Monday, September 7, 2026

किताब के पीछे से एक आवाज आती है---मृणाल वल्लरी

क्या पढ़ना खाने-पीने, घूमने-फिरने जैसी सहज प्रक्रिया हो सकती है? वैसे, अब भोजन करना भी सहज प्रक्रिया कहां रही? रोटी में अब हमें कार्बोहाइड्रेट दिखता है तो दाल में प्रोटीन। और अब कहा जा रहा है कि दाल में भी प्रोटीन जरा सा ही है। आज के समय में ज्यादातर लोगों को अहसास करवाया जा रहा है कि वे अब तक जो भी खा रहे थे, गलत खा रहे थे। यहां पर एक अस्वीकरण...जाहिर सी बात है कि दुनिया में अभी पुरानी किताबों वाला वर्ग संघर्ष चल ही रहा है तो, यह एक बहुत छोटा तबका है, जो अभी खाना कैसे खाएं वाले शिक्षकों का विद्यार्थी बना बैठा है। दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए समस्या यही है कि क्या खाएं, कैसे भूख मिटाएं।

खाना कैसे खाएं की भेड़चाल के बीच नजर पड़ती है राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारें में’। क्या किताबों के बारे में भी कहा जा सकता है कि ‘हम किताब कैसे पढ़ें’। किताब के प्राक्कथन में यह वाक्य पढ़ते ही जेहन में याद आ गया पिछले दिनों गीतांजलि श्री की किताब रेत समाधि के बारे में। रेत समाधि को बुकर सम्मान मिलते ही हिंदी के पाठकों ने उसे पढ़ना शुरू कर दिया। बहुत से पाठकों ने किताब की भाषा, शैली पर सवाल उठाए। उसी समय कुछ ऐसे विद्वान भी सामने आए जिन्होंने रेत समाधि को पढ़ने के एक सौ एक तरीकेनुमा लेख भी लिखे। जब तक रेत समाधि को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिला था, तब तक किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि पाठकों को रेत समाधि पढ़ने के नुस्खे बता दिए जाएं।

किताब और पाठक और अब प्रकाशक के भी ऐसे संबंधों को समझने के लिए राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारे में’ पढ़ लेना बतौर पाठक खुद को समृद्ध कर लेना होगा। ‘चंद किताबों के बारे में’ राजू रंजन प्रसाद के विभिन्न मंचों पर लिखे गए लेखों का संग्रह है। ये लेख दो अलग-अलग माध्यमों के जरिए पाठकों तक पहुंचे। कुछ लेख अखबार व पत्रिकाओं में छपे हैं तो कई लेख को लेखक ने अपने फेसबुक खाते की दीवार पर प्रकाशित किया है। इन लेखों में हम पहला अंतर माध्यमों का देखेंगे। बतौर लेखक राजू रंजन प्रसाद जब पत्र-पत्रिकाओं के निर्धारित अनुशासन के इतर सोशल मीडिया पर आते हैं तो ज्यादा मुखर होते हैं। लेखक इतिहास के अकादमिक विद्वान हैं और साहित्य के अध्येता हैं। फेसबुक की दीवार की सबसे खास बात यह है कि लेखक, अपने संपादक खुद ही हैं। इसलिए इस माध्यम पर वे ज्यादा बेबाक नजर आते हैं। उनके लिखने की गति भी तेज होती है और वे कई विषयों पर सवाल उठाते हैं। लेकिन उनके लिए फेसबुक लेखन वैचारिक विरेचन जैसा नहीं होता है। फेसबुक पर भी वे अपनी अकादमिक जिम्मेदारियों को क्षण भर के लिए भी नहीं भूलते हैं। वहां भी जो लिखते हैं पुख्ता स्रोतों और अपनी पूरी समझ के साथ। शायद इसलिए घनघोर वैचारिक बहसों के बाद भी उन्हें कभी अपनी पोस्ट को डिलीट करने की नौबत नहीं आई है।

हम गणित के सवाल कैसे हल करते हैं, विज्ञान की गुत्थियों को कैसे समझते हैं, संस्कृत के श्लोकों को कैसे देखते हैं, कविता की व्याख्या कैसे करते हैं, हम कौन सी किताब पढ़ने के ख्वाहिशमंद होते हैं, किताबों को कैसे पढ़ते व समझते हैं, यह सब बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हमने इतिहास को कितना और कैसे पढ़ा है। इतिहास सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में नहीं पढ़ा जाता। इतिहास दादी-नानी, दादा-दादी की कहानियों में होता है, खेतों-खलिहानों, कारखानों में होता है। और अब इतिहास वाट्सएप और फेसबुक पर भी है।

