Thursday, November 5, 2015

किताबों के बारे में टिप्पणियां




‘भूख में खाया हुआ भोजन पौष्टिक होता है।’ आप चैंके नहीं। यह आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कोई नवीन खोज नहीं है बल्कि पब्लिक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई जानेवाली हिंदी की पाठ्य-पुस्तक की एक पंक्ति है। हालांकि शुरू में यह सुनकर कुछ क्षणों के लिए मैं भी भौंचक्का रह गया था। हुआ यह कि किसी दिन मैंने चैथी कक्षा (फिलहाल डी.यू.,से अंग्रेजी में एम.ए.कर रहा है) में पढ़ रहे बेटे को पकड़ लिया और बच्चों में कुपोषण की बढ़ती समस्या पर लेक्चर झाड़ना शुरू कर दिया। बेटे ने सहज ही प्रतिवाद किया कि ‘पापा, कुपोषण की समस्या तो हमारी गलत जीवन-शैली से पैदा होती है। इसकी जड़ में अशिक्षा है। गरीबी से भला आप किस तरह जोड़ रहे हैं ?’ मैंने उसे एकबार फिर समझाने की कोशिश की तो उसे भी हथियार से लैस पाया। उसके हाथ में ‘सोम सुधा प्रकाशन’, नई दिल्ली से चैंथी कक्षा के लिए प्रकाशित हिंदी की पाठ्य-पुस्तक थी। मेरे सामने लगभग पटकते हुए उसने रखा और उस हिस्से पर उंगली रखी जहां वेद-वाक्य की तरह छपा था, ‘भूख में खाया हुआ भोजन पौष्टिक होता है।’ मुझे समझते तनिक देर न लगी कि मेरे बेटे का तर्क इसी पुस्तक के ‘ज्ञान’ से पैदा हुआ है। इसके बाद मैंने सचेत होकर उस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो गलतियों और अशुद्धियों का अंबार पाया। मैं अंदर ही अंदर खीझ रहा था कि आखिर वे कौन-से लोग हैं जो हमारे बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं ? इसी गुस्से में एक दिन विद्यालय चला गया जहां यह टेक्स्ट-बुक मजे में चलाया जा रहा था। इस बात को जानकर कि यहां के निदेशक की शिक्षा जे.एन.यू. से हुई है, मेरी पीड़ा का ठिकाना न रहा। निदेशक ने अत्यंत ही सहज भाव से कहा, ‘इस वर्ष यह गलती से लग गई है। ...ऐसे प्रकाशकों पर तो मुकदमा चलना चाहिए।’ मैंने प्रकाशक को भी लिख भेजा लेकिन पत्रोत्तर न आया। ये सारी स्थितियां अंत में एक ही सवाल छोड़ जाती हैं कि यह सब क्यों और कैसे हो रहा है ?
सत्यभक्त और साम्यवादी पार्टी
कर्मेंदु शिशिर जी योजनाबद्ध लेखन करते हैं. उनका यह गुण मुझमें ईर्ष्या का भाव जगाता है. उन्होंने हिंदी नवजागरण से संबद्ध कई लेखकों पर लिखा है. निश्चित रूप से यह काम महत्वपूर्ण है. इसी क्रम में उन्होंने ‘नवजागरण की दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं के अरण्य में गहरी छानबीन’ के बाद ‘सत्यभक्त और साम्यवादी पार्टी’ सम्पादित की है. शिशिर जी को पता है कि ‘सत्यभक्त के व्यक्तित्व में अंतर्विरोध थे और बहुत साफ-साफ दिखते भी थे.’ (पृष्ठ ३०) जो ‘दिखा’ वह यह कि ‘उनकी भारतीयता आध्यात्मिकता तक पहुँच जाती थी’ (पृष्ठ ३०) और जो ‘नहीं दिखा’ वह था भारत में मुसलमान का ‘अभारतीय’ होना. सत्यभक्त लिखते हैं, ‘हिंदुस्तान की हालत इस समय बड़ी शोचनीय हो रही है. एक हजार सालों से यह विदेशियों के पैरों तले कुचला जा रहा है.’ (पृष्ठ ५२) सत्यभक्त की ‘भारतीयता’ की यह ‘भारतीय दृष्टि’ कर्मेंदु शिशिर जी की दृष्टि से शायद ओझल है ! अन्यथा वे ‘अखण्ड ज्योति’ से उनके (सत्यभक्त के) जुड़ाव को दलित कन्या (मेहतरानी) के साथ विवाह की परिणति के रूप में न देखते. (पृष्ठ २९)
डाक्टर रामचंद्र ठाकुर ने ‘हिस्ट्री ऑफ जर्नलिज्म इन बिहार’ (१८६६-१९१९) में ‘लक्ष्मी’ मासिक पत्रिका को १९०२ में लाला भगवान दिन के संपादन में लक्ष्मी प्रेस, गया से प्रकाशित हुआ बताया है (पृष्ठ ५९). इनका दावा है कि इन्होंने उक्त पत्रिका की जुलाई १९०२ की मूल प्रति देखी है (पृष्ठ ६६, पाद टिप्पणी संख्या ८१). हालाँकि श्री अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने ‘समाचार पत्रों का इतिहास’ में ‘लक्ष्मी’ का प्रकाशन वर्ष १९०३ लिखा है (पृष्ठ २४१). रामजी मिश्र ‘मनोहर’ने भी ‘बिहार में हिंदी-पत्रकारिता का विकास’ में प्रकाशन वर्ष १९०३ ही बताया है (पृष्ठ ५९).
दरअसल इसकी कहानी है कि गया जिले के ‘कूसी’ (औरंगाबाद) ग्राम के निवासी लक्ष्मीनारायण लाल ने आयुर्वेद-प्रचार के लिए सन् 1903 ई. में एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जिसका नाम ‘लक्ष्मी-उपदेश-लहरी’ रखा गया था (‘हिंदी साहित्य और बिहार’, चतुर्थ खण्ड, पृष्ठ 100). इसके प्रथम संपादक श्री अखौरी शिवनन्दन प्रसाद ‘बहार’ थे. श्री बहार ने एक वर्ष तक उसका संपादन किया. तदन्तर मध्यदेश के सागर-मण्डलांतर्गत ‘देवरी’ निवासी श्री गोरेलाल मंजु सुशील ने उसका संपादन भार संभाला. इनके समय में पत्रिका की विशेष उन्नति हुई. अत्यधिक प्रचार के बाद पत्रिका अपने साहित्यिक रूप में प्रतिष्ठित हुई (‘जयंती स्मारक ग्रंथ’, पृष्ठ 585; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, चतुर्थ खण्ड, पृष्ठ 100, पा.टि. 1). जब ‘लक्ष्मी प्रेस’ का स्थानांतरण गया नगर में हुआ, तब पत्रिका का नाम केवल ‘लक्ष्मी’ रह गया. इसी समय सुशील जी का असामयिक निधन हो गया. इनके अचानक दिवंगत होने से पत्रिका का बड़ा अहित हुआ. इनके निधनोपरांत बुन्देलखण्ड निवासी श्री लाला भगवान दीन जी ने इसके संपादन का भार अपने कंधों पर लिया. इसके पूर्व वे हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी के हिंदी विभाग में प्राध्यापक थे. लाला भगवान दीन जी के बाद आरा निवासी पं. ईश्वरीप्रसाद शर्मा और श्रीरामानुग्रह नारायण लाल, बी.ए. क्रमशः इसके संपादक हुए. ‘लक्ष्मी’ अपने जमाने की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका गिनी जाती थी. इस पत्रिका के संबंध में श्रीस्वामी सत्यदेव तथा म.म.पं. सकलनारायण शर्मा ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी. अमेरिका प्रवासी स्वामी सत्यदेव ने एक पत्र में ‘लक्ष्मी’ की प्रशंसा करते हुए लिखा था : ‘‘गया की ‘लक्ष्मी’ हिंदुस्तान के सामयिक पत्रों में अपना खास स्थान रखती है. प्रायः सभी लेख और कविताएं उपयोगी और शिक्षाप्रद हैं. संस्थापक महोदय अवश्य प्रशंसा के पात्र हैं।’’ म.म.पं. सकलनारायण शर्मा ने एक बार प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति पद से भाषण करते हुए कहा था: ‘रायसाहब लक्ष्मीनारायण लाल जी बिहार के उन हिंदी प्रमियों में हैं, जो हिंदी के लिए प्रतिवर्ष पानी की तरह रुपये बहाते हुए कुण्ठित नहीं होते’ (त्रैमासिक साहित्य’, पृष्ठ 41; ‘हिंदी साहित्य और बिहार’, चतुर्थ खण्ड, पृष्ठ 100, पा.टि. 2). रामचंद्र ठाकुर ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ जर्नलिज्म इन बिहार (१८६६-१९१९)' में 'क्षत्रिय पत्रिका' का प्रकाशन-वर्ष १८८० बताया है (पृष्ठ २८) जो सही नहीं प्रतीत होता. १८८० में दरअसल इस पत्रिका का विज्ञापन निकला था और इसका प्रथम अंक निकला १९ मई १८८१ को. डाक्टर धीरेन्द्रनाथ सिंह (आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका,पृष्ठ १६६) ने इसी तिथि को सही बताया है. कहना होगा कि डाक्टर सिंह का निष्कर्ष अत्यंत प्रामाणिक स्रोत यथा पत्रिका की फाइल, डायरी आदि पर आधारित है जबकि डाक्टर ठाकुर ने 'रिपोर्ट ऑन नैटिव न्यूजपेपर्स इन बंगाल १८८२' को आधार बनाया है.

