Thursday, September 16, 2010

हिन्दी उपन्यासों के नायक किताबें क्यों नहीं पढ़ते ?

सुरेन्द्र स्निग्ध

विडंबना कहिए कि हिन्दी पाठक के हाथों में किताब देर से पहुंचती है, समीक्षा पहले। ऐसे में पाठक बेचारा आग्रह से मुक्त होकर रचना का आस्वाद लेने से वंचित रह जाता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ। सुरेन्द्र स्निग्ध का उपन्यास ‘छाड़न’ प्रशंसा से उद्बुद्ध माहौल में हाथ लगा। कई ख्यात हस्तियां तारीफ के पुल बांध चुकी थीं। मित्रों में पंकज कुमार चौधरी ने इस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्ररित किया। उनका ख्याल था कि रेणु के ‘मैला आंचल’ के बाद यह अपने तरह का पहला उपन्यास है। पूर्णिया जिला इसकी पृष्ठभूमि है और उसका सामाजिक विन्यास इसका कथा विन्यास है। किंतु मैं स्पष्ट शब्दों में कहूं कि ‘छाड़न’ पढ़कर मुझे वैसा कुछ भी नहीं दिखा जैसा साहित्य के ‘महारथियों’ को दिखा। वैसे भी, मुझे तो ‘दृष्टि-दोष’ की शिकायत है!

समीक्ष्य पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे दिमाग में पहला सवाल यही उठा कि क्या यह उपन्यास ही है ? उपन्यास का उद्भव पूंजीवादी समाज की निरंतर बढ़ रही जटिलताओं को चित्रित करने हेतु ही हुआ था। इसलिए एक उपन्यास में समाज के ब्यौरे भरे होते हैं और भाषा चित्रात्मक होती है। चित्रात्मकता भाषा के आलंकारिक मात्र होने से संभव नहीं होती बल्कि इसमें जीवन-स्थितियों के चित्र होने चाहिए। कोई भी समाज कई स्तरों पर विभाजित होता है। आप कह ले सकते हैं कि एक समाज में कई-कई समाज होते हैं और यह समाज विकास की मुख्यधारा को निदेशित करते हुए अपने अंतर्विरोधों को भी प्रकट करता है।

टी. एस. एलिएट के शब्दों के सहारे कहा जा सकता है कि एक नया रचनाकार पुरानी व्यवस्था में परिवर्तन लाता है-कुछ जोड़ता है या घटाता है। व्यवस्था में अपनी जगह बनाने के लिए एक रचनाकार की न्यूनतम शर्त है यह। ठीक इसी प्रकार की स्थिति का सामना रचना को भी करना पड़ता है। रचना को अपनी परंपरा से बहस करनी होती है। बहस की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान रचना अपना ‘अन्वेषित ज्ञान’ स्थापित करने की कोशिश करती है। रचना का यह अपना ‘अन्वेषित ज्ञान’ ही है जो पाठक को पुरानी दुनिया से एक नई दुनिया में लाती है। और इसीलिए एक रचना की पहली और अंतिम कसौटी भी यही है कि उसे पढ़कर पाठक बदला हुआ महसूस कर रहा है अथवा नहीं। यह बदलाव कोई जरूरी नहीं कि ज्ञान या सूचना के स्तर पर ही हो बल्कि यह हमारी संवेदना को भी बदल सकता है। एक पाठक के नाते मैं ऐसा कह सकने की स्थिति में नहीं हूं कि उक्त रचना मुझे बदल सकी है। पाठक का कायांतरण हुए बगैर रचना अपने उद्येश्यों की पूर्ति नहीं कर सकती। हालांकि विज्ञजन कहेंगे कि कभी-कभी बातों को दोहराने का भी अपना एक खास महत्व है। फिलहाल इस बात से असहमत होने का कोई लाभ नहीं दिखता।

विचार को रचना के भीतर से झांकना चाहिए। परंतु इसका निर्वाह कठिन है। सुरेन्द्र स्निग्ध का लेखक जब असमर्थ होता है तो एक राजनीतिक विश्लेषक की भाषा का प्रयोग करता है। नमूने के तौर पर आप देख सकते हैं, ‘सिक्का बदल गया था। धरमपुर के सारे जमींदार, जो अंग्रेजों की दलाली करते थे, अब कांग्रेस पार्टी के नेता हो गये थे। लंकाशायर के बने हुए कपड़ों की जगह इनलोगों ने खादी वस्त्र धारण कर लिया और अपने सिरों पर गांधी की दुपल्ली टोपियां पहन लीं’ (पृष्ठ 106)। पूरी किताब लेखक की ऐसी भाषा से आक्रांत है। एक उपन्यासकार को उपन्यास और रिपोर्ट की भाषा का अंतर बरकरार रखना चाहिए। एकाध जगह तो वे भाषा के व्यूह में ऐसे फंस जाते हैं कि अपना उद्येश्य तक को अभिव्यक्त कर पाने में अक्षम साबित होते हैं। वे लिखते हैं, ‘नछत्तर मालाकार जिस तरह धमदाहा और भवानीपुर के इलाके के अन्याय के खिलाफ एक नायक के रूप में विख्यात हो चुके थे, उसी तरह सोहन शर्मा ढोलबज्जा, लौआलगाम और रूपौली के दक्षिण-पश्चिम के इलाके के लोगों के बीच एक ऐसे नायक के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे जिसकी लड़ाई नछत्तर मालाकार की लड़ाई से सर्वथा अलग किस्म की थी’ (पृष्ठ 92)। एकाध जगह तो ‘मजदूरिन औरतें’ (पृष्ठ 100) जैसे शब्द का गलत प्रयोग भी है। संभव है कविता में आपको इस तरह की छूट मिल जाये लेकिन गद्य की प्रकृति ऐसा करने से भरसक रोकेगी। और हिन्दी का एक अध्यापक तो इसे माफ करने से रहा!  

सुरेन्द्र स्निग्ध, नक्षत्र मालाकार और सोहन शर्मा के अंतर को स्पष्ट करते कहते हैं, ‘एक अंग्रेजी सत्ता से टकरा रहा था, दूसरा टकरा रहा था अंगरेजों के खैरख्वाह स्थानीय जमींदारों से’ (पृष्ठ 104)। सोहन शर्मा की खुद की बातों पर विश्वास करें तो लेखक की टिप्पणी पर सहज ही अविश्वास होगा-‘जब भी कोई एक भूमिहार हमारे हाथों मारा जाता है, लगता है हम एक जग्गन सिंह को मार रहे हैं। हमने कसम खायी है कि इस इलाके के एक-एक भूमिहार को मार देंगे। हम अपनी आजादी अपने ही ढंग से प्राप्त करेंगे’ (पृष्ठ 92)। 

सामाजिक विद्रूपता को चित्रित करने के लिए लेखक ने यौन शोषण और बलात्कार जैसी घटनाओं को अत्यंत सरलीकृत ढंग से पेश किया है। प्रकाशन जगत की ऐसी कोई मजबूरी रही हो शायद! अपनी संपूर्ण प्रक्रिया में यौन शोषण की घटनाएं अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक लगती हैं। ऐसी घटनाओं को चित्रित करती भाषा लेखक की यौन कुंठा को उजागर करती है-‘अचानक सिवसिंह ने गितिया की दोनों टांगों को और फैला दिया था और अपनी पूरी ताकत के साथ अपने को झोंक दिया था गितिया के अक्षत अंगों में।’ कहीं-कहीं आवेश में लेखक सुध-बुध खो बैठता है और अवैज्ञानिक बातें गढ़ लेता है-‘जिस दिन से सिवसिंह ने गितिया के कुंवारेपन को भंग किया था उसी दिन से गुमसुम पड़ी रहती गितिया। अब हर रात शिवसिंह बेखटके दोनों के साथ संभोग करता था।’ ऐसा नहीं माना जा सकता कि शिवसिंह की उम्र का लेखक को अंदाजा न हो। बल्कि यह अतृप्त यौन लालसा ही है जो लेखक के सिर चढ़कर बोलती है।

यह उपन्यास बिहार में कम्युनिस्ट आंदोलन में आए विचलनों की भी चर्चा करता करता है लेकिन बहुत ही हड़बड़ी में। लेखक आनन-फानन में कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर व्याप्त भ्रयटाचार को दिखाकर अपनी छुट्टी ले लेता है। इन आंदोलनों में लोगों ने जो कुर्बानियां दी हैं, लेखक को शायद पता नहीं। या फिर ये तथ्य लेखक के पूर्व नियोजित फैसले को बाधित कर सकते थे। इतिहास बोध के बगैर इतिहास को छेड़ना खतरनाक हो सकता है। कहना होगा कि इस उपन्यास में कई तरह के राजनीतिक  आंदोलनों का चित्रण-विश्लेषण है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से किसी भी आंदोलन का नायक किताबें अथवा पत्रिकाएं पढ़ता नहीं दिखता। मेरी एक पुरानी जिज्ञासा है कि हिन्दी उपन्यासों के नायक किताबें क्यों नहीं पढ़ते ? 

