प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन बहुत ही सावधानी और होशियारी के साथ करने की जरुरत है। कारण कि हमारे अधिकतर ग्रंथ एक समय में और एक व्यक्ति के द्वारा नहीं लिखे गये हैं। महाभारत को 'जय', 'भारत' और 'महाभारत'-तीन चरणों में लिखे जाने की बात पर अधिकतर इतिहासकार एकमत हैं। कई चरणों में लिखे जाने का मतलब होता है कई युगों की कहानियों और घटनाओं को समेटते चलना। प्राचीन ग्रंथों की यह परिस्थितिजन्य विशेषता है। 'महाभारत' के बारे में तो लेखक का स्पष्ट दावा भी है कि 'अबतक का सारा ज्ञान इसमें निबद्ध है, और जो कुछ इसमें नहीं है, वह ज्ञान ही नहीं है।' लेखक की इस 'वीर-घोषणा' से न सिर्फ 'महाभारत' की ऐतिहासिक महत्ता का बोध होता है बल्कि इस बात का भी सहज अनुमान हो जाता है कि लेखक अपने समय में उपलब्ध सम्पूर्ण ज्ञान को एक ही जगह ठूंस-ठांसकर संकलित कर देना चाहता है। इस तरह के उद्देश्य/दावा वाले ग्रन्थों के संपादन के लिए असीम धैर्य और अवकाश की आवश्यकता थी जिसका इन ग्रंथकारों के पास सख्त अभाव दिखता है। उनकी इस 'हड़बड़ी' का कारण वाचिक परंपरा से जन्मा होगा। इसी हड़बड़ी का नतीजा है कि 'महाभारत' में वे तमाम तरह के किस्से आ गये हैं जिनका मूलकथा से कोई संबंध नहीं है। कई बार ये किस्से परस्परविरोधी भी हैं। उनमें आंतरिक संगति का भी अभाव परिलक्षित है।
कहने की जरुरत नहीं कि महाभारत का लेखन और पुनर्लेखन आज इक्कीसवीं शती में भी जारी है। धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा और नरेन्द्र कोहली से लेकर मीनाक्षी नटराजन तक ने अपने-अपने समय में कुछ-कुछ जोड़ने-घटाने की कोशिश की है। और बात है कि कला माध्यमों का फर्क रहा है। किसी ने कहानी, उपन्यास और नाटकों के माध्यम से अपनी बात रखने की कोशिश की तो किसी ने फिल्म/धारावाहिक के माध्यम से। किन्तु कहना होगा कि अधिकतर विद्वानों ने पितृसत्ता के बने-बनाये दृष्टिकोण से ही कथा का पुनर्लेखन किया है। मीनाक्षी नटराजन ने 'सामयिक प्रकाशन' से छपी अपनी पुस्तक 'अपने अपने कुरुक्षेत्र' में इतिहास लेखन के क्षेत्र में व्याप्त पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। यह चुनौती इतिहास को 'नयी आँख' से देखने की वजह से मिल रही है। यह 'नयी आँख' स्त्री विमर्श की अथवा स्त्री जाति की है जिसकी स्पष्ट मान्यता रही है कि अबतक का इतिहास 'पुरुषों का' और 'पुरुषों के द्वारा' लिखा गया इतिहास है। अर्थात अगर इतिहास को 'स्वीकृत फैसलों का एक सिलसिला' मानें तो कहना होगा कि ये फैसले उन न्यायाधीशों के हैं जो इतिहास के अपराधी भी रहे हैं। इसलिए यह इतिहास विश्वसनीय और प्रामाणिक नहीं हो सकता। अविश्वसनीयता का कारण है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के मूल्यांकन हेतु निर्धारित मूल्य और मापदंड अलग-अलग हैं। बात अगर महाभारत से शुरू करें तो जैसाकि चित्रा मुद्गल ने लिखा है, महाभारत की कथा उनलोगों ने लिखी है जो यह मानते रहे थे कि 'कौमार्य भंग स्त्री उनकी स्त्री नहीं हो सकती, किन्तु वह स्वयं की यौनेच्छाओं को मर्यादित करने के लिए बाध्य नहीं' थे। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 10) इसलिए मीनाक्षी नटराजन ने महाभारत की कथा और खासकर स्त्री पात्रों-यथा गांधारी, कुंती, शिखंडी, द्रौपदी आदि को 'स्त्री की आँख' से देखने की कोशिश की है। बार-बार भीष्म को झिड़की देती हुई कि उन्होंने कभी स्त्री के मन को पढ़ने-समझने की कोशिश नहीं की।
