Saturday, September 19, 2026

ईश्वरीय रचना नहीं है वेद

आज के उत्तर-आधुनिक समय में किसी के दिमाग में यह सवाल कौंध सकता है कि वेद का अध्ययन हम क्यों करें। किन्तु, प्राचीन जमाने का मनुष्य इतना 'भौतिकवादी' नहीं था। इसलिए वहाँ तुलसी के 'स्वान्तः सुखाय' की तरह ज्ञान का अन्यतम और संभवतः सबसे प्रमुख उपयोग 'बौद्धिक जिज्ञासा की तृप्ति' है। पतंजलि ने यही बात ध्यान में रखकर महाभाष्य में कहा है कि 'ब्राह्मणेन निष्कारणः षडंगो वेदो$ध्येयो ज्ञेयश्च' अर्थात ब्राह्मण को बिना किसी कारण के, तात्पर्य कि बिना किसी लौकिक लाभ की इच्छा के, षडंगों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद, ज्योतिष) से युक्त वेदों का अध्ययन करना चाहिए। 'ब्राह्मण' को आप इस उत्तर-आधुनिक काल का 'बुद्धिजीवी' मान सकते हैं। 

उसी 'स्वान्तः सुखाय' की परंपरा में कुमार मुकुल ने वेदों का अध्ययन करते हुए 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' किताब का सृजन किया है। किताब एक खास तैयारी के बाद लिखी गई है, इसलिए 'नोट्स' को 'भाष्य' का समतुल्य मान सकते हैं। जब आप किताब पढ़ेंगे तो इस बात को स्वीकारे बिना न रहेंगे कि उन्होंने वैदिक साहित्य से सम्बंधित किताबों की जो विस्तृत सूची दी है, उसका गंभीर अध्ययन भी किया है। उन किताबों को समेटता हुआ एक स्वतंत्र अध्याय भी आपको पढ़ने को मिलेगा। इस किताब का यह खास आकर्षण है।

वेद शब्द 'विद' धातु से बना है जिसका मतलब 'ज्ञान' और 'संग्रह' है। अतः कहा जा सकता है कि वेद अपने समय के 'ज्ञान का संग्रह' हैं। जो वेद में है वह ज्ञान है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान का हिस्सा नहीं है। आम बोलचाल में भी 'वेद-वाक्य' शब्द का चलन है जिसका मतलब हुआ कि वह 'संदेह से परे' है अथवा 'स्वयंप्रमाणित' है। आरंभ में तीन वेद की मान्यता थी। 'वेदत्रयी' की यही अवधारणा और आधारभूमि है। 'अथर्ववेद' में तनिक 'भिन्न' और 'निम्न' कोटि का ज्ञान था। बाद में 'अथर्ववेद' की भी वेद-समूह में गिनती की जाने लगी। और बाद में तो 'महाभारत' और 'नाट्यशास्त्र' को भी पांचवां वेद मान लिया गया। पंचम वेद हो जाने से 'महाभारत' के बारे में भी प्रचलित हो गया कि अपने समय का सारा ज्ञान इसमें संकलित है और जो इसमें नहीं है वह ज्ञान भी नहीं है। हालांकि लोकबुद्धि ने इसे स्वीकार करने से इनकार किया है। लोक में एक कहावत प्रचलित है : 'चार बेद और पांचवां लबेद'। 

वेद का यह 'ज्ञान' किसी एक व्यक्ति अथवा किसी एक पीढ़ी का नहीं, अपितु पीढ़ियों का संकलित-संरक्षित ज्ञान है। संकलन-संरक्षण तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान हस्तांतरित करते जाने का यह काम वाचिक परंपरा में होता रहा। हस्तांतरण की इस प्रक्रिया के लिए कविता सबसे मुफीद विधा साबित हुई। वेद हमारी सभ्यता-संस्कृति के सबसे आरंभिक, अथवा कहें कि आदिम कविता संकलन हैं। हालांकि इस बात से यह भ्रम न होना चाहिए कि वैदिक आर्य गद्य विधा से अपरिचित थे बल्कि अपनी बात कहने के लिए कविता के फॉर्म का उनका चुनाव भौतिक परिस्थितियों से अधिक अनुप्राणित था। गद्य की किसी भी विधा (फॉर्म) की तुलना में कविता को कम शब्दों की आवश्यकता होती है। एक वैसे समय और समाज में जहां लेखनकला का विकास न हो सका हो, शब्दों की मितव्ययिता खास मतलब रखती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऋग्वैदिक समाज में सैंकड़ों तरह की चीजों के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त हो रहा है। यहां 'गो' (बाद में गाय के लिए रूढ़) शब्द के उदाहरण से स्थिति को समझने में आसानी हो सकती है। 

