Tuesday, September 8, 2026

चंद किताबों के बारे में : 'दो शब्द'

इतिहास और साहित्य में इतना ही भेद है कि पहले में तिथि और पात्र वास्तविक हैं और बाकी सब कल्पना है जबकि दूसरे में तिथि और पात्र तो काल्पनिक हैं किंतु बाकी सब यथार्थ हैं। इतिहास के तथ्य के मामले में आप चाहें तो हाउसमान की इस उक्ति से सहमत हो सकते हैं कि 'यथातथ्य होना एक दायित्व है, कोई गुण नहीं।' सही है कि किसी 'इतिहासकार की यथातथ्यता की प्रशंसा वैसी ही है जैसे किसी वास्तुकार की इसलिए तारीफ की जाए कि उसने अपने भवन में पुरानी लकड़ियों का प्रयोग किया है अथवा ककीट का सही घोल बनाया है। यह तो उसके काम के लिए आवश्यक शर्त है, कोई वास्तविक कार्य नहीं।' (ई. एच. कार, इतिहास क्या है, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, द्वितीय हिन्दी संस्करण 1987, पृष्ठ 4)

'कंक्रीट के सही घोल का प्रयोग' वास्तुकार का कोई गुण नहीं है, यह तो भवन बनाने की पूर्वशर्त है। ठीक उसी तरह यथातथ्यता इतिहासकार की विशेषता न होकर इतिहास लेखन की एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। लेकिन यह भी सच है कि कंक्रीट के सही घोल के बगैर न तो सुंदर और मजबूत भवन की कल्पना की जा सकती है न ही यथातथ्यता के बगैर इतिहास की। इस बात से भी शायद ही कोई इंकार करे कि 'तथ्य, इतिहास की रीढ़ हैं'।

दुखद है कि बिहार के इतिहास से संबंधित अधिकतर प्रामाणिक कही जानेवाली किताबों में इसकी भारी उपेक्षा है। यहां तक कि प्रतिष्ठित शोध संस्थानों से प्रकाशित इतिहास की किताबों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। तथ्य को लेकर न लेखक गम्भीर है न प्रकाशक । छापे की इन भूलों को सुधारने के लिए लेखक जीवित रहे नहीं और शोध संस्थाओं के निदेशक अब पढ़े-लिखे होते नहीं कि इस ओर ध्यान जाय। कुछ सालों बाद पाठक इसे ही सच मानकर बिहार का 'प्रामाणिक' इतिहास लिखेंगे। इतिहास चाहे जैसा हो, प्रामाणिक ही होता है!

इधर के वर्षों में मैंने अपना अध्ययन औपनिवेशिक बिहार के गिर्द केंद्रित करने की कोशिश की है। जाहिर है, तथ्य को पवित्र मानकर मैंने इतिहास नहीं पढ़ा है। इतिहास के एक सजग विद्यार्थी को चाहिए कि वह न केवल इतिहासकार के मतव्यों पर नजर रखे अपितु तथ्यों की भी जांच करता चले। इसी जांच के क्रम में कुछ किताबों पर अपनी टिप्पणी दे दी है। यह किताब और परिशिष्ट उसी का नतीजा है।

बिहार में हिंदी

कहना अनावश्यक है कि हिंदी भाषा एवं साहित्य के इतिहास लेखन में बिहार की भूमिका उपेक्षित रही है। डॉ. राजू रंजन प्रसाद की 'बिहार में हिंदी' बिहार एवं हिंदी को केंद्र में रखकर लिखी गई सम्भवतः पहली किताब है। डॉ. प्रसाद की 'अष्टाध्यायी' इस किताब के पहले अध्याय में पूर्व मध्यकालीन बिहार में हिंदी के उद्भव एवं विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को परखते हुए यह दिखलाने का प्रयास है कि नाथों-सिद्धों के रूप में बिहार हिंदी की आदिभूमि रहा है।