Tuesday, September 7, 2010

सीढ़ियां तलाशता कवि

संजय कुंदन

छुटपन में जब गांव में था तो अग्रज मित्रों से सुना करता था कि भूत-प्रेत आदि का डर लगे तो ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना चाहिए। मेरा मन कभी इसे मानने को तैयार न होता और सहज ही हंसी फूट पड़ती। बालमन को तब यह कहां पता था कि कुछ ‘बुद्धिमान’ लोग भी इसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुके हैं और रह-रहकर कविता की शक्ल में पुनर्सृजन करेंगे। संजय कुंदन का काव्य-संग्रह ‘चुप्पी का शोर’ पढ़ते हुए लग रहा है, मानो बगल में बैठा मित्र बचपन का वही रटा-रटाया चालीसा बक रहा हो।

चुप्पी वैसे कई बार महत्वपूर्ण और अर्थवान होती है। बेढंगा बोलेंगे तो बेवजह शोर पैदा करेंगे आप! फिर भारतीय दर्शन में मौन की बड़ी महिमा है। बहुतेरे मौनी लोग अपनी ‘आत्मा’ तक के साथ ‘संवाद’ स्थापित कर लेते हैं। नामवर सिंह की ऊंचाई अगर मुझे मिली होती तो झट इसे ‘आत्मालोचना’ घोषित कर डालता। अर्थात् आत्मा के साथ चलनेवाला अंतहीन संवाद आत्मालोचना है। अलबत्ता, संवाद के बहाने अगर ‘संभावना’ और ‘समझौते’ के सूत्र तलाशे जा रहे हों तो चुप्पी ही भली!

धूमिल के यहां जाना था कि मोची के लिए प्रत्येक आदमी एक जोडा जूता है। मोची और जूते का बिंब फिर भी हमें श्रम की दुनिया से बाहर निकलने नहीं देता। ऐसा इसलिए भी संभव हुआ कि धूमिल ग्रामीण परिवेश से गहरे जुड़े थे। ‘दिल्ली’ की राह न पकड़ी थी, जहां कवि के अनुसार, आदमी ‘जूते’ न रहकर ‘सीढ़ियों’ में तब्दील हो चुका है, और प्रत्येक आदमी को अपने-अपने तरीके से सीढ़ियों की तलाश है। मेरे इस विश्वास के लिए कि कवि शायद इसमें शामिल न हो, कोई आधार नहीं मिलता। कवि ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी खुद ही मारी है।

सीढ़ियां चढ़ना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि सीढ़ियां भी तो कोई साधारण नहीं हैं! बिल्कुल सर्कस की सीढ़ियां हैं, जिस पर कुशल नट ही चढ़ सकता है। ऊंचा चढ़ने के लिए अपना ‘वजन’ कम करना होता है, गुरुत्व-बल की दिशा ठीक करनी होती है। ‘दिमाग’ का साथ छोड़ना होता है। जरूरत पड़ने पर स्मृतियों तक से पीछा छुड़ाना पड़ सकता है। किंतु भारत की सामाजिक संरचना ही कुछ ऐसी है कि ‘द्विज’ अथवा ‘ब्राह्मण’ होने की बात दिमाग के किसी-न-किसी कोने में रह ही जाती है। कवि का यह अपराध क्षम्य है, क्योंकि ब्राह्मणत्व का भूत उसे सिर्फ बहन की शादी के समय सताता है। फिर धूत कहौं, अवधूत कहौ का मंत्रोच्चार करनेवाले तुलसी का मन जब इसके पार नहीं जा सका तो अपनी पीढ़ी के कवि से ऐसी अपेक्षा रखना ‘सामाजिक न्याय’ के सिद्धांत के विरुद्ध है।

कवि ने अपने समय की एक भयावह किंतु कल्पित तस्वीर प्रस्तुत की है। यह भयावहता सिर्फ चेतना के स्तर पर है और इसीलिए इसकी संरचना में एक अद्भुत कृत्रिमता है। कवि के अनुसार,
‘अब शहर में
सबसे सुरक्षित थे हत्यारे
इसलिए लोग चाहते थे हत्यारों की तरह दिखें
पर जब किसी को मार न पाया तो सोचा सबसे आसान है
अपने-आपको मार डालना
और उसने ऐसा ही किया
सुरक्षित होने के लिए।’ 

ऐसी कौन-सी हत्यारी संस्कृति है जिसमें हत्यारा किसी की हत्या करने की बजाय आत्महत्या पर उतर आता है ? क्या यही है आलोक धन्वा की ‘कुलीन हिंसा’ ? दरअसल यह मध्यवर्ग की असुरक्षा की चेतना है जिससे कवि कई तरह की मानसिक दुर्बलताओं का शिकार होता है। वह अपने पात्र इसी वर्ग से उठाता है। टी.वी. पर हत्या की खबरों को देख-सुनकर खुद के मारे जाने की कल्पना कर लेता है और विलाप करती हुई स्त्री पत्नी लगती है। जिसे रात की नींद के लिए शराब और दवा की जरूरत है। जरा गौर करें-

‘टीवी पर समाचार देखते हुए
उसने ड्रिंक्स बनाकर पी
फिर गहरी नींद में सो गया।’

संजय  कुंदन का भय समय और समाज से कटे हुए आदमी का भय है और उसका दुख एक अकेले आदमी का असहाय प्रलाप है। मध्यवर्गीय कवि प्रतिपक्ष रचना नहीं चाहता, व्यवस्था के विरुद्ध वह नहीं जा सकता क्योंकि ऐसा करने से पहचान का संकट पैदा हो सकता है। कवि की पंक्तियां हैं-

‘वह घबराया
उसे पहली बार अहसास हुआ
कि उसकी आवाज अनसुनी भी की जा सकती है
उसे पहचानने से इंकार किया जा सकता है।’

यह जवाब है कवि केदारनाथ सिंह के उस सवाल का-‘वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा ?’ संजय कुंदन को डर है कि अगर कहीं उसे अपना होना प्रमाणित करना पड़ा तो सिर्फ उसका ईश्वर ही उसके पक्ष में बयान दे सकता है, क्योंकि  महानगरों की सोसायटी महज एक अपार्टमेंट की आबादी के बूते बनती है। उस अकेले अपार्टमेंट के लोगों का आपसी सरोकार भी किस स्तर का होता है, कवि उससे अनजान नहीं है। इसी संग्रह की एक कविता है-‘पड़ोसी’, जो व्यक्तिकेंद्रित जीवन जी रहे लोगों की त्रासदी बयान करती है।

ठीक ऊपर की मंजिल पर रह रहे व्यक्ति का कवि के साथ कोई सीधा संवाद स्थापित नहीं होता या कहें कि कवि की अपनी जो विशिष्टता है, वह उसे लोगों से हिलने-मिलने, मिलने-जुलने से रोक देती है;
‘कोई बेचैन चक्कर लगा रहा है कमरे में
उसकी बेचैनी एक दीवार से छन-छन कर
आ रही मुझतक
बस एक मंजिल ऊपर चल रहा
अलग तरह से जीवन
जिसकी आहट दखल देती रहती
मेरे जीवन में भी।’

पड़ोसी का कवि के जीवन में दखल महज इतना भर है कि देर रात तक जब कवि सो नहीं पाता, तो नल चलने की तेज आवाज सुनायी पड़ती है या फिर कुकर की तेज सीटी। कभी तेज पुरुष-स्वर तो कभी एक स्त्री की सिसकी। कवि को लगता है जैसे-
‘यहां इस फ्लैट की हर कोठरी में
एक न एक आदमी झेल रहा है
किसी न किसी तरह की यातना।’

यह अकेले पड़ चुके आदमी की यातना है। यह पीड़ा की अभिव्यक्ति भी नहीं, क्योंकि पीड़ा की सच्ची अभिव्यक्ति पीड़ा से मुक्ति के लिए प्रयास में है। केवल तभी पीड़ा साहित्यिक मूल्य बन पाती है।

प्रकाशन: प्रभात खबर, दिल्ली, 19 मार्च, 2005.

