कर्मेंदु शिशिर की एक किताब है-'पत्रकारिता के युग निर्माता : शिवपूजन सहाय'। इस किताब में उन्होंने पुस्तक-भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी को 'खुर्राट व्यवसायी' तथा बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय को 'दुधारू गाय' कहा है। आगे यह भी लिखा कि पाठ्यपुस्तकों के 'व्यवसाय की सफलता से उनकी आंखों पर मोटी परत चढ़ गई'। (पृष्ठ 53) शिशिर जी एक 'लेखक' को 'व्यवसायी' किस कुण्ठा में लिख रहे हैं वे ही जानें!
'जयन्ती स्मारक ग्रन्थ' में उस समय के लगभग तमाम लेखकों के संस्मरण प्रकाशित हैं। कथित दुधारू गायों के संस्मरण भी हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि वे बेरोजगार थे और बहन की शादी की चिंता सिर पर थी। उन्होंने जिन दो लोगों को पत्र लिखे उनमें एक पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचन शरण बिहारी भी थे। रामलोचन जी ने बेनीपुरी को पुस्तक भंडार आने का न्योता लिख भेजा। काम भी मिल गया। कुछ माह बाद उन्होंने बेनीपुरी को बहन की शादी की याद दिलायी तो उन्होंने अपर्याप्त बचत की बात कही। रामलोचन जी ने उन्हें एक नई साइकिल दी और कहा कि जाइए और अपने गांव के आसपास किसी लड़के को देखिए। शादी हो गई। लड़का बेनीपुरी जी खोजा और खर्च का भार बिहारी जी ने उठाया। बेनीपुरी जी के अतिरिक्त कलक्टर सिंह केसरी, दिनकर आदि ने भी आर्थिक मदद की बात स्वीकारी है।
'व्यवसाय' की 'सफलता' के पीछे रामलोचनशरण बिहारी का श्रम और साधन था। तब 'बालक' पत्रिका निकालने की बात थी। उन्होंने इंग्लैंड और अमेरिका से अंग्रेजी के कई बालोपयोगी मासिक पत्र और वार्षिक पुस्तकें (इयर-बुक) मंगाई थी। बंगला, गुजराती, मराठी और उर्दू के प्रमुख बालोपयोगी पत्र भी मंगाये। बच्चों के लिए अंग्रेजी की प्रसिद्ध 'बुक-ऑफ नॉलेज' जैसी ग्रंथ-मालाएँ भी मंगाई। रामवृक्ष बेनीपुरी को कलकत्ता भेजकर वहां से मैकमिलन, न्यूमैन, बैंकर आदि अंग्रेजी कंपनियों की दूकानों से हजार रुपये की बालोपयोगी पुस्तकें भी मंगवाई। उन सबके अध्ययन और परीक्षण के बाद ही 'बालक' के लिए उपयुक्त विषयों एवं शीर्षकों का चुनाव तथा निर्धारण किया। 'बालक' का कवर आदि का डिजाइन बाबू शिवपूजन सहाय के परामर्श पर तत्कालीन प्रख्यात चित्रकार रामेश्वर प्रसाद वर्मा से तैयार कराया गया था।
इन सबके पीछे रामलोचनशरण जी ने पानी की तरह पैसा बहाया था। वर्मा जी से मास्टर साहब की भेंट 1929 में कलकत्ते में हुई थी। इसी साल वर्मा जी इंग्लैंड जाने के सिलसिले में पुस्तक भंडार आये थे। मास्टर साहब ने उन्हें एक हजार रुपये दिये थे। जबतक वर्माजी इंग्लैंड में रहे, तबतक उनके घर 50 रुपये माहवार 'भंडार' से निर्बाध जाता रहा। इंग्लैंड से भी वर्मा जी की मांग पर 600 रुपये अतिरिक्त भेजे गये थे। दुर्भाग्य कि स्वदेश लौटने के बाद वर्मा जी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सके।
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