बचपन की स्मृति है कि एक बार मामा (दादी) कई दिनों बाद कहीं बाहर से लौटी थी। और कुछ की तो नहीं लेकिन उनके द्वारा लाई गई पतली, कांटेदार लाठी की स्मृति अब भी कायम है। बाद में पता चला कि वह तीर्थाटन से लौटी थी। बहुत दिनों तक हरद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, जमुनोत्री आदि शब्द कानों को सुनने पड़े थे। बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने-पहचाने शब्द थे। साल में एक बार यहां के पंडे गांव के चक्कर लगा जाते। तब गांव से झुण्ड के झुण्ड लोग बद्रीनाथ और केदारनाथ के लिए निकलते और विशेष कुछ नहीं तो गंगाजल और लाठी के साथ लोव लौटते। गंगाजल यहां काम आता और लाठियां वहां पहाड़ के दुर्गम रास्ते को आसान करतीं। इस तीर्थाटन में बिहार के कुछ नामी साहित्यकार भी शामिल रहे हैं। दो के नाम यहां खासतौर से लिये जा सकते हैं। फिरंगिया के कवि मनोरंजन एवं शिवनंदन सहाय। पीछे से जानेवालों में गंगाशरण जी भी थे। शिवनंदन सहाय ने अपनी यात्रा का हाल 'कैलास-दर्शन' में लिखा है तो बाबू मनोरंजन ने 'उत्तराखंड के पथ पर' में। गंगाशरण जी ने मनोरंजन की किताब की भूमिका लिखकर ही संतोष किया है। ये किताबें पुस्तक भंडार लहेरियासराय से छपी थीं। मनोरंजन बाबू की किताब का प्रकाशन 1936 में हुआ तो सहाय जी की किताब सम्भवत: 1934 में। इन दोनों किताबों से पहले मुंगेर की एक लेखिका की किताब 'हिमालय परिभ्रमण' बंगला भाषा में छप चुकी थी। इस तरह देखा जाय तो बिहार की हिन्दी में यात्रा वृत्तांत का भी योग है, किंतु इन सब बातों की चार चर्चा नहीं हो सकी। विस्मृति स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु जब वह व्याधि बन जाय तो उपचार अपेक्षित है।
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