Saturday, September 12, 2026

किताबों के बारे में

विश्व पुस्तक दिवस (2022) की शाम भंवरलाल कसाणिया जी का फोन आया कि मैं अगर व्यस्त न होऊं तो उनसे ऑनलाइन पुस्तकों के बारे में बात करूँ। उन्होंने बातचीत का एक सिरा भी पकड़ा दिया कि आजकल शिक्षक कहलाने वाला समुदाय भी पढ़ाई-लिखाई और अंततः किताबों से दूर जा चुका है। उनकी बात से मुझे कृशन चंदर के 'एक गधे की आत्मकथा' की याद हो आई और 'गधों' के लिए थोड़ी करुणा भी पैदा कर सका। गधे की आत्मकथा का मजमून है कि गधों का मालिक वकील साहब के यहां काम पर लगा है। वकील साहब को अखबार पढ़ने की बुरी आदत थी लेकिन वे क्लासिफाइड विज्ञापन वाले कॉलम ही में रुचि लेते थे। वे जब विज्ञापन देख-पढ़ रहे होते तो संपादकीय पृष्ठ बाहर की तरफ खुलता। कहना अनावश्यक है कि गधे को भी अखबार पढ़ने की लत थी। इसलिए वह हमेशा इस ताक में रहता कि वकील साहब अखबार खोलें तो वह भी कुछ ताक-झाँक कर ले। इस तरह वकील साहब प्रतिदिन अखबार का विज्ञापन उलटते-पलटते और मौके का फायदा उठाकर गधा संपादकीय पृष्ठ पर अपनी नजरें टिका लेता। गधे को इस बुरी आदत के लिए मालिक की छड़ी भी खानी पड़ती लेकिन गधे ही क्या जो मार खा सुधर जाएं!

कृशन चंदर के गधे की तुलना मैं पटना-गया रेललाइन के यात्रियों से कर सकता हूँ। बचपन की स्मृति है कि जब कोई सज्जन अखबार लिए रेल डिब्बे में दाखिल होते तो एक साथ कई-कई लोग उसे झपट लेने को आतुर रहते। बेचारे का एक-एक पेज पूरी बोगी में फैल जाता। अखबार मालिक को छोड़ सबको पता होता कि कौन-सा पृष्ठ किसके पास है। वे आपस में पृष्ठों की अदला-बदली करते रहते और कभी-कभी तो अखबार मालिक को उसके बगैर ही अपने गंतव्य पर गाड़ी छोड़ देना होता। मैं कभी अखबार लेकर तो ट्रेन में नहीं चढ़ा लेकिन कंधे से लटकता कपड़े का एक झोला अवश्य होता जिसमें मार्क्सवादी साहित्य की दो-तीन किताबें होतीं और 'हंस-मेनस्ट्रीम' जैसी पत्रिकाएं। झोले से जैसे ही किताबें निकलतीं कि लोग अपने हाथ में लेने और उलट-पलट करने को बेचैन हो जाते। कभी-कभी ट्रेन में इतनी भीड़ होती कि बैठने भर की जगह न होती तो किताबें क्या निकलतीं। झोले में पड़ी-पड़ी ज्ञान का ताप फैलाती रहती। काफी बाद तक झोले की आदत बनी रही। पत्नी कभी टोकती भी कि जब पढ़ने का अवसर नहीं मिलता तो किताबें क्यों टांगे चलते हैं? मैं बेलज्ज सा जवाब देता-'इन कंधों को भार ढोने की आदत हो गई है। इससे संस्कार और संतुलन दोनों कायम रहता है!'

