि थी। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। इस पांचवें को आर्य संस्कृति का हिस्सा बनने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा है वह चाहे 'पंचम वेद' हो या 'पंचम वर्ण'। इस 'पांच' का मतलब आधुनिक काल का 'प्रोन्नत पदाधिकारी' हुआ। भारतीय संस्कृति में पांच को बड़ा लचीला रखा गया है ताकि विशेष परिस्थिति में सबको गले लगाया जा सके। इसकी व्यवस्था बहुत हाल तक कायम रही है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 113)। मेरे गांव में इसको 'लाठीकोट' (कोर्ट) कहा जाता है। 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' तो आपने भी सुनी होगी। 'लबेद' का मतलब 'लाठी' ही है। पहले गांवों में 'लाठीकोट' का फैसला 'अंतिम' माना जाता था। जिसका परिवार बड़ा होता वह लाठीकोट में केस जीता हुआ समझा जाता। मेरे बाबा (दादाजी) एक पढ़ुआ पढ़ते थे-'जेकरा पाले चार धुरहिया, मारे लाठी छीने रुपइया'! इसी बात को दूसरे शब्दों में कहा गया है : 'जिसके चार भैय्या, मारें धौल छीन लें रुपैया'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 140) जाहिर है, तब जन ही धन था।

पितृसत्तात्मक समाज में सौत स्त्रियों की स्थायी पीड़ा रही है, इसलिए उससे संबंधित कई मुहावरे यहां दर्ज हैं। एक कहावत है ‘सेज की मक्खी भी बुरी’। (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 344) फिर सौत के संबंध में अलग से कहा ही क्या जाय? एक दूसरी कहावत है, ‘सौकन चून की भी बुरी है’ (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 348) इसी बात को एक अन्य कहावत में कुछ इस तरह कहा गया है-‘सौकन बुरी चून की और साझे का काम।/कांटा बुरा करील का और बदरी का घाम।’ (वही)

मां एक किस्सा सुनाया करती थी। किस्सा एक अनोखी शादी का था। बात उस जमाने की है जब बाप को देखकर बेटे-बेटियों की शादी हो जाया करती थी। आदमी की कौन कहे, तब ढेंकी, चूल्हे तक की शादी हो जाया करती। ऐसी ही एक शादी थी जिसमें ‘कानी’ और ‘लंगड़े’ का भाग्य जुड़ रहा था। तब शादियों में भी शास्त्रार्थ हुआ करता। कभी-कभी लट्ठ भी बजते। आदमी तो आदमी बाजे भी आपस में प्रतिद्वंदिता करते। विवाहोपरांत आशीर्वादी का दौर चल रहा था। लड़की पक्ष के बाजेवाले ने गाया-‘जुग जीतलें गे कानी’ कि तभी लड़केवाले की तरफ से ‘समस्यापूर्ति’ हुई-‘ई वर उठिहें त जानी’। फैलन साहब के कोश में इसको ऐसे लिखा है-‘जग जीता मोरी कानी, वर ठाढ़ होय तब जानी’। (फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 126)

दरवाजे पर बैठे गंजेड़ियों को गलियाते बाबा अक्सर यह कहावत पढ़ते: ‘गांजा पिये गुर ज्ञान घटै, और घटै तन अंदर का/खोंखत खोंखत गांड़ फटै, मुंह देखो जस बंदर का।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (हिन्दी), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 93 में उद्धृत)

'हिन्दुस्तानी कहावत-कोश' से गुजरते हुए ऐसा लगता है कि लोक साहित्य का अपना आकर्षण तो है लेकिन प्रभुत्वशाली ताकतों ने उसे भी अधिकाधिक रूप से अपने पक्ष में करने की कोशिश की है, तोड़-फोड़ की है। एक कहावत है, ‘मां पै पूत पिता पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़म थोड़ा।’ (एस डब्ल्यू फैलन, हिन्दुस्तानी कहावत-कोश (अनुवाद: कृष्णानंद गुप्त), नेशनल बुक ट्रस्ट, पृष्ठ 270) अर्थात ‘लड़के में अपनी मां के और घोड़े में अपने पिता के थोड़े-बहुत गुण अवश्य आते हैं।’ लगता है, बाद में पहली कहावत को एक दूसरी से ‘रिप्लेस’ करने की कोशिश की गई-‘बापै पूत सिपाह पै घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा थोड़ा।’ (वही) कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे लोक स्मृति से बादवाली कहावत ही विरासत के रूप में प्राप्त हुई। कहावतों के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं जिनसे इनके ‘रचनाकार’ का स्त्री-विरोधी होना प्रमाणित होता है। कहावत है, 'औरत रहे तो आप से, नहीं तो जाय सगे बाप से' अर्थात 'स्त्री यदि स्वयं सच्चरित्रा है, तब तो वह रहेगी, अन्यथा अपने बाप के साथ भी निकल जाती है।' (हिन्दुस्तानी कहावत-कोश, पृष्ठ 56) स्त्री को कामातुर साबित करनेवाली कहावत देखिए : 'कातक कुतिया, माघ (कोश में 'माघ' की जगह माह लिखा है।) बिलाई, चैत चिड़िया, सदा लुगाई।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 68) 'कौड़ी गांठ की, जोरू साथ की' अर्थात 'अपना पैसा हमेशा अपनी गांठ में और स्त्री को अपने साथ रखना चाहिए। अथवा पैसा गांठ का ही काम आता है और स्त्री तभी काबू में रहती है, जब अपने साथ रखी जाए।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 78)

'जोरू का मरना और जूती का टूटना बराबर है।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 151) जिस तरह जूती पुरानी होने पर नई खरीदी जा सकती है, उसी तरह औरत के मरने पर दूसरी शादी भी फौरन की जा सकती है। (वही) 'तिरिया चरित्र जाने नहिं कोय, खसम मार के सत्ती होय।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) कहा गया है कि स्त्री के चरित्र को समझना बड़ा कठिन है, वह अपने पति को मारकर फिर उसके साथ सती होती है। (वही) 'तिरिया जात कमान है, जित चाहे तित तान' अर्थात स्त्रियां धनुष की तरह होती हैं, जहां या जितना चाहो झुका लो। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169) 'तिरिया तुझ में तीन गुन, अवगुन हैं लख चार। मंगल गावे, सत रचे, और कोखन उपजें लाल।' (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 169)

कहावतों में समाज ही नहीं, भाषा का इतिहास भी प्रतिबिम्बित होता है। कहावत है कि 'ग्वाले की दही, महतो की भेंट' अर्थात 'गरीब की चीज बड़े लोग हड़प लेते हैं'। (हिन्दुस्तानी कहावत कोश, पृष्ठ 100) यह न समझें कि कोशकार ने भूलवश दही का स्त्रीलिंग प्रयोग किया है, बल्कि इस कहावत से इस बात का सहज अनुमान होता है कि पुराने जमाने में लोग दही का प्रायः स्त्रीलिंग में प्रयोग करते होंगे। कम-से-कम बिहार से तो इस बात के हमें लिखित साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने बिहार प्रादेशिक साहित्य सम्मेलन के अपने भाषण में जैसा कि कहा है, "अगर बिहार में 'हाथी विहार करती है' तो पंजाब में 'तारें आनी हैं' और युक्त प्रान्त के काशी-प्रयाग में लोग 'अच्छी शिकारें मारकर लम्बी सलामें' करते हैं। अगर बिहार में 'दही खट्टी होती है' तो मारवाड़ में 'बुखार चढ़ती है और जनेऊ उतरती है'।" (बिहार का साहित्य, प्रथम भाग, पुस्तक भंडार, लहेरियासराय)

पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय

कर्मेंदु शिशिर की एक किताब है-'पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय'। इस किताब में उन्होंने पुस्तक-भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी को 'खुर्राट व्यवसायी' तथा बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय को 'दुधारू गाय' कहा है। आगे यह भी लिखा कि पाठ्यपुस्तकों के 'व्यवसाय की सफलता से उनकी आंखों पर मोटी परत चढ़ गई'। (पृष्ठ 53) शिशिर जी एक 'लेखक' को 'व्यवसायी' किस कुण्ठा में लिख रहे हैं वे ही जानें!

'जयन्ती स्मारक ग्रन्थ' में उस समय के लगभग तमाम लेखकों के संस्मरण प्रकाशित हैं। कथित दुधारू गायों के संस्मरण भी हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि वे बेरोजगार थे और बहन की शादी की चिंता सिर पर थी। उन्होंने जिन दो लोगों को पत्र लिखे उनमें एक पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचन शरण बिहारी भी थे। रामलोचन जी ने बेनीपुरी को पुस्तक भंडार आने का न्योता लिख भेजा। काम भी मिल गया। कुछ माह बाद उन्होंने बेनीपुरी को बहन की शादी की याद दिलायी तो उन्होंने अपर्याप्त बचत की बात कही। रामलोचन जी ने उन्हें एक नई साइकिल दी और कहा कि जाइए और अपने गांव के आसपास किसी लड़के को देखिए। शादी हो गई। लड़का बेनीपुरी जी खोजा और खर्च का भार बिहारी जी ने उठाया। बेनीपुरी जी के अतिरिक्त कलक्टर सिंह केसरी, दिनकर आदि ने भी आर्थिक मदद की बात स्वीकारी है।

'व्यवसाय' की 'सफलता' के पीछे रामलोचनशरण बिहारी का श्रम और साधन था। तब 'बालक' पत्रिका निकालने की बात थी। उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका से अंग्रेजी के कई बालोपयोगी मासिक पत्र और वार्षिक पुस्तकें (इयर-बुक) मंगाई थी। बंगला, गुजराती, मराठी और उर्दू के प्रमुख बालोपयोगी पत्र भी मंगाये। बच्चों के लिए अंग्रेजी की प्रसिद्ध 'बुक-ऑफ नॉलेज' जैसी ग्रंथ-मालाएँ भी मंगाई। रामवृक्ष बेनीपुरी को कलकत्ता भेजकर वहां से मैकमिलन, न्यूमैन, बैंकर आदि अंग्रेजी कंपनियों की दूकानों से हजार रुपये की बालोपयोगी पुस्तकें भी मंगवाई। उन सबके अध्ययन और परीक्षण के बाद ही 'बालक' के लिए उपयुक्त विषयों एवं शीर्षकों का चुनाव तथा निर्धारण किया। 'बालक' का कवर आदि का डिजाइन बाबू शिवपूजन सहाय के परामर्श पर तत्कालीन प्रख्यात चित्रकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा से तैयार कराया गया था। 

इन सबके पीछे रामलोचनशरण जी ने पानी की तरह पैसा बहाया था। वर्मा जी से मास्टर साहब की भेंट 1929 में कलकत्ते में हुई थी। इसी साल वर्मा जी इंग्लैंड जाने के सिलसिले में पुस्तक भंडार आये थे। मास्टर साहब ने उन्हें एक हजार रुपये दिये थे। जबतक वर्माजी इंग्लैंड में रहे, तबतक उनके घर 50 रुपये माहवार 'भंडार' से निर्बाध जाता रहा। इंग्लैंड से भी वर्मा जी की मांग पर 600 रुपये अतिरिक्त भेजे गये थे। दुर्भाग्य कि स्वदेश लौटने के बाद वर्मा जी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके।