पिछले दिनों मगही लोक काव्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन पर एक बृहदाकार पुस्तक का लोकार्पण हुआ. कहा जाता है कि इसके लेखक पहले कोई बड़े पद पर थे और किसी घोटाले में संलिप्त थे. अतः नौकरी से असमय ही छुट्टी ले ली. अब वे 'प्रायश्चित' के लिए पैसे पर 'लेखक' खरीदते हैं और पुस्तकों के 'स्वामी' बनते हैं. मुझे चिंता उस 'अदृश्य' लेखक की है. उसकी क्या मज़बूरी है? दूसरों के लिए लिखना कोई हंसी-खेल नहीं है. किताब देखने से लगा कि 'अदृश्य' लेखक ने किताब को अच्छा खासा समय और श्रम दिया है.
‘स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के बलिदानी’
 ‘स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के बलिदानी’ पुस्तक में कुछ महत्वपूर्ण नाम इसमें नहीं आ सके हैं. महेंद्र चौधरी ऐसे ही एक राजनीतिक कैदी का नाम है जिसे डाकाजनी और हत्या के अपराध में ७ अगस्त, १९४५ को भागलपुर केन्द्रीय जेल में फांसी दी गई थी.
पब्लिक स्कूल के नाम पर लूट मची है. चौथी कक्षा के लिए आर.टी.पब्लिशर्स (दिल्ली) द्वारा प्रकाशित 'वरदायिनी' देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. पता नहीं प्रकाशक की कौन-सी मज़बूरी थी कि सारी की सारी कविताएँ एक ही 'स्वनामधन्य' कवयित्री 'रचना गर्ग' की लगा दीं. कवयित्री को तो यह भी नहीं पता कि नाम अवतरण चिह्न (इन्वर्टेड कौमा) के भीतर नहीं होता. उनसे प्रकाशक ने कहा होता कि वे अपनी कविताएँ लगाने की बजाय भाषा की शुद्धता पर ध्यान केन्द्रित करती.
धर्मनिरपेक्षता की कहानी गढ़ते हुए हम कई बार अवैज्ञानिक तक हो चले हैं. आज भी कबीर के बारे में यही पढ़ा रहे हैं--'कहते हैं कि उनकी मृत्यु के पश्चात् हिन्दुओं और मुसलमानों में झगड़ा हो गया. हिन्दू और मुस्लमान दोनों ही अपने-अपने धर्म के अनुसार उनका दाह-संस्कार करना चाहते थे. परन्तु जब उनके शव से कपड़ा उठाया गया तो शव के स्थान पर फूल थे. आधे फूलों की हिन्दुओं ने समाधि बनाई और आधे की मुसलमानों ने कब्र.' (वरदायिनी, आर.टी. पब्लिशर्स, दिल्ली, प्रथम संस्करण २०१५, पृष्ठ १२०)
'भारत का गहराता कृषि संकट और किसानों की आत्महत्याएं'
सियाराम शर्मा अपनी साम्य-पुस्तिका 'भारत का गहराता कृषि संकट और किसानों की आत्महत्याएं' में लिखते हैं कि 'मीडिया का दूसरा सशक्त माध्यम पिपली लाइव जैसी संवेदनहीन फिल्मों के माध्यम से किसानों की गंभीर त्रासदी को हंसी मजाक का विषय बना देने की कोशिश कर रहा है. किसानों के चरित्र और व्यवहार को हास्यास्पद, बदनाम और अपमानित करने वाली ऐसी फ़िल्में किसी सामाजिक समस्या के प्रति मीडिया की भोथरी दृष्टि के साथ उसके तिरस्कारपूर्ण रवैये को भी उजागर करती है.' मैं शर्मा जी के इस आकलन से सहमत नहीं हूँ. और आप ?
हिंदी साहित्य और बिहार', प्रथम खंड, पृष्ठ 126, पादटिपण्णी-3, में लिखा है, 'अंगरेजों का विश्वास है कि जहाज या नाव पर यदि कोई यहूदी हो, तो अवश्य उपद्रव होगा.' इस बात का कोई अन्य लिखित प्रमाण मिलता है क्या ?
'बिहार थ्रू द एजेज' अपने समय की शानदार किताब है लेकिन उसकी कई गंभीर सीमाएं है. मसलन, जब संस्कृत साहित्य को आधुनिक बिहार का योगदान की बात आती है तो महज दो लेखक की चर्चा कर लेखक बच निकलता है. दो से अधिक पृष्ठ केवल रामावतार शर्मा पर जाया किया जाता है, बिहार गायब है.
 ‘बिहार स्टेट टेक्स्टबुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड’ द्वारा कक्षा ग्यारह के लिए इतिहास की पाठ्यपुस्तक ‘विश्व इतिहास के कुछ विषय’ (प्रथम संस्करण : 2007, पुनर्मुद्रण : 2008) तैयार करवाई गई है. ‘पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति’ के सदस्यों के ‘नाम-पदनाम’ छापने में पूरा एक पृष्ठ जाया हुआ है. नीलाद्रि भट्टाचार्य उक्त समिति के मुख्य सलाहकार हैं. ‘विश्व इतिहास का अध्ययन’ शीर्षक से दो पृष्ठ की उनकी भूमिका भी है. उसकी कुछ पंक्तियाँ यहाँ देखें : (1) ‘‘नए इतिहासकार को अब कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिन्हें पहले अनदेखा कर दिया गया था. वे इन प्रमाणों की व्याख्या करती हैं, नए अंतर्संबंध कायम करती है और इस तरह से एक नयी किताब लिख डालती हैं.’’ (2) ‘‘अक्सर किन्हीं विशेष घटनाओं का इतिहास पश्चिम की विजयी यात्रा की बड़ी कहानी का ही हिस्सा था.’’ (3) ‘‘इस यात्रा में विश्व इतिहास के कुछ विषय आपकी मदद करेगी’’. (4) ‘‘सबसे पहले यह पुस्तक विकास और प्रगति की महान कहानियों के पीछे छुपे ज्यादा ‘अँधेरे’ इतिहासों से आपका परिचय कराएगी’’.
दिल्ली विश्वविद्यालय के अधीन हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय है. इसकी स्थापना हिंदी माध्यम से सामाजिक विज्ञान आदि विषयों की पढाई कर रहे छात्रों को मानक पुस्तकें उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी. देव राज चानना की पुस्तक 'प्राचीन भारत में दास प्रथा' २००९ में पुनर्मुद्रित होकर आई है. इसे बहुत सावधानी के साथ पढ़ने की जरूरत है. कहने की जरूरत नहीं कि किताब को कूड़ा बना दिया गया है. एक-दो उदाहरण से आप समझें. लेखक का नाम कहीं देवराज चानना है तो कहीं देव राज चानना. शांतिपर्व कई जगह शांतिपूर्ण छपा. पुस्तक में आद्योपांत सूची, 'सूचि' है. पूरी पुस्तक में अगम्भीरता का 'मानक' प्रदर्शित किया गया है.
वीरेंद्र कुमार बरनवाल की राजकमल प्रकाशन से ‘जिन्ना : एक पुनर्दृष्टि’ किताब है. उक्त पुस्तक के ‘खंड : १’ का ६ठा अध्याय ‘माउन्टबैटन के हिंदुस्तान आगमन से विभाजन और देहावसान तक’ लैरी कॉलिन्स/डोमिनिक लेपियर की पुस्तक ‘माउन्टबैटन एंड द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ (विकास पब्लिशिंग हॉउस, १९८२) का लगभग अनुवाद है. अनुवाद के क्रम में कुछ जरूरी बातें छुट गई हैं अथवा छोड़ दी गई हैं जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है. पृष्ठ ३१९ पर लिखा है, ‘‘ध्यातव्य है कि एडविना अपने पति लॉर्ड माउंटबैटन को प्यार से ‘डिकी’ कहती थीं.’’ तथ्य यह है कि ‘डिकी’ नाम से न केवल एडविना और माउंटबैटन के परिवार के लोग बल्कि उनके मित्र भी बुलाते थे. लॉर्ड इस्मे भी इसी नाम से बुलाते थे. ‘माउन्टबैटन एंड द पार्टीशन ऑफ इंडिया’, पृष्ठ ११ की पादटिप्पणी में यह पंक्ति ध्यातव्य है : ‘Dickie was the nickname given to Mountbatten by his family and intimate friends’.
अल्तेकर 
 ‘The Purdah system, in all probability, was unknown in ancient India. Its general adoption is subsequent to the advent of Muslims in India....The Hindus adopted purdah as a protective measure. The tendency to imitate the ruling class was another factor.’ ये पंक्तियाँ गुरू गोलवरकर की नहीं, प्राचीन भारत के मान्य इतिहासकारों में लगभग सर्वाधिक पढ़े गये इतिहासकार ए.एस. अल्तेकर की हैं. अल्तेकर यह कैसे भूल जाते हैं कि प्राचीन भारत की अन्तःपुर की नारियां, ‘पतिव्रता’ और ‘सती’ स्त्रियाँ असूर्यम्पश्य (सूर्यमपि न पश्यति) हैं. अन्तःपुर की रानियों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सूर्य देखना भी दुर्लभ था. पर्दा का यह रूप अल्तेकर को नहीं दिखा क्योंकि वे इसका तार मुसलमानों का आगमन और उनकी ज्यादतियों के साथ जोड़ते हैं. वे जीवित होते तो मैं पूछता कि ‘जनाब, पर्दा और प्रोटेक्टिव मेजर का क्या घपला है ?' यह भी कि ‘प्रोटेक्टिव मेजर’ केवल मुसलमानों के विरुद्ध था अथवा हिन्दू राजाओं के विरुद्ध भी था ?’ संस्कृत के मर्मज्ञ अल्तेकर ने इस प्रसंग को अवश्य पढ़ा होगा--- वाग्भट्ट अनहिलपट्टन के राजा जयसिंह के महामात्य थे। इन्हें अपने इस ‘महामात्यत्व’ का ‘महामूल्य’ चुकाना पड़ा है। इनकी एक पुत्री थी, परम सुन्दरी, परम विदुषी और अपने पिता के सदृश कविप्रतिभाशालिनी। जब वह विवाह योग्य हुई तो उसे बलात् इनसे छीनकर राजप्रासाद की शोभा बढ़ाने के लिए भेज दिया गया। न वाग्भट्ट इसके लिए तैयार थे और न कन्या। पर ‘अप्रतिहता राजाज्ञा’ के सामने दोनों को सिर झुकाना पड़ा। बिदाई के समय की कन्या की इस उक्ति को जरा देखिए। राजप्रासाद के लिए प्रस्थान करते समय कन्या अपने रोते हुए पिता को सान्त्वना देते हुए कह रही है-‘तात वाग्भट्ट! मा रोदीः कर्मणां गतिरीदृशी।’ दुष् धातोरिवास्माकं गुणो दोषाय केवलम्।।’ व्याकरण प्रक्रिया के अनुसार दुष् धातु को गुण होकर ‘दोष’ पद बनता है ‘दुष्’ धातु के ‘गुण’ का परिणाम ‘दोष’ है। इसी प्रकार हमारे सौन्दर्य-‘गुण’ का परिणाम यह अनर्थ है और अत्याचाररूप ‘दोष’ है। इसलिए हे तात्! आप रोइए नहीं, यह तो हमारे कर्मों का फल है कि दुष् धातु के समान
हमारा गुण भी दोषजनक हो गया।–देखें, मम्मट, ‘काव्यप्रकाश’ (हिंदी व्याख्या : आचार्य विश्वेश्वर सिद्धांतशिरोमणि), ज्ञाणमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, पुनर्मुद्रित संशोधित संस्करण : 1998, पुनर्मुद्रण, जुलाई 2006, पृष्ठ 80-81।)