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में बिहार के शिक्षा जगत में भाषा और लिपि की समस्या के साथ ही विद्यार्थियों के सम्मुख टेक्स्टबुक की समस्या उपस्थित हुई। फैलन एवं भूदेव मुखोपाध्याय के नेतृत्व में देशी-विदेशी हिंदी लेखकों की एक फौज ने पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अपना हाथ बंटाया। राय सोहनलाल और मुंशी राधालाल जैसे विद्वानों ने हिंदी का आरंभिक कोश तैयार किया। फ्रेडरिक पिन्काट जैसे विदेशी विद्वानों ने बिहार के बच्चों की पाठ-सामग्री तैयार की। इन पाठ्यपुस्तकों को पटना के बिहार बन्धु एवं खड्गविलास प्रेस ने प्रकाशित कर सुलभ कराया और नवलकिशोर प्रेस के एकाधिकार को समाप्त किया। यही वह काल है जब बिहारी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए 'विद्यार्थी' और 'शिक्षा' जैसे पत्र निकले। पुस्तक के दूसरे और तीसरे अध्याय में इन तथ्यों की गहरी पड़ताल की गई है। कहना जरूरी है कि औपनिवेशिक बिहार में पाठ्यपुस्तक से सम्बंधित सामग्री और उसकी समीक्षा पहली बार 'बिहार में हिंदी' किताब में पढ़ने को मिलेगी।

आधुनिक हिंदी के विकास में बिहार अग्रणी भूमिका में रहा है। आरंभिक जीवनीकारों में जिस तरह शिवनंदन सहाय को नहीं भुलाया जा सकता ठीक उसी तरह हिंदी कहानी की बात सदल मिश्र को छोड़कर नहीं की जा सकती। पुस्तक के चौथे अध्याय में औपनिवेशिक बिहार की हिंदी कहानी का संक्षिप्त इतिहास संकलित है तो पांचवें अध्याय में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध रचे गये साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत है। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शती के पूर्वार्ध में हिंदी और इसकी बोलियों में रचित साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है जिसे विदेशी शासन के कोप का शिकार होना पड़ा और प्रतिबंधित हुआ।

निराला को जिस मुक्तछंद की कविता को स्थापित करने का श्रेय प्राप्त है, दरअसल, उसके प्रवर्तक होने का गौरव बिहार के कवि महेश नारायण को प्राप्त है। बिहार केवल खड़ी बोली आंदोलन और साहित्य का सृजन ही नहीं कर रहा था बल्कि उसकी भाषा को भी एक मानक और मर्यादित रूप दे रहा था। न केवल पहला हिंदी व्याकरण बिहार में लिखा गया बल्कि अयोध्या प्रसाद खत्री, केशवराम भट्ट, सकलनारायण शर्मा, रामावतार शर्मा, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने बिहार की भूमि से आधुनिक हिंदी को अपने व्याकरण ग्रंथों के माध्यम से अनुशासित एवं परिष्कृत करने का काम किया। इन बातों को जन-जन तक पहुंचाने में बिहार बन्धु छापाखाना और पत्र की महती भूमिका रही है। किंतु हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने कृतघ्नता ज्ञापित की है। इन सब बातों की विवेचना आप पुस्तक के सातवें-आठवें अध्याय में पढ़ सकेंगे।

Monday, September 7, 2026

किताब के पीछे से एक आवाज आती है---मृणाल वल्लरी

क्या पढ़ना खाने-पीने, घूमने-फिरने जैसी सहज प्रक्रिया हो सकती है? वैसे, अब भोजन करना भी सहज प्रक्रिया कहां रही? रोटी में अब हमें कार्बोहाइड्रेट दिखता है तो दाल में प्रोटीन। और अब कहा जा रहा है कि दाल में भी प्रोटीन जरा सा ही है। आज के समय में ज्यादातर लोगों को अहसास करवाया जा रहा है कि वे अब तक जो भी खा रहे थे, गलत खा रहे थे। यहां पर एक अस्वीकरण...जाहिर सी बात है कि दुनिया में अभी पुरानी किताबों वाला वर्ग संघर्ष चल ही रहा है तो, यह एक बहुत छोटा तबका है, जो अभी खाना कैसे खाएं वाले शिक्षकों का विद्यार्थी बना बैठा है। दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए समस्या यही है कि क्या खाएं, कैसे भूख मिटाएं।