ऐसी स्थिति सिर्फ इसलिए नहीं है कि शब्द-भण्डार की कमी है, बल्कि इसलिए भी कि कई पीढ़ियों से प्राप्त और संचित ज्ञान को आगे की पीढ़ी को सौंप देना है। इस पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक था कि कम से कम शब्दों का इस्तेमाल हो। वैयाकरणों के संबंध में तो परंपरा से यह अनुश्रुति चली ही आ रही है कि आधी मात्रा भर कम कर देने से वह उतना ही हर्ष मनाता है, जितना कि पुत्रोत्सव के उपलक्ष्य में : 'अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणा:'। वैयाकरण पाणिनि की महत्ता इस बात में भी है कि उन्होंने बहुत छोटे-छोटे सूत्रों के माध्यम से अपनी बात कही है। वे इतने छोटे हैं कि एक मात्रा तक निकाले नहीं जा सकते।

वर्तमान रूप में ऋग्वेद के जो सूक्त मिलते हैं वे एक सुदीर्घ काव्य-परंपरा के परिणाम है। इस काव्य-परंपरा की शुरुआत ऋग्वेद के रचे जाने या भारत में आर्यों के आगमन से बहुत पहले हो चुकी है। इसका प्रमाण स्वयं ऋग्वेद के कवि हैं। वे बार-बार अपने पूर्वज कवियों को याद करते हैं. इस बात पर जोर देते हैं कि पुराने सूक्तों की तुलना में उनके स्तोत्र नये हैं। ऋग्वेद के कवियों से पूर्व अथर्वा एवं पिता मनु हैं और इन्होंने पूर्वथा, पहले की तरह इन्द्र को लक्ष्य करके स्तोत्र रचे। उस इन्द्र को प्राचीन लोग (पूर्वथा) हमारे पूर्वज (इमथा विश्वथा) तथा आज के सभी जन स्तुति कर रहे हैं। स्तुति की परंपरा पूर्वजों से चली आ रही है। ऋग्वेद के कवि अपनी काव्य-परंपरा के प्रति काफी सचेत हैं-‘हे घोड़ों के स्वामिन इन्द्र! तेरी पहले की गई स्तुति को कोई भी दूसरा बल से, न योग्यता से ही आज तक प्राप्त कर सका.’ यम को मधुर हवि अर्पित करते हुए कवि प्रथम मार्गदर्शक पूर्वजों को याद करता है-‘पूर्वज और पूर्व मार्गदर्शक ऋषियों के लिए यह नमस्कार है’ (पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृदम्य: ऋषिभ्य: इदं नम:)। अनेक सूक्तों में सुदूर अतीत की झलक मिलती है. काण्वमेध्य ऋषि एक मंत्र में कहते हैं-‘बहुस्तुत सोम प्राचीनकल से देवों का पेय है। अग्नि पूर्वकालीन और अधुनातन ऋषियों का पूज्य है। शुन:शेप प्राचीन पितरों से स्तुत इन्द्र की स्तुति करता है। कक्षीवान ऋषि भयंकर इन्द्र से उसी नेतृत्व की कामना करता है जो प्राचीनकाल में था। कक्षीवान के पिता दीर्घतमा प्राचीन ऋषि दधीचि, अंगिरा, प्रियमेध, काण्व, अत्रि तथा मनु का उल्लेख करता है. ऋषियों एवं उनके पुत्रों के सूक्त वेद में एकत्र मिलते हैं। इन सूक्तों से सिद्ध होता है कि ऋषियों को सतत अपने अतीत का स्मरण है। मैक्स मूलर ने भी स्वीकार किया है कि ऋग्वेद में प्राचीन एवं अर्वाचीन सूक्त हैं। इसलिए वेद को एक किसी निश्चित काल की रचना मानकर अध्ययन करने की अपनी परेशानी है।