इतिहास-लेखन को लेकर राजू रंजन प्रसाद कहते हैं-‘इतिहास लेखन शुरू से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है क्योंकि जनमानस को प्रभावित करनेवाला यह सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए इतिहास की चिंता सबको होती है, इसकी जरूरत सबको पड़ती है।’

किताब का पहला अध्याय चंद किताबों के बारे में उन किताबों पर रोचक टिप्पणियां हैं जो अपने लिखे जाने के समय से लेकर अब तक सवालों से मुठभेड़ करती हैं। इसमें लेखक सूत्र देते हुए कहते हैं, ‘बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। लेखक अपने बड़े भाई के हवाले से कहते हैं-‘अच्छा पाठक वह नहीं है जो बहुत कुछ या सब कुछ पढ़ता है, बल्कि वह है जो यह जानता है कि उसे क्या पढ़ना है और क्या नहीं, आज भी मुझे सूत्रवाक्य की तरह लगती है।’ यह सूत्र आगे जाकर कहता है, ‘पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। हम अपने किशोर समय में जो किताबें पढ़ते हैं वे हमें सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। अक्सर देखा गया है कि बड़ी उम्र में जाने के बाद कई लोग किशोरावस्था में पढ़ी गई किताबों को फिर से समझते हैं तो अपनी मानसिक बनावट पर अचरज करते हैं। पहले पढ़ी हुई किताब एकदम नई सी लगने लगती है। राम शरण शर्मा की पुस्तक प्राचीन भारत की चर्चा करते हुए लेखक की टिप्पणी है-‘लगता है, इस किताब को शर्मा जी ने बड़े ही धैर्य से लिखा है। कहीं से भी नहीं लगता कि इतिहास-दर्शन पढ़ाया जा रहा है जबकि छात्र उससे लैस होता चलता है। यह ऐसी किताब है जिसे पढ़ते हुए लेखक की बात सुनाई देती है। ई.एच. कार ने इतिहास क्या है में लिखा है कि किताब के पीछे से एक आवाज आती है। आवाज अगर सुनायी न दे तो लेखक गूंगा है या फिर पाठक बहरा है।’

लाला हरदयाल की किताब ‘हिंट्स फार सेल्फ कल्चर’ का जिक्र करते हुए लेखक लिखते हैं-इसमें इतिहास, गणित एवं भूगोल जैसे विषयों से लेकर संगीत तक पर जानकारी उपलब्ध है। उसी किताब में मैंने इतिहास के बारे में पढ़ा था कि यह...उस्तरे की तरह है जिससे सफलतापूर्वक दाढ़ी बनाकर आप सुंदर दिख सकते हैं लेकिन आपने थोड़ी भी लापरवाही या असावधानी बरती कि अपने को घायल कर लेंगे। लेखक लाला हरदयाल के दिए नुस्खे साझा करते हुए लेखक लिखते हैं-‘कोई भी पुस्तक आप पढ़ें तो उसके नोट्स अवश्य लें। बगैर नोट्स की पढ़ाई की तुलना उन्होंने ढालुआं छत की वर्षा से की थी। मूसलाधार बारिश के बाद भी पानी की बूंदें वहां ठहर नहीं पातीं। इस हिदायत को ताख पर रखकर पढ़नेवालों का बुरा हाल होते मैंने देखा है। आसपास ऐसे लोग बिखरे पड़े हैं जिन्होंने पढ़ा तो बहुत कुछ (एक सीमा में कहें तो शायद सब कुछ!) लेकिन लिखा कुछ नहीं। शायद कुछ अकाट्य लिखना चाहते हों।’ हालांकि यहां लेखक पाठकों के साथ कुछ ज्यादती करते दिख रहे हैं। पढ़ना अलग क्रिया है और लिखना अलग। हर पढ़नेवाला कुछ लिख भी ले यह जरूरी नहीं। दुनिया में बहुत सारा श्रेष्ठ उन लोगों ने भी रचा है, जिन्होंने बहुत सारा श्रेष्ठ नहीं पढ़ा है। लेखक जब लिखते हैं कि मैं अपनी किताबें ऐसे दिखाता था जैसे औरतें अपने गहने तो मन सवालिया होता है। क्या लेखक के समकालीन समाज में ऐसी औरतें नहीं थीं जो किताबें दिखाती थीं? फिर तो किताबों के पढ़ने की एक और श्रेणी विकसित करनी पड़ेगी स्त्रियों के संदर्भ में।