जानकीदेवी : मेरी जीवन-यात्रा

गाँधीजी के पांचवें पुत्र जमनालाल बजाज की पत्नी जानकीदेवी बजाज हैं। उनकी आत्मकथा है 'मेरी जीवन-यात्रा'। इस किताब की प्रस्तावना लिखी है आचार्य विनोबा ने। पहली बार यह 1956 में सस्ता साहित्य मंडल की पहल पर सत्साहित्य प्रकाशन से छ्पी। इस किताब को पढ़ते हुए अपना पुराना विश्वास दृढ़तर हुआ कि स्त्रियों को पढ़े बगैर किसी भी समाज का सच्चा और प्रामाणिक इतिहास लिखा जाना असम्भव है। कल्पना के घोड़े दौड़ाना और बात है।

जानकीदेवी का परिवार धार्मिक शिक्षा और संस्कारों का परिवार था जैसे गांधी का परिवार था। इसे आप औसत भारतीय परिवार का संस्कार भी कह सकते हैं। अल्पवय में शादी हुई। पति को लगभग परमेश्वर माननेवाली पत्नी साबित होने की साध थी। तब की औरतें शादी के बाद 'पतिसेवा' नामक किताब पढ़ती थीं। जानकीदेवी को भी दी गई। एक-एक अक्षर को अपने जीवन में उतारने की चाह लिए किताब पढ़ती रही। पति की थाली का उच्छिष्ट भोजन खाने लगी। पातिव्रत्य में कुछ कमी रह गई तो पादोदक/चरणोदक भी लेने लगी। जमनालाल बजाज अगर कभी जेल जाते तो अतिरिक्त मात्रा में चरणोदक की पहले ही से व्यवस्था करके रख लेती। बीच में अगर मिलने जेल भी जाती तो झट चरणोदक का प्रबंध कर लेती। लेकिन जैसे-जैसे जमनालाल जी की राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रियता बढ़ती गई जानकीदेवी के लिए परंपरा का निर्वाह मुश्किल होता गया। सात परदों के भीतर रहनेवाली महिला ने जब खादी की मोटी साड़ी धारण की तो पर्दा करना असंभव हो गया। आगे कुछ भी दिखना बंद हो गया। बापू के सामने समस्या रखी तो विनोदी महात्मा ने मजाक में कहा कि आंखों के आगे जाली लगा लो। फैसला हुआ कि पर्दा न किया जाये। 

परंपरा में पति का नाम लेना भी पाप माना जाता था किंतु सामाजिक जीवन जीनेवाली जानकीदेवी से यह अभ्यास भी धीरे-धीरे छूटता गया। कुछ दिनों तक तो 'सेठजी' का सहारा रहा किन्तु अंततः जमनालाल जी पर आकर टिकी। पति का नाम लेना तब 'पाप' था। जानकीदेवी ने इसे अब 'पुण्य' बना दिया था।

जानकीदेवी के मारवाड़ी समाज में गहनों का भी चाव था। पैर में चांदी की कड़ी जैसी कोई चीज पहनने का रिवाज था। धार्मिक मान्यता थी कि वह श्मशान तक साथ जाती है। राजस्थानी परिवार-समाज की गरीब से गरीब औरतें भी इसे पहनना अनिवार्य मानती थीं। और भी कई गहने थे जो पति के जीवन की गारंटी सदृश थे। बापू ने यह सब छुड़वा दिया। और यह सब लाखों-करोड़ों औरतों के साथ हुआ। 

मैं समझता था कि गाँधी के आगमन के बाद राजनीति और समाज में धर्म और अंधविश्वास का बोलबाला बढ़ा है, किन्तु जानकीदेवी की इस आत्मकथा ने मेरी आँखें खोल दी हैं। स्त्रियों की आत्मकथाओं के बगैर गांधी का सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

ईश्वरीय रचना नहीं है वेद

आज के उत्तर-आधुनिक समय में किसी के दिमाग में यह सवाल कौंध सकता है कि वेद का अध्ययन हम क्यों करें। किन्तु, प्राचीन जमाने का मनुष्य इतना 'भौतिकवादी' नहीं था। इसलिए वहाँ तुलसी के 'स्वान्तः सुखाय' की तरह ज्ञान का अन्यतम और संभवतः सबसे प्रमुख उपयोग 'बौद्धिक जिज्ञासा की तृप्ति' है। पतंजलि ने यही बात ध्यान में रखकर महाभाष्य में कहा है कि 'ब्राह्मणेन निष्कारणः षडंगो वेदो$ध्येयो ज्ञेयश्च' अर्थात ब्राह्मण को बिना किसी कारण के, तात्पर्य कि बिना किसी लौकिक लाभ की इच्छा के, षडंगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद, ज्योतिष) से युक्त वेदों का अध्ययन करना चाहिए। 'ब्राह्मण' को आप इस उत्तर-आधुनिक काल का 'बुद्धिजीवी' मान सकते हैं। 

उसी 'स्वान्तः सुखाय' की परंपरा में कुमार मुकुल ने वेदों का अध्ययन करते हुए 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' किताब का सृजन किया है। किताब एक खास तैयारी के बाद लिखी गई है, इसलिए 'नोट्स' को 'भाष्य' का समतुल्य मान सकते हैं। जब आप किताब पढ़ेंगे तो इस बात को स्वीकारे बिना न रहेंगे कि उन्होंने वैदिक साहित्य से सम्बंधित किताबों की जो विस्तृत सूची दी है, उसका गंभीर अध्ययन भी किया है। उन किताबों को समेटता हुआ एक स्वतंत्र अध्याय भी आपको पढ़ने को मिलेगा। इस किताब का यह खास आकर्षण है।

वेद शब्द 'विद' धातु से बना है जिसका मतलब 'ज्ञान' और 'संग्रह' है। अतः कहा जा सकता है कि वेद अपने समय के 'ज्ञान का संग्रह' हैं। जो वेद में है वह ज्ञान है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान का हिस्सा नहीं है। आम बोलचाल में भी 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन है जिसका मतलब हुआ कि वह 'संदेह से परे' है अथवा 'स्वयंप्रमाणित' है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में तनिक 'भिन्न' और 'निम्न' कोटि का ज्ञान था। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। पंचम वेद हो जाने से 'महाभारत' के बारे में भी प्रचलित हो गया कि अपने समय का सारा ज्ञान इसमें संकलित है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान भी नहीं है। हालांकि लोकबुद्धि ने इसे स्वीकार करने से इनकार किया है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद'। 

वेद का यह 'ज्ञान' किसी एक व्यक्ति अथवा किसी एक पीढ़ी का नहीं, अपितु पीढ़ियों का संकलित-संरक्षित ज्ञान है। संकलन-संरक्षण तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित करते जाने का यह काम वाचिक परंपरा में होता रहा। हस्तांतरण की इस प्रक्रिया के लिए कविता सबसे मुफीद विधा साबित हुई। वेद हमारी सभ्यता-संस्कृति के सबसे आरंभिक, अथवा कहें कि आदिम कविता संकलन हैं। हालांकि इस बात से यह भ्रम न होना चाहिए कि वैदिक आर्य गद्य विधा से अपरिचित थे बल्कि अपनी बात कहने के लिए कविता के फॉर्म का उनका चुनाव भौतिक परिस्थितियों से अधिक अनुप्राणित था। गद्य की किसी भी विधा (फॉर्म) की तुलना में कविता को कम शब्दों की आवश्यकता होती है। एक वैसे समय और समाज में जहां लेखनकला का विकास न हो सका हो, शब्दों की मितव्ययिता खास मतलब रखती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऋग्वैदिक समाज में सैंकड़ों तरह की चीजों के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त हो रहा है। यहां 'गो' (बाद में गाय के लिए रूढ़) शब्द के उदाहरण से स्थिति को समझने में आसानी हो सकती है। 

ऐसी स्थिति सिर्फ इसलिए नहीं है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा:'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

वर्तमान रूप में ऋग्वेद के जो सूक्त मिलते हैं वे एक सुदीर्घ काव्य-परंपरा के परिणाम है। इस काव्य-परंपरा की शुरुआत ऋग्वेद के रचे जाने या भारत में आर्यों के आगमन से बहुत पहले हो चुकी है। इसका प्रमाण स्वयं ऋग्वेद के कवि हैं। वे बार-बार अपने पूर्वज कवियों को याद करते हैं. इस बात पर जोर देते हैं कि पुराने सूक्तों की तुलना में उनके स्तोत्र नये हैं। ऋग्वेद के कवियों से पूर्व अथर्वा एवं पिता मनु हैं और इन्होंने पूर्वथा, पहले की तरह इन्द्र को लक्ष्य करके स्तोत्र रचे। उस इन्द्र को प्राचीन लोग (पूर्वथा) हमारे पूर्वज (इमथा विश्वथा) तथा आज के सभी जन स्तुति कर रहे हैं। स्तुति की परंपरा पूर्वजों से चली आ रही है। ऋग्वेद के कवि अपनी काव्य-परंपरा के प्रति काफी सचेत हैं-‘हे घोड़ों के स्वामिन इन्द्र! तेरी पहले की गई स्तुति को कोई भी दूसरा बल से, न योग्यता से ही आज तक प्राप्त कर सका.’ यम को मधुर हवि अर्पित करते हुए कवि प्रथम मार्गदर्शक पूर्वजों को याद करता है-‘पूर्वज और पूर्व मार्गदर्शक ऋषियों के लिए यह नमस्कार है’ (पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृदम्य: ऋषिभ्य: इदं नम:)। अनेक सूक्तों में सुदूर अतीत की झलक मिलती है. काण्वमेध्य ऋषि एक मंत्र में कहते हैं-‘बहुस्तुत सोम प्राचीनकल से देवों का पेय है। अग्नि पूर्वकालीन और अधुनातन ऋषियों का पूज्य है। शुन:शेप प्राचीन पितरों से स्तुत इन्द्र की स्तुति करता है। कक्षीवान ऋषि भयंकर इन्द्र से उसी नेतृत्व की कामना करता है जो प्राचीनकाल में था। कक्षीवान के पिता दीर्घतमा प्राचीन ऋषि दधीचि, अंगिरा, प्रियमेध, काण्व, अत्रि तथा मनु का उल्लेख करता है. ऋषियों एवं उनके पुत्रों के सूक्त वेद में एकत्र मिलते हैं। इन सूक्तों से सिद्ध होता है कि ऋषियों को सतत अपने अतीत का स्मरण है। मैक्स मूलर ने भी स्वीकार किया है कि ऋग्वेद में प्राचीन एवं अर्वाचीन सूक्त हैं। इसलिए वेद को एक किसी निश्चित काल की रचना मानकर अध्ययन करने की अपनी परेशानी है।

वेदाध्यन के संदर्भ में कहा जाता है कि ‘ऋषि’, ‘देवता’ एवं ‘छंद’ को जाने बिना मंत्रार्थ नहीं खुलते हैं। ‘सर्वानुक्रमणी’ तथा ‘वृहददेवता’ में स्पष्ट लिखा है कि ऋषि, देवता एवं छंद समझे बिना वेदार्थ का प्रयास करनेवाले का श्रम निरर्थक जाता है। कहना अनावश्यक है कि यहाँ ‘ऋषि’ का अर्थ है कहनेवाला (यस्य वाक्यं स ऋषि), ‘देवता’ का भाव है-प्रकृति की शक्तिधारा (या तेनोच्यते सा देवता) और छंद का अर्थ है कि इसमें काव्यात्मकता किस शैली की है (यद अक्षरपरिमाणं तच्छन्द:)। भावों की गहराई तक पहुँचने में छन्द भी सहायक होते हैं। भर्तृहरि ने लिखा है कि शब्द और अर्थ का संबंध वक्ता की इच्छा के अधीन रहता है। प्रयोक्ता जिस शब्द को जिस अर्थ में प्रयोग करता है वही अर्थ उसे मिल जाता है। कबीर इसी रूप में वाणी के डिक्टेटर हैं। ब्लूमफील्ड भी वक्ता की मनःस्थिति के संदर्भ में ही अर्थ की चर्चा और परिभाषा करते हैं।