Tuesday, May 5, 2015

पब्लिक स्कूलों में क्या पढ़ रहे हैं हमारे बच्चे ?



अक्सर कहा जाता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती और अभिभावक अपने बच्चे का नाम किसी पब्लिक स्कूल में लिखाकर निश्चिन्त हो लेते हैं. इस बात से बेखबर कि इन स्कूलों में बच्चे आखिर पढ़ क्या रहे हैं? इस उददेश्य से मैंने पटना के पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई जा रही हिंदी की कुछ पाठ्य-पुस्तकों का सर्वेक्षण किया है. फ़िलहाल चौथी कक्षा के लिए अवधेश कुमार तिवारी द्वारा तैयार की गई हिंदी व्याकरण की पुस्तक ‘व्याकरण रश्मि’ (एडोनिस पब्लिकेशन इंक, नई दिल्ली, नवीन संस्करण, २०१५) का हाल देखिए. पुस्तक के गलत अथवा अवांछित हिस्से को मैंने कोष्ठक में बंद कर दिया है.      
पृष्ठ संख्या ५
(१) (बच्चों!) आपने देखा होगा कि छात्र विद्यालय के पुस्तकालय में (वहाँ) सब शांत होकर पुस्तक पढ़ते हैं, क्योंकि वहाँ बोलना मना होता है. (२) ऐसे कुछ संकेत (है) (३) ऐसे और भी संकेत (है). (४) दूर बैठे लोगों से बात करने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता पड़ती (हैं). (५) इसीलिए (बच्चों), भाषा बनाई गई. (६) भाषा के दो (रुप) होते हैं.
पृष्ठ संख्या ६
(१) जब अपने मन के विचार बोलकर प्रकट (किए जाते हैं) या दूसरों को (समझाए जाते हैं), तो भाषा का वह रूप ‘मौखिक भाषा’ कहलाता है. (२) वे परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं (मे) लिखकर दे रहे हैं. (३) (यह) लिखित भाषा (के) उदाहरण (है). (४) सभी देशों की अपनी-अपनी भाषा (हैं). (५) इसके अलावा हमारे देश में भी अनेक भाषाएँ बोली जाती (है).
पृष्ठ संख्या ७ 
(१) भाषा (का) क्षेत्रीय रूप को बोली कहा जाता है. (२) हिंदी और संस्कृत भाषाएँ देवनागरी (भाषा) में, अंग्रेजी भाषा रोमन लिपि में, उर्दू भाषा फारसी लिपि में, पंजाबी भाषा (गुरूमुखी) लिपि में लिखी जाती है. (३) भाषा के दो (रुप) हैं-लिखित और मौखिक.     
पृष्ठ संख्या ८
(1) भाषा को लिखने का ढंग क्या कहलाता (हैं) ? (२) शैक्षिक (अधिगम) Scholastic Assessment (३) जिसके उच्चारण में वायु (नाम) और मुँह (दोनो) से निकलती है, उसे कहते हैं – (४) (निर नुनासिक)
पृष्ठ संख्या ९
(१) भाषा किसे कहते हैं ? (उदाहरण सहित बताइए). (२) बातचीत के माध्यम से विचारों को प्रकट करने के लिए (कौन सी भाषा की जाती है) ? (३) भाषा के द्वारा बोलकर और लिखकर (और लिखकर) विचार प्रकट कर सकते हैं. (४) प्रश्न संख्या ४ में भाषा कॉलम के अंतर्गत उड़ीसा, बंगाल और केरल का अनुचित उल्लेख है. ये राज्य हैं, भाषा नहीं.
पृष्ठ संख्या ११
इन शब्दों को यदि ध्यान से (पढ़े) तो पाएँगे कि प्रत्येक शब्द कुछ ध्वनियों से बना है. जैसे- (१) सेब=स+ए+व्+अ (२) मौसा=(म+आ+स+आ) (३) गुलाब=ग+उ+स+आ+व् +अ (४) किताब=क्+ई+त+आ+ब+अ
पृष्ठ संख्या १२
(१) हिंदी भाषा में वर्ण दो प्रकार के होते (है). (२) इनका स्थान स्वर के बाद (ओर) व्यंजन से पहले होता है. (३) इसका उच्चारण नाक और (गले) दोनों से होता है. (४) अंग्रेजी भाषा के प्रभाव के कारण (औं) को भी स्वर की मात्र में शामिल कर लिया गया है. (५) स्वतंत्र (रुप) में-स्वतंत्र रुप से प्रयोग (किए जाने) स्वरों के उदहारण (है)
पृष्ठ १३
(गुरू), (रूचि)
पृष्ठ १४
(एल्फावेट्स), (आर्शीर्वाद)
पृष्ठ १५
(१) वर्ण भाषा (को) सबसे छोटी इकाई होती है. (२)  शैक्षिक (अधिगम) Scholastic Assessment 
पृष्ठ १८ 
(१) (बच्चों,) पिछले अध्याय में आपने वर्ण के विषय में पढ़ा. (२) क, प, त, र आदि (वर्णों है). (२) (वर्णो) के मेल से शब्द बनते हैं.                        
पृष्ठ १९
(१) वर्णों के सार्थक मेल को ही शब्द कहते (है). (२) शब्द दो तरह के होते (है)
पृष्ठ २०
(१) शब्द किसे कहते (है)? (२) (निम्नलिखीत) वर्णो को मिलकर शब्द बनाइए. (३) (वार समो), (मा र टर), (लगा रे डी)
पृष्ठ २२
(१) इससे किसी भाव को (रूप से) प्रकट किया जा सकता है. (२) प्रत्येक वाक्य के दो अंग होते (है)
पृष्ठ २३
(१) वाक्य (पदों शब्दों व्यवस्थित) समूह होता है. (२) उददेश्य और विधेय (एक-एक पदों को) भी हो सकते हैं.
पृष्ठ २४
(१) आपका बेटा कहाँ पढ़ता है (|)
पृष्ठ २५
(१) छुट्टी/आज/ है/ स्कूल (की). (२) उपन्यासकार हिंदी के प्रेमचंद (है) प्रसिद्ध.
पृष्ठ २६
(१) (व्यक्ति वाचक) संज्ञा (२) (फुटबाँल) (३) (हाँकी) (४) गाय एक (पालतु) पशु है.
पृष्ठ ३३
(१) (पुरूष) सूचक चित्रों में बैल, पिताजी और मोर (है).
पृष्ठ ३४
(१) (माता जी)
पृष्ठ ३५
(१) (पुरूष)
पृष्ठ ३६
(१) लिंग के कितने भेद होते हैं(|)
पृष्ठ ३८
(१) हम बहुवचन (सभी) बोल सकते हैं, जब गिन (सके). (२) (बच्चों !)