वेदाध्यन के संदर्भ में कहा जाता है कि ‘ऋषि’, ‘देवता’ एवं ‘छंद’ को जाने बिना मंत्रार्थ नहीं खुलते हैं। ‘सर्वानुक्रमणी’ तथा ‘वृहददेवता’ में स्पष्ट लिखा है कि ऋषि, देवता एवं छंद समझे बिना वेदार्थ का प्रयास करनेवाले का श्रम निरर्थक जाता है। कहना अनावश्यक है कि यहाँ ‘ऋषि’ का अर्थ है कहनेवाला (यस्य वाक्यं स ऋषि), ‘देवता’ का भाव है-प्रकृति की शक्तिधारा (या तेनोच्यते सा देवता) और छंद का अर्थ है कि इसमें काव्यात्मकता किस शैली की है (यद अक्षरपरिमाणं तच्छन्द:)। भावों की गहराई तक पहुँचने में छन्द भी सहायक होते हैं। भर्तृहरि ने लिखा है कि शब्द और अर्थ का संबंध वक्ता की इच्छा के अधीन रहता है। प्रयोक्ता जिस शब्द को जिस अर्थ में प्रयोग करता है वही अर्थ उसे मिल जाता है। कबीर इसी रूप में वाणी के डिक्टेटर हैं। ब्लूमफील्ड भी वक्ता की मनःस्थिति के संदर्भ में ही अर्थ की चर्चा और परिभाषा करते हैं।

कहना पड़ेगा कि अर्थ की महिमा से प्राचीनकाल के लोग बखूबी परिचित थे। यास्क ने निरुक्त में कहा है कि जिस प्रकार बगैर अग्नि के शुष्क ईंधन प्रज्वलित नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना अर्थ समझें जो शब्द दुहराया जाता है, वह कभी अभीप्सित विषय को प्रकाशित नहीं कर सकता-"यद (द हलयुक्त) गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्दयते (द हलयुक्त)। अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित" (त हलयुक्त)।। उसी प्रसंग में आगे कहा है कि जो बिना अर्थ जाने वेदों का अध्ययन करता है, वह केवल भार ढोता है। अर्थ को जानने वाला ही समस्त कल्याणों का भागी होता है और ज्ञान की ज्योति से समस्त दोषों को दूर कर ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। "स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति यो$र्थम (म हलयुक्त)। यो$र्थज्ञ इत (त हलयुक्त) सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।।" 

कुमार मुकुल बहुत सही कहते हैं कि 'शब्दों की जन्मकुंडली वेदों से खुलती है'। पुस्तक में 'वैदिक शब्दगाथा' शीर्षक से एक अध्याय है, जिसमें शब्द-निर्माण-प्रक्रिया का बड़ी सूक्ष्मता से वर्णन है। व्युत्पत्ति के माध्यम से वे शब्दों की यात्रा को समझने की कोशिश करते हैं जो काफी उपयोगी और दिलचस्प है। किन्तु, लेखक इस व्युत्पत्ति-विज्ञान की सीमा से परिचित भी है। यह विज्ञान कभी-कभी विनोद का साधन बन जाता है। कहना अनावश्यक है कि ब्राह्मण और उपनिषद पुराने अनुष्ठानमूलक शब्दों से अपने मतलब के नये अर्थ निकालने के लिए अनेक बचकानी व्युत्पत्तियां प्रस्तुत करते हैं। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में एक मजेदार कहानी है, जिसमें बताया गया है कि बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर विग्रहराज क्यों रखा ? बीसलदेव का एक सान्धिविग्रहिक ‘कुमारपाल’ की सभा में आया। उसने ‘बीसल’ को संस्कृत ‘विश्वल’ (विश्व को जीत लेनेवाला) से व्युत्पन्न बताया। कुमारपाल के मन्त्री कपर्दी ने ‘विश्वल’ (वि=पक्षी, श्वल=भागनेवाला) का अर्थ किया-'चिड़ियों की तरह भागनेवाला'। यह सुनकर बीसलदेव ने अपना नाम बदलकर 'विग्रहराज' रखा पर कपर्दी ने इसका भी बेढंगा अर्थ सिद्ध कर दिया। उसने बताया कि इस शब्द का अर्थ हुआ 'शिव और ब्रह्मा की नाक काटनेवाला'! तब बीसलदेव ने अपना नाम ‘कविबान्धव’ रखा।