खाना कैसे खाएं की भेड़चाल के बीच नजर पड़ती है राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारें में’। क्या किताबों के बारे में भी कहा जा सकता है कि ‘हम किताब कैसे पढ़ें’। किताब के प्राक्कथन में यह वाक्य पढ़ते ही जेहन में याद आ गया पिछले दिनों गीतांजलि श्री की किताब रेत समाधि के बारे में। रेत समाधि को बुकर सम्मान मिलते ही हिंदी के पाठकों ने उसे पढ़ना शुरू कर दिया। बहुत से पाठकों ने किताब की भाषा, शैली पर सवाल उठाए। उसी समय कुछ ऐसे विद्वान भी सामने आए जिन्होंने रेत समाधि को पढ़ने के एक सौ एक तरीकेनुमा लेख भी लिखे। जब तक रेत समाधि को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार नहीं मिला था, तब तक किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि पाठकों को रेत समाधि पढ़ने के नुस्खे बता दिए जाएं।

किताब और पाठक और अब प्रकाशक के भी ऐसे संबंधों को समझने के लिए राजू रंजन प्रसाद की ‘चंद किताबों के बारे में’ पढ़ लेना बतौर पाठक खुद को समृद्ध कर लेना होगा। ‘चंद किताबों के बारे में’ राजू रंजन प्रसाद के विभिन्न मंचों पर लिखे गए लेखों का संग्रह है। ये लेख दो अलग-अलग माध्यमों के जरिए पाठकों तक पहुंचे। कुछ लेख अखबार व पत्रिकाओं में छपे हैं तो कई लेख को लेखक ने अपने फेसबुक खाते की दीवार पर प्रकाशित किया है। इन लेखों में हम पहला अंतर माध्यमों का देखेंगे। बतौर लेखक राजू रंजन प्रसाद जब पत्र-पत्रिकाओं के निर्धारित अनुशासन के इतर सोशल मीडिया पर आते हैं तो ज्यादा मुखर होते हैं। लेखक इतिहास के अकादमिक विद्वान हैं और साहित्य के अध्येता हैं। फेसबुक की दीवार की सबसे खास बात यह है कि लेखक, अपने संपादक खुद ही हैं। इसलिए इस माध्यम पर वे ज्यादा बेबाक नजर आते हैं। उनके लिखने की गति भी तेज होती है और वे कई विषयों पर सवाल उठाते हैं। लेकिन उनके लिए फेसबुक लेखन वैचारिक विरेचन जैसा नहीं होता है। फेसबुक पर भी वे अपनी अकादमिक जिम्मेदारियों को क्षण भर के लिए भी नहीं भूलते हैं। वहां भी जो लिखते हैं पुख्ता स्रोतों और अपनी पूरी समझ के साथ। शायद इसलिए घनघोर वैचारिक बहसों के बाद भी उन्हें कभी अपनी पोस्ट को डिलीट करने की नौबत नहीं आई है।

हम गणित के सवाल कैसे हल करते हैं, विज्ञान की गुत्थियों को कैसे समझते हैं, संस्कृत के श्लोकों को कैसे देखते हैं, कविता की व्याख्या कैसे करते हैं, हम कौन सी किताब पढ़ने के ख्वाहिशमंद होते हैं, किताबों को कैसे पढ़ते व समझते हैं, यह सब बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि हमने इतिहास को कितना और कैसे पढ़ा है। इतिहास सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में नहीं पढ़ा जाता। इतिहास दादी-नानी, दादा-दादी की कहानियों में होता है, खेतों-खलिहानों, कारखानों में होता है। और अब इतिहास वाट्सएप और फेसबुक पर भी है।

इतिहास-लेखन को लेकर राजू रंजन प्रसाद कहते हैं-‘इतिहास लेखन शुरू से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है क्योंकि जनमानस को प्रभावित करनेवाला यह सबसे प्रभावी साधन है। इसलिए इतिहास की चिंता सबको होती है, इसकी जरूरत सबको पड़ती है।’

