मिथिला (बिहार), नदिया (बंगाल), काशी (उत्तर प्रदेश) और जयपुर (राजस्थान) संस्कृत अध्ययन के केन्द्र रहे हैं। मिथिला के पंडित संस्कृत की आगे की पढ़ाई के लिए नदिया, काशी और जयपुर जाते रहे हैं। इनमें काशी की प्रसिद्धि सर्वाधिक थी। साक्षात विद्या नगरी। जयपुर भी कुछ कम नहीं था। इसे 'छोटी काशी' कहा जाता। किन्तु महत्त्व की बात यह है कि काशी और जयपुर को यह गौरव प्रदान करने में मिथिला की खास भूमिका रही है। इसलिए जब-जब इन नगरों का इतिहास लिखा जाता रहा मिथिला को उसका 'स्पेस' देना पड़ा। बात चाहे 'काशी की सारस्वत साधना' की हो या 'जयपुर की संस्कृत साहित्य को देन' की-मिथिला की साधना दर्ज होती रही है। बल्कि कहिए कि मिथिला के बगैर इन शहरों का इतिहास लिखा जाना असम्भव है। इस बात को जयपुर के इतिहास के एक प्रसंग से बेहतर समझा जा सकता है।
महाराज रामसिंह ने धार्मिक व्यवस्था को सुदृढ़ रखने की दृष्टि से तथा आगंतुक विद्वान ब्राह्मणों की यथोचित सत्कार भावना से मोद मंदिर संस्था की स्थापना की। राजगुरु कथाभट्ट श्री छोटेलाल जी नामावाल (श्री हरगोविंद) नामक विद्वान इस संस्था के प्रधान थे और मिथिला के राजीव लोचन ओझा आदि विद्वान इसके मान्य सदस्य थे। बाद के दिनों में राजीव लोचन ओझा के भतीजे मधुसूदन ओझा को इस मंडली में शामिल किया गया। इस संस्था का सम्मेलन प्रतिदिन सायंकाल चंद्र महल (सिटी पैलेस) के समीप संस्थापित राजराजेश्वर महादेव के सान्निध्य में हुआ करता था। कहा जाता है कि इस संस्था की अनुमति के बिना कोई धार्मिक व्यवस्था देना लगभग असंभव था। सवाई रामसिंह के समय में शैव तथा वैष्णव संप्रदाय के बीच भयंकर वाद-विवाद उत्पन्न हो गया था। इस वाद-विवाद में अनेक वैष्णव जयपुर से पलायन कर गये थे। वृंदावन के महंथ श्री रंगाचार्य के साथ जयपुर के विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ था। कहा जाता है कि उनका एक पत्र नैयायिक भाषा में मीमांसा के अधिकरणों से युक्त होने के कारण तत्कालीन किसी विद्वान की समझ में न आया। महामहोपाध्याय श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी जी ने मधुसूदन ओझा विषयक अपने लेख में इस बात का उल्लेख किया है कि श्री राजीव लोचन ओझा ने इसका समाधान प्रस्तुत कर अपना लोहा मनवाया था।
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