कहना पड़ेगा कि अर्थ की महिमा से प्राचीनकाल के लोग बखूबी परिचित थे। यास्क ने निरुक्त में कहा है कि जिस प्रकार बगैर अग्नि के शुष्क ईंधन प्रज्वलित नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना अर्थ समझें जो शब्द दुहराया जाता है, वह कभी अभीप्सित विषय को प्रकाशित नहीं कर सकता-"यद (द हलयुक्त) गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्दयते (द हलयुक्त)। अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित" (त हलयुक्त)।। उसी प्रसंग में आगे कहा है कि जो बिना अर्थ जाने वेदों का अध्ययन करता है, वह केवल भार ढोता है। अर्थ को जानने वाला ही समस्त कल्याणों का भागी होता है और ज्ञान की ज्योति से समस्त दोषों को दूर कर ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। "स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति यो$र्थम (म हलयुक्त)। यो$र्थज्ञ इत (त हलयुक्त) सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।।" 

कुमार मुकुल बहुत सही कहते हैं कि 'शब्दों की जन्मकुंडली वेदों से खुलती है'। पुस्तक में 'वैदिक शब्दगाथा' शीर्षक से एक अध्याय है, जिसमें शब्द-निर्माण-प्रक्रिया का बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन है। व्युत्पत्ति के माध्यम से वे शब्दों की यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं जो काफी उपयोगी और दिलचस्प है। किन्तु, लेखक इस व्युत्पत्ति-विज्ञान की सीमा से परिचित भी है। यह विज्ञान कभी-कभी विनोद का साधन बन जाता है। कहना अनावश्यक है कि ब्राह्मण और उपनिषद पुराने अनुष्ठानमूलक शब्दों से अपने मतलब के नये अर्थ निकालने के लिए अनेक बचकानी व्युत्पत्तियां प्रस्तुत करते हैं। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में एक मजेदार कहानी है, जिसमें बताया गया है कि बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर विग्रहराज क्यों रखा ? बीसलदेव का एक सान्धिविग्रहिक ‘कुमारपाल’ की सभा में आया। उसने ‘बीसल’ को संस्कृत ‘विश्वल’ (विश्व को जीत लेनेवाला) से व्युत्पन्न बताया। कुमारपाल के मन्त्री कपर्दी ने ‘विश्वल’ (वि=पक्षी, श्वल=भागनेवाला) का अर्थ किया-'चिड़ियों की तरह भागनेवाला'। यह सुनकर बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर 'विग्रहराज' रखा पर कपर्दी ने इसका भी बेढंगा अर्थ सिद्ध कर दिया। उसने बताया कि इस शब्द का अर्थ हुआ 'शिव और ब्रह्मा की नाक काटनेवाला'! तब बीसलदेव ने अपना नाम ‘कविबान्धव’ रखा।

इतिहासकार जब तक यह मानते रहे कि ऋग्वैदिक समाज मूलतः पशुचारी और कबीलाई था, 'आर्य' शब्द को ‘ऋ’ धातु से व्युत्पन्न बताया जाता रहा और सदैव यह कहते रहे कि अलग-अलग गणों में जो ‘ऋ’ धातु पाई जाती है, वह प्रायः गत्यर्थक है। अतः आर्य शब्द का अर्थ हुआ 'घुमक्कड़' या 'मुसाफिर'। यह भी कहा गया कि संस्कृत में गमनार्थक धातुओं का बाहुल्य है जो संभवतः इस बात का प्रमाण है कि आर्य स्थिर रहने के बदले चलते रहना पसंद करते थे। बाद के दिनों में, जब आर्यों के कृषि-जीवन की जानकारी प्राप्त हुई, विद्वानों ने कहना शुरू किया कि आर्य शब्द ‘अर्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ 'कृषि करना' है। कहने की जरूरत नहीं कि आर्य शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों की बदलती मान्यताएं भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों से कम, इतिहास की हमारी व्याख्या से ज्यादा प्रभावित लगती हैं। 

सामाजिक-ऐतिहासिक मान्यताएं भाषाविज्ञान के नियमों को प्रभावित करती हैं, इस तथ्य को 'शूद्र', 'कायस्थ', 'पत्नी' आदि शब्दों के व्युत्पत्यर्थ निकालने के बेतुके और अवैज्ञानिक प्रयासों से भी समझा जा सकता है। वेदांत सूत्र में शूद्र शब्द को दो भाग में विभक्त कर दिया गया है-‘शुक’ (शोक) और ‘द्र’ जो ‘द्रु’ धातु से बना है, और जिसका अर्थ 'दौड़ना' बताया गया है। पाणिनि के व्याकरण में उणादिसूत्र के लेखक ने भी इस शब्द की कुछ ऐसी ही व्युत्पत्ति दर्शायी है। पुराणों में भी शूद्र शब्द ‘शुच्’ धातु से संबद्ध जान पड़ता है, जिसका अर्थ 'संतप्त होना' है। कहा जाता है कि ‘जो खिन्न हुए और भागे, ,शारीरिक श्रम करने के अभ्यस्त थे, उन्हें शूद्र बना दिया गया।’ बौद्धों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या भी ब्राह्मणों की व्याख्या से भिन्न नहीं है। बुद्ध के अनुसार, जिन व्यक्तियों का आचरण आतंकपूर्ण और हीन कोटि का था (लुदआचारा खुद्दाचाराति), वे सुद्द (संस्कृत-शूद्र) कहलाने लगे और इस तरह सुद्द (संस्कृत-शूद्र) शब्द बना। दीघनिकाय के एक परिच्छेद में कहा गया है कि 'शूद्र वे हैं जो शिकार और अन्य हीन कर्म द्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं'। आदि मध्यकाल के बौद्ध शब्दकोश में शूद्र शब्द क्षुद्र का पर्याय बन गया, और इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि शूद्र शब्द क्षुद्र से बना है। दोनों ही व्युत्पत्तियां भाषाविज्ञान की दृष्टि से असंतोषजनक हैं। हाल में एक लेखक ने शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति इस रूप में की है-धातु ‘श्वी’ (मोटा होना) + धातु ‘द्रु’ (दौड़ना)। उनकी राय है कि इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा व्यक्ति जो स्थूल जीवन की ओर दौड़े।’ अतएव उनकी दृष्टि में शूद्र ‘ऐसा गँवार है जो शारीरिक श्रम करने के लिए ही बना है। इस शब्द को लेखक जो अर्थ देना चाहता है, वह शूद्रों के प्रति केवल परंपरावादी मनोवृत्ति को चित्रित कर पाता है। उससे शूद्रों की उत्पत्ति पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। उशना ने कायस्थ की एक विचित्र व्युत्पत्ति उपस्थित की है, यथा काक (कौआ) के ‘का’, यम के ‘य’ एवं स्थपति के ‘स्थ’ शब्दों से ‘कायस्थ’ बना है; ‘काक’, ‘यम’ एवं ‘स्थपति’ शब्द क्रम से लालच (लोभ), क्रूरता एवं लूट के परिचायक हैं। ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत इन व्युत्पत्तियों में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है। पाणिनि ने ‘पति’ से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति सिद्ध करने की व्याख्या दी है। ‘पत्युर्नो यज्ञ संयोगे’-पति के यज्ञ कार्य में सहयोग प्रदान करने से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति, स्त्री की निम्नतर सामाजिक स्थिति की आख्यात्री है।

वैदिक काल में शब्द-निर्माण की प्रक्रिया पर गौर करें तो अधिकतर शब्द 'गो' से बन रहे हैं। चमड़ा से लेकर सूर्य की किरण तक सभी गो हैं। आरम्भ में पृथ्वी की गमनशीलता के कारण उसे भी 'गो' कहा गया। वाणी भी गौ है। गाय को चूंकि हम पहले पालतू बना चुके हैं, इसलिए बाद में भैंस से परिचय होने पर उसे भी 'गौरी गवल' कहा जाता है। इसका कारण है कि हमारी भौतिक संस्कृति में बहुत कम चीज है, अतः जैसे-जैसे संस्कृति का हमारा दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे शब्द बढ़ते हैं। जैसे प्रारम्भ में 'सुर' और 'असुर' में भेद नहीं है, दोनों शब्द एक ही अर्थ ध्वनित करते हैं। पूर्ववैदिक काल में, आप आश्चर्य नहीं करें, आदमी भी 'पशु' कहलाता है। मनुष्य पशुओं में प्रथम है। सारे पशु, मृग भी हैं। उसी मृग में आदमी भी शामिल है। बाद के दिनों में उसी मृग से शाखा पर रहनेवाले अर्थात 'शाखामृग' अर्थात बंदर बनते हैं। उसी मृग से हाथवाला पशु अर्थात मृगहस्तिन अर्थात हाथी बनता है। 

मगही भाषा का बहुप्रचलित 'पोरसा' शब्द वैदिक 'पुरुष' से बना लगता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में लंबाई की एक माप के रूप में 'पुरुष' शब्द प्रयुक्त होता रहा है। 'तैत्तिरीय संहिता' एवं 'शतपथ ब्राह्मण' में इसे उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। वैदिक साहित्य में इसका सबसे प्राचीन प्रयोग यज्ञ की बेदी की ऊंचाई बताने हेतु हुआ है। कहा गया है कि ‘चतुरश्र स्येन’ (बाज पक्षी के आकार की तथा चौकोर ईंटों की बनी सबसे प्राचीन बेदी) का क्षेत्रफल साढ़े सात वर्गपुरुष होता था। पाणिनि काल में भी गहराई मापने के संबंध में ‘पुरुष’-संज्ञक माप का प्रयोग किया जाता था-'पुरुषात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम्'। जैसलमेर में आज भी यह शब्द प्रचलित और सुरक्षित है। वहां कुएं की गहराई 300-350 ‘पुरुष’ के नाम से ही जानी जाती है। एक हाथ में रस्सी को पकड़कर दूसरे हाथ को ऋजुकोण की तरह फैलाने तक की दूरी को ‘एक पुरुष’ मानकर मापने की रीति राजस्थान में आज भी प्रचलित है। 

इसके अलावे 'पुरुष' शब्द मनुष्य की जीवन-अवधि अथवा एक पीढ़ी के लिए, नेत्र की पुतलियों के लिए और व्याकरण साहित्य में क्रिया के 'पुरुष' के लिए भी व्यवहृत हुआ है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में विभिन्न वर्णों का जन्म भी एक विराट ‘पुरुष’ ही से बताया गया है। इसी ‘पुरुष’ से ‘अपौरुषेय’ शब्द बना है। वेद को ‘अपौरुषेय’ कहकर 'ईश्वरीय' और 'दैवी' घोषित करने की कोशिश की गई है जबकि सच्चाई यह है कि वेद में ईश्वर का तात्पर्य 'स्वामी' से है, भगवान वाला अर्थ उसने बहुत बाद में ग्रहण किया है। इसीलिए नास्तिक का आरंभिक अर्थ है, 'वह जो वेद में विश्वास नहीं करता'। मनुस्मृति में भी नास्तिक का यही अर्थ लिया गया है-'नास्तिको वेद निंदकः'। इसलिए वेद के अपौरुषेय होने का मतलब उसे दैवी अथवा ईश्वरीय समझना दरअसल वेद के गलत पाठ से जुड़ा मसला है। आधुनिक अर्थबोध के साथ जब तक हम वेद पढ़ेंगे, ऐसी भूल से अपने को बचाने में असमर्थ रहेंगे।