इतिहासकार जब तक यह मानते रहे कि ऋग्वैदिक समाज मूलतः पशुचारी और कबीलाई था, 'आर्य' शब्द को ‘ऋ’ धातु से व्युत्पन्न बताया जाता रहा और सदैव यह कहते रहे कि अलग-अलग गणों में जो ‘ऋ’ धातु पाई जाती है, वह प्रायः गत्यर्थक है। अतः आर्य शब्द का अर्थ हुआ 'घुमक्कड़' या 'मुसाफिर'। यह भी कहा गया कि संस्कृत में गमनार्थक धातुओं का बाहुल्य है जो संभवतः इस बात का प्रमाण है कि आर्य स्थिर रहने के बदले चलते रहना पसंद करते थे। बाद के दिनों में, जब आर्यों के कृषि-जीवन की जानकारी प्राप्त हुई, विद्वानों ने कहना शुरू किया कि आर्य शब्द ‘अर्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ 'कृषि करना' है। कहने की जरूरत नहीं कि आर्य शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों की बदलती मान्यताएं भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों से कम, इतिहास की हमारी व्याख्या से ज्यादा प्रभावित लगती हैं। 

सामाजिक-ऐतिहासिक मान्यताएं भाषाविज्ञान के नियमों को प्रभावित करती हैं, इस तथ्य को 'शूद्र', 'कायस्थ', 'पत्नी' आदि शब्दों के व्युत्पत्यर्थ निकालने के बेतुके और अवैज्ञानिक प्रयासों से भी समझा जा सकता है। वेदांत सूत्र में शूद्र शब्द को दो भाग में विभक्त कर दिया गया है-‘शुक’ (शोक) और ‘द्र’ जो ‘द्रु’ धातु से बना है, और जिसका अर्थ 'दौड़ना' बताया गया है। पाणिनि के व्याकरण में उणादिसूत्र के लेखक ने भी इस शब्द की कुछ ऐसी ही व्युत्पत्ति दर्शायी है। पुराणों में भी शूद्र शब्द ‘शुच्’ धातु से संबद्ध जान पड़ता है, जिसका अर्थ 'संतप्त होना' है। कहा जाता है कि ‘जो खिन्न हुए और भागे, ,शारीरिक श्रम करने के अभ्यस्त थे, उन्हें शूद्र बना दिया गया।’ बौद्धों द्वारा प्रस्तुत व्याख्या भी ब्राह्मणों की व्याख्या से भिन्न नहीं है। बुद्ध के अनुसार, जिन व्यक्तियों का आचरण आतंकपूर्ण और हीन कोटि का था (लुदआचारा खुद्दाचाराति), वे सुद्द (संस्कृत-शूद्र) कहलाने लगे और इस तरह सुद्द (संस्कृत-शूद्र) शब्द बना। दीघनिकाय के एक परिच्छेद में कहा गया है कि 'शूद्र वे हैं जो शिकार और अन्य हीन कर्म द्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं'। आदि मध्यकाल के बौद्ध शब्दकोश में शूद्र शब्द क्षुद्र का पर्याय बन गया, और इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि शूद्र शब्द क्षुद्र से बना है। दोनों ही व्युत्पत्तियां भाषाविज्ञान की दृष्टि से असंतोषजनक हैं। हाल में एक लेखक ने शूद्र शब्द की व्युत्पत्ति इस रूप में की है-धातु ‘श्वी’ (मोटा होना) + धातु ‘द्रु’ (दौड़ना)। उनकी राय है कि इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा व्यक्ति जो स्थूल जीवन की ओर दौड़े।’ अतएव उनकी दृष्टि में शूद्र ‘ऐसा गँवार है जो शारीरिक श्रम करने के लिए ही बना है। इस शब्द को लेखक जो अर्थ देना चाहता है, वह शूद्रों के प्रति केवल परंपरावादी मनोवृत्ति को चित्रित कर पाता है। उससे शूद्रों की उत्पत्ति पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। उशना ने कायस्थ की एक विचित्र व्युत्पत्ति उपस्थित की है, यथा काक (कौआ) के ‘का’, यम के ‘य’ एवं स्थपति के ‘स्थ’ शब्दों से ‘कायस्थ’ बना है; ‘काक’, ‘यम’ एवं ‘स्थपति’ शब्द क्रम से लालच (लोभ), क्रूरता एवं लूट के परिचायक हैं। ब्राह्मणों द्वारा प्रस्तुत इन व्युत्पत्तियों में शूद्रों की दयनीय अवस्था का चित्रण किया गया है। पाणिनि ने ‘पति’ से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति सिद्ध करने की व्याख्या दी है। ‘पत्युर्नो यज्ञ संयोगे’-पति के यज्ञ कार्य में सहयोग प्रदान करने से ‘पत्नी’ की व्युत्पत्ति, स्त्री की निम्नतर सामाजिक स्थिति की आख्यात्री है।

