प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित किताब एक दलित कीआत्मकथा (2022) मिली। लगा कि लेखक का नाम 'राम रक्षादास' गलत छप गया है। मेरी सहज व्याकरण-बुद्धि ने इसे सुधारकर 'रामरक्षा दास' पढ़ना शुरू किया। हालांकि नाम में बुद्धि काम नहीं करती तो मैंने लेखक को फोन लगाया। पता चला कि उनका सही नाम 'राम रक्षा दास' है। पुस्तक में नाम की अशुद्धि के साथ और भी कई तरह की अशुद्धियां रह गई हैं जो गम्भीर संपादन की मांग करती हैं। मसलन, पृष्ठ 17 पर 'खपरैल का घर' की बजाय 'खपरैल घर' लिखना श्रेयस्कर होता। घर लिखना अगर आवश्यक हो तो 'खपड़े का घर' लिखा जाना उचित है। पृष्ठ 18 पर 'अहसान', 'छह', 'पुत्रेष्ठि' की जगह 'एहसान', 'छः' और 'पुत्रेष्टि' का प्रयोग सही होता। पृष्ठ 22 पर 'मर्माहत' भूलवश 'मर्माहित' छप गया है तो पृष्ठ 23 पर 'फीट'। हिंदी में 'फुट' ही चलता है। पृष्ठ 40 पर 'अधिकांश' शब्द की जगह 'अधिकतर' लिखा जाना था। 'प्रीफेक्ट' को सर्वत्र 'परफेक्ट' (पृष्ठ 72 एवं अन्य) लिखा गया है। पृष्ठ 80 पर लिखा है, 'फूलन देवी मालिन जाति की लड़की थी।' कहना अनावश्यक है कि जाति का नाम तो माली है, मालिन उसका स्त्रीलिंग रूप हुआ। पृष्ठ संख्या 86 पर '57वीं जयंती समारोह' की बजाय '57वाँ जयन्ती समारोह' लिखा जाना चाहिए था।
पृष्ठ 116 पर लिखते हैं, '...तब तैमूरलंग याद आते हैं, जिन्हें 17 बार चढ़ाई करने के बाद 18वीं बार में सफलता मिली थी।' दरअसल यह बात महमूद गजनी के बारे में प्रचलित है।
लेखक को लगता है कि "इस देश और समाज में 'मनुस्मृति' के प्रावधान के विरुद्ध जाना खतरे से खाली नहीं है।" (पृष्ठ 226) इस समझ से उनके निजी जीवन के निर्णय तो प्रभावित होते ही हैं, इतिहास का विश्लेषण भी कहाँ अप्रभावित रह पाता है! बंगाल के एक प्रसंग में वे कहते हैं- "'मनुस्मृति' में शूद्रों को जज बनाने पर रोक है। अंग्रेजों ने 1861 में आई.पी.सी. एवं अन्य अधिनियम बनाए। इसके पहले तो 'मनुस्मृति' के कोड के आधार पर न्यायिक कार्य होता था। 'मनुस्मृति' में ब्राह्मणों को दंडित करने पर रोक है। लेकिन इस प्रावधान के विपरीत वॉरेन हेस्टिंग्स ने 5 अगस्त, 1775 में राजा नंद कुमार नामक एक ब्राह्मण को फाँसी दे दी। जिस तरह भागलपुर में हंगामा हुआ, उसी तरह 1775 में कलकत्ता में हंगामा खड़ा हुआ। अंग्रेजों का शासन तो ब्राह्मणों की मदद से चल रहा था। सारे ब्राह्मण पदाधिकारियों और नेताओं ने अंग्रेजों को सहयोग करना बंद कर दिया। नतीजा हुआ कि अंग्रेजों को अपनी राजधानी कलकता से हटाकर दिल्ली ले जानी पड़ी।" (पृष्ठ 225) 'मनुस्मृति' के प्रति उनकी 'अतिरिक्त सजगता' बंगाल के इतने लंबे अंतराल को ब्राह्मण-विरोध से पाट देती है।
किताब में कुछ रोचक निजी अनुभव हैं। जैसे, "मैथिल की तीन पहचान है-पान, पेटिशन और पैरवी। या तो वे पान खाते और सरौता से कसैली काटते रहेंगे या किसी के खिलाफ पेटिशन लिखते रहेंगे। इससे समय बचा तो पैरवी करने लगेंगे। पैरवी करने में भी उनका एक हाथ पैर पर और दूसरा गरदन पर रहता है।'' (पृष्ठ 157)
यह भी लिखा है कि पटना शहर के गर्दनीबाग मुहल्ले के नामकरण की कहानी 1942 की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी कही जाती है। उस समय यह संपूर्ण इलाका बाग-बगीचे से भरा था। अंग्रेज, आंदोलनकारियों की गर्दनों को इन्हीं पेड़ों से लटका दिया करते थे ताकि लोगों में भय और आतंक पैदा हो सके। इस तरह इस मुहल्ले का नाम गर्दनीबाग हुआ। (पृष्ठ 79) हालांकि इसका कोई दस्तावेजी साक्ष्य उनके पास नहीं है। अपने एक सीनियर पदाधिकारी के साथ हुई मौखिक बातचीत को आधार बनाया है। यद्यपि अतार्किक नहीं है।
'एक दलित की आत्मकथा' मुझे काफी रोचक लग रही है। यह हर हाल में पठनीय है। आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी हुई कई दिलचस्प जानकारियां हैं। कुछ जादू-टोने भी। उसमें लेखक का विश्वास थोड़ा डराता है तो वर्णित तथ्यों को थोड़ा अविश्वसनीय भी बनाता है। लेखक को यह अंधविश्वास थोड़ा 'विरासत' में मिला है तो थोड़ा अर्जित करना पड़ा है!
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