जब मैं हाईस्कूल में था तो अपने कम्युनिस्ट शिक्षक रामविनय शर्मा से आनंदमार्ग और उसके संस्थापक प्रभात रंजन सरकार का नाम और खंडन-मंडन सुना करता था इसलिए एक लंबे समय तक इनसे बचाव की मुद्रा में रहा। सन 2000 के आसपास 'लोक दायरा' पत्रिका निकालने के क्रम में नेहरूनगर, पटना के एक व्यक्ति के यहां जाना हुआ जहां 'शब्द चयनिका' (भाग 2) पुस्तक देखने को मिली। उलट-पलटकर देखा तो किताब रोचक लगी और उपयोगी भी। घर ले आया। पढ़ा तो उसका कायल भी हुआ। अब मैं आपको भी पढ़ने की सलाह देता हूँ।
8 सितंबर, 1985 को प्रभात रंजन सरकार ने प्रत्येक रविवार को बंगला भाषा के चुनिंदा शब्दों पर व्याख्यान की एक श्रृंखला शुरू की थी। यह पुस्तक उन्हीं व्याख्यानों का लिखित-संकलित रूप है। इस लिहाज से यह औपनिषदिक परंपरा की चीज लगती है जहाँ शिष्य सीधा गुरुमुख से ज्ञान प्राप्त करता है। प्रभात रंजन सरकार की पुस्तक 'शब्द-चयनिका' मूल बंगला भाषा में 26 खण्डों में प्रकाशित हो चुकी है। जैसा कि नाम ही से स्पष्ट है, यह पुस्तक चुने हुए शब्दों की व्याख्या है। इसमें लेखक शब्दों की व्युत्पत्ति की व्याख्या करते हैं और इस क्रम में वे इतिहास, भूगोल, दर्शन, विज्ञान और भाषाविज्ञान जैसी ज्ञानजगत की अनेक गलियों से गुजरते हैं। इस यात्रा के फलस्वरूप यह किताब शब्दों की व्युत्पत्ति भर न रहकर 'ज्ञानकोष' हो जाती है। वे अपनी बात कहने के लिए कई कहानियों का भी सहारा लेते हैं। कुछ अविश्वसनीय कथाओं को छाँट दें तो कहना होगा कि ये जरूरी किताबें हैं।
बचपन में हमलोग कबीर के इस ज्ञान को अक्सर रटा करते थे : ''सात समंद की मसि करौं, लेखनि सब बनराइ/ धरती सब कागद करौं, तऊ हरि गुण लिखा न जाइ।'' प्रभात रंजन सरकार हमें बताते हैं कि मूल संस्कृत में यह मूलतः शिव के लिए लिखा गया था : ''असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिंधुपात्रे/सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमूर्बी। लिखति यदि गृहीत्वा सारदा सर्वकालं/तथापि तव गुणानामीश पारं न याति।।'' अर्थात ''हे शिव, यदि हिमालय की तरह एक कज्जल-वटिका (स्याही की गोली), समुद्र जैसा एक मत्स्याधार (दवात), स्वर्ग के पारिजात वृक्ष की शाखा जैसी कलम और इस सुविस्तीर्ण धरापृष्ठ को कागज के रूप में व्यवहार कर स्वयं विद्यादेवी अनंत काल तक लिखती जाएं फिर भी तुम्हारी गुणावली लिखकर समाप्त नहीं की जा सकती।'' (प्रभात रंजन सरकार, शब्द-चयनिका, तृतीय खंड, पृष्ठ 30)
संस्कृत में पत्नी के लिए 'कलत्र' शब्द भी व्यवहृत है। 'कल' शब्द का अर्थ है ध्वनि और 'कलत्र' शब्द का अर्थ हुआ 'ध्वनि के द्वारा जो त्राण करे'। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द-चयनिका, भाग 3, पृष्ठ 166) पत्नी शारीरिक शक्ति में संभव न हो, वाक युद्ध में शत्रु को पराभूत कर स्वामी को विपन्मुक्त कर सकती है। इसलिए पत्नी को कलत्र कहा गया है। (वही) मजेदार है कि कलत्र शब्द जहां पत्नी के अर्थ में व्यवहृत होता है वहां यह पुल्लिंगवाचक (कलत्र:, नर शब्द की तरह रूप) अथवा स्त्रीलिंगवाचक रूप (कलत्रा, लता की तरह) न होकर क्लीवलिंगवाचक होता है अर्थात शब्द हो जाता है कलत्रम् (फल शब्द की तरह रूप)। 'यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।' भर्तृहरिशतकत्रयम् 2/68; आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 300 में उद्धृत)