Tuesday, August 31, 2010

कविता के अंत के विरुद्ध लड़ती कविताएं

गोरख पाण्डेय
हाल की कुछ चुनिंदा साहित्यिक पत्रिकाओं में ‘पहल’ की भूमिका उल्लेखनीय रही है। इसने गंभीर साहित्य से जुड़े लोगों को छापने में अपनी दिलचस्पी का लगातार प्रदर्शन किया है। कहना न होगा कि कुमार विकल, आलोक धन्वा, गोरख पाण्डे एवं वीरेन डंगवाल की कविताओं को बार-बार छापकर इसने स्वस्थ साहित्य की परंपरा को और मजबूत ही किया है। इन सार्थक कविताओं के अलावे समय-समय पर आलोचना की गंभीर पुस्तिकाएं भी प्रकाशित होती रही हैं। ‘कविता का तीसरा संसार’ पुस्तिका पहल की इसी ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करती है। इस पुस्तिका के लेखक, सियाराम शर्मा हिन्दी साहित्य के, विशेषकर समकालीन कविता के एक अत्यंत गंभीर पाठक हैं।

शर्मा जी ने इन कविताओं को चुनकर न सिर्फ अपनी ईमानदारी और वैचारिक भावधारा को स्पष्ट किया है, बल्कि साहित्य की असली समस्या के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी प्रदर्शित किया है। निस्संदेह, शर्मा जी की भावधारा वही है जो तीसरे संसार की कविताएं लिखते इन कवियों की है। भेड़ों की गंध से भरा गड़रियों जैसा है इनका चेहरा। अपने चेहरे की पहचान और गंध को सूंघकर परिवेश को जानने की अद्भुत क्षमता है उनमें।

बहुतों के लिए ‘आज की कविता आधुनिक विकासवादी और क्रांतिकारी दोनों तरह के यूटोपिया के अंत की कविता है।’ (कविता का अंत)। अपनी इस स्थापना के आधार पर हिन्दी समालोचना में तकनीकी शब्दावली के ज्ञान को समृद्ध करनेवाले युवा आलोचक सुधीश पचौरी लगभग ‘हल्ला बोल’ के अंदाज में लिखते हैं, जो लोग समकालीन कविता में अर्थ खोजते हैं, वे दरअसल उस सपने को खोजते हैं, जो कविता रचे जाने से पहले ही खत्म हो चुका होता है।’ आगे की पंक्ति इससे भी अधिक ज्ञान का आतंक पैदा करती है, जब वे कहते हैं, ‘सपने के अंत के बाद जो दुनिया बचती है, कविता उसी बची हुई दुनिया की संरचना का नाम है।’

मेरी जगह अगर उदय प्रकाश होते तो कहते, कुछ नहीं बोलने, कुछ नहीं सोचने अथवा किसी सपने के न होने के बाद आदमी मर जाता है। सपने की अनुपस्थिति में आदमी लाश की तरह है। सुधीश पचौरी के दुर्बल कंधों पर इसी लाश का बोझ है, जिससे वह वैराग्य की तरफ मुड़ना चाहता है। लाश को ढोता मनुष्य सांसारिक बहुत कम रह जाता है, अचानक मृतकों की दुनिया में चला जाता है। ऐसी स्थिति में ‘जीवित’ मनुष्यों की दुनिया के बारे में अगर वह सोचना बंद कर देता है तो इसमें आश्चर्य कैसा?

सियाराम शर्मा की पुस्तक ‘कविता का तीसरा संसार’ सपने के अंत के विरुद्ध लड़ती और सपने बुनती कविताओं के उत्स को जानने और उद्घाटित करने की बेचैनी का नमूना मात्र है। समकालीन कविता, हमें कह लेने दीजिए, कविता के अंत के अमानुषिक नारे के विरुद्ध लड़ती कविता है, जिसकी सबसे मुखर आवाज पिछले दो दशक में कुमार विकल, आलोक धन्वा, गोरख पाण्डे और वीरेन डंगवाल की कविताओं से ध्वनित हुई है। शर्मा जी कुमार विकल के बारे में लिखते हैं, ‘मुक्तिबोध के बाद हिन्दी के सर्वाधिक बेचैन कवि हैं। उनकी हर कविता अंधेरे और उजाले की एक मुकम्मल (इस शब्द पर जोर मेरा है) दुनिया है।’ हिन्दी साहित्य का कोई भी सुधी पाठक सुधीश पचौरी साहब से पूछ ले सकता है कि सपने के अंत के बाद भी क्या कोई ‘मुकम्मल’ दुनिया बची रह सकती है ? अपनी विद्वता को थोपने से बेहतर होगा कि मैं कुमार विकल की ही एक कविता की कुछ पंक्तियों का नमूना यहां रखूं-‘

तुम्हारी कविता में सिर्फ एक बुलबुल है
मेरी कविता के आंगन में कई पेड़ हैं
जिनमें सैकड़ों चिड़ियां
दूर दराज से आकर अपने घोंसले बनाती हैं
चोंच दर चोंच/अनुभव का चुग्गा
मेरी कविताओं को खिलाती हैं।’ (रंग खतरे में है, पृष्ठ 63)। 

इसका बेहतर जवाब तो सुधीश पचौरी ही दे सकते हैं कि ये कविताएं सपने के अंत की कविताएं हैं अथवा किसी ‘मुकम्मल’ दुनिया की जो आंख और ईमानवालों के लिए अब भी काफी बची हुई है। अगर इतने पर भी भरोसा न होता हो तो आगे की पंक्ति को थोड़ा गौर से देख लें जो वैसे लोगों को सीधे-सीधे ललकारती हैं, जिनके लिए कविता और शब्द की अर्थवत्ता खो गई है। वे कहते हैं, 

‘मुझे शब्दों की हिफाजत
अपने तरीके से करनी है और पहली लड़ाई
उस आदमी के खिलाफ लड़नी है
जो शब्दों की अर्थवत्ता को तोड़ता है
और दूसरी उसके विरुद्ध
जो शब्दों की अर्थवत्ता को छोड़ता है।’ (एक छोटी सी लड़ाई, पृष्ठ 62)।  

शर्मा जी इन शब्दों की अर्थवत्ता से परिचित हैं और उनसे सावधान करते हैं, जो इन शब्दों की अर्थवत्ता को तोड़ने और छोड़ने की साम्राज्यवादी साजिशें रचता दिखता है। ऐसे भयानक दौर में इस छोटी-सी पुस्तक की यही सार्थकता है कि वह हमें किसी आसन्न खतरे से सावधान कर दे।

हिन्दी आलोचना जगत के छोटे आचार्य नंदकिशोर नवल ने ‘आलोचना’ में गोरख पाण्डेय के गीतों पर विचार करते हुए एक बार लिखा था, गोरख पाण्डेय लोकगीतों की सरणि पर गीत रचते हैं,पर उनके गीतों में न लोकगीतों की मस्ती होती है, न ताजगी, उनमें एक जुगुप्सोत्पादक बनावटीपन होता है।’ संभव है, आचार्यों को यह बनावटी और जुगुप्सोत्पादक लगे किन्तु औरों के लिए सच्चाई यह है कि गोरख पाण्डेय के गीत हिन्दी प्रदेश में फैले करोड़ों मूक लोगों की सांस है, जिसके बजने मात्र से जीवन और मृत्यु का भेद खड़ा होता है। असली गीतकार तो कुछ दिनों पहले तक नंदकिशोर नवल के हृदय में फंसा था जिसे सारी मर्यादा लांघकर अततः हमारे सामने उपस्थित कर ही दिया। ‘बनावटीपन’ और ‘कृत्रिमता’ आचार्य के दो अत्यंत ही प्रिय शब्द हैं-जिनका प्रयोग वे बार-बार करते हैं। खासकर वैसे मौकों पर जब उनके सारे हथियार विरोधियों के सामने एक-एक कर चूक जाते हैं। आलोक धन्वा की कविता ‘जनता का आदमी’ और ‘गोली दागो पोस्टर’ की ‘चुस्त भाषा’ और ‘चुस्त बिंब’ (दोनों ही शब्द नवल जी के हैं) भी उनको कृत्रिम ही लगी थी। यह शब्द उनके व्यक्तित्व में इस कदर शामिल हो गया है कि उसकी कैद से वे बाहर निकल ही नहीं पाते।