पृष्ठ ३९
(१) (एक वचन)
पृष्ठ ४०
(१) (दवाईयाँ)
पृष्ठ ४१
(१) ऐसे शब्द जिनसे एक से अधिक संख्याओं का पता चलता है, उन्हें (एकवचन) कहते हैं. (२) (एक वचन)
पृष्ठ ४३
(१) मेज पर (फस) रखा है. (२) वर्ग-(पहले) (३) (छॉंटकर)       
पृष्ठ ४४
(१) संज्ञा शब्दों का बार-बार प्रयोग न हो इसके लिए सर्वनाम शब्दों का (प्रयोग बार-बार प्रयोग न हो इसके लिए सर्वनाम शब्दों का) प्रयोग किया जाता है. (२) रंगीन रेखांकित छपे शब्द सर्वनाम (है).
पृष्ठ ४५
(१) (पुरूषवाचक) सर्वनाम
पृष्ठ ४६
(१) (अनिश्चिय) सर्वनाम (२) प्रश्नवाचक सर्वनाम-(केसे) (३) आप कौन (है) ? (४) अध्यापक ने बच्चों से कहा, ‘‘(बच्चों) जो परिश्रम करेगा, वह अवश्य सफल होगा.’’ (५) (पुरूषवाचक)
पृष्ठ ४७
(१) (पुरूषवाचक) सर्वनाम
पृष्ठ ४८
(१) दरवाजा कौन खटखटा रहा है(|) (२) आप यहाँ कब आए(|) (३) आज की प्रतियोगिता कौन जीता(|) (४) क्या आप मेरी बात मानेंगे(|) (५) बगीचे से किसी ने फल तोड़ (दिया) है.
पृष्ठ ४९
(१) तुम तुम्हारी पाठशाला (जाओं). (२) (पुरूषवाचक) सर्वनाम
पृष्ठ ५०
(१) आज रोहित का (जन्म दिन) है. (२) (राहित)
पृष्ठ ५१
(१) जब इन पुतलों में आग लगती (हैं) (२) पापी, खुश ऐसे विशेषण (है) (३) ये सभी गुणवाचक विशेषण (है). (४) इस (रेश) में दो घोड़े दौड़ रहे हैं(पूर्णविराम गायब) (५) दिए गए दोनों वाक्यों में रंगीन शब्द परिमाणवाचक विशेषण (है).
पृष्ठ ५२
(१) (परिभाण) (२) (सार्वजनिक) विशेषण
पृष्ठ ५३
(१) मुझे मीठे आम बहुत पसंद (है) (२) कक्षा में दस छात्र अनुपस्थित (है)
पृष्ठ ५४
(१) (सार्वजनिक) विशेषण                                            

Sunday, March 9, 2014

संस्कृति-रत्न नहीं हैं देशरत्न!

बिहार ने सन् 2012 में बंगाल से अपने पृथक्करण के 100 साल पूरे किये। शताब्दी वर्ष में सरकार ने बिहार के इस अलगाव को ‘बिहारी अस्मिता’ एवं ‘बिहारी नवजागरण’ का फल बताया जबकि हकीकत में यह बिहार में बसे बंगालियों के विरुद्ध बिहारी मुसलमान एवं कायस्थों के उभार का नतीजा था। आधुनिक शिक्षा ने बिहार के उच्चवर्गीय मुसलमानों एवं कायस्थों को बंगालियों के विरुद्ध खड़ा कर दिया था। शताब्दी-वर्ष में कथित बिहारी नवजागरण एवं अस्मिता को ध्यान में रखकर सरकारी प्रयास से कई पुस्तकें प्रकाशित की गईं। ‘बिहार के 100 रत्न’ इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। विनोद अनुपम के संपादन में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग (बिहार सरकार) से प्रकाशित उक्त पुस्तक संपादक के बड़े-बड़े दावों के बावजूद ‘धरोहर’ की बजाय कूड़ेदान में तब्दील हो गई है।

पुस्तक में विचार/विचारधारा की दृष्टिहीनता का नमूना देखिए-‘जयप्रकाश नारायण मरते दम तक तमाम समस्याओं का विश्लेषण अपने माक्र्सवादी ढंग से ही करते रहे।’ आगे है-‘जयप्रकाश के राजनीतिक जीवन से गुजरते हुए यह तय करना कठिन होता है कि आखिर उनकी विचारधारा क्या थी ? ...कभी वे समाजवाद के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं, तो कभी लोकतंत्र के सिपाही बनकर जान की बाजी लगा देते हैं। वास्तव में जे. पी. के लिए रास्ते महत्त्वपूर्ण नहीं थे, वरन् लक्ष्य महत्त्वपूर्ण थे।’ (पृष्ठ 66) पुस्तक में कई स्थलों पर ऐसे ‘उन्मुक्त विचार’ के दर्शन होंगे।

पुस्तक का शीर्षक रखने में भी किंचित असावधानी बरती गई है। शीर्षक है ‘बिहार के 100 रत्न’ जबकि 1912 से 2012 के बीच के केवल ‘संस्कृति रत्नों’ को ही इसमें शामिल किया गया है। पुस्तक की इसी सीमा की वजह से ‘देशरत्न’ डा. राजेन्द्र प्रसाद तक को इसमें शामिल किया जाना संभव नहीं हो सका। संपादक का तर्क है कि राजेन्द्र बाबू का संबंध सक्रिय राजनीति से था, इसलिए उनका नाम छोड़ दिया गया। हम सब जानते हैं कि इतिहास में कुछ नाम ऐसे भी होते हैं जो राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता जैसे तंग खानों में अंट नहीं पाते हैं। भारतीय इतिहास में गांधी, नेहरु एवं राजेन्द्र प्रसाद निश्चित रूप से ऐसे ही नाम हैं । एक क्षण के लिए पाठक अगर ‘राजनीति से संपर्क’ के ‘संपादकीय’ तर्क को मान भी ले तो शायद इस तर्क से उसे तसल्ली न मिले क्योंकि सक्रिय राजनीति से संपर्क तो जे. पी. का भी था फिर उन्हें क्यों शामिल किया गया ? अगर उन्हें शामिल किया गया तो संपादक को चाहिए था कि वे पाठकों को उनके सांस्कृतिक अवदानों की जानकारी दें। बेहतर होता अगर जे.पी. की कहानी-कविता की पुस्तक में चर्चा होती और खुद जे.पी. के जीवन में उनके महत्त्व को रेखांकित किया जाता। लेकिन अफसोस कि विनोद अनुपम, जे.पी. की राजनीतिक सक्रियता से इतर कुछ कह पाने में असमर्थ रहे।