पुस्तकों में हमारे पुरखों के अनुभव कैद हैं। किसी राष्ट्र अथवा संस्कृति की स्मृति के दस्तावेज हैं। पारंपरिक भारतीय समाज में इसीलिए बड़े-बुजुर्गों का आदर/सम्मान होता था कि वे अनुभव के खजाने हैं। पूर्ववैदिक समाज में 'सभा', 'समिति' जैसी संस्थाओं का उल्लेख है जिनमें बुजुर्गो की खास भागीदारी पर ध्यान दिया जाता था लेकिन अफसोस कि आज हमारे परिवार की अवधारणा से बुजुर्ग गायब हैं। जो थोड़े बच भी गये हैं उनको हमने वृद्धाश्रम की राह दिखा दी है और एक नये बुजुर्ग 'गूगल बाबा' को ले आया है। गौर करें तो किताबों का संकट और बुजुर्गों का संकट साथ-साथ आया है। हमें मानवी बुद्धि नहीं कृत्रिम बुद्धि की दरकार हो चली है और सबसे बड़ी 'व्यावसायिक बुद्धि' है। मान लिया गया है कि पढ़े-लिखे लोगों में व्यावसायिक बुद्धि नहीं होती। उन्हें 'किताबी' कहकर उपेक्षित किया जाता रहा है। याद आता है कि अदम गोंडवी भी अपनी गजल में एक जगह 'किताबी' शब्द का प्रयोग करते हैं। कहते है-तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है मगर ये दावा किताबी है। (स्मृति के आधार पर) कबीर तो पहले ही 'कागद लेखी' की जगह 'आँखिन देखी' को स्थापित कर चुके हैं। अब कबीर को भला कौन कहता कि कागद लेखी भी कभी आँखिन देखी रहा होगा। अकारण नहीं है कि वेद के ऋषियों को मंत्रों का 'रचयिता' नहीं 'द्रष्टा' कहा गया है!

एक तुलसी बाबा भी हैं जो स्कूल मास्टर की तरह डपटकर हिदायत दे गये हैं-शास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। बड़े भाई बताते हैं कि पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के एक प्रोफेसर थे। दीनानाथ वर्मा नाम था। उनका सूत्रवाक्य था-पांच किताब पढ़ने से बेहतर है एक किताब पांच बार पढ़ना। किताब पढ़ना भी कला है। सब इस कला का निष्णात हो सम्भव नहीं। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों की बात कुछ और है! किताब को पढ़ना समय को पढ़ना है जिस समय में वह किताब लिखी गई। हर समय के अपने खास शब्द और मुहावरे होते हैं। एक समय के बाद शब्द और मुहावरों के अर्थ बदल जाते हैं। इन बदले हुए अर्थ के साथ पुराने समय को पढ़ना जोखिम भरा और अनर्थकारी हो सकता है। संस्कृत की एक कहानी से इस बात को बेहतर समझा जा सकता है। कहानी है कि शास्त्र पढ़े हुए चार स्नातक ब्राह्मणकुमार थे। वे 'शास्त्रजीवी' थे मतलब शास्त्रोक्त काम ही करते थे। रोजगार के सिलसिले में वे गांव से बाहर निकले। शास्त्र साथ लेते गये। मेरे बाबा कहा करते थे कि 'तीर न कमान तो ...के पैठान'! खाली जगह में आप उपयुक्त शब्द रख छोड़ें, बाबा का कहा मैं नहीं लिख सकता। ब्राह्मणकुमार जैसे ही घर से निकले कि एक चौराहा मिला। जब शास्त्र उपस्थित हो तो भला किसी से क्यों पूछना कि किस राह जाना चाहिए? शास्त्र ने रास्ता दिखाया-महाजनो येन गताः स पन्थाः! दुर्योग कहिए कि उसी समय एक अर्थी ले जायी जा रही थी। स्नातकों ने समझा महाजन यानी ढेर सारे लोग। अनुगमन का मार्ग अपनाया। अब वे श्मशान में थे। साक्षात विपत्ति। अब क्या करें? पुनः शास्त्र खोला-विपत्ति में जो साथ खड़ा हो वही भाई है। तब सामूहिक रुदन का दौर था। गधे के गले लग रोने के क्रम में भाई ने दुलत्ती झाड़ दी। परिणाम की भयंकरता का आप खुद अनुमान कर लें। आगे बढ़े कि रात घिर आई। गाँव के मुखिया जी के घर ठहरे थे। खाने में मीठी सेवई मिली लेकिन शास्त्र में लिखा 'दीर्घसूत्री विनश्यन्ति' मिल गया। विनाश के भय से कुमारों ने कुछ न खाया। आगे की यात्रा शुरू। नदी गहरी मिली। एक को तैरना न आता था। डूबने-उतराने लगा। शास्त्र ने कहा, 'सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धत्यजति स: पंडित:'। पण्डितों ने डूबते शरीर का सिर बचा लिया। पूरे का मोह क्यों करता भला! गाँव लौटे तो तीन शरीर और एक सिर साथ था। उन कुमारों के साथ क्या सलूक हुआ होगा यह अब पूछना अनावश्यक है। इसलिए तुलसी बाबा का कहा मानिए और किताब को पढ़ने का सही तरीका अमल में लाइए! पाठ और पाठ....पुनर्पाठ!

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