वैदिक काल में शब्द-निर्माण की प्रक्रिया पर गौर करें तो अधिकतर शब्द 'गो' से बन रहे हैं। चमड़ा से लेकर सूर्य की किरण तक सभी गो हैं। आरम्भ में पृथ्वी की गमनशीलता के कारण उसे भी 'गो' कहा गया। वाणी भी गौ है। गाय को चूंकि हम पहले पालतू बना चुके हैं, इसलिए बाद में भैंस से परिचय होने पर उसे भी 'गौरी गवल' कहा जाता है। इसका कारण है कि हमारी भौतिक संस्कृति में बहुत कम चीज है, अतः जैसे-जैसे संस्कृति का हमारा दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे शब्द बढ़ते हैं। जैसे प्रारम्भ में 'सुर' और 'असुर' में भेद नहीं है, दोनों शब्द एक ही अर्थ ध्वनित करते हैं। पूर्ववैदिक काल में, आप आश्चर्य नहीं करें, आदमी भी 'पशु' कहलाता है। मनुष्य पशुओं में प्रथम है। सारे पशु, मृग भी हैं। उसी मृग में आदमी भी शामिल है। बाद के दिनों में उसी मृग से शाखा पर रहनेवाले अर्थात 'शाखामृग' अर्थात बंदर बनते हैं। उसी मृग से हाथवाला पशु अर्थात मृगहस्तिन अर्थात हाथी बनता है। 

मगही भाषा का बहुप्रचलित 'पोरसा' शब्द वैदिक 'पुरुष' से बना लगता है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में लंबाई की एक माप के रूप में 'पुरुष' शब्द प्रयुक्त होता रहा है। 'तैत्तिरीय संहिता' एवं 'शतपथ ब्राह्मण' में इसे उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। वैदिक साहित्य में इसका सबसे प्राचीन प्रयोग यज्ञ की बेदी की ऊंचाई बताने हेतु हुआ है। कहा गया है कि ‘चतुरश्र स्येन’ (बाज पक्षी के आकार की तथा चौकोर ईंटों की बनी सबसे प्राचीन बेदी) का क्षेत्रफल साढ़े सात वर्गपुरुष होता था। पाणिनि काल में भी गहराई मापने के संबंध में ‘पुरुष’-संज्ञक माप का प्रयोग किया जाता था-'पुरुषात् प्रमाणेऽन्यतरस्याम्'। जैसलमेर में आज भी यह शब्द प्रचलित और सुरक्षित है। वहां कुएं की गहराई 300-350 ‘पुरुष’ के नाम से ही जानी जाती है। एक हाथ में रस्सी को पकड़कर दूसरे हाथ को ऋजुकोण की तरह फैलाने तक की दूरी को ‘एक पुरुष’ मानकर मापने की रीति राजस्थान में आज भी प्रचलित है। 

इसके अलावे 'पुरुष' शब्द मनुष्य की जीवन-अवधि अथवा एक पीढ़ी के लिए, नेत्र की पुतलियों के लिए और व्याकरण साहित्य में क्रिया के 'पुरुष' के लिए भी व्यवहृत हुआ है। ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में विभिन्न वर्णों का जन्म भी एक विराट ‘पुरुष’ ही से बताया गया है। इसी ‘पुरुष’ से ‘अपौरुषेय’ शब्द बना है। वेद को ‘अपौरुषेय’ कहकर 'ईश्वरीय' और 'दैवी' घोषित करने की कोशिश की गई है जबकि सच्चाई यह है कि वेद में ईश्वर का तात्पर्य 'स्वामी' से है, भगवान वाला अर्थ उसने बहुत बाद में ग्रहण किया है। इसीलिए नास्तिक का आरंभिक अर्थ है, 'वह जो वेद में विश्वास नहीं करता'। मनुस्मृति में भी नास्तिक का यही अर्थ लिया गया है-'नास्तिको वेद निंदकः'। इसलिए वेद के अपौरुषेय होने का मतलब उसे दैवी अथवा ईश्वरीय समझना दरअसल वेद के गलत पाठ से जुड़ा मसला है। आधुनिक अर्थबोध के साथ जब तक हम वेद पढ़ेंगे, ऐसी भूल से अपने को बचाने में असमर्थ रहेंगे।

