1926 ई. में बच्चों की सचित्र मासिक पत्रिका ‘बालक’, ‘पुस्तक भंडार’ के रामलोचनशरण द्वारा लहेरियासराय से शुरू की गई। बाद में इसका प्रकाशन पटना से होने लगा। इसके संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे। 1927 के ‘गया साहित्य सम्मेलन’ में ‘वियोगी’ ने बेनीपुरी पर व्यंग्य करते हुए एक कविता सुनाई थी : ‘मास-मास बालक प्रसव’। पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी ही का नाम छपता रहा। ‘बालक’ की परिकल्पना में भी इनकी भागीदारी थी, इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’ बाद में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। प्रवेशांक के समय बाबू शिवपूजन सहाय कलकत्ता के ‘समन्वय’ में कार्यरत थे, इसलिए इसके आरंभिक दो अंक उन्हीं के संपादन व देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में नाम रामलोचनशरण बिहारी का जाने लगा, हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में ‘विद्यापति प्रेस’ स्थापित किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण इसी प्रेस में होने लगा।
रामलोचनशरण द्वारा संपादित ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ जिसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापतिं तथा पांच स्वागताध्य के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में ‘बालक’ का विज्ञापन छपा था जिसमें कहा गया कि ‘‘सोलह स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चैथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चैदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। इस तरक ‘बालक’ ने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इससे बच्चों की न केवल भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ बल्कि उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की भी वृद्धि हुई।
आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक-साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था। दिनकर, प्रभात, आरसी, हंसकुमार तिवारी, नेपाली आदि की काव्य-प्रतिभा ‘बालक’ के पृष्ठों में ही पल्लवित हुई। नेपाली की पहली कविता ‘भारत गगन के जगमग सितारे’ बेनीपुरी ने ‘बालक’ में छापी थी। संभवतः 1926-27 की बात थी, जब नेपाली 15-16 की उम्र में तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे। उक्त कविता बेतिया मिडिल स्कूल के एक शिक्षक ने अपने पत्र के साथ रामलोचनशरण के पास प्रकाशनार्थ भेजी थी। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की पत्रिका के अनुसार नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी कही जाती है जो सही नहीं है। 1927 ई. में आरसीप्रसाद सिंह की कहानी ‘आम का पेड़’ ‘बालक’ में प्रकाशित हुई थी। 1928 के दिनों में नलिनजी की बहन कुमुद्वती ‘बालक’ के लिए लेख और कविताएं लिखा करती थीं। स्वयं नलिनजी की कहानियां और कविताएं प्रकाशित होती रही हैं। बेनीपुरी ने प्रवेशांक में मुजफ्फरपुर के बाबू लंगटसिंह की सचित्र जीवनी प्रकाशित की थी। ‘बालक’ की समालोचना करते हुए काशी के दैनिक ‘आज’ ने उस जीवनी के विषय में लिखा था-‘‘वह कौन हैं ?’-शीर्षक के अंदर अपने ही पुरुषार्थ के बल पर अतिसाधारण उन्नति करनेवाले बिहार के स्व. श्री लंगटसिंह का चरित्र दिया गया है। संभवतः आगे भी इस स्तंभ में ऐसे ही स्वदेशीय पुरुषों के जीवन प्रकाशित किए जाएंगे। बालकों के चरित्र गठन पर ऐसे चरित्रों का निश्चय ही कल्याणकारी प्रभाव पड़ेगा।’’
‘बालक’ के विशेषांक संग्रहणीय होते थे। ‘एण्ड्रूज अंक’ तथा भारतेन्दु की अर्द्ध-शताब्दी पर निकला अंक विशेष आकर्षक था। मई, 1935 में सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर ‘बालक’ का ‘रजत जयन्ती अंक’ निकला था। अपनी साज-सज्जा में यह ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव के अवसर पर भी ‘बालक’ के द्वारा राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण प्रकाशित किया गया था। पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी ‘बालक’ के विशेषांक के रूप में ‘शोक-प्रकाश’ प्रकाशित हुआ था।
48 पृष्ठ के बालक का वार्षिक मूल्य 3 रुपयेे था। सन् 1969 ई. में इसकी प्रसार संख्या 22,000 थी जो किसी भी साप्ताहिक या मासिक से ज्यादा थी। तत्कालीन सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने ‘बालक’ की तुलना सर्वश्रेष्ठ बंगला बाल मासिक ‘संदेश’ से की तो अन्यों ने उसे मराठी बाल पत्रिका ‘सुमन’ से बेहतर कहा।
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