समकालीन हिन्दी कविता के संसार में आलोक धन्वा एक अत्यंत ही विशिष्ट नाम है। उनकी यह विशिष्टता कई कारणों से है। हिन्दी कविता के क्षेत्र में शायद वे अकेले कवि हैं, जो महज इतनी, चंद कविताओं के आधार पर चर्चित रहे हों। दूसरे, इन पर लिखनेवाले आलोचकों की संख्या भी महज एक-दो ही है-वे भी हिन्दी के आचार्य आलोचकों की तरह बहुत नामवर भी नहीं हैं-फिर भी इनकी ख्याति लगभग सर्वाधिक है। आलोक धन्वा का असली आलोचक तो संपूर्ण हिन्दी प्रदेश में फैला पाठक वर्ग है, जो कई मायनों में आचार्य आलोचकों से ज्यादा विवेकवान है।

आलोक धन्वा की कविताएं शुरू ही होती हैं जिरह से। यह जिरह व्यवस्था से होती है, उसके नौकरशाहों से, सामंतों और गिरहकटों से। यह बड़े-से-बड़े अभियुक्त को थका देनेवाली किसी बड़े वकील की जिरह है जो अपने पक्ष में एक से बड़ा एक तर्क प्रस्तुत कर सबको हैरान कर देता है। जब-जब पूंजीवाद पर संकट गहराता है, फासीवादी ताकतों का जन्म होता है जो सीधे कहती है-बहस नहीं, हमें कबूल करो। आलोक धन्वा की कविता लगभग हर वैसी जगह पर एक अंतहीन जिरह और बहस की शुरुआत है। इस तरह आलोक धन्वा की कविताएं हमें जिरह करनेवाली कौम की संतान होने का सबब सिखाती हैं। शर्मा जी ने सुविधाभोगियों की दुनिया में इन कवियों को चुनकर अपनी परंपरा की पहचान की है और उसकी आग को तेज किया है।

पूरी किताब पढ़ते हुए कई ऐसे बिन्दु उभरते हैं जिनसे असहमत होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। खासकर आलोक धन्वा के मूल्यांकन में, ऐसा लगता है, शर्मा जी ने विशेष रागात्मकता से काम लिया है। सियाराम  शर्मा की नजरों में आलोक धन्वा, मुक्तिबोध की परंपरा के सच्चे वाहक हैं। परंपरा एवं विरासत जैसी जटिल चीजों को परिभाषित एवं चिह्नित करते वक्तहमें थोड़ा सतर्क और सावधान होना चाहिए क्योकि जिसे हम अपनी परंपरा में शामिल कर रहे हैं, बहुत संभव है, एक दिन कहीं विरोधियों के जुलूस में नारे लगाता न दिख जाये। मुक्तिबोध और आलोक धन्वा में एक बुनियादी फर्क है, जिसे हमें स्पष्टता के साथ समझ लेना चाहिए। मुक्तिबोध ने पेशेवर बुद्धिजीवियों की तरह दूर से खड़े होकर महज तमाशा नहीं देखा है, बल्कि जनता की भागदौड़ में, उसके आंदोलनों में अपना कंधा भी लगाया है। उसकी आवाज को अपनी प्रचंड वाणी से द्विगुणित किया है। मुक्तिबोध लिखते हैं, 

‘चेतना में हम विचारों की
गुंथे तुमसे
बिंधे तुमसे
व परस्पर आवेष्टित हो गये।’
(रचनावली, पृष्ठ 27)। 

बिल्कुल ‘सहचर’ हैं मुक्तिबोध जैसे किसी की अपनी ही छाया हो, जो छोड़ती नहीं कभी हमारा साथ, नष्ट होने की अंतिम घड़ी तक।

आलोक धन्वा का मिजाज कुछ दूसरा है। किसी आंदोलन का लड़ा हुआ सिपाही नहीं है वह। उन्होंने तो सिर्फ उसकी ‘समझ’ हासिल की है, उसका रहस्य जाना है, कड़वा स्वाद नहीं चखा है। आप तरस खाइए कि उनकी समझ भी ‘फर्स्टहैंड’ नहीं है, बल्कि किसानों-मजदूरों के संज्ञान से वह चुरायी हुई है, जिसका उन्हें भारी ‘गुमान’ है। 

‘यह कविता नहीं है
गोली दागने की समझ है जो तमाम कलम चलानेवालों को
हल चलानेवालों से मिल रही है।’ 
(गोली दागो पोस्टर)। 

मुक्तिबोध आंदोलन की समझ हासिल करके ही संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि उसे जीते भी हैं। उसकी सजा भी भुगतते हैं-
‘भागता मैं दम छोड़
घूम गया मैं कई मोड़।’ 

चूंकि आलोक धन्वा ने एक अपरिचित पर्यवेक्षक की तरह आंदोलनों को दूर से देखा है इसलिए उन्हें गोली चलाने की समझ मात्र मिली है, जबकि मुक्तिबोध ऐसी चीज थे जिसे खरीदा नहीं जा सकता था, फलतः सत्ता की गोलियों का निशाना बनना पड़ता था। मुक्तिबोध ने अपने कानों से सुना था-‘मारो गोली दागो स्साले को एकदम।’ आलोक धन्वा में आंदोलनों के साथ वह निजता नहीं, आत्मीयता नहीं क्योंकि वे पेशेवर बुद्धिजीवियों की पांत में शामिल हो चुके हैं। इसीलिए अब मजदूरिनों की हत्या उनकी कविताओं में ‘उत्सव’ की तरह आती है।

जो क्रांतिकारी केवल छद्म होता है, क्रांतिकारी होने का स्वांग रचता है, उसे अपनी ‘पहचान’ की चिंता सबसे ज्यादा सताती है। उसकी पहचान केवल औरों से दर्शायी गई उसकी विशिष्टता है जो सामंती मानसिकता से उत्पन्न भूख को शान्त करती है, उसका अहं तुष्ट करती है। उनकी ‘फर्क’ शीर्षक कविता इसी अहं को तुष्ट करती कविता है। आलोक धन्वा को लगता है, जैसे उनकी मृत्यु के बाद लोग उन्हें भुला देंगे, किसी अनिच्छा की तरह। क्रांतिकारी कवि को अब अपने समानधर्मा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसके साथ मिलकर वे क्रांति और जनवाद के हजारों सपने देखे होंगे! (मौखिक बातचीत में वे इस तथ्य की ओर बार-बार लौटते हैं)। पहचान के खत्म हो जाने के डर से पीड़ित कवि की कुछ पंक्तियां यहां गौर करने लायक हैं-‘

तुम जो अनगिनत बार
मेरी कमीज के ऊपर ऐन दिल के पास
लाल झंडे का बैज लगा चुके हो
तुम भी यकीन मत कर लेना।’

शर्मा जी ने सिर्फ कविताएं पढ़ीं हैं, आलोक धन्वा का जीवन नहीं देखा है। वैसे साहित्य में रचना और रचनाकार को बिल्कुल ही अलहदा करके देखने की प्रवृत्ति पता नहीं कहां से चल निकली है। एक बहुत बड़ा तबका है जो इसे स्वस्थ लेखन के लिए अनुचित मानता है। सियाराम शर्मा का भी कुछ इसी तरह का ख्याल है। मुझे लगता है, सिर्फ कविता के आधार पर, कवि के जीवन के उतार-चढ़ाव को जाने बगैर कविता के ‘गैप’ को समझना मुश्किल है। वैसे यह मेरा दुस्साहस है। शर्मा जी ने मुझसे कई गुना ज्यादा पढ़ा है और चीजों को समझा है। अपनी उम्र के हिसाब से मैं कुछ बड़ी ही बात कर गया। इसलिए गालिब के संदर्भ में पेश की गई विश्वनाथ त्रिपाठी की उक्ति का सहारा लेना चाहूंगा। वे कहते हैं, ‘जो लोग रचना और रचनाकार के जीवन की अंतःसूत्रता को नकारते हैं उन्हें गालिब की कविता और उनके पत्रों को ध्यान से पढ़ना चाहिए। अंतःसूत्रता स्वीकार करनेवालों को तो और ज्यादा।’ (आजकल, दिसंबर 1997)                                                  