लेखक उस दौर का भी जिक्र करते हैं, जब किताब लिखना बहुत मुश्किल काम नहीं रहा और उससे जीवन के अनुभव गायब होते गए। इसी क्रम में कबीर किताब की बातों का उपहास उड़ा कर ‘आंखिन देखी’ को प्रमाणिक मानते हैं। लेखक साहित्यिक बहस में भी इतिहास की लेंस को लाना नहीं भूलते हैं। ‘मुसलमान’ एक पत्र प्रतिक्रिया शीर्षक वाले लेख में आलोचना के अंक 91 में कवि देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ नामक कविता पर हुई बहस के संदर्भ में राजू रंजन प्रसाद लिखते हैं-‘कविता में जो द्वंद्व उभरकर आया है वह व्यक्ति का-खुद कवि का अंतिर्विरोध है। कवि को न तो इतिहास की कोई स्पष्ट समझ है न तो समाज को देखने का सही नजरिया है। इसलिए इतिहास में वर्णित मिथकों का जिक्र करके प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाने की कोशिश में वह असफल हो जाता है। बजाए, इसकी, प्रगतिशीलता के आइने में उनका रोबीला सांप्रदायिक चेहरा बेपर्द हो जाता है। कवि इतिहास के मिथकों में फंसकर खुद नये मिथक गढ़ने शुरू कर देता है।’ इतिहास में एक खास तर्कशैली पर सवाल उठाते हुए लेखक पूछते हैं-‘मुसलमानों के आगमन से ही कबीर, गालिब पैदा हुए यह इतिहास की कौन-सी व्याख्या है। असलियत तो यह है कि ये सारे लोग सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की उपज थे। मार्क्सवादी अंदाज में कहा जाए तो ‘हिस्टॉरिकल डेवलपमेंट’ की नियति थे।’ ध्यान रहे कि लेखक ने यह हस्तक्षेप 16 नवंबर, 1990 को नवभारत टाइम्स के पत्रों के कालम में किया था। वहीं एक रेडियो कार्यक्रम में हरेकृष्ण झा के कविता संग्रह पर बात करते हुए लेखक कहते हैं-‘कहने को तो पूंजीवाद की भी एक क्रांतिकारी भूमिका है, लेकिन अक्सर होता ऐसा है कि सामंतवाद के साथ यह तीव्र संघर्ष न करके उसके साथ समझौता कर लेता है।’

भाषा और अस्मिता की खोज के संदर्भ में लेखक उद्धृत करते हैं-‘दरअसल भाषा का सवाल कभी सिर्फ भाषा का सवाल नहीं होता। यह अपनी बुनियाद में ही किसी राष्ट्र की और उसकी अस्मिता का सवाल होता है।’

राजू रंजन प्रसाद के लेखकीय अस्तित्व में एक शिक्षक की आवाज भी गूंजती है। शिक्षक की आंखें त्रुटियां, चालाकी, काहिलियत को जल्दी पकड़ लेती हैं। किताब का अध्याय ‘परिशिष्ट’ इसकी बानगी है। साहित्य से लेकर पत्रकारिता व राजनीति तक में गैरजिम्मेदारी की पहचान कर उसे सार्वजनिक करना आज के दौर में सबसे ऐतिहासिक काम है। राजनीति में पहले विपक्ष और प्रतिपक्ष जैसे शब्द होते थे। अब राजनीति में विपक्ष के लिए धड़ल्ले से ‘विरोधी पार्टी’ जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही आज साहित्य में भाषा, व्याकरण और तथ्यों की भूल बताने वाले को ‘विरोधी’ बताया जाता है। इंटरनेट पर के लेखन को वाट्सएप यूनिवर्सिटी की संज्ञा मिलने की वजह यही है कि लिखने और पढ़ने वाले के बीच कोई संपादक, कोई शिक्षक जैसी जिम्मेदार संस्था नहीं है। राजू रंजन प्रसाद इंटरनेट लेखन पर शिक्षक और अकादमिक की जिम्मेदारी बखूबी निभाते नजर आते हैं। किताब के इस खंड में उनकी जिम्मेदारी, निर्भीकता और लेखन को लेकर अभय मुद्रा दिखती है। प्रभाकर प्रकाशन से आई इस किताब को पढ़ने के बाद आपको अपनी पढ़ी हुई किताबों की याद जरूर आएगी कि आपने उसे क्यों और कैसे पढ़ा। यहीं पर राजू रंजन प्रसाद सफल होते दिखते हैं।