इतिहास और साहित्य में इतना ही भेद है कि पहले में तिथि और पात्र वास्तविक हैं और बाकी सब कल्पना है जबकि दूसरे में तिथि और पात्र तो काल्पनिक हैं किंतु बाकी सब यथार्थ हैं। इतिहास के तथ्य के मामले में आप चाहें तो हाउसमान की इस उक्ति से सहमत हो सकते हैं कि 'यथातथ्य होना एक दायित्व है, कोई गुण नहीं।' सही है कि किसी 'इतिहासकार की यथातथ्यता की प्रशंसा वैसी ही है जैसे किसी वास्तुकार की इसलिए तारीफ की जाए कि उसने अपने भवन में पुरानी लकड़ियों का प्रयोग किया है अथवा ककीट का सही घोल बनाया है। यह तो उसके काम के लिए आवश्यक शर्त है, कोई वास्तविक कार्य नहीं।' (ई. एच. कार, इतिहास क्या है, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, द्वितीय हिन्दी संस्करण 1987, पृष्ठ 4)
'कंक्रीट के सही घोल का प्रयोग' वास्तुकार का कोई गुण नहीं है, यह तो भवन बनाने की पूर्वशर्त है। ठीक उसी तरह यथातथ्यता इतिहासकार की विशेषता न होकर इतिहास लेखन की एक अनिवार्य पूर्वशर्त है। लेकिन यह भी सच है कि कंक्रीट के सही घोल के बगैर न तो सुंदर और मजबूत भवन की कल्पना की जा सकती है न ही यथातथ्यता के बगैर इतिहास की। इस बात से भी शायद ही कोई इंकार करे कि 'तथ्य, इतिहास की रीढ़ हैं'।
दुखद है कि बिहार के इतिहास से संबंधित अधिकतर प्रामाणिक कही जानेवाली किताबों में इसकी भारी उपेक्षा है। यहां तक कि प्रतिष्ठित शोध संस्थानों से प्रकाशित इतिहास की किताबों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। तथ्य को लेकर न लेखक गम्भीर है न प्रकाशक । छापे की इन भूलों को सुधारने के लिए लेखक जीवित रहे नहीं और शोध संस्थाओं के निदेशक अब पढ़े-लिखे होते नहीं कि इस ओर ध्यान जाय। कुछ सालों बाद पाठक इसे ही सच मानकर बिहार का 'प्रामाणिक' इतिहास लिखेंगे। इतिहास चाहे जैसा हो, प्रामाणिक ही होता है!
इधर के वर्षों में मैंने अपना अध्ययन औपनिवेशिक बिहार के गिर्द केंद्रित करने की कोशिश की है। जाहिर है, तथ्य को पवित्र मानकर मैंने इतिहास नहीं पढ़ा है। इतिहास के एक सजग विद्यार्थी को चाहिए कि वह न केवल इतिहासकार के मतव्यों पर नजर रखे अपितु तथ्यों की भी जांच करता चले। इसी जांच के क्रम में कुछ किताबों पर अपनी टिप्पणी दे दी है। यह किताब और परिशिष्ट उसी का नतीजा है।
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