कला-संस्कृति के क्षेत्र से भी कई ऐसे बड़े नाम हैं जो या तो छुट गये हैं या छोड़ दिये गये हैं। सच्चिदानंद सिन्हा का नाम शामिल करते वक्त लोगों ने तनिक नहीं सोचा कि ‘बिहारी अस्मिता’ अथवा ‘बिहारी नवजागरण’ की बात महेश नारायण के बगैर संभव है क्या ? ‘बिहार में जनमत निर्माण के पिता’ कहे जानेवाले महेश नारायण का नामोल्लेख न होना क्या अनायास है ? ध्यान रहे कि महेश बाबू ‘कायस्थ समाचार’ के संपादक के रूप में बिहार में अंग्रेजी पत्रकारिता के सूत्रधार रहे हैं। उनके इस ऐतिहासिक महत्त्व की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए थी।

‘बिहारी अस्मिता’ को ध्यान में रखकर लिखी गई इस किताब से इतिहासकार विजय चन्द्र प्रसाद चैधरी गायब हैं जबकि उनकी लिखी किताब ‘द क्रिएशन आॅफ माॅडर्न बिहार’ (यह पुरस्कृत पुस्तक है) इस दिशा में पहला प्रामाणिक प्रयास थी । आज भी उस किताब से आगे की बात नहीं हो रही है। समीक्ष्य पुस्तक में इतिहासकार रामशरण शर्मा तो हैं लेकिन बिहार में मार्क्सवादी इतिहास लेखन की परंपरा की शुरुआत करनेवाले राधाकृष्ण चौधरी का नाम गायब है। खासकर जब राधाकृष्ण चौधरी के ‘ए सर्वे आॅफ मैथिली लिटरेचर’ समेत बिहार से संबंधित विषयों पर कई महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक काम हों। इस लिहाज से देखें तो बिहार में पैदा होने के अलावा बिहार के इतिहास-संस्कृति लेखन में चौधरी जी के उलट शर्मा जी का कोई योगदान नहीं है।

‘बिहार के 100 रत्न’ पुस्तक किसी दृष्टि के बगैर एक खास तरह की हड़बड़ी में संपादित की गई लगती है। तभी भाषिक त्रुटियों की भरमार है. यह पुस्तक कम, अलबम ज्यादा है।

पुस्तक-‘बिहार के 100 रत्न’, संपादक-विनोद अनुपम, प्रकाशक-कला,संस्कृति एवं युवा विभाग, वर्ष-2013

Wednesday, May 25, 2011

कविता मरसिया नहीं होती

‘गंगा-तट ’ की चर्चा धूमिल भी न होने पाई थी कि ज्ञानेन्द्र पति का संग्रह ‘संशयात्मा ’ पाठकों के बीच आ धमका। ज्ञानेन्द्र पति की कविताओं से गुजरना किसी अत्यंत ही समृद्ध संग्रहालय से गुजरना है, जिसमें संसार की लगभग तमाम चीजों के बारे में ब्यौरे भरे होते हैं। साहित्य के सुधी पाठकों के लिए ये ब्यौरे अनावश्यक और अरोचक हो सकते हैं, किंतु मुझे खासे महत्वपूर्ण लगते हैं। हमारे आसपास की बहुत-सी चीजें लुप्त हो चुकी हैं और बहुत-सी लुप्तप्राय हैं। अगर कोई कवि उसकी फेहरिस्त तैयार कर रहा हो तो यह काम महत्वपूर्ण है। कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी संग्रहालय के अवदान को कम करके नहीं देख सकता। कवि का यह कर्म उन रचनाकारों के लिए भी ‘काम’ का है जो ‘यादों से रचा गांव’ पढ़कर गांवों की दुरवस्था पर विलाप करते हैं। लेकिन सवाल है कि एक रचनाकार क्या महज संकलनकर्ता है ?

प्रेमचंद ने कभी कहा था कि साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। समकालीन हिंदी कवियों को (अपवाद यहां भी हैं), और विशेष तौर से ज्ञानेन्द्र पति को पढ़ते हुए प्रेमचंद पर अविश्वास करने को जी चाहता है। प्रायः प्रत्येक समाज एक संक्रमणशील समाज होता है जिसमें पुरानी चीजें टूटती हैं और नई चीजें शक्ल अख्तियार करती हैं। एक रचनाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह सामाजिक परिवर्तन की दशा-दिशा की सही पहचान रखे।

मुक्तिबोध ने जैसाकि लिखा है, किताब की समीक्षा करना आग से खेलना है। ज्ञानेन्द्र पति की कविताओं पर लिखते हुए किसी को भी इस खतरे का सामना करना पड़ सकता है। वजह यह है कि उनकी कविता भाषा और शिल्प में, अथवा कह लीजिए कि अपनी बुनावट में जितनी ही सुघड़, बेजोड़ और उन्नत है, विचार की दृष्टि से उतनी ही लचर, कमजोर और कई दफा प्रतिगामी भी हैं।

जहां तक भाषा की बात है, कविता में तत्सम शब्दों का बाहुल्य है। यद्यपि ठेठ देसी शब्दों की भी कमी नहीं खलती। कहीं-कहीं तो ज्ञानेन्द्र पति विल्कुल ही शब्दान्वेषी हो उठते हैं और नये शब्द तक गढ़ डालते हैं-तत्सम और देसी शब्दों का अपूर्व गंठजोड़! इनकी शब्द और बिम्ब-योजना तक पर इनके कुलीन मन की छाया आ घिरती है-

‘दस कोस दूर शहर से आनेवाला सर्कस का प्रकाश-बुलौआ

तो कब का मर चुका है

कि जैसे गिर गया हो गजदन्तों को गँवाकर कोई हाथी।’

‘यहां गजदन्तों को गंवाकर कोई हाथी’ का जो बिम्ब है वह कवि के मिजाज को, उसके सामंती संस्कार को स्पष्टतः रेखांकित करता है। संग्रह में कवि इसी मनोजगत से बिम्ब ग्रहण करता है। शायद यही वह चीज है जो कवि को दबे-कुचले लोगों के साथ जुड़ने में बाधा पैदा करती है-

‘सभ्यता के इस तरफ सूअरों के साथ खेलने के लिए छोड़ दिए गए बच्चे

जिनके तन में केवल आंखें चमकती हैं

मानव-शिशु की आंखों की तरह

अहो! कि जिनसे

मिलकर झुक जाती हैं आंखें।’

गनीमत है कि इस असंवेदनशील समय में कवि को इसका बोध तो है!

संग्रह का एक बड़ा हिस्सा ‘शोकगीत’ और ‘विदागीत’ से भरा है। कई कविताओं के शीर्षक भी ठीक-ठीक शोकगीत और विदागीत से बनते हैं। ‘ओ ओ आ-आ का विदागीत’, ‘मूर्धन्य ष के लिए एक विदा-गीत’ तथा ‘बचे हुओं के लिए शोकगीत’ आदि कविताएं इसी श्रेणी की हैं। जो कविताएं इनसे बच जाती हैं उनमें स्मृति अपनी पैठ बना लेती है। जैसे ‘एक पट्ट की स्मृति में’ और फिर ‘कुम्हरार: एक सभ्यता के खंडहर में भटकते हुए।’ कवि का मन सभ्यता के खंडहरों में ही रमता है। एक कविता है ‘गांव का घर’। यह घर किसी सभ्यता के खंडहर से कम नहीं है। कविता में जिस घर का वर्णन कवि करता है, वह निस्संदेह उसका अपना पुस्तैनी घर है-

‘वह सीमा

जिसके भीतर आने से पहले खांसकर आना पड़ता था बुजुर्गों को

खड़ाऊँ खटकानी पड़ती थी खबरदार की

और प्रायः तो उसके उधर ही रुकना पड़ता था

एक अदृश्य पर्दे के पार से पुकारना पड़ता था।’

आलोक धन्वा इसीलिए बड़ा कवि है कि उसके पास समय का विवेक है। ‘वे घर की जंजीरों’ को भी देख पाते हैं। ज्ञानेन्द्र पति को अगर ये जंजीरें दिखी होतीं या उसका ‘अहसास’ होता तो शायद गांव के उस घर के लिए इस कदर का प्यार न उमड़ता! ज्ञानेन्द्र पति को शायद यह मालूम नहीं है कि कविता मरसिया नहीं होती।

Tuesday, April 26, 2011

समय मुर्दागाड़ी नहीं होता


निर्मला पुतुल की छिटपुट कविताओं ने मुझे काफी प्रभावित किया था। ठीक-ठीक शब्दों में बयान करूं तो वह आकर्षण लगभग सम्मोहन जैसा था; किंतु संग्रह पढ़कर मुझे अपनी राय में थोड़ा संशोधन करना पड़ा। अब मुझे उनकी कविताओं में अंतर्निहित खतरे भी साफ-साफ नजर आने लगे हैं। वैसे, पुतुल की कविताओं की जो रचनात्मक प्रतिबद्धता और ईमानदारी है, मैं निस्संदेह उसका कायल हूं।