शहरों/नगरों के नामों का भी वे उत्खनन करते हैं किंतु उनके औजार यही शब्द होते हैं। भाषा में शब्दों को पढ़ना आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के लिए भी पुरातत्त्व उत्खनन ही था। सरकार कहते हैं कि उत्तर भारत में बकुल, मौलश्री नाम से सभी परिचित हैं। राढ़ में बकुल फूल को 'बउल' या 'बोल' कहा जाता है। बकुलपुर शब्द से बोलपुर आया है। (तृतीय भाग, पृष्ठ 75) तिरहुत की भी कुछ यही कहानी है। बताते हैं कि राजा मिथि ने विदेह को दखल करके भूमि को पवित्र करने के लिए त्रिहोत्रीय यज्ञ (तीन होताओं द्वारा यज्ञ) किया था और भूमि के पवित्र होने की घोषणा की। त्रिहोत्रीय यज्ञ के द्वारा भूमि के पवित्र होने से त्रिहुत नाम पड़ा। (तृतीय भाग, पृष्ठ 106) पूर्णिया स्थानीय बोलचाल का प्रचलित शब्द पुरैनियाँ का भ्रष्ट अंग्रेजी रूप है। (डी आर पाटिल, द एन्टीक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार, पृष्ठ 425) इस इलाके में कभी कमल ही कमल हुआ करते थे। अकारण नहीं है कि फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल की नायिका भी कमली है। कमल की समष्टि को कमलिनी कहा जाता है। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, भाग 3, पृष्ठ) कमल को उस क्षेत्र में पुरइन भी कहा जाता है। इसलिए शहर का नाम हुआ पुरैनियाँ। आसपास के गांव के बच्चों के बुझौवल में शहर पुरैनियाँ की याद शेष है-"एक रत्ती चिनगी चिनगल जाए, सहर पुरैनियाँ लूटल जाए?" (फणीश्वरनाथ रेणु, मैला आँचल, राजकमल पेपरबैक्स, 1992, पृष्ठ 86) कुछ लोग बताते हैं कि पूर्णिया शब्द पूर्ण/पूरा और अरण्य से मिलकर बना है। जो हो, शब्द निर्माण की बड़ी ही दिलचस्प यात्रा है।
अर्जुन की पताका में वानरचिह्न रहने से उसका एक नाम 'कपिध्वज' है; उसी प्रकार वानर जिसका रथ चलाता है, इस अर्थ में राम का एक नाम 'कपिरथ' है। (तृतीय भाग, पृष्ठ 115)
'ओड' (ड हल युक्त है) धातु का अर्थ है नजदीक लाना, आदर करना, जकड़कर पकड़ना, सेवा-शुश्रुषा करना आदि। 'उड' (ड हलयुक्त) + रक (क हलयुक्त) ओड्र हुआ। जिस देश में अतिथि का खूब आदर-सत्कार होता है, दूर के लोगों को खींचकर लाया जाता है, उसका नाम है 'ओड्र' देश। (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, तृतीय खण्ड, पृष्ठ आठ) इस ओड्र देश संबंधी विषय को औड्र कहा जाता है और वहाँ की भाषा को ओड्री/औड्री कहा जाता है। इस ओड्री/औड्री शब्द से ओड़िया शब्द आया है। ओड्री/औड्री से विवर्तित होकर 'उड़िया' शब्द नहीं आता, ओड़िया आता है। (प्रभात रंजन सरकार, पूर्वोद्धृत)
इंद्र को संस्कृत में उलूक कहते है। (वामन शिवराम आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, कमल प्रकाशन, पृष्ठ 254; प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, भाग 2, पृष्ठ 73)। इंद्र को यह नाम उनके बड़बोलेपन की वजह से दिया गया है। (प्रभात रंजन, पृष्ठ 74) कुछ लोगों का ख्याल है कि दिन के उजाले में उल्लू बाहर नहीं निकल सकता, इसलिए अपने अँधेरे कोटर में छिपा रहता है। साथ ही यह सोचकर आत्ममुग्ध भी होता है कि उसके भय से रात में कोई भी वन्य पशु शिकार के लिए निकलने न पाया था। उन बेचारों को अब जाकर मौका मिला है तो उन्हें अवसर का लाभ उठा लेने दो! रात में वे कायर मेरी वीरता के आगे कहाँ ठहर पाते है! यह स्वघोषित वीरता उल्लू को तोष देती है। पुराणों में वीरता के बखान के किस्से इंद्र के भी हैं। (प्रभात रंजन, पृष्ठ 74) पति अगर सम्मानित न हो तो पत्नी भला कैसे सम्मानित बनी रह सकती है। संस्कृत में इंद्र की पत्नी इन्द्राणी के लिए उलूकी शब्द है। उलूकी का अर्थ हुआ उल्लू की तरह बदसूरत! घूम-फिरकर भाषा स्त्री की सूरत पर आ टिकती है। क्या यहाँ भी कोई पितृसत्ता काम कर रही है? नारीवादी चिंतकों को सोचना चाहिए!