परिवर्तन न सिर्फ प्रकृति का नियम है, अपितु भाषा में भी काल-सापेक्ष परिवर्तन देखा गया है। इसलिए जब हम वेद जैसे गुजरे जमाने की रचनाओं को आज के संदर्भ में पढ़ते हैं तो उनके शब्द कई बार हमें भ्रमित और चकित करते हैं, क्योंकि आज उनके अर्थ वही नहीं होते जो रचना के लिखे जाने के समय थे। कभी-कभी शब्दार्थ इतनी तेजी से बदलते हैं कि महज दो पीढ़ी का अंतर भी इतिहास का विशाल काल-खंड प्रतीत होता है। निरुक्तकार यास्क ने वेद के लगभग चार सौ ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। इस अर्थ-परिवर्तन में जाति, धर्म, लिंग आदि अन्य अनेक चीजों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 

ऋग्वेद की आरंभिक ऋचाओं में ‘असुर’ शब्द देवतावाचक है किन्तु संभवतः पारसियों से संबंध अच्छे न रह जाने के कारण भारतीय आर्यों ने ‘असुर’ शब्द को, जो पारसियों के प्रधान देवता (अहुरमज्दा) का वाचक था, ‘राक्षस’ के अर्थ में प्रचलित कर लिया। जैन लेखक विमलसूरी की प्राकृत रामायण ‘पउमाचरियम’ की मानें तो ब्राह्मण ग्रंथों का यह ‘राक्षस’, दानव नहीं है। यहां राक्षस शब्द ‘रक्ष’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘रक्षा करना’ है। इस तरह आप कह सकते हैं कि संस्कृत का असुर शब्द ‘देवता’ से परिवर्तित होकर ‘राक्षस’ अर्थ प्रयोक्ताओं की विशेष मानसिक स्थिति का परिणाम है। संस्कृत 'उपेक्षितव्याः' का मूल अर्थ है ‘समीप जाकर देखना चाहिए’ किन्तु बाद में इसका अर्थ ‘तिरस्कार’ हो गया। ‘निरुक्त’ में यह पुराने ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आंखों के निकट रहने से अनादर होता ही है, संभवतः इस तरह यह अर्थ आया। 'भ्रातृव्य' शब्द का मूल अर्थ ‘भ्राता का पुत्र’ था किन्तु आगे चलकर वह ‘शत्रु’ के लिए प्रयुक्त होने लगा, ठीक जैसे कभी पड़ोसी राजा को ‘अरि’ कहा जाता था। ‘धान्य’ शब्द का मूल अर्थ ‘अनाज’ है लेकिन कालांतर में धान्य शब्द ‘चावल’ संबंधी अर्थ में सीमित हो गया। कीथ और मैकडानल के अनुसार ऋग्वेद में ‘यव’ शब्द केवल ‘जौ’ का वाचक नहीं बल्कि अन्न मात्र का वाचक है। ‘पुंगव’ शब्द का अर्थ बैल था किन्तु ‘नरपुंगव’ में श्रेष्ठतावाचक हो गया। ‘दया’ अथवा ‘अनुकम्पा’ के अर्थ में प्रयुक्त होनेवाला ‘घृणा’ शब्द ‘नफरत’ का वाचक बन गया।

कुमार मुकुल की पुस्तक 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' देखने-पढ़ने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ है। इसलिए कह सकता हूँ कि वेद के विविध आयामों और अध्यायों वाली यह पुस्तक रोचक बन पड़ी है और निश्चय ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी। आशा है, वेद के और कुमार मुकुल के कवि से आप एक साथ मिल सकेंगे।

बिहार में बापू

5 मार्च, 1947 को बापू कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही उन्होंने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, 'क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?' श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि 'बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।' इस भाषण के बाद बापू को एक 'तार' प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, 'बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।'

1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो। अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक 'रॉयल बेगर' ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।

ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, 'तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।'

श्रीकांत की किताब '1947-बिहार में महात्मा गांधी दंगों का दस्तावेज है। 5 मार्च 1947 से 23 मई 1947 तक बिहार के अलग-अलग दंगा-प्रभावित स्थानों की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी ने जो कुछ कहा था वह सब तभी 'दुःखे दिल की पुकार' पुस्तिका में प्रकाशित हुआ था। इस सामग्री के अलावे भी कई दस्तावेजों को खंगाल कर श्रीकांत ने अपनी किताब को पठनीय और प्रामाणिक बनाया है।

पुस्तक के आरंभ में गांधी संग्रहालय, पटना के रजी अहमद का 'अवलोकन' छपा है। प्रथम अनुच्छेद में 'राजनीतिक-गुलामी' में योजक चिह्न का बेजा प्रयोग हुआ है। दूसरे अनुच्छेद  के प्रथम वाक्य का हिस्सा है : 'दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़े अभियान में'। 'लड़े अभियान' की जगह 'चले अभियान' श्रेयस्कर था। आगे लिखा है : "1916 के लखनऊ कांग्रेस के बाद, एक के बाद एक घटनायें सामने आती गईं....।" कहना अनावश्यक है कि एक के बाद एक घटना आती है! एक के बाद बहुवचन सर्वथा त्याज्य है। आगे लिखा है : 'ऐसे मील के पत्थर हैं जिसने...।' जिसने की जगह जिनने संभवतः ज्यादा उपयुक्त होता। 'युग पुरूष', 'गुरू गोविंद सिंह' की जगह 'युग पुरुष' और 'गुरु गोविंद सिंह' उचित था। 'लिखे एक पत्र में लिखा था'-यहाँ लिखने की क्रिया की अनावश्यक आवृत्ति है। अंतिम अनुच्छेद में Man of the Millennium असावधानीवश Man of the Million हो गया है। परिणाम स्वरूप और विस्तार पूर्वक साथ लिखे जाने चाहिए अर्थात परिणामस्वरूप तथा विस्तारपूर्वक।कुछ प्रूफ की भूलें भी हैं। उदाहरणार्थ तजुर्बों और पीढ़ियां 'तर्जुबों' तथा 'पीढ़ीयां' प्रकाशित हैं।

बिहार के बगैर इतिहास एक असंभव प्रयास है!

मिथिला (बिहार), नदिया (बंगाल), काशी (उत्तर प्रदेश) और जयपुर (राजस्थान) संस्कृत अध्ययन के केन्द्र रहे हैं। मिथिला के पंडित संस्कृत की आगे की पढ़ाई के लिए नदिया, काशी और जयपुर जाते रहे हैं। इनमें काशी की प्रसिद्धि सर्वाधिक थी।  साक्षात विद्या नगरी। जयपुर भी कुछ कम नहीं था। इसे 'छोटी काशी' कहा जाता। किन्तु महत्त्व की बात यह है कि काशी और जयपुर को यह गौरव प्रदान करने में मिथिला की खास भूमिका रही है। इसलिए जब-जब इन नगरों का इतिहास लिखा जाता रहा मिथिला को उसका 'स्पेस' देना पड़ा। बात चाहे 'काशी की सारस्वत साधना' की हो या 'जयपुर की संस्कृत साहित्य को देन' की-मिथिला की साधना दर्ज होती रही है। बल्कि कहिए कि मिथिला के बगैर इन शहरों का इतिहास लिखा जाना असम्भव है। इस बात को जयपुर के इतिहास के एक प्रसंग से बेहतर समझा जा सकता है। 

महाराज रामसिंह ने धार्मिक व्यवस्था को सुदृढ़ रखने की दृष्टि से तथा आगंतुक विद्वान ब्राह्मणों की यथोचित सत्कार भावना से मोद मंदिर संस्था की स्थापना की। राजगुरु कथाभट्ट श्री छोटेलाल जी नामावाल (श्री हरगोविंद) नामक विद्वान इस संस्था के प्रधान थे और मिथिला के राजीव लोचन ओझा आदि विद्वान इसके मान्य सदस्य थे। बाद के दिनों में राजीव लोचन ओझा के भतीजे मधुसूदन ओझा को इस मंडली में शामिल किया गया। इस संस्था का सम्मेलन प्रतिदिन सायंकाल चंद्र महल (सिटी पैलेस) के समीप संस्थापित राजराजेश्वर महादेव के सान्निध्य में हुआ करता था। कहा जाता है कि इस संस्था की अनुमति के बिना कोई धार्मिक व्यवस्था देना लगभग असंभव था। सवाई रामसिंह के समय में शैव तथा वैष्णव संप्रदाय के बीच भयंकर वाद-विवाद उत्पन्न हो गया था। इस वाद-विवाद में अनेक वैष्णव जयपुर से पलायन कर गये थे। वृंदावन के महंथ श्री रंगाचार्य के साथ जयपुर के विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ था। कहा जाता है कि उनका एक पत्र नैयायिक भाषा में मीमांसा के अधिकरणों से युक्त होने के कारण तत्कालीन किसी विद्वान की समझ में न आया। महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी जी ने मधुसूदन ओझा विषयक अपने लेख में इस बात का उल्लेख किया है कि श्री राजीव लोचन ओझा ने इसका समाधान प्रस्तुत कर अपना लोहा मनवाया था।

कैलास-दर्शन

 बचपन की स्मृति है कि एक बार मामा (दादी) कई दिनों बाद कहीं बाहर से लौटी थी। और कुछ की तो नहीं लेकिन उनके द्वारा लाई गई पतली, कांटेदार लाठी की स्मृति अब भी कायम है। बाद में पता चला कि वह तीर्थाटन से लौटी थी। बहुत दिनों तक हरद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, जमुनोत्री आदि शब्द कानों को सुनने पड़े थे। बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने-पहचाने शब्द थे। साल में एक बार यहां के पंडे गांव के चक्कर लगा जाते। तब गांव से झुण्ड के झुण्ड लोग बद्रीनाथ और केदारनाथ के लिए निकलते और विशेष कुछ नहीं तो गंगाजल और लाठी के साथ लोव लौटते। गंगाजल यहां काम आता और लाठियां वहां पहाड़ के दुर्गम रास्ते को आसान करतीं। इस तीर्थाटन में बिहार के कुछ नामी साहित्यकार भी शामिल रहे हैं। दो के नाम यहां खासतौर से लिये जा सकते हैं। फिरंगिया के कवि मनोरंजन एवं शिवनंदन सहाय। पीछे से जानेवालों में गंगाशरण जी भी थे। शिवनंदन सहाय ने अपनी यात्रा का हाल 'कैलास-दर्शन' में लिखा है तो बाबू मनोरंजन ने 'उत्तराखंड के पथ पर' में। गंगाशरण जी ने मनोरंजन की किताब की भूमिका लिखकर ही संतोष किया है। ये किताबें पुस्तक भंडार लहेरियासराय से छपी थीं। मनोरंजन बाबू की किताब का प्रकाशन 1936 में हुआ तो सहाय जी की किताब सम्भवत: 1934 में। इन दोनों किताबों से पहले मुंगेर की एक लेखिका की किताब 'हिमालय परिभ्रमण' बंगला भाषा में छप चुकी थी। इस तरह देखा जाय तो बिहार की हिन्दी में यात्रा वृत्तांत का भी योग है, किंतु इन सब बातों की चार चर्चा नहीं हो सकी। विस्मृति स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु जब वह व्याधि बन जाय तो उपचार अपेक्षित है।