प्रकाशन: प्रभात खबर, विकल्प - 3, दिसंबर ’ 97। 

Friday, August 27, 2010

मेरा विरोध ही मनुष्यता मेरी

समकालीन कविता-जगत में लीलाधर मंडलोई एक अनूठा नाम है। यह अनूठापन इनकी भाषा व कहन की शैली की वजह से है। कविता में न तो अन्य बहुतेरे कवियों की तरह ‘अतिक्रांतिकारी वक्तव्य’ हैं, न ज्ञानेन्द्र पति की तरह  चमत्कारपूर्ण कौंध पैदा करनेवाले शब्द ही हैं। इनकी कविताओं में एक सामान्य आदमी का सुख-दुख है, वह भी सामान्य तरीके से व सामान्य तरीके का। छोटी-छोटी खुशियों को पाकर खुश हो लेना और छोटी-छोटी चीजों से आहत हो जाना इस कवि-मन की आम विशेषता है। शायद इसीलिए इस कवि के पास गूलर से लेकर मक्खी तक पर कविताएं हैं। लेकिन चीजों को अपने तरीके से देखने का, अपने रास्ते चलने का एक आत्मविश्वास-भरा प्रयास है।

मंडलोई की कविता में आम आदमी का जीवन है, एक भरा-पूरा समाज है-जिसमें रुच्चा, कत्वारू, सुक्का, लक्ष्मी, भद्दू, अमर कोली, तोड़ल और चोखेलाल हैं। और भी कितने ही नाम हैं। इनकी कविताओं में इतने लोग हैं कि सिर्फ नामों को लेकर एक स्वतंत्र लेख बन सकता है। समकालीन हिंदी कविता की दुनिया में यह एक विरल किंतु सुखद संयोग की तरह है। यहां हर तरह के अन्याय और विषमता का प्रतिकार करती लड़की ‘कस्तूरी’ है। कविता के ‘वर्जित प्रदेश’ में ‘वीर-घोषणाएं’ (महाराजाधिराज परमभट्टारक चक्रवर्ती सम्राट पधार रहे हैंऽऽ...! की शैली में) करते बहुतेरे जन-कवि आए, लेकिन एक ‘अमूर्त भीड़’ के साथ। ‘व्यक्ति’ और ‘व्यक्ति का जीवन’ फिर भी कविता के दायरे से बाहर ही रहा। आलोक धन्वा के यहां ‘ब्रूनो की बेटियां’ तो आ सकीं, अलबत्ता कोई ‘कस्तूरी’ कविता में दर्ज नहीं होने पाई। ‘कस्तूरी’ की अनुपस्थिति (अनुपस्थिति पर मंडलोई की ‘अनुपस्थिति’ शीर्षक से एक बहुत ही शानदार कविता है) शायद आलोक को ‘चेता’ (खबरदार) गई हो कि उनका, (कवि का) जुड़ाव एक ‘दार्शनिक स्तर’ तक ही क्यों महदूद रहा ? मंडलोई इस लिहाज से भी एक विशिष्ट, और इन्हीं अर्थों में बड़े कवि हैं।

अक्सर कहा और सुना जाता रहा है कि मनुष्य केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता। इसके बहाने शायद यह कहा जाता रहा हो कि मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो कला और सौंदर्य का सर्जक और प्रेमी है। बहुत पहले प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘कफन’ में संभवतः यही बताने की कोशिश की थी कि पूंजीवादी समाज ने एक मनुष्य को शत-प्रतिशत मनुष्य नहीं रहने दिया है। धूमिल की कविता में ‘मोची के लिए हर आदमी एक जोडा जूता है।’ मंडलोई का ‘गंवई’ कवि-मन हैरान है-
‘मैं कहता हूं बार-बार कोई नहीं आता
मैं पूछता हूं बार-बार-कोई क्यों नहीं आता ?’(क्यों कोई नहीं आता यहां, काल बांका तिरछा, पृष्ठ 75)।
वैसे कवि को इसका उत्तर पता है ‘कि घर और जीवन अब एक बाजार’ है। (‘बाजार और दादी,’ काल बांका तिरछा, पृष्ठ 83)। इसलिए

‘दरबाजे पर जब कोई आता है तो
कभी यूरेका फोब, कभी वीडियोकॉन
यहां तक कि चाकुओं का सेट लिए कोई सेल्समैन।’ (कोई क्यों नहीं आता यहां, काल बांका तिरछा, पृष्ठ 74)। ध्यान रहे कि ये सारे रिश्ते बाजार द्वारा निर्मित/तय किये हैं। लेकिन मनुष्य के अपने जो ‘नैसर्गिक’ और ‘मानवीय’ रिश्ते हैं, वहां एक अजीब सन्नाटा है, एक बड़ा शून्य।
‘कोई नहीं आता वहां
न बाल्कनी में चिड़िया, न ही धूप
न रसोई में बिल्ली
न पत्नी के मैके से कोई रिश्तेदार।’ (‘कोई क्यों नहीं आता यहां,’ पृष्ठ 74)
नव उदारवादी बाजार का दंश झेलता कवि साफ-साफ देखता है या कि दिखाता है कि पूंजी ने मानवीय संबंधों को कैसी पटकनी दी है और उसकी कब्र पर बाजार ने अपने नये रिश्ते-नाते गढ़े हैं। इन रिश्तों को सिक्कों से खरीदा और बेचा जा सकता है। लेखक-बुद्धिजीवि विलाप की मुद्रा में हैं कि हाय! ‘मुझे खरीद लिया एक चमकते सिक्के ने।’ (‘मैं इतना अपढ़ जितनी सरकार,’ काल बांका तिरछा, पृष्ठ 77)। प्रेमचंद विरले थे जिन्होंने बंबई की ‘मायानगरी’ से छलांग लगा दी थी। ठीक जैसे कोई ‘वध-स्थल’ से छलांग लगाता हो।

इस नव उदारवादी किंतु हिंसक बाजार ने उन तमाम चीजों के लिए, जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने में मदद कर सकती हैं, बहुत ही कम ‘स्पेस’ छोड़ा है। जनतंत्र का चौथा खंभा कहे जानेवाले अखबार में कला-संस्कृति के लिए क्या कोई जगह बाकी बची है ? कुछेक साल पहले जब स्थानीय अखबारों में लेख छपता तो बड़ा खुश होता। अपने अग्रज (अमरेंद्र कुमार) की टिप्पणी बिल्कुल बेकार-सी और कुण्ठा से उपजी लगती। वे अक्सर कहते कि ‘कभी ऐसा  हुआ है कि तुम्हारे लेख के अभाव में अखबार का कोई पेज सादा चला गया हो ? विज्ञापन से जो जगह बच जाती है उसमें वे तुम्हारा लेख छाप देते हैं। इसमें खुश होने की क्या बात है ?’ आज उनकी बात से असहमत होने की इच्छा रखते हुए भी सहमत होने को विवश हूं। हस्तलिखित दो पृष्ठ के मेरे लेख को एक अखबार के उप-संपादक (सौभाग्य या दुर्भाग्य से वे कथा-लेखक हैं ) ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘लेख बहुत बड़ा हो चला है।’ मेरे-आपके लिखे लेख की बात तो रहने ही दीजिए। अखबार का संपादक भी बेचारा बहुत कम ही ‘संपादक’ रह गया है, शायद ‘न से हां भला’ की तर्ज पर। आज हर जगह
‘सम्पादकीय की जगह
हँस रहा है एक बड़ा-सा विज्ञापन।’ (कोई क्यों नहीं आता यहां, पृष्ठ 75)।
याद है कि ‘सहारा समय’ अखबार में सुब्रत बनर्जी के ‘पवित्र-परिवार’ की ‘विज्ञापनी-तस्वीर’ देखकर दिल को कितनी कचोट होती थी। आज संपादकों की ऐसी असहाय स्थिति देख निराला ‘चमरौंधे को तेल में भिंगोने’ की साध भी पूरी न कर पाते !   