माना जाता है कि कठोपनिषद की रचना वैशम्पायन के शिष्य कठ नामक वैदिक ऋषि ने की थी। कठ (ठ हलयुक्त) धातु का अर्थ है कष्ट में रहना, कठिनाई से रहना (आप्टे, संस्कृत हिंदी शब्दकोश), सूखकर कड़ा हो जाना, झमेला में रहना, आर्त्तनाद करना, आहत होकर या आहत होने के भय से दौड़ना, हरी घास या गाछ का सूखकर पीला या पुआल हो जाना (प्रभात रंजन सरकार, शब्द चयनिका, तृतीय खण्ड, पृष्ठ 46) आदि। कठ से सूखी लकड़ी या पत्थर का भी बोध होता है। कहने की जरूरत नहीं कि उस काल में बहुत से ब्राह्मण दरिद्र और अभावग्रस्त हुआ करते थे। इसलिए कठ से सामान्यतः ब्राह्मण भी समझा जाता है। 'कठी' या 'कठानी' का अर्थ ब्राह्मणी (ब्राह्मणकन्या नहीं) और 'कठा' शब्द का अर्थ ब्राह्मणकन्या है। (प्रभात रंजन सरकार, पूर्वोद्धृत)
वे खाली जगहों को अपनी कहानियों से भरने की कोशिश करते हैं। वैसे भी, भाषाविज्ञान को इन कहानियों/कल्पनाओं की आवश्यकता पड़ती रही है। इससे सरकार की शब्द-यात्रा रोचक भी बनती है। तो अब एक कहानी भी-"पद्म की डंठल या मृणाल में एक प्रकार के कीट होते हैं-विशेषकर वर्षाकाल में। उसी प्रकार के कीट कलम्बी (कलमी, करमी) साग में भी होते हैं। इसीलिए वर्षाकाल में लोग कलम्बी साग नहीं खाते। कुछ लोग तर्क द्वारा समझाने पर भी कई बार समझना-मानना नहीं चाहते। इसलिए डराने के लिए कहा जाता है कि सीधा रथ के दिन से उल्टा रथ के दिन तक जगन्नाथ को ज्वर रहता है। वे कलमी पत्ते पर सोये रहते हैं, इसलिए उस समय कलमी साग नहीं खाना चाहिए। खाने से पाप होता है।" (तृतीय भाग, पृष्ठ 131, पादटिप्पणी)
इस किताब को पढ़ने के बाद अपनी पुरानी धारणा को बल मिला कि धर्म और धर्म-प्रचारकों ने सिर्फ उन्माद ही नहीं फैलाया बल्कि तुलनात्मक भाषाशास्त्र विकसित करते हुए दुनिया की कई भाषाओं का 'पहला व्याकरण' लिखने का गौरव भी हासिल किया। (डैविड क्रिस्टल, 'लिंग्विस्टिक्स', पेंगुइन, रिप्रिंट : 1980, पृष्ठ 45) भारत की बात करें तो मलाबार क्षेत्र में सत्रहवीं सदी के अंतिम चरण से लेकर अठारहवीं सदी के चौथे दशक तक क्रियाशील रहनेवाले जेस्विट पादरी फादर हैंक्सलेडेन ने संस्कृत का एक व्याकरण लिखा जो किसी भी यूरोपीय भाषा में संस्कृत पर लिखा गया पहला व्याकरण है। (द्विजेन्द्र नारायण झा, प्राचीन भारत : सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की पड़ताल, ग्रंथ शिल्पी, प्रथम संस्करण : 2000, पृष्ठ 13) 1767 में सबसे पहले फादर कुर्डो ने संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं के बीच के घनिष्ठ संबंध को पहचाना। (वही) प्रभात रंजन सरकार की 'शब्द-चयनिका' उसी की एक आगे की कड़ी है।
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