महाभारत युद्ध की कथा निजी परिवार, निजी संपत्ति और राज्य के उदय तथा उसके सुदृढ़ीकरण से उत्पन्न अंतर्विरोधों की कथा है। प्राचीन भारत में भूमि पर निजी मालिकाना हक स्थापित किये बगैर निजी संपत्ति की अवधारणा को एक सुदृढ़ आधार प्रदान करना असंभव था। द्रौपदी का पांच पतियों के साथ ब्याहा जाना, जो एक प्रक्षिप्त कथा का हिस्सा है, बहुपति विवाह की याद भर है। यह प्रथा कभी सुदूर अतीत में जब निजी संपत्ति का इस हद तक विकास नहीं हुआ होगा, अस्तित्व में रही होगी।
मीनाक्षी नटराजन की किताब का महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि उन्होंने महाभारत की समस्या को 'स्त्री आँख' से पढ़ने की कोशिश की है, बल्कि इस बात में भी है कि उन्होंने इतिहास बोध से कभी किनारा नहीं किया। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उचित ही इतिहास बोध को 'तीसरी आँख' कहते थे। इस 'तीसरी आँख' से देखे बगैर महाभारत की कथा का सम्यक पाठ असम्भव है क्योंकि यह अपनी काया में तो विशाल है ही, इतिहास की अनगिनत प्रवृत्तियों और परंपराओं को भी एक साथ लिये चलती है। अर्थात महाभारत में बहुपति विवाह के साथ-साथ बहुपत्नी विवाह की भी कथा है। अतः महाभारत की कथा की स्पष्ट समझ के लिए हमें वैदिक काल से चली आ रही परंपरा का भी ध्यान रखना होगा। मीनाक्षी नटराजन ने हमें ठीक ही ध्यान दिलाया है कि महाभारतकालीन समाज संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ परंपराओं और मान्यताओं की अजीब टक्कर है। यहीं इतिहास बोध रूपी तीसरी आँख की आवश्यकता पड़ती है यह देखने के लिए कि कौन-सी मान्यता जीवित रहनेवाली है और कौन-सी दम तोड़नेवाली।
महाभारत में जो कभी-कभी यौन स्वछंदता की प्रवृत्ति दिखती है उसकी भी एक परंपरा है। देवताओं के जीवन में भी यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कहा जाता है कि पुषन ने अपनी माता से प्रेम याचना की। बेबिलोनिया में भी स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का संबंध मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण की एक पुरानी गाथा बताती है कि पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुषों ने माताओं और बहनों के साथ पत्नी की तरह संभोग किया। (रामशरण शर्मा, प्रारंभिक भारत का आर्थिक और सामाजिक इतिहास, पृष्ठ57) ब्रह्मा-सरस्वती का यौन सम्बंध किसी प्राचीन समाज में पिता-पुत्री का 'वैध' यौन संबंध है। 'जन्हु ने भी अपनी पुत्री जाह्नवी से विवाह किया था।' (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, पृष्ठ 161) अवेस्ता के यिम, यिमे, ऋग्वेद के यम-यमी का संवाद भाई-बहन के बीच यौन संबंध के अस्तित्व को ध्वनित करते हैं। सर्वदमन सिंह के मतानुसार मातृनामों से, जिनमें ऋग्वेद के 'मामतेय' का उदाहरण भी है, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व अथवा स्वच्छंद संभोग के संकेत मिलते हैं। (पोलिएंड्री इन एनशिएंट इंडिया, 1978, पृष्ठ 68) प्राचीन मिस्र में भाई-बहन के बीच शादी होती थी क्योंकि संपत्ति का हस्तांतरण मां से पुत्री को होता था। आइसिस ओसिरिस की बहन तथा पत्नी थी। अथर्ववेद में उल्लिखित है कि असुरों में बाप-बेटी के बीच विवाह की प्रथा थी। महाभारत के कर्ण पर्व में मद्र देश के लोगों के विषय में ऐसी अनेक परम्पराओं का उल्लेख है। कहा गया है कि मद्र देश में शाकल की बाह्लीक स्त्रियां नंगी नाचती और हंसती हैं तथा स्वैरणी और स्वेच्छाचारिणी होती हैं और खुले मैदान में मैथुन का आनंद लेती हैं। (कर्ण पर्व, कुंभकोनम प्रकाशन, 37, 22-23) राजतरंगिणी में भी उल्लेख है कि गांधार के ब्राह्मणों में कौटुम्बिक मैथुन प्रचलित था। (राजतरंगिणी, 1.308)
कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह और परिवार रूपी संस्था के अभ्युदय के पहले पिता, पुत्र सभी यौन संबंध कायम कर सकते थे। एंगेल्स ने ठीक ही इसे 'यौन साम्यवाद' की संज्ञा दी है। भारतीय विद्वानों में काशीनाथ राजवाड़े ने भी काफी कुछ लिखा है इस विषय पर। तो यौन स्वच्छंदता की प्रवृत्ति पर बंदिश रातोंरात नहीं लगी है। इतिहास के कई युगों और पीढ़ियों को गुजरना पड़ा है। पांच भाइयों के साथ द्रौपदी की शादी को औचित्य प्रदान करते हुए युधिष्ठिर ने महाभारत में परंपरा की ओर ध्यान दिलाया है। युधिष्ठिर ने इसी परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि गौतम-नन्दिनी जटिला ने सात ऋषियों के साथ व्याह किया था। स्त्री-पुरुष के स्वच्छंद मैथुन के मामले में महाभारत की उक्तियाँ निर्णयात्मक हैं। पाण्डु उस युग की चर्चा करते हैं जिसमें स्त्रियां अनियंत्रित, स्वैरिणी, स्वेच्छाचारिणी और स्वतंत्र होती थीं। स्त्रियां विवाह के पहले भी पुरुषों की ओर आकृष्ट होती थीं लेकिन यह उनके लिए पाप नहीं माना जाता था। (आदि पर्व, 128. 4-5) किन्तु शादी के पहले की यौन क्रिया संबंधी अपनी 'भूल' को कुंती आजीवन अपने पति पाण्डु के समक्ष स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। मीनाक्षी नटराजन ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि एक ही समय और समाज में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य और मापदंड निर्धारित है।
स्वच्छंद यौन संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण संकेत उद्दालक और उनके पुत्र श्वेतकेतु की कथा में मिलता है। श्वेतकेतु ने अपने सामने देखा कि एक ब्राह्मण ने उसकी माता को हाथ पकड़कर खींच लिया है। इससे वह अत्यंत क्रोधित हुआ पर उसके पिता ने श्वेतकेतु से कहा कि इसमें क्रोधित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि संसार की सभी स्त्रियां स्वच्छंद विचरण करती हैं और यह प्रथा अति प्राचीन काल से सनातन धर्म के रूप में चली आ रही है। (आदि पर्व, 128. 9-15) श्वेतकेतु के आख्यान से मिलती-जुलती अन्य अनेक परंपराएं हैं अतः कल्पित कथा कहकर इस आख्यान का तिरस्कार नहीं किया जा सकता है। (डी एन मित्तर, पोजीशन ऑफ वीमेन इन हिन्दू लॉ, पृष्ठ 203)
मुनिकन्या वार्क्षी का ब्याह एक नाम वाले दस प्रचेताओं के साथ हुआ था। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 252) अहिल्या की कथा से भी इतना ही प्रकट होता है कि इंद्र प्राचीन परंपरा का द्योतक है। किसी पुरुष ने स्त्री को स्वतंत्र समझकर अहिल्या से संबंध किया, किन्तु अब सामाजिक परिस्थिति बदल चुकी थी। पितृसत्तात्मक समाज में यह सर्वमान्य नहीं रही थी। राम ने उसी प्राचीन परंपरा में अहिल्या को निर्दोष माना और समाज में जीवित माना। (रांगेय राघव, प्राचीन भारतीय परंपरा और इतिहास, आत्माराम एण्ड संस, 2008, पृष्ठ 201)