किताब का पहला अध्याय चंद किताबों के बारे में उन किताबों पर रोचक टिप्पणियां हैं जो अपने लिखे जाने के समय से लेकर अब तक सवालों से मुठभेड़ करती हैं। इसमें लेखक सूत्र देते हुए कहते हैं, ‘बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। लेखक अपने बड़े भाई के हवाले से कहते हैं-‘अच्छा पाठक वह नहीं है जो बहुत कुछ या सब कुछ पढ़ता है, बल्कि वह है जो यह जानता है कि उसे क्या पढ़ना है और क्या नहीं, आज भी मुझे सूत्रवाक्य की तरह लगती है।’ यह सूत्र आगे जाकर कहता है, ‘पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना’। हम अपने किशोर समय में जो किताबें पढ़ते हैं वे हमें सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। अक्सर देखा गया है कि बड़ी उम्र में जाने के बाद कई लोग किशोरावस्था में पढ़ी गई किताबों को फिर से समझते हैं तो अपनी मानसिक बनावट पर अचरज करते हैं। पहले पढ़ी हुई किताब एकदम नई सी लगने लगती है। राम शरण शर्मा की पुस्तक प्राचीन भारत की चर्चा करते हुए लेखक की टिप्पणी है-‘लगता है, इस किताब को शर्मा जी ने बड़े ही धैर्य से लिखा है। कहीं से भी नहीं लगता कि इतिहास-दर्शन पढ़ाया जा रहा है जबकि छात्र उससे लैस होता चलता है। यह ऐसी किताब है जिसे पढ़ते हुए लेखक की बात सुनाई देती है। ई.एच. कार ने इतिहास क्या है में लिखा है कि किताब के पीछे से एक आवाज आती है। आवाज अगर सुनायी न दे तो लेखक गूंगा है या फिर पाठक बहरा है।’

लाला हरदयाल की किताब ‘हिंट्स फार सेल्फ कल्चर’ का जिक्र करते हुए लेखक लिखते हैं-इसमें इतिहास, गणित एवं भूगोल जैसे विषयों से लेकर संगीत तक पर जानकारी उपलब्ध है। उसी किताब में मैंने इतिहास के बारे में पढ़ा था कि यह...उस्तरे की तरह है जिससे सफलतापूर्वक दाढ़ी बनाकर आप सुंदर दिख सकते हैं लेकिन आपने थोड़ी भी लापरवाही या असावधानी बरती कि अपने को घायल कर लेंगे। लेखक लाला हरदयाल के दिए नुस्खे साझा करते हुए लेखक लिखते हैं-‘कोई भी पुस्तक आप पढ़ें तो उसके नोट्स अवश्य लें। बगैर नोट्स की पढ़ाई की तुलना उन्होंने ढालुआं छत की वर्षा से की थी। मूसलाधार बारिश के बाद भी पानी की बूंदें वहां ठहर नहीं पातीं। इस हिदायत को ताख पर रखकर पढ़नेवालों का बुरा हाल होते मैंने देखा है। आसपास ऐसे लोग बिखरे पड़े हैं जिन्होंने पढ़ा तो बहुत कुछ (एक सीमा में कहें तो शायद सब कुछ!) लेकिन लिखा कुछ नहीं। शायद कुछ अकाट्य लिखना चाहते हों।’ हालांकि यहां लेखक पाठकों के साथ कुछ ज्यादती करते दिख रहे हैं। पढ़ना अलग क्रिया है और लिखना अलग। हर पढ़नेवाला कुछ लिख भी ले यह जरूरी नहीं। दुनिया में बहुत सारा श्रेष्ठ उन लोगों ने भी रचा है, जिन्होंने बहुत सारा श्रेष्ठ नहीं पढ़ा है। लेखक जब लिखते हैं कि मैं अपनी किताबें ऐसे दिखाता था जैसे औरतें अपने गहने तो मन सवालिया होता है। क्या लेखक के समकालीन समाज में ऐसी औरतें नहीं थीं जो किताबें दिखाती थीं? फिर तो किताबों के पढ़ने की एक और श्रेणी विकसित करनी पड़ेगी स्त्रियों के संदर्भ में।