Saturday, September 12, 2026

किताबों में श्रीकांत

 (श्रीकांत जी के जन्मदिन के बहाने समय-समय पर उनकी किताबों पर की गई टिप्पणियों का कोलाज प्रस्तुत करते हुए)

दलित आंदोलन की पहली किताब

‘बिहार में दलित आंदोलन’ (1912-2000) पुस्तक के लेखक हैं प्रसन्न कुमार चौधरी एवं श्रीकांत। इससे पहले उनकी पुस्तक ‘बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम’ अपने ‘जर्नलिस्टिक एप्रोच’ (प्रकाश लुइस) के बावजूद खासी चर्चा में रही।

‘बिहार में दलित आंदोलन’ पुस्तक बीसवीं सदी में बिहार के दलितों की स्थिति और उनके आंदोलन का एक दस्तावेज है। देश के अन्य हिस्सों, खासकर दक्षिण और पश्चिमी प्रदेशों में चले दलित आंदोलन और उनकी स्थिति पर तो काफी सामग्री उपलब्ध है, लेकिन बिहार के दलितों के बारे में सामग्रिक अध्ययन अब तक नहीं किया गया। यह किताब इसी अभाव को पूरा करने का एक प्रयास है। इस अध्ययन में लेखक को प्राथमिक स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ा है किंतु ये स्रोत भी ज्यादातर ‘नकारात्मक’ ही हैं-पुलिस तथा प्रशासन की रिपोर्टों के रूप में। यह अध्ययन एक ‘दस्तावेज’ इसलिए बन पड़ा है कि इसमें लगभग सभी उपलब्ध सामग्रियों को क्रमवार संकलित करने का प्रयास किया गया है।

इस अध्ययन को दस अध्यायों में सफलतापूर्वक समेटने का प्रयास किया गया है। प्रथम अध्याय ‘कमिया’, ‘क्रिमिनल’ और ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ है। इसमें बीसवीं सदी के आरंभ में बिहार के अछूतों की स्थिति प्रस्तुत की गई है। लेखक की राय है कि ‘भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के साथ जहां एक ओर औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत हुई, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज की कमजोरियों का आकलन-विश्लेषण तथा उनके निवारण की कोशिशें भी तेज हुईं। और आगे, ‘इसी आत्म-मंथन के बीच कई धर्म-सुधार तथा समाज-सुधार आंदोलनों का जन्म हुआ।’ उपनिवेशवाद के खिलाफ यह संघर्ष न सिर्फ अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संघर्ष भर था, वरन वह भारतीय समाज की पुनर्रचना का भी आंदोलन बन गया। हमारा राजनीतिक संघर्ष भारतीय समाज की पुनर्रचना का आंदोलन किस हद तक था इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक द्वारा ही उद्धृत पंक्तियों का सहारा लें तो बेहतर होगा। ‘राजनीतिक आंदोलन के कई उग्र योद्धा सामाजिक प्रश्नों पर काफी पुरातनपंथी रुख रखते थे, और सामाजिक आंदोलन के कई गणमान्य नेता राजनीतिक आंदोलन के प्रति अधिक आग्रही नहीं थे। 1885 में कांग्रेस के पूना अधिवेशन में सामाजिक सुधार-विरोधी गुट विद्रोह कर बैठा और उसने धमकी दी कि यदि कांग्रेस ने सोशल कांफ्रेंस को अपने पंडाल का उपयोग करने की अनुमति दी तो पंडाल फूंक दिया जाएगा।’ यह भी सच है कि भारत में राष्ट्रवाद के उद्भव एवं विकास के साथ ही जातीय संगठनों एवं साप्रदायिक दंगों का इतिहास जुड़ा है। 1885 में कांग्रेस की स्थापना होती है और दलित वर्गों का सबसे पुराना सामाजिक राजनीतिक संगठन 1892 में ‘द्रविड़ जनसभा’ नाम से अस्तित्व में आता है। पहला हिन्दू-मुस्लिम दंगा भी इसी के आसपास हुआ माना जाता है। इसकी तार्किक संगति बैठाने का पुस्तक में अभाव झलकता है।

दलित आंदोलन के उद्भव से संबंधित एक विचार साहित्य चिंतक डा. नामवर सिंह का भी है। वे लिखते हैं, ‘गनीमत है कि बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य में लेखकों का एक ऐसा समुदाय या वर्ग (संगठन नहीं) है जो अंग्रेजी शिक्षा से बहुत कुछ वंचित रह जाने के कारण इस नव-उपनिवेशवादी विचारधारा की गिरफ्त से बचा रह गया है। …भारतीय भाषाओं में ‘दलित साहित्य’…उसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जो प्राणवान और सार्थक है…साहित्य सृजन का अच्छा-खासा हिस्सा भारतीय समाज के उन लोगों की ओर से आया है जो हाशिए पर रहे हैं।’

बिहार में दलित आंदोलन का इतिहास लिखते हुए श्रीकांत ने दलित आंदोलन की वैचारिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश नहीं की है। यह आंदोलन बिहार में वर्षों से चल रहे ‘एग्रेरियन मुवमेंट’ से दार्शनिक स्तर पर कैसे भिन्न है, इसकी जांच अपेक्षित थी। लेकिन पाठकों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना होगा कि बिहार में दलित आंदोलन पर यह पहली पुस्तक है, पहला पाठ है।

बिहार में 'सुशासन' के नाम पर जो 'खेल' चल रहा है उसमें केवल अख़बारों के संपादक ही नहीं, अलख. एन. शर्मा जैसे 'एनजीओ बुद्धिजीवी' भी लिप्त हैं और मालामाल हो रहे हैं। अलख एन शर्मा की ताजा 'लीला' है-#डेवलपमेंटरिसर्चऑनबिहार (2000-2010) ए कम्पेनडियम'। इसे अलख एन शर्मा, अमृता दत्ता एवं जोयिता घोष ने सम्पादित किया है। यह 2000-2010 के बीच बिहार पर केंद्रित प्रकाशित पुस्तकों/शोध लेखों की सूची है। इस 'महत्वाकांक्षी' परियोजना की कई जानकारी अपर्याप्त/अपूर्ण और भ्रमपूर्ण है। उदाहरण के लिए 'दलित मूवमेंट इन बिहार (1912-2000) के लेखक प्रसन्न कुमार चौधरी के साथ श्रीकांत भी हैं। इस किताब का कई जगह उल्लेख तो है लेकिन कहीं भी लेखक के रूप में श्रीकांत का नाम नहीं है। इस शोध परियोजना की क्या जरूरत थी। सुशासन में लूट जारी है और यह सब वैश्विक स्तर पर है।

हिन्दी-सेवक मूनिस

पीर मुहम्मद मूनिस की रचनाओं एवं उनसे संबंधित दस्तावेजों का श्रीकांत ने 'अपनी बात' के साथ संकलन एवं संपादन किया है। पहली बार यह किताब सन 2000 में प्रकाशित हुई थी। इस संस्करण में कुछ अशुद्धियां शेष रह गई थीं जिनको आशुतोष पार्थेश्वर के सदुद्योग से दुरुस्त करते हुए चम्पारण सत्याग्रह के 100वें साल में प्रभात प्रकाशन के सौजन्य से पुनर्प्रकाशित किया गया है। हालांकि कुछ अशुद्धि रह ही गई है। उदाहरणार्थ, पृष्ठ संख्या 6 तथा कवर फ्लैप पर लिखा है कि 'मूनिस का जन्म 1892 में हुआ था' जबकि पृष्ठ संख्या 16 पर लिखा है, 'मूनिस का जन्म 1882 में हुआ था'। कहने की आवश्यकता नहीं कि 1882 वाली बात ही सही प्रतीत होती है।

भाषा में फिसलन से कभी-कभी प्रसंशा में कही गई बात भी घातक साबित हो जाती है। जैसे, मूनिस का हिन्दी प्रेम बताते हुए लेखक लिख जाता है कि 'मूनिस मुसलमान होते हुए भी हिन्दी के अनन्य सेवक थे'। (पृष्ठ 5) इस तरह के वाक्य से सामान्य मुसलमान की छवि हिन्दी विरोधी की बनती है। इससे कोई यह भी प्रमाणित करेगा कि हिन्दू हिन्दी सेवक हैं और फिर यह भी कि मुसलमानों की भाषा उर्दू है और हिंदुओं की हिन्दी।

कहने की आवश्यकता नहीं कि एन. एम. पी. श्रीवास्तव के बाद श्रीकांत अकेले ऐसे पत्रकार हैं जिनकी आधुनिक बिहार के इतिहास में गहरी अभिरुचि है। आधुनिक बिहार के विविध विषयों/पहलुओं पर आपके कई मूल्यवान शोधग्रंथ प्रकाशित हैं। आधुनिक बिहार के इतिहास में चंपारण, मूनिस और किसान आंदोलन में रुचि रखने वाले लोगों को यह किताब अवश्य देखनी चाहिए। वे तो और भी खास तवज्जो के साथ पढ़ें जो बिहार की हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास जानना/लिखना चाहते हों।

बिहार के बलिदानी

कहा जाता है कि कविता तीसरे पाठ के बाद भ्रष्ट हो जाती है और हम रिसर्चर किताब से किताब बनाये जा रहे हैं। 'स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के बलिदानी' (बिहार विधान परिषद सचिवालय, मार्च 2011) श्रीकांत जी की किताब है। इसमें पृष्ठ 31 पर मेरे गांव का नाम 'टेपारी' छपा है। मेरे गांव का नाम #तिनेरी है। गलत नाम पढ़कर दुख हुआ। लगा कि छापे की भूल है। लेकिन कल मैंने अपने विद्यालय की लाइब्रेरी से एक किताब निकाली। किताब का नाम है 'भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के शहीद'। लेखक वीरेंद्र कुमार 'वीरू' हैं। अनुराग प्रकाशन ने 2008 में इसे प्रकाशित किया है। इस किताब के पृष्ठ 35 पर भी अपने गांव का नाम 'टेपारी' छपा देख मन छोटा हो गया। क्या यह मूल दस्तावेज की गलती है अथवा मान लें कि किताब से किताब ही नहीं निकलती गलतियां भी निकलती हैं! 

पुनश्च, श्रीकांत जी की किताब में तिथिवार शहीदों की सूची प्रकाशित है। उक्त सूची में मेरे गांव के 'शहीद' अम्बिका सिंह का जिक्र नहीं है।

अम्बिका सिंह की मृत्यु 10 अगस्त 1942 को गाँव के निकट रेल पटरी पर पुलिस की गोली लगने से हुई थी। तथ्य है कि रेल-पटरी उखाड़ने की कार्रवाई रात के वक्त हुई थी। सुबह वे धान का खेत देखने व शौच के ख्याल से निकले थे। तभी उन्हें गोली लगी थी। इस तरह वे इतिहास में 'शहीद' के रूप में दर्ज हैं। स्वतंत्रता आंदोलन की यह कोई पहली ऐसी घटना नहीं है। 1942 के जमाने में पाखाना करते-करते 'शहीद' हो जाने की अनेक घटनाएं हैं। 1942 की ही क्रांति के समय आरा के पास जमीरा में पाखाना फिर रहे कुछ लोगों को गोली मार दी गई थी। (मन्मथनाथ गुप्त, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास, आत्माराम एंड संस, 2009, पृष्ठ 374) उन सब का का नाम 42 के शहीद में दर्ज है.

