राजू रंजन जी इतिहास के प्राध्यापक हैं और हिन्दी में कविताएं लिखते हैं. सामयिक विषयों पर भी लिखते रहे हैं. कोई बीस साल या उससे भी पूर्व ' लोकदायरा ' पत्रिका के कोई आधा दर्जन अंक इन्होने बड़े उत्साह से निकाला था. पिछले कुछ समय से इनकी चुप्पी से मैं चिंतित था. लेकिन कुछ समय पूर्व जब इनकी किताब ' बिहार में हिन्दी ' मिली तब अहसास हुआ उनकी चुप्पी क्यों थी.
किताब (बिहार में हिन्दी : डा राजू रंजन प्रसाद) में कुल आठ लेख हैं जो एक साथ मिल कर सोच-विचार की एक दुनिया गढ़ते हैं. बिहार का सांस्कृतिक अध्ययन बहुत कम हुआ है. यह किताब इस दिशा में एक जरूरी कदम है. लेखों के शीर्षक बहुत कुछ कह जाते हैं, इसलिए इन्हें देखा जाना चाहिए -
हिन्दी का उद्भव एवं पूर्व मध्यकालीन बिहार
औपनिवेशिक बिहार में शिक्षा एवं हिन्दी में पाठ्यपुस्तक
औपनिवेशिक बिहार में स्कूली शिक्षा एवं हिन्दी पत्रकारिता
औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी कहानी का विकास
बिहार में अंग्रेजी दमन एवं प्रतिरोध का साहित्य
औपनिवेशिक बिहार में भागलपुर की हिन्दी पत्रकारिता
औपनिवेशिक बिहार में हिन्दी व्याकरण की परंपरा
बिहार में नवजागरण और बिहार बंधु
सभी लेख महत्वपूर्ण हैं. सन्दर्भ टिप्पणियों के साथ इन्हें अकादमिक अनुशासन के साथ लिखा गया है. इस दृष्टि से यह इतिहास के विद्यार्थियों केलिए भी उपयोगी है. लेकिन आम पाठक भी इससे बहुत कुछ ग्रहण कर सकते हैं. पिछली शताब्दियों के बिहार में हिन्दी, उसके साहित्य और पत्रकारिता की क्या स्थिति थी और कुल मिला कर इस क्षेत्र के सामाजिक- राजनीतिक नवजागरण में हिन्दी वालों ने क्या भूमिका निभाई इस किताब से समझा जा सकता है. रामदीन सिंह की किताब बिहार दर्पण की कडी में मैं इसे देखता हूँ. हाँ, औपनिवेशिकता से लेखक का क्या तात्पर्य है इसकी विवेचना होनी चाहिए थी. राजू जी जब लोकदायरा निकालते थे, तब भी उसे प्रति-औपनिवेशिक चेतना की पत्रिका घोषित किया था. इसकी सम्यक विवेचना अपेक्षित है.
लगभग तीन सौ ( २९१) पृष्ठों की किताब के प्रकाशक हैं प्रलेक प्रकाशन, मुंबई.
प्रेमकुमार मणि