लेखक उस दौर का भी जिक्र करते हैं, जब किताब लिखना बहुत मुश्किल काम नहीं रहा और उससे जीवन के अनुभव गायब होते गए। इसी क्रम में कबीर किताब की बातों का उपहास उड़ा कर ‘आंखिन देखी’ को प्रमाणिक मानते हैं। लेखक साहित्यिक बहस में भी इतिहास की लेंस को लाना नहीं भूलते हैं। ‘मुसलमान’ एक पत्र प्रतिक्रिया शीर्षक वाले लेख में आलोचना के अंक 91 में कवि देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ नामक कविता पर हुई बहस के संदर्भ में राजू रंजन प्रसाद लिखते हैं-‘कविता में जो द्वंद्व उभरकर आया है वह व्यक्ति का-खुद कवि का अंतिर्विरोध है। कवि को न तो इतिहास की कोई स्पष्ट समझ है न तो समाज को देखने का सही नजरिया है। इसलिए इतिहास में वर्णित मिथकों का जिक्र करके प्रगतिशीलता का मुखौटा लगाने की कोशिश में वह असफल हो जाता है। बजाए, इसकी, प्रगतिशीलता के आइने में उनका रोबीला सांप्रदायिक चेहरा बेपर्द हो जाता है। कवि इतिहास के मिथकों में फंसकर खुद नये मिथक गढ़ने शुरू कर देता है।’ इतिहास में एक खास तर्कशैली पर सवाल उठाते हुए लेखक पूछते हैं-‘मुसलमानों के आगमन से ही कबीर, गालिब पैदा हुए यह इतिहास की कौन-सी व्याख्या है। असलियत तो यह है कि ये सारे लोग सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की उपज थे। मार्क्सवादी अंदाज में कहा जाए तो ‘हिस्टॉरिकल डेवलपमेंट’ की नियति थे।’ ध्यान रहे कि लेखक ने यह हस्तक्षेप 16 नवंबर, 1990 को नवभारत टाइम्स के पत्रों के कालम में किया था। वहीं एक रेडियो कार्यक्रम में हरेकृष्ण झा के कविता संग्रह पर बात करते हुए लेखक कहते हैं-‘कहने को तो पूंजीवाद की भी एक क्रांतिकारी भूमिका है, लेकिन अक्सर होता ऐसा है कि सामंतवाद के साथ यह तीव्र संघर्ष न करके उसके साथ समझौता कर लेता है।’

भाषा और अस्मिता की खोज के संदर्भ में लेखक उद्धृत करते हैं-‘दरअसल भाषा का सवाल कभी सिर्फ भाषा का सवाल नहीं होता। यह अपनी बुनियाद में ही किसी राष्ट्र की और उसकी अस्मिता का सवाल होता है।’

राजू रंजन प्रसाद के लेखकीय अस्तित्व में एक शिक्षक की आवाज भी गूंजती है। शिक्षक की आंखें त्रुटियां, चालाकी, काहिलियत को जल्दी पकड़ लेती हैं। किताब का अध्याय ‘परिशिष्ट’ इसकी बानगी है। साहित्य से लेकर पत्रकारिता व राजनीति तक में गैरजिम्मेदारी की पहचान कर उसे सार्वजनिक करना आज के दौर में सबसे ऐतिहासिक काम है। राजनीति में पहले विपक्ष और प्रतिपक्ष जैसे शब्द होते थे। अब राजनीति में विपक्ष के लिए धड़ल्ले से ‘विरोधी पार्टी’ जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही आज साहित्य में भाषा, व्याकरण और तथ्यों की भूल बताने वाले को ‘विरोधी’ बताया जाता है। इंटरनेट पर के लेखन को वाट्सएप यूनिवर्सिटी की संज्ञा मिलने की वजह यही है कि लिखने और पढ़ने वाले के बीच कोई संपादक, कोई शिक्षक जैसी जिम्मेदार संस्था नहीं है। राजू रंजन प्रसाद इंटरनेट लेखन पर शिक्षक और अकादमिक की जिम्मेदारी बखूबी निभाते नजर आते हैं। किताब के इस खंड में उनकी जिम्मेदारी, निर्भीकता और लेखन को लेकर अभय मुद्रा दिखती है। प्रभाकर प्रकाशन से आई इस किताब को पढ़ने के बाद आपको अपनी पढ़ी हुई किताबों की याद जरूर आएगी कि आपने उसे क्यों और कैसे पढ़ा। यहीं पर राजू रंजन प्रसाद सफल होते दिखते हैं।