पुस्तक में कुछ महत्त्वपूर्ण शहीदों के नाम नहीं आ सके हैं। नवंबर 1930 में 'जवाहर दिवस' मनाने का आदेश निकला था। बिहार ने सबसे अधिक उत्साह के साथ इस दिवस को मनाया। इस दिवस को मनाने की तैयारियां देखकर ही बिहार सरकार घबरा गई थी और उसको रोकने के लिए सरकार ने कोई चेष्टा बाकी न रखी। इसके चलते बिहार में दो जगहों पर गोलियां भी चलाई गईं।  #मुजफ्फरपुर का #भगवानदास इसी दिवस के मनाने में शहीद हुआ। (छविनाथ पांडेय, राजेंद्र अभिनंदन ग्रंथ, पृष्ठ 118) 19 जून, 1931 को हाजीपुर रेलवे स्टेशन पर क्रांतिकारियों ने रेलवे कैश बैग को लूट लिया था। लूट में #रामदेनीसिंह ने प्रमुख भूमिका निभाई थी और उन्हें फांसी की सजा भी इसी केस के मुतल्लिक हुई थी। (विनोद कुमार सिंह, मृत्युंजय सूरज नारायण सिंह, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना, 2011, पृष्ठ 43) #महेंद्रचौधरी भी ऐसे ही एक राजनीतिक कैदी का नाम है जिसे डाकाजनी और हत्या के अपराध में 7 अगस्त, 1945 को भागलपुर केन्द्रीय जेल में फांसी दी गई थी।

महात्मा गांधी और मैं

जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान, पटना से रामनन्दन मिश्र की पुस्तिका 'महात्मा गाँधी और मैं' का पुनर्प्रकाशन हुआ है। निस्संदेह यह ऐतिहासिक महत्त्व का काम है। नई पीढ़ी के लोगों के लिए, जिन्हें भारत और खासकर बिहार के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में रुचि है, विशेष महत्त्व की चीज है। नई पीढ़ी के लोगों को इसमें कई नई बातें मिलेंगी। एक नई बात मुझे भी मिली। मैं अब तक यही जानता था कि गाँधीजी को महात्मा की उपाधि टैगोर से मिली थी। इतिहास की प्रचलित किताबों में यही पढ़ा था। रामनन्दन मिश्र ने टैगोर की जगह लोकमान्य तिलक का नाम लिया है। (पृष्ठ 11)

दुखद है कि असाधारण महत्त्व की पुस्तिका में भी भाषा और प्रूफ की कई गड़बड़ियां हैं। पृष्ठ 14 पर लिखा है, 'स्वर्गीय सरोजिनी नायडू अक्सर गाँधीजी के पास आतीं और उनसे घंटों बातें करतीं।' हम यह तो जानते हैं कि गाँधीजी एक चमत्कारी व्यक्तित्व के आदमी थे किंतु अब तक यह पढ़ा-सुना न था कि वे मृतात्माओं के साथ भी घंटों बोल-बतिया सकते थे! नामों की समरूपता/एकरूपता का भी ध्यान नहीं रखा गया है, अर्थात कहीं 'राधाबाई' लिखा मिलता है तो कहीं 'राधावाई'। एक जगह 'राधाबहन' तो दूसरी जगह 'राधावहन'। पूरी किताब में 'ढ' और 'ढ़' के प्रयोग में असावधानी बरती गई है। अनुस्वार का कई जगहों पर अवांछित/अनावश्यक इस्तेमाल हुआ है। रुचि और रुपये भी कई जगह गलत (रूचि, रूपये) लिखे मिलते हैं। पृष्ठ (viii) पर 'घी' का स्त्रीलिंग-प्रयोग है : 'सबों को खाने में एक चम्मच घी मिलती थी'। यह प्रयोग व्याकरणसम्मत नहीं है। पुरुष (पुरूष) और पुरुषोत्तम (पुरूषोत्तम) लिखने में भी भूल हुई है। पृष्ठ 17 पर 'पूर्व-सर्गों' शब्द के लिए कोष्ठक में propositions लिखा गया है जबकि इसे कायदे से prepositions होना था।

बिहार में महात्मा गांधी

5 मार्च, 1947 को बापू कलकत्ता-पटना ट्रेन में सवार हुए। पटना जंक्शन पर भीड़ होने की आशंका से उन्होंने फतुहा स्टेशन पर उतर जाना ही मुनासिब समझा। इस बात की जानकारी कुछ ही लोगों को थी। फतुहा स्टेशन पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, विकास मंत्री डॉ. सैयद महमूद, अर्थमंत्री अनुग्रह नारायण सिंह तथा अब्दुल बारी कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं एवं स्वयंसेवकों के साथ स्वागत एवं अगवानी के लिए वहां पहुंचे। किन्तु पत्रकारों को इस बात की खबर लग चुकी थी इसलिए वे लोग भी अपने लटकते कैमरों के साथ वहां प्रकट हो चुके थे। गाड़ी से उतरते ही उन्होंने डॉ. सैयद महमूद से मजाक किया, 'क्यों, आप तो अभी जिन्दे हैं न?' श्रीकृष्ण सिंह की गाड़ी से बापू सैयद महमूद के आवास पर पहुंचे और उसे ही अपना ठिकाना बनाया। गांधी तक जो खबर पहुंची थी उसके अनुसार बिहार के हिंदुओं ने बंगाल का बदला लिया था। कांग्रेसियों की भूमिका भी असंदिग्ध नहीं रही थी। इसलिए गांधी के इन दोनों से खिन्न होने के कारण थे। गांधी ने कहा कि 'बिहार ने हिंदुस्तान का नाम डुबो दिया। नोआखाली के जंगली कृत्यों का अनुकरण करना न सीखना और बदले का विचार किये बिना मृत्यु का आलिंगन करके मानवोचित ढंग से जंगलीपन का सामना करना ही नोआखाली का बदला लेने का उचित मार्ग है।' इस भाषण के बाद बापू को एक 'तार' प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था, 'बिहार के हिंदुओं को आप जरा भी उलाहना न दीजिए। उन्होंने जो कुछ किया है, वह कर्तव्यपालन की दृष्टि से ही किया है।'

1947 के दंगे में बापू नोआखाली से सीधे बिहार आये थे। पटना आने के तीसरे ही दिन सुबह की सैर के दौरान बापू की भेंट एक भिखारी से हुई। वह अंधा था इसलिए बापू को देख तो नहीं सकता था किन्तु उनके चरण का स्पर्श पाकर वह धन्य और पवित्र हो जाना चाहता था। कहने को वह हिन्दू था किन्तु आसपास के गांवों से भीख मांगकर जमा की गई चार आने की रकम उसने मुस्लिम-सहायता-कोष को सुपुर्द कर दी। हर्ष और उल्लास से गांधीजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने भिखारी की पीठ थपथपायी और कहा कि आज से भीख माँगना छोड़ दो; अंधा आदमी भी बहुत काम कर सकता है। सूत तो कात ही सकता है। गांधीजी ने मनु को कहकर उसे तकली दिलवाई और स्वयंसेवकों से कहा कि सदाकत आश्रम में ऐसे लोगों का सदुपयोग हो। अपनी पीठ पर बापू का हाथ फिरा पाकर भिखारी काफी आनंद में था। एक 'रॉयल बेगर' ने एक सचमुच के भिखारी का उद्धार किया।

ठिकाने पर लौटकर बापू ने मनु को समझाया, 'तुमने देख लिया न, भिखारी जैसे ने भी पैसा अपने पेट में न डालकर खास नाम लेकर मुस्लिम-सहायता-कोष के लिए दिया। उसके चार आने की कीमत मेरी दृष्टि में तो चार करोड़ से भी अधिक है। इसका नाम है सच्चा दान! यह है बिहार की जनता! बिहार में कदम रखे आज तीसरा ही दिन है। इतने में ही यह जो छोटी-सी घटना हो गयी उसका मेरे मन पर बहुत अद्भुत असर हुआ है। ईश्वर ने यहाँ तक मेरी आवाज पहुंचायी है, यह उसकी महान कृपा है। हम जितने सच्चे होते हैं, निर्मल होते हैं, उतना उन गुणों का प्रतिबिंब ईश्वर हमें दिखाता ही है।'

श्रीकांत की किताब '1947-बिहार में महात्मा गांधी दंगों का दस्तावेज है। 5 मार्च 1947 से 23 मई 1947 तक बिहार के अलग-अलग दंगा-प्रभावित स्थानों की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी ने जो कुछ कहा था वह सब तभी 'दुःखे दिल की पुकार' पुस्तिका में प्रकाशित हुआ था। इस सामग्री के अलावे भी कई दस्तावेजों को खंगाल कर श्रीकांत ने अपनी किताब को पठनीय और प्रामाणिक बनाया है।

पुस्तक के आरंभ में गांधी संग्रहालय, पटना के रजी अहमद का 'अवलोकन' छपा है। प्रथम अनुच्छेद में 'राजनीतिक-गुलामी' में योजक चिह्न का बेजा प्रयोग हुआ है। दूसरे अनुच्छेद  के प्रथम वाक्य का हिस्सा है : 'दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ लड़े अभियान में'। 'लड़े अभियान' की जगह 'चले अभियान' श्रेयस्कर था। आगे लिखा है : "1916 के लखनऊ कांग्रेस के बाद, एक के बाद एक घटनायें सामने आती गईं....।" कहना अनावश्यक है कि एक के बाद एक घटना आती है! एक के बाद बहुवचन सर्वथा त्याज्य है। आगे लिखा है : 'ऐसे मील के पत्थर हैं जिसने...।' जिसने की जगह जिनने संभवतः ज्यादा उपयुक्त होता। 'युग पुरूष', 'गुरू गोविंद सिंह' की जगह 'युग पुरुष' और 'गुरु गोविंद सिंह' उचित था। 'लिखे एक पत्र में लिखा था'-यहाँ लिखने की क्रिया की अनावश्यक आवृत्ति है। अंतिम अनुच्छेद में Man of the Millennium असावधानीवश Man of the Million हो गया है। परिणाम स्वरूप और विस्तार पूर्वक साथ लिखे जाने चाहिए अर्थात परिणामस्वरूप तथा विस्तारपूर्वक। कुछ प्रूफ की भूलें भी हैं। उदाहरणार्थ तजुर्बों और पीढ़ियां 'तर्जुबों' तथा 'पीढ़ीयां' प्रकाशित हैं।

बिहार में हिन्दी--प्रेमकुमार मणि

राजू रंजन जी इतिहास के प्राध्यापक हैं और हिन्दी में कविताएं लिखते हैं. सामयिक विषयों पर भी लिखते रहे हैं. कोई बीस साल या उससे भी पूर्व ' लोकदायरा ' पत्रिका के कोई आधा दर्जन अंक इन्होने  बड़े उत्साह से निकाला था. पिछले कुछ समय से इनकी चुप्पी से मैं चिंतित था. लेकिन कुछ समय पूर्व जब इनकी किताब ' बिहार में हिन्दी ' मिली तब अहसास हुआ उनकी चुप्पी क्यों थी. 