लगभग दो-तीन वर्ष पहले इतिहासकार रोमिला थापर की एन.सी.आर.टी. द्वारा छठवीं कक्षा के लिए प्रकाशित पुस्तक 'प्राचीन भारत' पढ़कर मैं सन्न रह गया था। उक्त पुस्तक में रोमिला थापर ने लिखा है ‘धन्य हैं आदिवासी जिन्होंने आदिम संस्कृति और संरचना को अपने मूल रूप में बरकरार रखा जिससे इतिहासकारों को अध्ययन हेतु आवश्यक स्रोत उपलब्ध हो सके।’ वाह! कैसी अद्भुत सोच है यह। हम अपने बौद्धिक व आत्मिक विकास के लिए किसी खास जाति अथवा समुदाय के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से अविकसित बने रहने की आकांक्षा पाले रहते हैं। यह है ‘सभ्य समाज’ का संस्कृति-विमर्श ! मुझे दुख है कि निर्मला पुतुल भी जाने-अनजाने ही सही, ‘भलेमानुषों’ की कुछ इसी तरह की सदास्था और सदिच्छा की शिकार होती हैं। वे लिखती हैं ‘बाजार की तरफ भागते/सबकुछ गड्डमड्ड हो गया है इन दिनों यहां/उखड़ गये हैं बड़े-बड़े पुराने पेड़/और कंक्रीट के पसरते जंगल में/खो गयी है इसकी पहचान।’ मैं बगैर किसी लाग-लपेट के कहूं कि कवयित्री यहां आदिवासी संस्कृति के जिन प्रतीक-चिह्नों की बात करती हैं वे बहुत ही स्पष्ट अर्थों में एक अविकसित समाज के अवशेष हैं। विकास की प्रक्रिया में उनके विलुप्त होते जाने पर इस तरह अविवेक के आंसू बहाना आदिवासी समाज व संस्कृति का रक्षक अथवा शुभचिंतक होना नहीं कहा जा सकता। दरअसल हमारा समाज और पूरी दुनिया का प्रत्येक समाज इस कबीलाई समाज की मंजिल को (हालांकि आदिवासी समाज को उन अर्थों में कबीलाई समाज नहीं कहा जा सकता) पारकर ही आधुनिक/उत्तर आधुनिक समय में आया है। भारत में बौद्ध धर्म की पूरी लड़ाई वैदिक संस्कृति के विरुद्ध ‘बाजार’ को स्थापित करने अथवा समर्थन करने की है। वेदकालीन भारत में सूदखोरी एवं वेश्यावृत्ति एक अनैतिक कर्म थी; पहली बार बौद्ध धर्म ही ने इसे मान्यता प्रदान की। ये दोनों ही मूल्य शहरी समाज के अर्थात् बाजार-केंद्रित अर्थतंत्र के उत्पाद थे। तत्कालीन समाज में बौद्ध धर्म का शायद यह एक सार्थक हस्तक्षेप था। एक लगभग अपरिवर्तनशील संस्कृति की अवधारणा के बारे में बात करते हुए हम अक्सर ही उसके अवश्यंभावी खतरों की तरफ से अपनी आंखें मूंद लेते हैं। परिवर्तनशील समय और समाज में अपरिवर्तनीय संस्कृति एवं पहचान की कल्पना वैज्ञानिक विश्वासों के साथ की जा सकती है क्या ? आदिवासी संस्कृति की मूल पहचान को बनाये रखने की निर्दोष (?) चिंता निर्मला पुतुल के संग्रह की केंद्रीय समस्या लगती है। कवयित्री के अनुसार, ‘उतना भी बच नहीं रह गया ‘वह’/संथाल परगना में /जितने/की उनकी/संस्कृति के किस्से’ और फिर, कायापलट हो रही है इसकी/तीर-धनुष -मादल-नगाड़ा-बांसुरी/सब बटोर लिये जा रहे हैं लोक संग्रहालय/समय की मुर्दागाड़ी में लादकर।’ निर्मला जी को अब कौन समझाए कि समय ‘मुर्दागाड़ी’ नहीं होता। समय को न समझने पर अलबत्ता रचना बहुत जल्द मुर्दा हो जाएगी।

निर्मला पुतुल की कविताओं का मूल स्वर विद्रोह का है। यह विद्रोह बहुआयामी है। 'ग्लोबल' और 'श्रेष्ठ संस्कृति' के विरुद्ध स्थानीय संस्कृति का विद्रोह तो कहीं मर्द-मर्दवादी संस्कृति के विरुद्ध नारी अस्मिता का विद्रोह। ‘अपने घर की तलाश में’ जो कविता है वह इसी विद्रोह-भाव से लिखी गई है। पुरुष के घर में एक स्त्री अपने होने का प्रमाण ढूढ़ती है, अपना अर्थ खोजती है-‘धरती के इस छोर से उस छोर तक/मुट्ठी भर सवाल लिये मैं/ दौड़ती-हांफती-भागती/तलाश रही हूं सदियों से निरंतर/अपनी जमीन, अपना घर/अपने होने का अर्थ!!’ स्त्री का यह संघर्ष सभ्यता की शायद पहली और अंतिम कहानी है। कवयित्री की तेज निगाहें इस विडंबना को रेखांकित किये बगैर नहीं रहतीं कि ‘स्त्री स्वयं में घर की तरह रहती हुई दरअसल घर से बाहर रहती है।’ पुरुष-प्रधान समाज में आत्म-निर्वासन झेलती एक स्त्री का दुख है यह।

निर्मला पुतुल की कविताओं में दुख एक कौंध पैदा करता है क्योंकि दुख से मुक्ति की बेचैनी है यहां, उसके लिए कठोर संघर्ष है। यहां ‘धान रोपती पहाड़ी स्त्री/रोप रही है अपना पहाड़-सा दुख/सुख की एक लहलहाती फसल के लिए।’ इतना ही नहीं, ‘पहाड़ तोड़ती तोड़ रही है/पहाड़ी बंदिश और वर्जनाएं।’ निर्मला के समवय कवि संजय कुंदन के यहां वर्जनाएं टूटती नहीं, कई बार मजबूत अवश्य होती हैं। उन्हें तो आदमी से ज्यादा ईश्वर पर भरोसा है जबकि पुतुल कहती हैं ‘मत ब्याहना उस देश में/जहां आदमी से ज्यादा/ईश्वर बसते हों।’

प्रकाशनः जन विकल्प , जुलाई, 2007

Friday, October 8, 2010

ये परंपरागत साधु नहीं हैं


कहानी का मैं अच्छा पाठक अपने को नहीं मानता. कविताओं की तुलना में यह अधिक समय लेती है. फिर इसमें पात्रों की अधिकता भी मेरे अंदर कुछ गड्डमड्ड पैदा कर जाती है. लेकिन हां, कहानी अगर अच्छी लगी तो पढ़े बिना भी नहीं रहा जाता. कविता अगर गड़बड़ भी हो तो एक पठन-वाचन तो किया ही जा सकता है. कहानी के साथ यह सुविधा नहीं है, अतः प्रारंभ में ही कहानी अगर कुछ-कुछ ‘अकहानी’ जैसी लगी तो बिना अतिरिक्त श्रम किये छोड़ बैठता हूं. ऐसा होने-करने का एक संभव कारण शायद यह भी रहा है और जिसकी शिकायत सुवास कुमार ने भी दर्ज की है कि श्आजकल के कथाकार ‘कहानी कहने’ की बनिस्बत ‘कहानी में कहने’ को ज्यादा उपयोगी मानते हैं. या यह भी संभव है कि वे कहानी कहना जानते ही न हों.श् लेकिन इधर मैंने प्रतिभा राय का कहानी-संग्रह ‘निरुत्तर ’ पढ़ा जिसमें मुझे कहानी कहने की कला के दर्शन हुए. हाल की 'हंस ' में प्रकाशित सृंजय की कहानी ‘माप ’ (हंस में छपे पत्र के बाद इसकी मौलिकता संदिग्ध है) एवं भालचन्द्र जोशी की 'दोआबा ' में प्रकाशित कहानी ‘राजा गया दिल्ली’ उल्लेखनीय कहानी कही जा सकती है. हां, एक नाम और मैंने इधर पाया. कुछ ही दिनों पहले हरिओम की कहानी ‘भैया राम’ ‘आजकल ’ के किसी अंक में पढ़ी थी. कहिए कि मैंने पूरी पढ़ी थी. पूरी कहानी पढ़ना मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं है. कुमार मुकुल जब दिल्ली वापस जाने लगे तो हरिओम का कहानी-संग्रह ‘अमरीका मेरी जान’ (अंतिका प्रकाशन) मेरे पास छोड़ते गये. ‘भैया राम’ (‘भैया राम’ एक असामान्य व्यक्ति की कहानी है जिसका मानसिक विकास नहीं हो सका है और इसीलिए वह अपने-आप को लेकर भी कई तरह के भ्रमों/वहम के बीच जीता है) मैंने पहले ही पढ़ रखी थी. वह कहानी मुझे पसंद भी थी, इसलिए कहिए कि उसके प्रभाव में मैंने उनका संग्रह पढ़ना शुरू किया। ‘भैया राम’ को छोड़कर सारी कहानियां मैं एक सांस में पढ़ गया। मतलब कि उसे खत्म करने के बाद ही मैंने किसी दूसरी किताब की तरफ ध्यान बंटाया. संभव है कि आलोचक इसे बेहतर कहानी का प्रमाण न मानें लेकिन मैं आश्वस्त हूं. मेरा पाठक-मन कहता है कि जो किताब आपसे पढ़वा ले, एक बेहतर किताब की पहली अनिवार्य शर्त तो पूरी कर ही ले जाती है. इस नाते मैं हरिओम की कहानियों को बेहतर कहानी मानने की छूट हासिल करता हूं.