हमारा इतिहास-विवेक इस बात को समझने में है कि यह प्रवृत्ति महाभारत के समय मुख्य प्रवृत्ति न होकर मरणासन्न है। दम तोड़ती इस प्रवृत्ति को स्मृति भर ही जगह मिली है हमारे शास्त्रों में। द्रौपदी की सास कुंती स्वयं सूर्य के साथ संभोग करती है। सूर्य ने यहां कुंती को जो समझाया है वह इस संदर्भ के लिए अर्थवान है। सूर्य कहता है कि 'स्वभाव से सभी स्त्री और पुरुष, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने के लिए स्वाधीन हैं। वैवाहिक नियम का बंधन स्वभाव के विकार से उत्पन्न हुआ है।' (रांगेय राघव, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 279) किंतु सच है कि उसकी संतान को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती। ये सारी कहानियां बस इसी बात की ओर संकेत हैं कि ये नये जमाने की बात नहीं है, जुज़रे जमाने की याद भर हैं।
मातृसत्ता के ध्वंस पर पितृसत्ता को स्थापित करती कहानियां भी रची जा रही थीं। कहानी है कि जमदग्नि, सत्यवती और ऋचीक के पुत्र तथा विख्यात भृगुवंशी परशुराम के पिता थे। उसकी पत्नी रेणुका थी। एक दिन रेणुका स्नान करने के लिए नदी-तट गई तो वहां उसने किसी गन्धर्वदंपति को जल में क्रीड़ा करते देखा। उस मनोहर दृश्य को देखकर उसके मन में ईर्ष्या जागी और वह उन दूषित विचारों से कलुषित हो गई। जब वह वापिस घर आई तो क्रोध के अवतार जमदग्नि ने उसे 'सतीत्व की कांति से हीन' देखकर बड़ा धमकाया और अपने पुत्रों को उसका सिर काट देने की आज्ञा दी। पहले चारों पुत्रों ने ऐसा क्रूर दुष्कृत्य करने में आनाकानी की। परशुराम उनका 'सबसे छोटा पुत्र' था। उसने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और कुल्हाड़े से अपनी माता का सिर काट डाला। शांत और प्रसन्न जमदग्नि ने परशुराम से वरदान मांगने के लिए आग्रह किया। परशुराम ने अपनी माता को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की जो अविलंब स्वीकार की गई। (आप्टे, संस्कृत-हिंदी शब्दकोश, पृष्ठ 438) यह कहानी हमें बताती है कि मातृसत्ता की कब्र पर पितृसत्ता के अंकुर फूटे हैं।
मीनाक्षी नटराजन की पुस्तक की नवीनता और अद्वितीयता इस बात में है कि वह ऐतिहासिक संदर्भ में इतिहास बोध के साथ कथा को समझती है। गांधारी, द्रौपदी, कुंती आदि के स्त्री मन की पीड़ा को समझती है। मीनाक्षी की द्रौपदी पर बहुपतित्व कुन्ती के द्वारा थोपा हुआ फैसला नहीं था बल्कि स्वयं द्रौपदी का लिया निर्णय था। इतना ही नहीं, सभी पतियों के लिए बहुविवाह की व्यवस्था देना भी द्रौपदी ही का निर्णय था। (अपने अपने कुरुक्षेत्र, पृष्ठ 143) दरअसल, द्रौपदी का प्रस्ताव था कि वह बारी-बारी प्रत्येक पांडव की पत्नी के रूप में एक-वर्ष का समय व्यतीत करेगी। उस एक वर्ष में अन्य पांडव बंधुओं के प्रति उसका व्यवहार पत्नी का नहीं होगा। इस व्यवस्था में प्रत्येक पाण्डव बंधु को द्रौपदी के संग के लिए पांच वर्ष की प्रतीक्षा करनी ही पड़ती। अतः उनका बहुविवाह आवश्यक था। (वही, पृष्ठ 145)
यह महाभारत की कथा का स्त्री पाठ है। पुस्तक में प्रवाह और अद्भुत रोचकता है। एक सांस में पढ़ी जा सकने वाली दृष्टिसम्पन्न किताब है। इसे पढ़ना समृद्ध होना है। जहाँ तक भाषा की बात है, एकाध स्थल को छोड़ दें तो पुस्तक में अशुध्दियों की कमी खलती है!