किताब (बिहार में हिन्दी : डा राजू रंजन प्रसाद) में कुल आठ लेख हैं जो एक साथ मिल कर सोच-विचार की एक दुनिया गढ़ते हैं. बिहार का सांस्कृतिक अध्ययन बहुत कम हुआ है. यह किताब इस दिशा में एक जरूरी कदम है. लेखों के शीर्षक बहुत कुछ कह जाते हैं, इसलिए इन्हें देखा जाना चाहिए -

हिन्दी का उद्भव एवं पूर्व मध्यकालीन बिहार 

औपनिवेशिक बिहार में शिक्षा एवं हिन्दी में पाठ्यपुस्तक 

औपनिवेशिक बिहार में स्कूली शिक्षा एवं हिन्दी पत्रकारिता 

औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी कहानी का विकास 

बिहार में अंग्रेजी दमन एवं प्रतिरोध का साहित्य 

औपनिवेशिक बिहार में भागलपुर की हिन्दी पत्रकारिता 

औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी व्याकरण की परंपरा 

बिहार में नवजागरण और बिहार बंधु 

सभी लेख महत्वपूर्ण हैं. सन्दर्भ टिप्पणियों के साथ इन्हें अकादमिक अनुशासन के साथ लिखा गया है. इस दृष्टि से यह इतिहास के विद्यार्थियों केलिए भी उपयोगी है. लेकिन आम पाठक भी इससे बहुत कुछ ग्रहण कर सकते हैं. पिछली शताब्दियों के बिहार में हिन्दी, उसके साहित्य और  पत्रकारिता की क्या स्थिति थी और कुल मिला कर इस क्षेत्र के सामाजिक- राजनीतिक नवजागरण में हिन्दी वालों ने क्या भूमिका निभाई इस किताब से समझा जा सकता है. रामदीन सिंह की किताब  बिहार दर्पण की कडी में मैं इसे देखता हूँ. हाँ, औपनिवेशिकता से लेखक का क्या तात्पर्य है इसकी विवेचना होनी चाहिए थी. राजू जी जब लोकदायरा निकालते थे, तब भी उसे प्रति-औपनिवेशिक चेतना की पत्रिका घोषित किया था. इसकी सम्यक विवेचना अपेक्षित है. 

लगभग तीन सौ ( २९१) पृष्ठों की किताब के प्रकाशक हैं प्रलेक प्रकाशन, मुंबई. 

प्रेमकुमार मणि

किताबों के बारे में

विश्व पुस्तक दिवस (2022) की शाम भंवरलाल कसाणिया जी का फोन आया कि मैं अगर व्यस्त न होऊं तो उनसे ऑनलाइन पुस्तकों के बारे में बात करूँ। उन्होंने बातचीत का एक सिरा भी पकड़ा दिया कि आजकल शिक्षक कहलाने वाला समुदाय भी पढ़ाई-लिखाई और अंततः किताबों से दूर जा चुका है। उनकी बात से मुझे कृशन चंदर के 'एक गधे की आत्मकथा' की याद हो आई और 'गधों' के लिए थोड़ी करुणा भी पैदा कर सका। गधे की आत्मकथा का मजमून है कि गधों का मालिक वकील साहब के यहां काम पर लगा है। वकील साहब को अखबार पढ़ने की बुरी आदत थी लेकिन वे क्लासिफाइड विज्ञापन वाले कॉलम ही में रुचि लेते थे। वे जब विज्ञापन देख-पढ़ रहे होते तो संपादकीय पृष्ठ बाहर की तरफ खुलता। कहना अनावश्यक है कि गधे को भी अखबार पढ़ने की लत थी। इसलिए वह हमेशा इस ताक में रहता कि वकील साहब अखबार खोलें तो वह भी कुछ ताक-झाँक कर ले। इस तरह वकील साहब प्रतिदिन अखबार का विज्ञापन उलटते-पलटते और मौके का फायदा उठाकर गधा संपादकीय पृष्ठ पर अपनी नजरें टिका लेता। गधे को इस बुरी आदत के लिए मालिक की छड़ी भी खानी पड़ती लेकिन गधे ही क्या जो मार खा सुधर जाएं!

कृशन चंदर के गधे की तुलना मैं पटना-गया रेललाइन के यात्रियों से कर सकता हूँ। बचपन की स्मृति है कि जब कोई सज्जन अखबार लिए रेल डिब्बे में दाखिल होते तो एक साथ कई-कई लोग उसे झपट लेने को आतुर रहते। बेचारे का एक-एक पेज पूरी बोगी में फैल जाता। अखबार मालिक को छोड़ सबको पता होता कि कौन-सा पृष्ठ किसके पास है। वे आपस में पृष्ठों की अदला-बदली करते रहते और कभी-कभी तो अखबार मालिक को उसके बगैर ही अपने गंतव्य पर गाड़ी छोड़ देना होता। मैं कभी अखबार लेकर तो ट्रेन में नहीं चढ़ा लेकिन कंधे से लटकता कपड़े का एक झोला अवश्य होता जिसमें मार्क्सवादी साहित्य की दो-तीन किताबें होतीं और 'हंस-मेनस्ट्रीम' जैसी पत्रिकाएं। झोले से जैसे ही किताबें निकलतीं कि लोग अपने हाथ में लेने और उलट-पलट करने को बेचैन हो जाते। कभी-कभी ट्रेन में इतनी भीड़ होती कि बैठने भर की जगह न होती तो किताबें क्या निकलतीं। झोले में पड़ी-पड़ी ज्ञान का ताप फैलाती रहती। काफी बाद तक झोले की आदत बनी रही। पत्नी कभी टोकती भी कि जब पढ़ने का अवसर नहीं मिलता तो किताबें क्यों टांगे चलते हैं? मैं बेलज्ज सा जवाब देता-'इन कंधों को भार ढोने की आदत हो गई है। इससे संस्कार और संतुलन दोनों कायम रहता है!'

पुस्तकों में हमारे पुरखों के अनुभव कैद हैं। किसी राष्ट्र अथवा संस्कृति की स्मृति के दस्तावेज हैं। पारंपरिक भारतीय समाज में इसीलिए बड़े-बुजुर्गों का आदर/सम्मान होता था कि वे अनुभव के खजाने हैं। पूर्ववैदिक समाज में 'सभा', 'समिति' जैसी संस्थाओं का उल्लेख है जिनमें बुजुर्गो की खास भागीदारी पर ध्यान दिया जाता था लेकिन अफसोस कि आज हमारे परिवार की अवधारणा से बुजुर्ग गायब हैं। जो थोड़े बच भी गये हैं उनको हमने वृद्धाश्रम की राह दिखा दी है और एक नये बुजुर्ग 'गूगल बाबा' को ले आया है। गौर करें तो किताबों का संकट और बुजुर्गों का संकट साथ-साथ आया है। हमें मानवी बुद्धि नहीं कृत्रिम बुद्धि की दरकार हो चली है और सबसे बड़ी 'व्यावसायिक बुद्धि' है। मान लिया गया है कि पढ़े-लिखे लोगों में व्यावसायिक बुद्धि नहीं होती। उन्हें 'किताबी' कहकर उपेक्षित किया जाता रहा है। याद आता है कि अदम गोंडवी भी अपनी गजल में एक जगह 'किताबी' शब्द का प्रयोग करते हैं। कहते है-तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये दावा किताबी है। (स्मृति के आधार पर) कबीर तो पहले ही 'कागद लेखी' की जगह 'आँखिन देखी' को स्थापित कर चुके हैं। अब कबीर को भला कौन कहता कि कागद लेखी भी कभी आँखिन देखी रहा होगा। अकारण नहीं है कि वेद के ऋषियों को मंत्रों का 'रचयिता' नहीं 'द्रष्टा' कहा गया है!

एक तुलसी बाबा भी हैं जो स्कूल मास्टर की तरह डपटकर हिदायत दे गये हैं-शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। बड़े भाई बताते हैं कि पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के एक प्रोफेसर थे। दीनानाथ वर्मा नाम था। उनका सूत्रवाक्य था-पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना। किताब पढ़ना भी कला है। सब इस कला का निष्णात हो सम्भव नहीं। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों की बात कुछ और है! किताब को पढ़ना समय को पढ़ना है जिस समय में वह किताब लिखी गई। हर समय के अपने खास शब्द और मुहावरे होते हैं। एक समय के बाद शब्द और मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। इन बदले हुए अर्थ के साथ पुराने समय को पढ़ना जोखिम भरा और अनर्थकारी हो सकता है। संस्कृत की एक कहानी से इस बात को बेहतर समझा जा सकता है। कहानी है कि शास्त्र पढ़े हुए चार स्नातक ब्राह्मणकुमार थे। वे 'शास्त्रजीवी' थे मतलब शास्त्रोक्त काम ही करते थे। रोजगार के सिलसिले में वे गांव से बाहर निकले। शास्त्र साथ लेते गये। मेरे बाबा कहा करते थे कि 'तीर न कमान तो ...के पैठान'! खाली जगह में आप उपयुक्त शब्द रख छोड़ें, बाबा का कहा मैं नहीं लिख सकता। ब्राह्मणकुमार जैसे ही घर से निकले कि एक चौराहा मिला। जब शास्त्र उपस्थित हो तो भला किसी से क्यों पूछना कि किस राह जाना चाहिए? शास्त्र ने रास्ता दिखाया-महाजनो येन गताः स पन्थाः! दुर्योग कहिए कि उसी समय एक अर्थी ले जायी जा रही थी। स्नातकों ने समझा महाजन यानी ढेर सारे लोग। अनुगमन का मार्ग अपनाया। अब वे श्मशान में थे। साक्षात विपत्ति। अब क्या करें? पुनः शास्त्र खोला-विपत्ति में जो साथ खड़ा हो वही भाई है। तब सामूहिक रुदन का दौर था। गधे के गले लग रोने के क्रम में भाई ने दुलत्ती झाड़ दी। परिणाम की भयंकरता का आप खुद अनुमान कर लें। आगे बढ़े कि रात घिर आई। गाँव के मुखिया जी के घर ठहरे थे। खाने में मीठी सेवई मिली लेकिन शास्त्र में लिखा 'दीर्घसूत्री विनश्यन्ति' मिल गया। विनाश के भय से कुमारों ने कुछ न खाया। आगे की यात्रा शुरू। नदी गहरी मिली। एक को तैरना न आता था। डूबने-उतराने लगा। शास्त्र ने कहा, 'सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धत्यजति स: पंडित:'। पण्डितों ने डूबते शरीर का सिर बचा लिया। पूरे का मोह क्यों करता भला! गाँव लौटे तो तीन शरीर और एक सिर साथ था। उन कुमारों के साथ क्या सलूक हुआ होगा यह अब पूछना अनावश्यक है। इसलिए तुलसी बाबा का कहा मानिए और किताब को पढ़ने का सही तरीका अमल में लाइए! पाठ और पाठ....पुनर्पाठ!