‘भैया राम’ की ही तरह ‘लबड्डा’ कहानी भी एक असामान्य पात्र को केन्द्र में रखकर रची गई है. ‘लबड्डा’ दरअसल अवध प्रदेश की एक झगड़ालू स्त्री की कहानी है. वह अपने ज्यादातर काम बाएं हाथ से करती थी. ऐसी औरत को गांव में ‘लबड़ी’ या ‘लबड्डी’ कहा जाता था. लेकिन लबड्डा सिर्फ़ अपने वाम-हस्ता होने के कारण लबड्डा नहीं थी वह वाममार्गी भी थी. मर्दों के समाज में मर्दों के बनाए-सुझाए सीधे रास्तों से उलट चलने की इच्छा और हिम्मत रखने वाली. पुरुष-प्रधान समाज ने एक स्त्री को ‘पुरुषोचित मान’ यूँ हीं नहीं दिया था-‘लबड्डा के सामने किसी भी मर्द की जबान तो क्या धोती भी खिसक जाती थी.’ लेकिन उसके अंदर एक संवेदनशील दिल भी था. स्त्री चर्चा में लबड्डा ने एक दिन कहा, ‘हे रे बहिनी! बुढ़िया के जाने के बाद बुढ़वा दिन भर उल्लू की तरह दीवार ताकत रहा. मरा तो उसके शरीर और मन को शांती ही मिली होगी. मगर बुढ़वा के जाने से अब घर कूकुर जस काटत है.’ (पृष्ठ ५१) दरअसल लबड्डा और भैया राम जैसे चरित्र की असामान्यता की वजह समाज और पारिवारिक संबंधों में मौजूद हैं
कहना न होगा कि इस संग्रह में कुल दस कहानियां हैं जिनमें पांच कहानियां ‘आम भारतीय मुसलमानों के जीवन के सच को सामने लाने’, साम्प्रदायिकता की समस्या के मूल कारणों की खोज करने, और बेहद ‘संवेदनशील तरीके से उनकी चेतना पर छाये खौफ और गहरी तकलीफ को समझने’ की कोशिश करती हैं। इन कहानियों का परिवेश अलग-अलग है. लेकिन सारे मुस्लिम पात्र एक-सा दर्द झेल रहे हैं, परायेपन और घृणा का दर्द.’ एक असुरक्षा बोध के साथ.

संग्रह की पहली कहानी ‘मियां’ है. यह अपने गांव के परिवेश में रहमत तेली बन चुके रहमत मियां की कहानी है. यानी कि वे मुसलमान थे . लेकिन चूँकि कई पीढ़ी से वे तेल पेरने का काम करते चले आ रहे हैं, इसलिए, रहमत तेली हुए. यानी पेशे से वे तेली हैं. सुनने में यह बात थोड़ी असहज, अजीब भले लगती हो किन्तु यह एक वास्तविकता है. यह कहानी सधी हुई भाषा में चुपके से, बगैर किसी सूत्र का दामन पकड़े गांव के सांप्रदायीकरण की बात दिखाती है. सामान्य जीवन में, गांव की संस्कृति में हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं है. रहमत मियां कब नमाज अदा करते हैं, किसी को कुछ नहीं मालूम. इतना ही कि वे कहीं किसी समय पढ़ लेते होंगे. इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे भीष्म साहनी का उपन्यास ‘तमस’ याद आता रहा. उस उपन्यास में भी गांव के सारे ही लोग, चाहे वे किसी भी जाति या सम्प्रदाय के क्यों न हों, आपस में सहानुभूति तथा प्रेम के साथ जीना चाहते हैं. उनको भय है तो सिर्फ बाहरी लोगों से. और सच में होता भी यही है-जब तक बाहर से दंगाई नहीं आते हैं, हरनाम सिंह मजे में अपनी दूकान चला रहा होता है. गांववालों को उनसे कोई शिकायत नहीं है, बल्कि उनके साथ लोगों की सहानुभूति भी है. गांव की जनता उन्हें बार-बार यही कहती है कि ‘तुम्हें खतरा तभी हो सकता है जब बाहरी लोग यहां आ जाएंगे.’ ‘मियां’ कहानी में हरिओम ने यही बताया है कि एक दिन गांव में कुछ साधु आते हैं. ये और बात है कि ‘ऐसे साधू पहले गांव में कभी नहीं आए. बिल्कुल नई उम्र हैं...खास बात तो यह कि उनके पास न तो भजन-कीर्तन का कोई सामान है और न ही भीख का झोला.’ ये परंपरागत साधु नहीं हैं. इन्हीं साधुओं ने पहली बार रहमत तेली को रहमत मियां कहा-‘रहमत के कानों ने ऐसी आवाज और ऐसा सम्बोधन पहली बार सुना था. आमतौर पर रहमत के घर आने वाले सीधे दालान तक पहुंच कर रहमत को पुकारते थे और रहमत बैठे-बैठे ही बात करते थे पर इस सम्बोधन में ऐसा कुछ था कि रहमत खड़े हो गए. वे जानते थे कि मियां मुसलमान को कहते हैं और यह भी कि वह तेली से पहले मुसलमान हैं. खड़े वह इसलिए हुए कि इस सम्बोधन से उन्हें पता चल गया था कि उनके दरवाजे पर गांव के बाहर का कोई व्यक्ति खड़ा है’ (पृष्ठ 17). कहानी का क्लाइमेक्स ही अंत है-‘न जाने रहमत को क्या सूझा उन्होंने पूछ लिया, ‘‘काम क्या है भइया?’’ तीसरे ने बेलाग कहा, ‘‘हमें शाम तक एक सौ आठ छोटे त्रिशूल चाहिए.’’(वही).