सूचना-विस्फोट के इस भयावह समय में आम-जन से जुड़ी घटनाएं खबर नहीं बन पातीं। क्या प्रिंट और क्या दृश्य मीडिया (एक अजीब तालमेल है)-सब जगह ऐसी खबर के विरुद्ध एक ‘अदृश्य-अघोषित’ सेंसर है, एक गजब की ‘सामरिक चुप्पी’ है। कुमार मुकुल को पता है कि
‘खबरों को पाकर
खबरनवीस सन्तुष्ट होता है
उन्हें दबाकर संपादक।’ (सन्तोष ही सुख है!,ग्यारह सितम्बर और अन्य कविताएं, पृष्ठ 18-19)
लीलाधर मंडलोई चूंकि मीडिया के ‘अंदर’ के आदमी हैं, इसलिए उन्हें बेहतर पता है-
‘छुपाता अधिक-से अधिक सच इस हद तक
कि रुदन, कराह, चीखें, अंग-प्रत्यंग, कफन
यहां तक जीवित बचे-खुचे लोगों का आक्रोश
मीडिया की चुस्त नजरों से गायब।’ (‘उन पर न कोई कैमरा’, काल बांका तिरछा, पृष्ठ 79)
और जो दिखाया जाता है वह सच नहीं होता-
‘बस कुछ अवसरपरस्त
एकाएक दृश्य पर काबिज
इधर से उधर नाक पर रूमाल रखे निर्देश पेलते
...हाथ जोड़ अभिवादन से न थकते मन्त्रीगण
सब अपने लिए तय कर ली गई फौरी भूमिका में
जो होना है या कि था से बेपरवाह।’ (उन पर न कोई कैमरा, पृष्ठ 79-80)
मीडिया के लिए खबर एक ‘उत्पाद’ की तरह है, चाहे वह मृत्यु ही की खबर क्यों न हो। बल्कि कहिए कि यहां मौत सबसे ज्यादा बिकती है। मृत्यु से आगे-पीछे की जीवन-स्थितियों के बारे में मीडिया-तंत्र इस कदर एक ‘शालीन चुप्पी’ ओढ़े रहता है जैसे उसका उन चीजों से कोई सरोकार ही न बनता हो।
‘मृत्यु सिर्फ उपभोक्ता खबर है दृश्य में
पहुंचती नहीं उन तक जो कभी भी तोड़ सकते हैं
अपनी आखिरी सांस अटकी जो उम्मीद में कहीं।’ (उन पर न कोई कैमरा, पृष्ठ 80)
नदी में डूबकर या आग लगाकर मरते बच्चे की लाइव तस्वीर वे दिखा सकते हैं, उसे बचाने की कोई ‘नैतिकता’ उनके पास नहीं है।
‘टी. वी. दस्ता मुस्तैद यह दिखाने में कि सबसे बुरा क्या ?
दूर-दूर तक उनकी आंख से मानवीय क्षण गैरहाजिर।’ (‘उन पर न कोई कैमरा,’ पृष्ठ 80)
अलबत्ता, ‘मानवीय’ होने की ‘नैतिकता’ जिसके पास है वह दृश्य से गायब है-
‘उनपर न कोई कैमरा
न किसी अखबार में उनकी तस्वीर
अगर वे कहीं धोखे से रहे भी तो
स्टिल या मूवी कैमरा के एक्सट्रीम लांग शाट में
और जो छपती रहीं क्लोजअप में
वे साफ-सुथरी इतनी मानो किसी आपदा में नहीं
कम्पोज की गई पूरे इत्मीनान से
कि दिखता रहे बनावटी दुःख  भी अधिक यथार्थपूर्ण।’ (उन पर न कोई कैमरा, पृष्ठ 80)

एक अत्यंत सीधा-सादा, ‘गंवई’ बोलनेवाला कवि-मन इन ‘प्रायोजित सक्रियताओं’ में नहीं रमता, इसलिए वह ‘खबर’ का हिस्सा भी नहीं बनता। कभी-कभी तो ‘कुलीनता की हिंसा’ ऐसे व्यक्ति के ‘अस्तित्व’/‘मैं’ तक को लील जाना चाहती है। कभी निराला को ‘बाहर’ करके ‘अंदर’ भर दिया गया था। इतना अधिक कि उनका ‘पीड़ा-बोध’ कभी-कभी ‘व्यर्थता-बोध’ में बदल जाता। ऐसी गहरी पीड़ा। मंडलोई का भी पीड़ा-बोध उतना ही गहरा है किंतु व्यर्थता-बोध की ‘लक्ष्मण-रेखा’ को छूने से बचता-बचाता हुआ। वे कहते हैं,
‘मैं एक छाया दिल्ली की सड़कों पर पागल
मेरा ‘मैं’ तक अनुपस्थ्ति कि मारा गया
जो उपस्थित बहुत हर जगह और जुगाड़ से
विरोध में रहा मैं उनके और इस तरह बाहर।’ (‘अनुपस्थिति’, काल बांका तिरछा, पृष्ठ 70)
इसलिए भी शायद कि ‘मेरा विरोध ही मनुष्यता मेरी।’ (‘मैं इतना अपढ़ जितनी सरकार,’ पृष्ठ 78)

पुनश्चः लीलाधर मंडलोई की कविता पढ़ते हुए मुझे राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह के गद्य की बरबस याद आती रही। संभव है, यह महज संयोग हो। 
                                             

Monday, August 23, 2010

आलोचना का विमर्श

महाकवि निराला पर डा. रेवतीरमण की पुस्तक काव्य विमर्श: निराला पढ़मे हुए मुझे कुछ अजीब-सा अहसास हुआ और एक बार फिर मेरी धारणा पुष्ट होती दिखी कि कुछ वैसे लोग होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। कुछ लोग अपने जीवनकाल में ही मिथक का रूप धारण कर लेते हैं। निराला का दौर भारत के इतिहास का कुछ वैसा ही कालखंड रहा जब हमारे नायक यथार्थ की जमीन छोड़ मिथक बनने या बना दिये जाने की ऐतिहासिक नियति जैसी जैसी चीजों के शिकार हुए। गांधी, नेहरु और निराला-सब के साथ यह समस्या जुड़ी है। नेहरु और निराला स्वतंत्रता संग्राम के दो ऐसे महानायक हैं जिन पर हिन्दी में सबसे ज्यादा कविताएं लिखी गईं।
 
किसी सृजनशील व्यक्तित्त्व का अन्वेषण तथा साक्षात्कार या फिर उसकी पुनःसृष्टि बड़ा चुनौती भरा और उत्तेजक कार्य है। और यदि वह व्यक्तित्त्व निराला जैसा प्रखर, उग्र और अंतर्विरोधों से भरपूर हो तो यह कार्य बड़ा कठिन और जोखिम का भी हो सकता है। निराला जिन्दगी भर अपने व्यक्तित्त्व और लेखन दोनों से ही अतिवादी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते रहे। निराला की साहित्य साधना के प्रकाशन के बाद तो यह जोखिम और भी बड़ा हो गया है। एक नये आलोचक के लिए निराला के साथ-साथ रामविलास शर्मा भी चुनौती बनकर आते हैं।
 
डा. रेवतीरमण के लिए निराला वैसा मूर्त्तिशिल्पी है जो रोज अपनी मूर्त्ति गढ़ता है और अगले दिन उसे तोड़ डालता है। निराला की यह क्रांतिकारी चेतना है जो परंपरा से दो-दो हाथ लड़ना जानती है। लेकिन आलोचक को माया मिली न राम। न तो वे निराला की कोई मूर्त्ति गढ़ पाये और नहीं किसी मूर्त्ति को तोड़ ही पाये। इसका श्रेय भी डा. रामविलास शर्मा को ही जाता है। उन्हीं की आलोचना में पहली बार निराला एक व्यक्तित्त्व ग्रहण करते हैं। लेकिन दुख कि आलोचक उसमें अपना मन आरोपित कर देता है-एक मार्क्सवादी मन, जो वेदांती की पीड़ा से कलुषित है। निराला के चिंतन में वेदांत कहां प्रतिक्रियावादी भूमिका में है और कहां प्रगतिशील-इसकी खोज-खबर रामविलास जी ने नहीं ली। गुरु-शिष्य परंपरा का शायद यही तकाजा रहा हो। डा. रेवतीरमण के साथ तो रामविलास जी वाली बाध्यता न थी। हां, शायद निराला के जानकीवल्लभ शास्त्री के साथ मधुर संबंध थे और रेवतीरमण निराला निकेतन ‘शिष्यवत्’ आते-जाते रहे हैं। निराला पर लिखने का यह भी एक प्रभावी कारण बनता है।
 
