कहना अनावश्यक है कि हिंदी भाषा एवं साहित्य के इतिहास लेखन में बिहार की भूमिका उपेक्षित रही है। डॉ. राजू रंजन प्रसाद की 'बिहार में हिंदी' बिहार एवं हिंदी को केंद्र में रखकर लिखी गई सम्भवतः पहली किताब है। डॉ. प्रसाद की 'अष्टाध्यायी' इस किताब के पहले अध्याय में पूर्व मध्यकालीन बिहार में हिंदी के उद्भव एवं विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को परखते हुए यह दिखलाने का प्रयास है कि नाथों-सिद्धों के रूप में बिहार हिंदी की आदिभूमि रहा है।
उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में बिहार के शिक्षा जगत में भाषा और लिपि की समस्या के साथ ही विद्यार्थियों के सम्मुख टेक्स्टबुक की समस्या उपस्थित हुई। फैलन एवं भूदेव मुखोपाध्याय के नेतृत्व में देशी-विदेशी हिंदी लेखकों की एक फौज ने पाठ्यपुस्तक के निर्माण में अपना हाथ बंटाया। राय सोहनलाल और मुंशी राधालाल जैसे विद्वानों ने हिंदी का आरंभिक कोश तैयार किया। फ्रेडरिक पिन्काट जैसे विदेशी विद्वानों ने बिहार के बच्चों की पाठ-सामग्री तैयार की। इन पाठ्यपुस्तकों को पटना के बिहार बन्धु एवं खड्गविलास प्रेस ने प्रकाशित कर सुलभ कराया और नवलकिशोर प्रेस के एकाधिकार को समाप्त किया। यही वह काल है जब बिहारी शिक्षा को ध्यान में रखते हुए 'विद्यार्थी' और 'शिक्षा' जैसे पत्र निकले। पुस्तक के दूसरे और तीसरे अध्याय में इन तथ्यों की गहरी पड़ताल की गई है। कहना जरूरी है कि औपनिवेशिक बिहार में पाठ्यपुस्तक से सम्बंधित सामग्री और उसकी समीक्षा पहली बार 'बिहार में हिंदी' किताब में पढ़ने को मिलेगी।
आधुनिक हिंदी के विकास में बिहार अग्रणी भूमिका में रहा है। आरंभिक जीवनीकारों में जिस तरह शिवनंदन सहाय को नहीं भुलाया जा सकता ठीक उसी तरह हिंदी कहानी की बात सदल मिश्र को छोड़कर नहीं की जा सकती। पुस्तक के चौथे अध्याय में औपनिवेशिक बिहार की हिंदी कहानी का संक्षिप्त इतिहास संकलित है तो पांचवें अध्याय में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध रचे गये साहित्य का लेखा-जोखा प्रस्तुत है। उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध एवं बीसवीं शती के पूर्वार्ध में हिंदी और इसकी बोलियों में रचित साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है जिसे विदेशी शासन के कोप का शिकार होना पड़ा और प्रतिबंधित हुआ।
निराला को जिस मुक्तछंद की कविता को स्थापित करने का श्रेय प्राप्त है, दरअसल, उसके प्रवर्तक होने का गौरव बिहार के कवि महेश नारायण को प्राप्त है। बिहार केवल खड़ी बोली आंदोलन और साहित्य का सृजन ही नहीं कर रहा था बल्कि उसकी भाषा को भी एक मानक और मर्यादित रूप दे रहा था। न केवल पहला हिंदी व्याकरण बिहार में लिखा गया बल्कि अयोध्या प्रसाद खत्री, केशवराम भट्ट, सकलनारायण शर्मा, रामावतार शर्मा, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने बिहार की भूमि से आधुनिक हिंदी को अपने व्याकरण ग्रंथों के माध्यम से अनुशासित एवं परिष्कृत करने का काम किया। इन बातों को जन-जन तक पहुंचाने में बिहार बन्धु छापाखाना और पत्र की महती भूमिका रही है। किंतु हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने कृतघ्नता ज्ञापित की है। इन सब बातों की विवेचना आप पुस्तक के सातवें-आठवें अध्याय में पढ़ सकेंगे।
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