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Sunday, September 20, 2026

पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' की 'श्रेष्ठ कहानियां'

अबतक मैंने पांडेय बेचन शर्मा उग्र को नहीं पढ़ा था। एकाध कहानी कहीं से पढ़ लेना पढ़ना नहीं हो सकता। 'आत्माराम एंड संस' ने दो खंडों में इनकी कहानियां छापी हैं। ये उग्र की नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। इनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। समाज और व्यक्ति समान रूप से हमला झेलते हैं। अभी कुछ ही कहानियां पढ़ सका हूँ। पढ़ते लगा कि पांडेय बेचन शर्मा उग्र आर्य समाज आंदोलन की विचारधारा से प्रभावित कथाकार लगते हैं। उनका अतिरिक्त भारतीयता-बोध भी गाहे-बगाहे सिर उचका देता है। उनकी एक कहानी है 'कम्यूनिस्ट दरवाज़े पर'। यह व्यंग्यप्रधान आत्म-संस्मरणात्मक कहानी है। अफसोस कि व्यंग्य की अपनी सारी ताकत उन्होंने कम्यूनिस्ट पात्र का मजाक उड़ाने में खर्च कर दी है। एक स्थल पर लिखा है, 'रुपये-पैसे की झंकार के सामने काले चश्मेवाले कम्यूनिस्ट की क्रूर माया फट गई।' (पांडेय बेचन शर्मा उग्र, श्रेष्ठ रचनाएं, भाग 1, पृष्ठ 248) कहानीकार का यह कहना कि 'कम्यूनिस्ट रूस से नहीं आता, काले बुखार की तरह देश-देश में वह स्वयं पैदा हो जाता है', (पृष्ठ 246) स्वतंत्र कथन के रूप में तो सही है, लेकिन गलत है जब इस आधारवाक्य के पीछे भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को 'आयातित' कहने की 'कूटनीति' हो। कहानी के अंत में लेखक ने कम्यूनिस्ट को कहा, 'आप गधे हैं, रूसी खूंटे से बंधे।' (वही, पृष्ठ 249) दूसरी ओर कम्यूनिस्ट की एक नई प्रजाति अर्थात 'सनातनी कम्यूनिस्ट' की खोज लेखक करता है जिसका वह स्वयं प्रतिनिधि है। इस 'सनातनी कम्यूनिस्ट' का कर्तव्य है, 'गरीब और अमीर दोनों की रक्षा, सबका भला।' (वही, पृष्ठ 248)

गाय की चिंता किसे है?

पांडेय बेचन शर्मा उग्र की एक कहानी है जिसका शीर्षक 'मूर्खा' है। कहानी में गुलाबो अम्मा हैं जिनके तीन बेटे हैं-रामेश्वर कांग्रेसी, कामेश्वर कम्युनिस्ट और दामोदर हिन्दूसभाई। कम्युनिस्ट लड़के कामेश्वर ने कभी तीस रुपये में एक गाय खरीदी थी। बूढ़ी हो जाने पर 'अर्थ-पिशाच-युग के प्राणी' अर्थात कम्युनिस्ट को गाय अनुपयोगी लगने लगती है। अतः वह उसे कसाई के हाथों बेच देने की गुलाबो अम्मा से अनुमति चाहता है। कांग्रेसी बेटा रामेश्वर भी अम्मा को समझाता है, 'अम्मा, जमाना महंगाई का है और इस गाय पर रुपया-सवा रुपया रोज़ सर्फ़ा पड़ जाता है।' (श्रेष्ठ रचनाएं, पृष्ठ 32) हिंदूसभाई दामोदर सबसे चपड़ निकला। 'उसने तय किया गुलाबो अम्मा के सो जाने पर, आधी रात में गाय को नगर की सीमा से बाहर हाँक आने का।' (पृष्ठ 32) हिंदूसभाई लड़का सब पर बीस पड़ा। उसने खीझ भरे स्वर में कहा, 'उसके (गाय के) मारे सारे घर में गंदगी, जिधर देखो गोबर ही गोबर। सीधे से तुम इसे कभी न निकालतीं, सो मैंने सोचा रातोंरात बाहर हाँक आऊँ।' (वही) (हिंदूसभाई बेटे की बात से 'स्वच्छता अभियान' चला रहे भाजपाई की याद आती है।) उस घर में केवल गुलाबो अम्मा ही है जो लाभ-हानि, उपयोगिता-अनुपयोगिता के तराजू पर तौले बगैर संबंधों को जीना जानती है। कहानी में गाय प्रतीक भर हो सकती है, असली कथा तो बूढ़ी हो चली गुलाबो अम्मा की ही लगती है। अम्मा कहती है, 'यह भी परिवार का प्राणी है, काल-गति से वैसे ही कमजोर बनी हुई, जैसे कि मैं हूँ।' (वही)

स्त्रियों का इतिहास केवल कविता, कहानी और गीत को आधार बनाकर लिखा जाना असंभव है। पहले, महिलाएं अपने मायके से रोजमर्रा की चीजें यथा शीतलपाटी, रुमाल, तकिया का खोल आदि बना-बनवाकर लाती रही हैं। उन पर कभी चित्र बने होते थे तो कभी शब्द। इनमें सिर्फ कला नहीं थी, मन का दर्द भी था। एक-एक शब्द अपने में इतिहास लपेटे होता। तब लड़कियां तकिए के खोल पर मायके के लिए 'आजादघर' लिखतीं और ससुराल के लिए 'जेलघर'। पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने अपनी कहानी 'आँखों में आँसू' में जैसाकि लिखा है, "पिता के घर 'सोलह वर्षों' तक लड़की की तरह रहने के अभ्यास के आगे ससुर के घर 'पतोहू' की तरह रहने का अभ्यास कारावास मालूम पड़ने लगा। जेल तो, सुना है, इतना बुरा नहीं होता। फिर, वहाँ के जीवन की अवधि होती है-साल, दो साल, दस साल। पतोहू का जेल-उफ़! उसकी कड़ी सजा की कोई अवधि नहीं।" (पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', आँखों में आँसू', श्रेष्ठ रचनाएँ-1, पृष्ठ 75)