संग्रह की दूसरी कहानी ‘जय हिन्द’ है. यह एक ऐसे निम्न मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है जो पलायन और विस्थापन का दर्द लिये कस्बे में जीवन-यापन करने को अभिशप्त है. कहानी गांव से शुरू होती है. इस कहानी का पात्र बब्बू है. वह मुसलमान है लेकिन जूते गांठने का काम कर अपने परिवार का भरन-पोषण करता है. आर्थिक विकास की आंधी ने उनके इस पुश्तैनी/परंपरागत हूनर को जीविकोपार्जन के लिए अपर्याप्त/अनुपयोगी साबित कर दिया. नतीजतन काम की तलाश में वे एक कस्बे में आ पहुंचे जहां कई पुरानी और चिर स्थायी समस्यायों के साथ ‘विस्थापन और परायेपन’ का दर्द भी घुल-मिल गया. बब्बू अक्सर कहते, ‘अपनी पुश्तैनी जमीन को छोड़कर कोई कहीं जाय, कितनी ही मौज कर पर रहता पराया का पराया ही है.’ (जय हिन्द, पृष्ठ १९). बब्बू की ‘पहचान’ एक ‘मुसलमान’ की थी क्योंकि वे ‘जिस देश-समाज में रहते थे वहां जात-पात, पहचान और नाम आसानी से नहीं बदलते थे.’ इस कस्बे में बब्बू के बेटे बन्ने की अपनी निराली जिंदगी भी शुरू होती है. बन्ने बेहद सीधे-साधे, भोले-भाले, किसी को नुकसान न पहुंचाने वाले, किसी का कोई भी काम करने को तैयार रहने वाले चरित्र हैं. लेकिन जो सिर्फ इस कारण मार दिए जाते हैं कि वे मुसलमान हैं. लेकिन बन्ने की जो दिनचर्या थी उसमें इस ‘पहचान’ की कोई भूमिका न थी. देश के अन्य शहरों की तरह वहां भी बाबा का एक आश्रम था. ‘बन्ने मुहल्ला-सड़क घूमते हुए और कहीं रुकते रहे हों या नहीं, आश्रम अवश्य पहुँचते थे.’ जो इस बात को खोलती है कि साम्प्रदायिक दंगों में अक्सर बन्ने जैसे निर्दोष लोग ही मारे जाते हैं। बन्ने इस कहानी का एक ऐसा पात्र है जो जीवन जीने के ‘अनिवार्य’ छल-छद्म हैं, उससे भी वाकिफ नहीं है. बन्ने के जीवन में एक भयावह रात आयी और उसे मृत्यु की गोद में सुला गयी. अचानक ‘रात में शहर के एक कोने से धुआँ उठा और आसमान अजूबे शोर में घुल गया. रात गरम हो उठी थी. छतों पर सोनेवाले घरों की खिड़कियों से हवा की पीली गंध महसूस कर रहे थे’ (पृष्ठ 26). कहानी की अंतिम पंक्ति- ‘यह शायद पहली बार था कि इतने ढेर सारे अफसरों की मौजूदगी के बावजूद बन्ने ने ‘जयहिन्द’ नहीं कहा, विशेष महत्व रखती है. यह बन्ने के साथ ‘जय हिन्द’ की भी हत्या थी शायद.

ये धुंआ धुंआ अंधेरा, जो छात्र राजनीति, आजादख्याल मुस्लिम नवयुवती नसीम के जीवन-प्रश्न तथा सांप्रदायिक दंगों के दौरान अखबार और खबरिया चौनल की ‘भाषायी भूमिका’ पर टिप्पणी से शुरू होती है-‘‘कहीं एक ट्रेन में लगी आग से कुछ लोग मरे थे और फिर ‘स्वाभाविक प्रतिक्रियास्वरूप’ हजारों लोग क़त्ल कर दिए गए थे.’’ लेकिन कहानी का अंत सांप्रदायिक कत्लेआम की पृष्ठभूमि में एक पराजयबोध में होता है. बीच में कहानी कई अन्य चीजों को भी अनावृत करती है. इस कहानी के पात्रों में अनीस, नसीम तथा जयराज हैं. अनीस और नसीम मुसलमान हैं और जयराज गांव से शहर गया हुआ हिंदू. जयराज अभी अपने धार्मिक संस्कारों से मुक्त नहीं हो सका है जबकि अनीस और नसीम कामरेड हो चुके हैं. कामरेड बनने के लिए वर्जनाओं और पुराने संस्कारों से मुक्त होना होता है. शायद सिगरेट-शराब की भी कोई भूमिका हो. अनीस के कमरे में ‘फर्श पर दरियाँ बिछी हुई थीं जिनपर अनीस के अलावा अक्सर कुछ अजनबी चेहरे लेटे-बैठे, सिगरेट फूंकते मिलते थे.’(पृष्ठ ९३). एक दिन ‘नसीम ने दो-तीन कश लेते हुए सिगरेट जयराज की तरफ बढ़ाई ...जयराज ने न में सिर हिलाया.’ जयराज के इनकार पर अनीस तिलमिला-सा गया. उसे लगा जैसे जयराज ‘क्रांति’ से ‘मुख मोड़ रहा हो. अतएव उसने चुटकी ली, ‘’ले लो यार. कैसे कामरेड हो. इतनी बड़ी पेशकश ठुकरा रहे हो. आखिर कब तक दकियानूस मजहबी संस्कारों का लबादा ढोओगे.’’(पृष्ठ ९६). कहानी का अंत जयराज की सिगरेट की लत के साथ होता है. शायद इसका कोई सांकेतिक प्रयोग हो.

यह भी सही है कि अनीस, नसीम और जयराज देश-समाज की मुक्ति की चिंता में व्यस्त तो थे लेकिन आपस में एक-दूसरे से सब अलहदा थे. बहुत कम जानते थे एक-दूसरे की ‘निजी’ जिंदगी और परिवार के बारे में. जयराज को ‘याद नहीं कि नसीम या अनीस में से किसी ने कभी अपने घर-परिवार के बारे में कोई बात की हो. उनकी चिंताओं में उनके परिवार की चिंताएं कभी शामिल देखी नहीं जयराज ने.’ कहना न होगा कि दो कामरेड (नसीम और जयराज) जो एक दूसरे को चाहते हैं, उनके बीच भी एक अजीब-सी दूरी है कि जब मुस्लिम धर्मावलंबियों का कत्लेआम होता है, उनकी बस्तियां जलाई जाती हैं, औरतों के साथ बलात्कार होता है, और खुद नसीम की बस्ती भी इससे नहीं बच पाती, तब दोनों अपनी अपनी जिंदगियों में अकेले रह जाते हैं. दुखद है कि ऐसी ही दूरी पार्टी कार्यालयों से लेकर पोलितब्यूरो के कामरेडों तक पसरी हुई है.

साम्प्रदायिकता की समस्या को समझने की कोशिश इस कहानी की मूल चिंता में शामिल लगती है. नसीम ने जयराज से कभी कहा था, ‘कॉमरेड ! जब तक यह मजहब और धर्म की घुट्टी हमारी दादी-नानियां और पंडित-मौलवी बच्चों को पिलाते रहेंगे, फिरकापरस्ती का यह सियासी तमाशा चलता रहेगा. ये मदारी इसी तरह डमरू बजाते रहेंगे और जनता जमूरे की तरह नाचती रहेगी’(पृष्ठ १०४-०५). लेकिन साम्प्रदायिकता के असली कारण धार्मिक न होकर आर्थिक-राजनीतिक हैं- इस बात का अनावरण करती कहानी है ‘अमरीका मेरी जान’. कहानीकार ने बड़ी बारीकी से दिखाने की कोशिश की है कि धर्मनिरपेक्ष सरकार के अहम प्रतिनिधि माने जानेवाले विधायक अपनी चुनावी राजनीति/रणनीति की सफलता के लिए आम हिंदू-मुसलमान की सोयी धार्मिक चेतना को हवा देने से बाज नहीं आते. वे दोनों ही संप्रदायों के स्थानीय नेताओं (आफताब मियां व परताप) का इस्तेमाल करते हुए अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करते हैं. जब लोगों की धार्मिक चेतना जग जाती है तो जनता के साथ ही पुलिस बल भी धार्मिक उन्माद का शिकार हो जाता है. सिपाही पाण्डेय का ‘सोया हिंदू मन’ जब जगता है तो मुसलमानों के प्रति अपनी घृणा को सम्पादित तक करने की जरूरत महसूस नहीं करता. वह कितनी सहजता से, और कैसी ‘टिपिकल’ भाषा में अपनी नफरत जाहिर करता है, वह देखने लायक है-‘जयहिंद सर ! कुछ खास नहीं सर ! अब पूजा पाठ करने पर भी मुल्लों को मिरची लगती है.’ (पृष्ठ ११९ ).

यह सिर्फ़ कहानी की बात नहीं है. यानी इस महज कहानी की काल्पनिक बात कहकर ख़ारिज नहीं कर सकते. यदि हम सरकारी आंकड़ों का ही यकीन करें तब भी हम यही पाएंगे कि ‘सन १९८० के बाद हर दंगे में मरनेवालों में ज्यादातर मुसलमान थे. न सिर्फ ज्यादा बल्कि अधिकतर मामलों में तो तीन-चौथाई से भी ज्यादा. इनमें पुलिस कार्यवाही भी अधिकतर मुसलमानों के खिलाफ ही हुई. अर्थात् जिन दंगों में मरनेवाले अधिकतर मुसलमान थे उनमें भी पुलिस की गाज उन्हीं पर गिरी. मतलब ज्यादा मुसलमान गिरफ्तार हुए, अधिक तलाशियां भी उन्हीं के घरों की हुईं और उन दंगों में भी जहां मरनेवाले तीन-चौथाई से अधिक मुसलमान थे; वहां भी अगर पुलिस ने गोली चलायी तो उनके शिकार भी मुख्य रूप से मुसलमान ही हुए’ (विभूति नारायण राय, राष्ट्रीय सहारा, २४ जुलाई २०१०). इसीलिए डॉक्टर रामविलास शर्मा की कहीं पढ़ी यह बात कि ‘राज्य को धर्मनिरपेक्ष नहीं, असाम्प्रदायिक होना चाहिए’ बार-बार याद आती है.