निराला में एक साधारण आदमी के कई दुर्गुण थे। अपनी आलोचना उन्हें भी पसंद न थी। वे बड़बोलापन के भी शिकार थे। कई बार उनकी कविताएं भी बड़बोलेपन की शिकार हुईं। ‘कुकुरमुत्ता’ एक अच्छा उदाहरण है। शुरू से ही निराला में एक कॉम्प्लेक्स था। पंडित नेहरु और रविन्द्रनाथ टैगोर के बारे में उनकी धारणा इसका प्रमाण है। आज की स्थिति में निराला की कविताएं एक विमर्श की मांग करती हैं जो व्यक्ति-पूजा और श्रद्धांजलि की भावना से रहित हो। ज्यादा घर्षण से चंदन की शीतलता भी खो जाती है।
 
पुनश्च, डा. रेवतीरमण की भाषा आलोचना की भाषा न होकर अध्यापक की हो चली है। अलबत्ता इस अगंभीर माहौल में उनकी भाषा की शुद्धता खलने लगती है।                                                                                

स्रोतः लोक दायरा, अंक 4, जून 2002 

Tuesday, August 17, 2010

भारतीय समाज को समृद्ध करती हिंदी

‘देशकाल’ नाम से पहले हिन्दी की एक पत्रिका निकली और अब ‘देशकाल’ प्रकाशन से एक किताब आई है जिसका शीर्षक है ‘हिन्दी नई चाल में ढली’। इसके संपादक हैं-पुरुषोत्तम अग्रवाल एवं संजय कुमार। पुस्तक में विनय कंठ, फ्रंचेस्का ओरसिनी, कृष्ण कुमार, प्रियदर्शन, अनिल चमड़िया, सुधीश पचौरी जैसे दर्जन भर लेखकों के आलेख संकलित हैं।

हिन्दी भाषा के निर्माण के बारे में चलनेवाली बहसें महज भाषा तक ही महदूद नहीं रही हैं, बल्कि ये आलोचना, इतिहास, परंपरा, विज्ञान, शिक्षा एवं मीडिया इत्यादि के सवालों से भी टकराती रही हैं। यह किताब इन्हीं सवालों को उठाने और उनके उत्तर तलाशने की कोशिश करती है। कुछ मौलिक सवालों से दो-चार होती यह पुस्तक हमें हिन्दी भाषा के इतिहास और वर्तमान से परिचित कराती है।

आलोच्य पुस्तक में कुल तेरह लोगों के लेख शामिल हैं। इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प विशेषता यह है कि पुस्तक में प्रकाशित लेखों के रचनाकार विभिन्न पेशों से संबंधित हैं जिनके विविध अनुभवों से इसके कैनवस को एक खुला विस्तार मिलता है। यह विशुद्ध साहित्य की दृष्टि से लिखी गई किताब नहीं है बल्कि इसमें समाज के विभिन्न तबकों के जीवन को हिन्दी किस रूप में समृद्ध कर रही है, इस लिहाज से भी देखने की कोशिश हुई है।

पुस्तक के प्रथम आलेख ‘1857 और हिन्दी नवजागरण’ में पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक पुराना सवाल उठाया है कि ‘क्या सचमुच हिन्दी नवजागरण 1857 में व्यक्त जागरण की ही अगली ऐतिहासिक अवस्था है ? क्या सचमुच हिन्दी नवजागरण 1857 की राजनीति और उसकी संवेदना से प्रेरणा लेता है ?’ आगे उन्होंने अपने आलेख की दिशा स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘साहित्यिक नवजागरण 1857 की राजनैतिक-सांस्कृतिक संभावनाओं के फलीभूत होने को सूचित करता है या 1857 की संभावनाओं के त्रासद विघटन को ?’ अपने इस आलेख में पुरुषोत्तम अग्रवाल, डा. रामविलास शर्मा की मूल स्थापना कि ‘हिन्दी नवजागरण में देशभक्ति एवं राजभक्ति का अंतर्विरोध झलकता है’, से पीछा छुड़ाकर अलग होने की कोशिश करते हैं लेकिन वे इस दिशा में दूर तक नहीं जा पाते। अलबत्ता इस बेचैनी में वे कुछ वैसे नवीन साक्ष्यों की चर्चा करते हैं जिससे अंतर्विरोध वाली बात ज्यादा प्रामाणिक हो उठती है।
‘
हिन्दी निर्माण और राष्ट्र की अवधारणा’ नामक अपने लेख में विनय कंठ की स्थापना है कि जिस वर्ग ने हिन्दी भाषा के निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वह साधारणतः मध्यवर्ग कहला सकता है।’यह वर्ग स्वाधीनता संघर्ष के काल में आन्दोलन की अगली कतार में था। इस वर्ग के कुछ लोग एक ओर सत्ता में अवस्थित थे तो बहुसंख्यक सत्ता विरोधी राजनीति में थे। वे यह भी मानते हैं कि हिंदी के विकास में उनलोगों की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण बनी जिनका राष्ट्रवाद भारतीय परंपरा के अधिक निकट था-चाहे वे तिलक, मालवीय, गांधी सरीखे राजनीतिक व्यक्ति हों या महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, प्रेमचंद जैसे साहित्यसेवी। पुस्तक में हिन्दी का जोरदार समर्थन करनेवालों के बीच प्रचलित राष्ट्रवाद में हिन्दू राष्ट्रवाद का तेवर भी कभी-कभी दीख जाता है।’ इस मसले पर अगर थोड़ा रूककर विचार किया गया होता तो शायद विनय कंठ और पुरुषोत्तम अग्रवाल दोनों को ही एक नई रोशनी में चीजों को देखने की सुविधा प्राप्त हो जाती। कहना न होगा कि भारत में मध्यवर्ग का स्वतंत्र विकास नहीं हो सका जिस तरह से इंग्लैंड और दूसरे औद्योगिक देशों में संभव हुआ। हमारे देश में मध्यवर्ग जमींदारों-किसानों के बीच से पैदा हुआ। कहिए कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा जमींदार वर्ग ही मध्यवर्ग में तब्दील होता गया, उसका कायांतरण न हुआ। इसलिए भारतीय मध्यवर्ग के संस्कार विशुद्ध किसानी संस्कारों के बहुत पास-पास दीखते हैं। मध्यवर्ग के निर्माण की प्रक्रिया भी अपने देश में बहुत धीरे-धीरे और देर से शुरू हुई इसलिए उसके अंतर्विरोधों को दबाया नहीं जा सका। 1857 के विद्रोह की असफलता के पीछे मध्यवर्ग का ढुलमुल रवैया एक प्रमुख कारक की तरह था। कारण शायद यह था कि साम्राज्यवाद के साथ उसकी अभी सीधी टकराहट न हुई थी, उसका अंतर्विरोध तीखा और उग्र न हुआ था। हिन्दी नवजागरण में देशभक्ति और राजभक्ति का जो अंतर्विरोध झलकता है, उसकी शायद यही पृष्ठभूमि थी।

भारतीय नवजागरण दरअसल अपने यहां हिन्दू नवजागरण और मुस्लिम नवजागरण की शक्ल में हुआ। हिन्दी-उर्दू का विवाद इसका एक आवश्यक प्रतिफल की तरह है। हिन्दी-उर्दू का यह विरोध विशेष रूप् से स्कूली बच्चों के लिए शाश्वत सत्य जैसा है। स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली पाठ्य पुस्तकें भी इससे बाहर नहीं हैं। कृष्ण कुमार हिन्दी पाठ्य पुस्तकों की गंभीर छानबीन के आधार पर यह कहने की स्थिति में होते हैं कि ‘भाषा का शिक्षण बिम्ब निर्माण और कल्पित सृष्टि में रमने की सामर्थ्य पैदा करने की जगह आनुष्ठानिक उच्चार की ट्रेनिंग बन जाता है, यही हमारी लाखों कक्षाओं में हिन्दी की घंटी में रोज घटनेवाली सांस्कृतिक दुर्घटना है।’

यह कहना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिन्दी का शिक्षक अगर वर्ग में उर्दू शब्दों का सहज प्रयोग भी करता है तो छात्र कह उठता है-‘श्रीमान! आप उर्दू शब्दों का इतना अधिक प्रयोग क्यों करते है ?’ कुल मिलाकर पुस्तक हिन्दी के अतीत और भविष्य के कई स्तरों को लेकर सोचने की एक दिशा हमें देती है।                                                                 

प्रकाशन: न्यूजब्रेक, 3 जून 2001.    