परिवर्तन न सिर्फ प्रकृति का नियम है, अपितु भाषा में भी काल-सापेक्ष परिवर्तन देखा गया है। इसलिए जब हम वेद जैसे गुजरे जमाने की रचनाओं को आज के संदर्भ में पढ़ते हैं तो उनके शब्द कई बार हमें भ्रमित और चकित करते हैं, क्योंकि आज उनके अर्थ वही नहीं होते जो रचना के लिखे जाने के समय थे। कभी-कभी शब्दार्थ इतनी तेजी से बदलते हैं कि महज दो पीढ़ी का अंतर भी इतिहास का विशाल काल-खंड प्रतीत होता है। निरुक्तकार यास्क ने वेद के लगभग चार सौ ऐसे शब्द गिनाये हैं जिनके अर्थ उन्हें भी नहीं मालूम थे। इस अर्थ-परिवर्तन में जाति, धर्म, लिंग आदि अन्य अनेक चीजों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 

ऋग्वेद की आरंभिक ऋचाओं में ‘असुर’ शब्द देवतावाचक है किन्तु संभवतः पारसियों से संबंध अच्छे न रह जाने के कारण भारतीय आर्यों ने ‘असुर’ शब्द को, जो पारसियों के प्रधान देवता (अहुरमज्दा) का वाचक था, ‘राक्षस’ के अर्थ में प्रचलित कर लिया। जैन लेखक विमलसूरी की प्राकृत रामायण ‘पउमाचरियम’ की मानें तो ब्राह्मण ग्रंथों का यह ‘राक्षस’, दानव नहीं है। यहां राक्षस शब्द ‘रक्ष’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘रक्षा करना’ है। इस तरह आप कह सकते हैं कि संस्कृत का असुर शब्द ‘देवता’ से परिवर्तित होकर ‘राक्षस’ अर्थ प्रयोक्ताओं की विशेष मानसिक स्थिति का परिणाम है। संस्कृत 'उपेक्षितव्याः' का मूल अर्थ है ‘समीप जाकर देखना चाहिए’ किन्तु बाद में इसका अर्थ ‘तिरस्कार’ हो गया। ‘निरुक्त’ में यह पुराने ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आंखों के निकट रहने से अनादर होता ही है, संभवतः इस तरह यह अर्थ आया। 'भ्रातृव्य' शब्द का मूल अर्थ ‘भ्राता का पुत्र’ था किन्तु आगे चलकर वह ‘शत्रु’ के लिए प्रयुक्त होने लगा, ठीक जैसे कभी पड़ोसी राजा को ‘अरि’ कहा जाता था। ‘धान्य’ शब्द का मूल अर्थ ‘अनाज’ है लेकिन कालांतर में धान्य शब्द ‘चावल’ संबंधी अर्थ में सीमित हो गया। कीथ और मैकडानल के अनुसार ऋग्वेद में ‘यव’ शब्द केवल ‘जौ’ का वाचक नहीं बल्कि अन्न मात्र का वाचक है। ‘पुंगव’ शब्द का अर्थ बैल था किन्तु ‘नरपुंगव’ में श्रेष्ठतावाचक हो गया। ‘दया’ अथवा ‘अनुकम्पा’ के अर्थ में प्रयुक्त होनेवाला ‘घृणा’ शब्द ‘नफरत’ का वाचक बन गया।

कुमार मुकुल की पुस्तक 'वेद-वेदांग कुछ नोट्स' देखने-पढ़ने का मुझे सुअवसर प्राप्त हुआ है। इसलिए कह सकता हूँ कि वेद के विविध आयामों और अध्यायों वाली यह पुस्तक रोचक बन पड़ी है और निश्चय ही पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी। आशा है, वेद के और कुमार मुकुल के कवि से आप एक साथ मिल सकेंगे।

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