Thursday, September 10, 2026

एक दलित की आत्मकथा

 प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित किताब एक दलित कीआत्मकथा (2022) मिली। लगा कि लेखक का नाम 'राम रक्षादास' गलत छप गया है। मेरी सहज व्याकरण-बुद्धि ने इसे सुधारकर 'रामरक्षा दास' पढ़ना शुरू किया। हालांकि नाम में बुद्धि काम नहीं करती तो मैंने लेखक को फोन लगाया। पता चला कि उनका सही नाम 'राम रक्षा दास' है। पुस्तक में नाम की अशुद्धि के साथ और भी कई तरह की अशुद्धियां रह गई हैं जो गम्भीर संपादन की मांग करती हैं। मसलन, पृष्ठ 17 पर 'खपरैल का घर' की बजाय 'खपरैल घर' लिखना श्रेयस्कर होता। घर लिखना अगर आवश्यक हो तो 'खपड़े का घर' लिखा जाना उचित है। पृष्ठ 18 पर 'अहसान', 'छह', 'पुत्रेष्ठि' की जगह 'एहसान', 'छः' और 'पुत्रेष्टि' का प्रयोग सही होता। पृष्ठ 22 पर 'मर्माहत' भूलवश 'मर्माहित' छप गया है तो पृष्ठ 23 पर 'फीट'। हिंदी में 'फुट' ही चलता है। पृष्ठ 40 पर 'अधिकांश' शब्द की जगह 'अधिकतर' लिखा जाना था। 'प्रीफेक्ट' को सर्वत्र 'परफेक्ट' (पृष्ठ 72 एवं अन्य) लिखा गया है। पृष्ठ 80 पर लिखा है, 'फूलन देवी मालिन जाति की लड़की थी।' कहना अनावश्यक है कि जाति का नाम तो माली है, मालिन उसका स्त्रीलिंग रूप हुआ। पृष्ठ संख्या 86 पर '57वीं जयंती समारोह' की बजाय '57वाँ जयन्ती समारोह' लिखा जाना चाहिए था।

पृष्ठ 116 पर लिखते हैं, '...तब तैमूरलंग याद आते हैं, जिन्हें 17 बार चढ़ाई करने के बाद 18वीं बार में सफलता मिली थी।' दरअसल यह बात महमूद गजनी के बारे में प्रचलित है।

लेखक को लगता है कि "इस देश और समाज में 'मनुस्मृति' के प्रावधान के विरुद्ध जाना खतरे से खाली नहीं है।" (पृष्ठ 226) इस समझ से उनके निजी जीवन के निर्णय तो प्रभावित होते ही हैं, इतिहास का विश्लेषण भी कहाँ अप्रभावित रह पाता है! बंगाल के एक प्रसंग में वे कहते हैं- "'मनुस्मृति' में शूद्रों को जज बनाने पर रोक है। अंग्रेजों ने 1861 में आई.पी.सी. एवं अन्य अधिनियम बनाए। इसके पहले तो 'मनुस्मृति' के कोड के आधार पर न्यायिक कार्य होता था। 'मनुस्मृति' में ब्राह्मणों को दंडित करने पर रोक है। लेकिन इस प्रावधान के विपरीत वॉरेन हेस्टिंग्स ने 5 अगस्त, 1775 में राजा नंद कुमार नामक एक ब्राह्मण को फाँसी दे दी। जिस तरह भागलपुर में हंगामा हुआ, उसी तरह 1775 में कलकत्ता में हंगामा खड़ा हुआ। अंग्रेजों का शासन तो ब्राह्मणों की मदद से चल रहा था। सारे ब्राह्मण पदाधिकारियों और नेताओं ने अंग्रेजों को सहयोग करना बंद कर दिया। नतीजा हुआ कि अंग्रेजों को अपनी राजधानी कलकता से हटाकर दिल्ली ले जानी पड़ी।" (पृष्ठ 225) 'मनुस्मृति' के प्रति उनकी 'अतिरिक्त सजगता' बंगाल के इतने लंबे अंतराल को ब्राह्मण-विरोध से पाट देती है।

किताब में कुछ रोचक निजी अनुभव हैं। जैसे, "मैथिल की तीन पहचान है-पान, पेटिशन और पैरवी। या तो वे पान खाते और सरौता से कसैली काटते रहेंगे या किसी के खिलाफ पेटिशन लिखते रहेंगे। इससे समय बचा तो पैरवी करने लगेंगे। पैरवी करने में भी उनका एक हाथ पैर पर और दूसरा गरदन पर रहता है।'' (पृष्ठ 157)

यह भी लिखा है कि पटना शहर के गर्दनीबाग मुहल्ले के नामकरण की कहानी 1942 की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी कही जाती है। उस समय यह संपूर्ण इलाका बाग-बगीचे से भरा था। अंग्रेज, आंदोलनकारियों की गर्दनों को इन्हीं पेड़ों से लटका दिया करते थे ताकि लोगों में भय और आतंक पैदा हो सके। इस तरह इस मुहल्ले का नाम गर्दनीबाग हुआ। (पृष्ठ 79) हालांकि इसका कोई दस्तावेजी साक्ष्य उनके पास नहीं है। अपने एक सीनियर पदाधिकारी के साथ हुई मौखिक बातचीत को आधार बनाया है। यद्यपि अतार्किक नहीं है।

'एक दलित की आत्मकथा' मुझे काफी रोचक लग रही है। यह हर हाल में पठनीय है। आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी हुई कई दिलचस्प जानकारियां हैं। कुछ जादू-टोने भी। उसमें लेखक का विश्वास थोड़ा डराता है तो वर्णित तथ्यों को थोड़ा अविश्वसनीय भी बनाता है। लेखक को यह अंधविश्वास थोड़ा 'विरासत' में मिला है तो थोड़ा अर्जित करना पड़ा है!

Tuesday, September 8, 2026

चंद किताबों के बारे में : 'दो शब्द'

इतिहास और साहित्य में इतना ही भेद है कि पहले में तिथि और पात्र वास्तविक हैं और बाकी सब कल्पना है जबकि दूसरे में तिथि और पात्र तो काल्पनिक हैं किंतु बाकी सब यथार्थ हैं। इतिहास के तथ्य के मामले में आप चाहें तो हाउसमान की इस उक्ति से सहमत हो सकते हैं कि 'यथातथ्य होना एक दायित्व है, कोई गुण नहीं।' सही है कि किसी 'इतिहासकार की यथातथ्यता की प्रशंसा वैसी ही है जैसे किसी वास्तुकार की इसलिए तारीफ की जाए कि उसने अपने भवन में पुरानी लकड़ियों का प्रयोग किया है अथवा ककीट का सही घोल बनाया है। यह तो उसके काम के लिए आवश्यक शर्त है, कोई वास्तविक कार्य नहीं।' (ई. एच. कार, इतिहास क्या है, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, द्वितीय हिन्दी संस्करण 1987, पृष्ठ 4)

'कंक्रीट के सही घोल का प्रयोग' वास्तुकार का कोई गुण नहीं है, यह तो भवन बनाने की पूर्वशर्त है। ठीक उसी तरह यथातथ्यता इतिहासकार की विशेषता न होकर इतिहास लेखन की एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। लेकिन यह भी सच है कि कंक्रीट के सही घोल के बगैर न तो सुंदर और मजबूत भवन की कल्पना की जा सकती है न ही यथातथ्यता के बगैर इतिहास की। इस बात से भी शायद ही कोई इंकार करे कि 'तथ्य, इतिहास की रीढ़ हैं'।

दुखद है कि बिहार के इतिहास से संबंधित अधिकतर प्रामाणिक कही जानेवाली किताबों में इसकी भारी उपेक्षा है। यहां तक कि प्रतिष्ठित शोध संस्थानों से प्रकाशित इतिहास की किताबों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। तथ्य को लेकर न लेखक गम्भीर है न प्रकाशक । छापे की इन भूलों को सुधारने के लिए लेखक जीवित रहे नहीं और शोध संस्थाओं के निदेशक अब पढ़े-लिखे होते नहीं कि इस ओर ध्यान जाय। कुछ सालों बाद पाठक इसे ही सच मानकर बिहार का 'प्रामाणिक' इतिहास लिखेंगे। इतिहास चाहे जैसा हो, प्रामाणिक ही होता है!

इधर के वर्षों में मैंने अपना अध्ययन औपनिवेशिक बिहार के गिर्द केंद्रित करने की कोशिश की है। जाहिर है, तथ्य को पवित्र मानकर मैंने इतिहास नहीं पढ़ा है। इतिहास के एक सजग विद्यार्थी को चाहिए कि वह न केवल इतिहासकार के मतव्यों पर नजर रखे अपितु तथ्यों की भी जांच करता चले। इसी जांच के क्रम में कुछ किताबों पर अपनी टिप्पणी दे दी है। यह किताब और परिशिष्ट उसी का नतीजा है।

बिहार में हिंदी

कहना अनावश्यक है कि हिंदी भाषा एवं साहित्य के इतिहास लेखन में बिहार की भूमिका उपेक्षित रही है। डॉ. राजू रंजन प्रसाद की 'बिहार में हिंदी' बिहार एवं हिंदी को केंद्र में रखकर लिखी गई सम्भवतः पहली किताब है। डॉ. प्रसाद की 'अष्टाध्यायी' इस किताब के पहले अध्याय में पूर्व मध्यकालीन बिहार में हिंदी के उद्भव एवं विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को परखते हुए यह दिखलाने का प्रयास है कि नाथों-सिद्धों के रूप में बिहार हिंदी की आदिभूमि रहा है।

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में बिहार के शिक्षा जगत में भाषा और लिपि की समस्या के साथ ही विद्यार्थियों के सम्मुख टेक्स्टबुक की समस्या उपस्थित हुई। फैलन एवं भूदेव मुखोपाध्याय के नेतृत्व में देशी-विदेशी हिंदी लेखकों की एक फौज ने पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अपना हाथ बंटाया। राय सोहनलाल और मुंशी राधालाल जैसे विद्वानों ने हिंदी का आरंभिक कोश तैयार किया। फ्रेडरिक पिन्काट जैसे विदेशी विद्वानों ने बिहार के बच्चों की पाठ-सामग्री तैयार की। इन पाठ्यपुस्तकों को पटना के बिहार बन्धु एवं खड्गविलास प्रेस ने प्रकाशित कर सुलभ कराया और नवलकिशोर प्रेस के एकाधिकार को समाप्त किया। यही वह काल है जब बिहारी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए 'विद्यार्थी' और 'शिक्षा' जैसे पत्र निकले। पुस्तक के दूसरे और तीसरे अध्याय में इन तथ्यों की गहरी पड़ताल की गई है। कहना जरूरी है कि औपनिवेशिक बिहार में पाठ्यपुस्तक से सम्बंधित सामग्री और उसकी समीक्षा पहली बार 'बिहार में हिंदी' किताब में पढ़ने को मिलेगी।

आधुनिक हिंदी के विकास में बिहार अग्रणी भूमिका में रहा है। आरंभिक जीवनीकारों में जिस तरह शिवनंदन सहाय को नहीं भुलाया जा सकता ठीक उसी तरह हिंदी कहानी की बात सदल मिश्र को छोड़कर नहीं की जा सकती। पुस्तक के चौथे अध्याय में औपनिवेशिक बिहार की हिंदी कहानी का संक्षिप्त इतिहास संकलित है तो पांचवें अध्याय में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध रचे गये साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत है। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शती के पूर्वार्ध में हिंदी और इसकी बोलियों में रचित साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है जिसे विदेशी शासन के कोप का शिकार होना पड़ा और प्रतिबंधित हुआ।

निराला को जिस मुक्तछंद की कविता को स्थापित करने का श्रेय प्राप्त है, दरअसल, उसके प्रवर्तक होने का गौरव बिहार के कवि महेश नारायण को प्राप्त है। बिहार केवल खड़ी बोली आंदोलन और साहित्य का सृजन ही नहीं कर रहा था बल्कि उसकी भाषा को भी एक मानक और मर्यादित रूप दे रहा था। न केवल पहला हिंदी व्याकरण बिहार में लिखा गया बल्कि अयोध्या प्रसाद खत्री, केशवराम भट्ट, सकलनारायण शर्मा, रामावतार शर्मा, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने बिहार की भूमि से आधुनिक हिंदी को अपने व्याकरण ग्रंथों के माध्यम से अनुशासित एवं परिष्कृत करने का काम किया। इन बातों को जन-जन तक पहुंचाने में बिहार बन्धु छापाखाना और पत्र की महती भूमिका रही है। किंतु हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने कृतघ्नता ज्ञापित की है। इन सब बातों की विवेचना आप पुस्तक के सातवें-आठवें अध्याय में पढ़ सकेंगे।