Monday, August 16, 2010

फिरकापरस्त क्यों भड़कते हैं ‘तमस’ से

भीष्म साहनी एक अच्छे साहित्यकार हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक समस्याओं से जुड़ने की कोशिश की है। इनकी रचनाओं में हमें विचार या यों कहें कि एक प्रकार के गंभीर दर्शन का आभास होता है। कुछ हिन्दी के आलोचकों द्वारा यह कहे जाने पर कि रचनाओं में विचार से परहेज होना चाहिए, आपने कहा था कि अगर रचनाओं से विचार को निकाल दिया जाये तो शेष बच ही क्या जायेगा। भीष्म साहनी की रचनाओं में इन्हीं विचारों की झलक देखने को मिलती है।
 
ऐसे में साम्प्रदायिकता पर भीष्म साहनी की कलम का चल जाना कोई अनहोनी बात नहीं है। साम्प्रदायिकता पर कुछ भी लिखना इनके लिए एक अनिवार्य शर्त थी। जैसाकि भीष्म साहनी ने इस बात का जिक्र किया है, पंजाबी होने के नाते दंगा पर लिखना इनके लिए जरूरी हो गया था। यह देखकर पाठक यह समझने की भूल न कर बैठें कि पंजाबी अक्सरहां साम्प्रदायिक होते हैं, बल्कि सच्चाई यह है कि पंजाबियों के लिए दंगा करना एक नयी बात है। फिर पंजाब में दंगा हो और भीष्म साहनी की कलम उस पर न चले, एक आश्चर्यजनक बात हो सकती है।
 
भीष्म साहनी ने अपने उपन्यास ‘तमस’ में दंगा की पोल खोलने की कोशिश की है। यह उपन्यास आज से लगभग बारह वर्ष पहले लिखा गया था। इसने एक हद तक दंगा एवं साम्प्रदायिकता को किसी भी प्रकार के पक्षपात तथा पूर्वाग्रह से दूर हटकर दिखाया है। इसमें साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने की कोशिश की गई है। ‘तमस’ खासकर स्वतंत्रता प्राप्ति के समय के दंगे को लेकर लिखा गया है। ‘तमस’ को लोगों ने सिर्फ साहित्य तक ही सीमित करके देखने की कोशिश की है। यह एक बहुत बड़ी भूल साबित हो सकती है। ‘तमस’ का आधार कुछ वास्तविक घटनाएं हैं और कुछ भीष्म साहनी के जीवन के सच्चे अनुभव। इसे स्वतंत्रता प्राप्ति के समय के इतिहास से जोड़कर देखना ज्यादा उचित होगा। मेरा तो मानना है कि ‘तमस’ न सिर्फ साहित्य की एक कृति है बल्कि इतिहास भी है।
 
आखिर ‘तमस’ में कौन वैसी चीज है जो सम्प्रदायवादियों को नागवार लगती है। इसकी वजह यह है कि ‘तमस’ तमाम साम्प्रदायिक ताकतों को बेनकाब करता है। ‘तमस’ एक इतिहास भी है। ऐसे इतिहास पर साम्प्रदायिकों का हमला होना स्वाभाविक है।
 
‘तमस’ भारतीय इतिहास की एक सच्ची घटना है। इसमें स्वतंत्रता प्राप्ति के समय के राष्ट्रीय कांग्रेस की समझौतापरस्त नीति को रेखांकित करने की कोशिश की गई है। ‘तमस’ का जनरैल जो सच्चा देशभक्त है जो हिन्दुस्तान की एकता एवं अखंड़ता को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, कहता है कि कांग्रेस पार्टी समझौता में विश्वास करती है। साम्प्रदायिकता के लिए कांग्रेस को भी उसने जिम्मेदार ठहराया। सचमुच अगर इसका सबूत इतिहास के पन्नों से लेने की कोशिश की जाए तो हमें यह मालूम होगा कि स्वतंत्रता के समय की कांग्रेस का चरित्र कुछ इसी तरह का था। कांग्रेस इस समय साम्प्रदायिकता से संघर्ष नहीं समझौता करने की स्थिति में थी। जाहिर है, ‘तमस’ एक इतिहास है।
 
मुख्य रूप से इसमें साम्प्रदायिकता की मूल जड़ को खोजने की कोशिश की गई है। अंग्रेजी राज को भी साम्प्रदायिकता के लिए दोषी साबित किया गया है। अंग्रेजी राज के सरकारी अफसरों ने अनेक जगहों पर दंगा भड़काया। ऐसा देखा गया है कि अंग्रेजी राज में साम्प्रदायिक तनाव बढ़े हैं। यह सच है लेकिन ‘तमस’ का उद्येश्य यहीं आकर समाप्त नहीं हो जाता है। अंग्रेजी राज तो साम्प्रदायिक तनाव का एक अमली उपकरण मात्र है।
 
‘तमस’ को मार्क्सवाद से जोड़कर देखने की जरूरत है। इसमें लेखक ने दंगा के कारणों में सामाजिक-आर्थिक कारण को महत्वपूर्ण बताया है। दंगा का कारण धर्म नहीं है बल्कि सत्य तो यह है कि दंगा शुरू हो जाने पर इसे मुख्य कारण के रूप में भोली जनता के सामने पेश किया जाता है। मसीत के सामने सूअर मरवाकर रखनेवाला कोई हिन्दू नहीं बल्कि वह मुसलमान ही है। जाहिर है, दंगा का आर्थिक कारण होता है, धर्म तो हाथी के सिर्फ दो दिखावटी बड़े दांत है।
 
‘तमस’ का संकेत कुछ और है। इसमें वर्ग संघर्ष है। आम जनता चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान चैन की जिंदगी जीना चाहती है। हर हिन्दुस्तानी मुसलमान अपना घर छोड़ते यही सोच रहा था कि वह इसे सदा के लिए थोड़े ही छोड़ रहा है। जाहिर है, आम जनता साम्प्रदायिक नहीं होती शांति चाहती है।
 
गांव के सारे लोग चाहे वे किसी भी जाति या सम्प्रदाय के क्यों न हों, आपस में सहानुभूति तथा प्रेम के साथ जीना चाहते हैं। उनको भय है तो सिर्फ बाहरी लोगों से। और सच होता भी यही है-जबतक बाहर से दंगाई नहीं आते हैं हरनाम सिंह मजे में अपनी दूकान चला रहा है। गांववालों को उनसे कोई शिकायत नहीं है बल्कि उनके साथ लोगों की सहानुभूति भी है। गांव की जनता उन्हें बार-बार यही कहती है कि तुम्हें खतरा तभी हो सकता है जब बाहरी लोग यहां आ जाएंगे। संक्षेप में, जनता शांति के पक्ष में है।
 
तब यह प्रश्न करना जायज हो जाता है कि दंगा होता क्यों है ? इसका जवाब हमें ‘तमस’ में मिलता है। इसमें यह स्पष्ट दिखाया गया है कि आदमी को कत्ल करने से ज्यादा मकानों को लूटा जाता है। यह सब वैसे लोग करते हैं जिनका एकमात्र उद्येश्य लोगों को लूटना होता है। स्पष्ट है, साम्प्रदायिकता धर्म और सम्प्रदाय का नहीं आर्थिक हितों का सवाल है। संक्षेप में, साम्प्रदायिक दंगा वर्ग संघर्ष का एक विकृत रूप है जिसे रेखांकित करना ‘तमस’ का एकमात्र उद्येश्य है।                         
प्रकाशन: जनशक्ति,  29 फरवरी 1988।